बेनेदेत्तो क्रोचे (Benedetto Croce) आधुनिक पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र के प्रमुख विचारक और अभिव्यंजनावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं। वे मूलतः आत्मवादी दार्शनिक थे। उनके साहित्यिक एवं सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन का केंद्रीय प्रश्न यह था कि कला का वास्तविक तत्त्व क्या है और उसकी आत्मा किसे कहा जाए। क्रोचे ने कला के मूल में कलाकार की चेतना, अंतःप्रज्ञा और आंतरिक अभिव्यक्ति को प्रतिष्ठित किया। उनके अनुसार कला का वास्तविक स्वरूप किसी बाहरी वस्तु, विषय या उपयोगिता में नहीं, बल्कि कलाकार के अंतर्मन में उत्पन्न होने वाली कलात्मक अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति में निहित है।
सहजानुभूति और तर्कज्ञान
क्रोचे के अनुसार मनुष्य को संसार का बोध मुख्यतः दो प्रकार से होता है—सहजानुभूति (Intuition) और तर्कज्ञान (Concept)। सहजानुभूति भावात्मक एवं प्रत्यक्ष बोध है। यह ऐसी मूर्त अनुभूति है, जो बिना तर्क-वितर्क या बौद्धिक विश्लेषण के मन में स्वतः उत्पन्न होती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, यह मूर्त भावना अथवा कल्पना आत्मा की अपनी क्रिया है, जो दृश्य जगत के विविध रूपों और व्यापारों को सामग्री के रूप में ग्रहण करके सक्रिय होती है।
क्रोचे ने इसी सहज और स्वयंप्रकाशित ज्ञान को अंतःप्रज्ञा या सहजानुभूति कहा है। उनके अनुसार कला का जन्म इसी सहजानुभूति से होता है। इसके विपरीत तर्कज्ञान बुद्धि-प्रधान होता है। इसमें मनुष्य विचार, तर्क और अवधारणाओं के माध्यम से जगत को समझने का प्रयास करता है। इस प्रकार सहजानुभूति का संबंध कला से और तर्कज्ञान का संबंध बौद्धिक चिंतन से है।
सहजानुभूति और अभिव्यंजना का संबंध
क्रोचे के अभिव्यंजनावाद का सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है कि सहजानुभूति और अभिव्यंजना अभिन्न हैं। सहजानुभूति के बिना अभिव्यंजना और अभिव्यंजना के बिना सहजानुभूति की कल्पना नहीं की जा सकती। उनके अनुसार कलाकार के मन में जब कोई अनुभूति स्पष्ट, मूर्त और संगठित रूप ग्रहण कर लेती है, तभी वह कलात्मक अभिव्यक्ति बनती है।
क्रोचे ने ‘अभिव्यंजना’ शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया है। सहज ज्ञान जब कलाकार की चेतना के साँचे में ढलकर निश्चित रूप ग्रहण करता है, तो वही कल्पना है और यही कल्पना मूलतः आंतरिक अभिव्यंजना है। बाद में यह आंतरिक रूप शब्द, रंग, रेखा, ध्वनि आदि माध्यमों से बाह्य रूप में व्यक्त हो सकती है। इस प्रकार कला की वास्तविक सृष्टि कलाकार के भीतर होती है, बाहर नहीं।
क्रोचे के अनुसार मनुष्य बाहरी जगत को केवल ग्रहण और अनुभव करता है; उसकी वास्तविक कलात्मक सृष्टि तब होती है, जब वह अनुभूति कलाकार की अंतःप्रज्ञा के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। इसलिए वे सहजानुभूति को आंतरिक अभिव्यंजना अथवा आंतरिक रूप-रचना मानते हैं। यही सौंदर्य का मूल आधार है।
क्रोचे का सौंदर्य-दर्शन
क्रोचे के अनुसार सौंदर्य किसी बाहरी वस्तु में स्वतंत्र रूप से विद्यमान गुण नहीं है। सौंदर्य कलाकार की आंतरिक सृजनात्मक क्रिया से उत्पन्न होता है। अर्थात् सौंदर्य की वास्तविक सत्ता बाह्य पदार्थ में नहीं, बल्कि कलाकार की अनुभूति और अभिव्यक्ति में है। इसी कारण कला की सफलता का निर्धारण उसके बाहरी आकार या विषय से नहीं, बल्कि उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति की पूर्णता से होता है।
क्रोचे के सिद्धांत की प्रमुख स्थापनाएँ इस प्रकार हैं—
- सहजज्ञान और अभिव्यंजना में अभेद है।
- प्रत्येक वास्तविक सहजज्ञान कलात्मक स्वरूप रखता है।
- कला-सृष्टि मूलतः आंतरिक है।
- कला वस्तु में नहीं, उसके कलात्मक रूप में निहित है।
- कला अखंड और अविभाज्य है।
क्रोचे और कुन्तक का अभिव्यंजनावाद
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने क्रोचे के अभिव्यंजनावाद को ‘भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान’ कहते हुए इसे ‘वाग्वैचित्र्यवाद’ की संज्ञा दी। इसके बाद क्रोचे के अभिव्यंजनावाद और आचार्य कुन्तक के वक्रोक्तिवाद की तुलना की परंपरा विकसित हुई। दोनों सिद्धांतों में कुछ महत्त्वपूर्ण समानताएँ हैं, किंतु उनके आधार और निष्कर्षों में पर्याप्त अंतर भी है।
क्रोचे और कुन्तक दोनों अभिव्यक्ति को काव्य का मूल तत्त्व मानते हैं। दोनों के यहाँ कला में कल्पना और सृजनात्मकता की प्रधानता है तथा कलात्मक अभिव्यक्ति को अखंड, अविभाज्य और अद्वितीय माना गया है। इस दृष्टि से दोनों कलावादी चिंतक हैं।
किन्तु दोनों में मूलभूत अंतर है। कुन्तक आलंकारिक आचार्य हैं, जबकि क्रोचे दार्शनिक। कुन्तक के वक्रोक्तिवाद में काव्य-सौंदर्य के लिए वक्रता और वैदग्ध्यपूर्ण अभिव्यक्ति महत्त्वपूर्ण है, जबकि क्रोचे के यहाँ आंतरिक अभिव्यंजना ही कला का मूल स्वरूप है। कुन्तक आनंद को सौंदर्य की सिद्धि और उसके कारण दोनों से जोड़ते हैं, जबकि क्रोचे के अनुसार सौंदर्य और अभिव्यंजना अपने आप में ही साध्य हैं। अभिव्यंजनावाद में कला के मूल्यांकन का आधार मुख्यतः उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति है; इसके विपरीत वक्रोक्तिवाद काव्य की अभिव्यक्ति के साथ उसके व्यापक काव्यगत मूल्यों की भी उपेक्षा नहीं करता। इसी प्रकार कुन्तक वक्रता और सामान्य उक्ति के बीच स्पष्ट अंतर करते हैं, जबकि क्रोचे कला की मूल अभिव्यंजना के स्तर पर इस प्रकार का भेद स्वीकार नहीं करते।
इस प्रकार अभिव्यंजनावाद काव्य की आत्मा, उसकी रचना-प्रक्रिया और कलाकार की आंतरिक अनुभूति को समझने का महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है। काव्य-सृजन को बाहरी अनुकरण के बजाय अंतःप्रज्ञा और आंतरिक अभिव्यक्ति से जोड़ना इसकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है। इसी कारण आधुनिक साहित्यिक आलोचना और सौंदर्यशास्त्र के विकास में क्रोचे के अभिव्यंजनावाद का विशिष्ट स्थान है।
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