यह प्रश्न केवल एक नैतिक चिंता नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संरचना से जुड़ा गहरा सवाल है। अक्सर ऐसा लगता है कि जैसे ही किसी संकट की स्थिति पैदा होती है—युद्ध, महामारी, प्राकृतिक आपदा या आपूर्ति संकट—कालाबाज़ारी और भ्रष्टाचारी अचानक सक्रिय हो जाते हैं। इससे यह धारणा बनती है कि क्या भारतीय समाज इन बुराइयों का इतना अभ्यस्त हो चुका है कि अब इन्हें सामान्य मानने लगा है।
भारत एक प्राचीन सभ्यता और लोकतांत्रिक परंपराओं वाला देश है, जहाँ सत्य, धर्म, न्याय और लोककल्याण जैसे आदर्शों की चर्चा सदियों से होती रही है। लेकिन वास्तविकता यह है कि स्वतंत्रता के लगभग 79 वर्षों बाद भी भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी को पूरी तरह समाप्त करने की बात करना यथार्थ से दूर लगता है। विडंबना यह है कि समय के साथ ये समस्याएँ कम होने के बजाय कई रूपों में बढ़ती दिखाई देती हैं। इतना ही नहीं, बदलती आर्थिक और तकनीकी परिस्थितियों के साथ भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी के नए-नए तरीके भी विकसित हो गए हैं। पहले जहाँ जमाखोरी, राशन की कालाबाज़ारी या लाइसेंस-परमिट के लिए रिश्वत जैसे पारंपरिक तरीके अधिक दिखाई देते थे, वहीं आज ठेकों में कमीशन, फर्जी कंपनियों के माध्यम से धन का स्थानांतरण, कर चोरी, डिजिटल माध्यमों से आर्थिक हेरफेर और प्रभाव के दुरुपयोग जैसे अधिक जटिल रूप सामने आ रहे हैं।
इतिहास पर नजर डालें तो
संकट के समय कालाबाज़ारी की घटनाएँ बार-बार सामने आई हैं। 1971 के भारत-पाकिस्तान
युद्ध के दौरान आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी और कालाबाज़ारी की शिकायतें आई थीं।
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी कुछ क्षेत्रों में ईंधन और आवश्यक वस्तुओं की
कीमतों में अचानक वृद्धि देखी गई। हाल के वर्षों में कोविड-19 महामारी के दौरान तो
यह समस्या बेहद स्पष्ट रूप में सामने आई। ऑक्सीजन सिलेंडर, जीवन रक्षक दवाइयों, अस्पताल के बेड और यहां तक
कि एंबुलेंस सेवाओं तक में कई जगहों पर अत्यधिक कीमत वसूली और कालाबाज़ारी की
घटनाएँ सामने आईं। कई राज्यों में पुलिस ने ऑक्सीजन और दवाओं की जमाखोरी करने वाले
गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई भी की।
इसी प्रकार आर्थिक संकट या
आपूर्ति में कमी के समय भी कालाबाज़ारी सक्रिय हो जाती है। उदाहरण के लिए, 1970 और 1980 के दशक में जब भारत में “लाइसेंस-परमिट राज” का दौर था, तब कई वस्तुओं की कमी रहती थी। उस समय स्कूटर, टेलीफोन कनेक्शन, सीमेंट, स्टील और यहां तक कि गैस सिलेंडर तक पाने के लिए वर्षों
इंतजार करना पड़ता था। इस कमी ने एक समानांतर “ब्लैक मार्केट” को जन्म दिया, जहाँ वही वस्तुएँ अधिक कीमत
देकर तुरंत प्राप्त की जा सकती थीं। यह व्यवस्था धीरे-धीरे समाज में इतनी सामान्य
हो गई कि कई लोग इसे व्यवस्था का हिस्सा मानने लगे।
भ्रष्टाचार
का प्रश्न भी इसी तरह जटिल है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी करप्शन
परसेप्शन इंडेक्स 2023 में भारत 180 देशों में लगभग मध्य स्थान पर रहा। यह दर्शाता
है कि भारत में भ्रष्टाचार की धारणा अभी भी एक महत्वपूर्ण समस्या के रूप में मौजूद
है। भारत में छोटे-मोटे प्रशासनिक कार्यों से लेकर बड़े ठेकों और परियोजनाओं तक कई
स्तरों पर भ्रष्टाचार के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
हालाँकि
यह भी सच है कि पिछले कुछ दशकों में भारत ने भ्रष्टाचार को कम करने के लिए कई
संस्थागत कदम उठाए हैं। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम 2005 ने सरकारी
कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके माध्यम से आम
नागरिक सरकारी दस्तावेज़ों और निर्णयों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
इसी तरह लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 भ्रष्टाचार के खिलाफ एक संस्थागत व्यवस्था
स्थापित करने के उद्देश्य से लाया गया।
तकनीकी
बदलावों ने भी भ्रष्टाचार को कम करने में कुछ हद तक मदद की है। डिजिटल भुगतान, आधार आधारित पहचान प्रणाली और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) जैसी योजनाओं ने सरकारी सब्सिडी और सहायता सीधे
लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुँचाने की व्यवस्था बनाई है। सरकार के अनुसार
डीबीटी के माध्यम से कई योजनाओं में बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और हजारों
करोड़ रुपये की बचत हुई है।
इसके
अलावा सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण—जैसे ऑनलाइन पासपोर्ट आवेदन, आयकर रिटर्न, भूमि रिकॉर्ड और रेलवे टिकट
बुकिंग—ने भी कई क्षेत्रों में
रिश्वतखोरी की संभावनाओं को कम किया है। जब प्रक्रियाएँ पारदर्शी और स्वचालित हो
जाती हैं तो व्यक्तिगत हस्तक्षेप कम होता है, जिससे भ्रष्टाचार की
गुंजाइश घटती है।
फिर
भी समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसका एक कारण सामाजिक मानसिकता भी है। कई
बार लोग स्वयं भी छोटे-मोटे “जुगाड़” को गलत नहीं मानते। उदाहरण के लिए टैक्स बचाने के लिए नकद
लेन-देन करना, संपत्ति के सौदे में
वास्तविक कीमत से कम दिखाना या नियमों से बचने के लिए रिश्वत देना—ये सब व्यवहार कई बार सामाजिक रूप से स्वीकार्य माने जाते हैं। जब
समाज का एक बड़ा वर्ग इन प्रथाओं को सामान्य मानने लगे तो भ्रष्टाचार को समाप्त
करना और कठिन हो जाता है।
दूसरी
ओर यह भी सच है कि भारतीय समाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता भी बढ़ रही है।
मीडिया और सोशल मीडिया ने कई मामलों को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
है। आज किसी भी घोटाले या अनियमितता की खबर कुछ ही घंटों में पूरे देश में फैल
जाती है। इससे सरकार और प्रशासन पर जवाबदेही का दबाव बढ़ता है।
युवा
पीढ़ी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। आज के युवा पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक शासन की मांग अधिक जोर से कर रहे हैं।
कई सामाजिक आंदोलनों और नागरिक अभियानों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत तैयार किया
है। 2011 का अन्ना हज़ारे आंदोलन इसका एक उदाहरण है,
जिसने
भ्रष्टाचार के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना दिया था।
आर्थिक
सुधारों और उदारीकरण के बाद भारत में कई क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, जिससे वस्तुओं की कमी कम हुई है और कालाबाज़ारी की
संभावनाएँ भी घटती हैं। उदाहरण के लिए आज टेलीफोन कनेक्शन या स्कूटर के लिए वर्षों
इंतजार नहीं करना पड़ता, जैसा कि 1980 के दशक में
होता था। बाजार में उपलब्धता बढ़ने से “ब्लैक मार्केट” की आवश्यकता भी कम हो जाती है।
फिर
भी कुछ क्षेत्रों में संकट के समय जमाखोरी और मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति अभी भी
दिखाई देती है। इसका कारण केवल लालच नहीं बल्कि कमजोर निगरानी, प्रशासनिक ढिलाई और कानूनी कार्रवाई में देरी भी है। जब तक
नियमों का सख्ती से पालन नहीं होगा और दोषियों को समय पर दंड नहीं मिलेगा, तब तक ऐसी प्रवृत्तियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं होंगी।
निष्कर्षतः
यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि भारतीय समाज भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी का
अभ्यस्त हो चुका है। लेकिन यह भी सच है कि इन बुराइयों के प्रति समाज की
संवेदनशीलता कई बार कमजोर पड़ जाती है और लोग उन्हें व्यवस्था का “सामान्य हिस्सा” मान लेते हैं।
समाधान
केवल कड़े कानूनों में नहीं बल्कि सामाजिक चेतना में भी है। जब नागरिक ईमानदारी को
महत्व देंगे, नियमों का पालन करेंगे और
भ्रष्टाचार को स्वीकार नहीं करेंगे, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव
होगा। पारदर्शी प्रशासन, प्रभावी कानून और जागरूक
समाज—इन तीनों के संयुक्त प्रयास
से ही भारत इन चुनौतियों पर काबू पा सकता है।