Thursday, 19 March 2026

क्या भारतीय समाज कालाबाज़ारी और भ्रष्टाचार का अभ्यस्त हो गया है?

यह प्रश्न केवल एक नैतिक चिंता नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संरचना से जुड़ा गहरा सवाल है। अक्सर ऐसा लगता है कि जैसे ही किसी संकट की स्थिति पैदा होती हैयुद्ध, महामारी, प्राकृतिक आपदा या आपूर्ति संकटकालाबाज़ारी और भ्रष्टाचारी अचानक सक्रिय हो जाते हैं। इससे यह धारणा बनती है कि क्या भारतीय समाज इन बुराइयों का इतना अभ्यस्त हो चुका है कि अब इन्हें सामान्य मानने लगा है।

भारत एक प्राचीन सभ्यता और लोकतांत्रिक परंपराओं वाला देश है, जहाँ सत्य, धर्म, न्याय और लोककल्याण जैसे आदर्शों की चर्चा सदियों से होती रही है। लेकिन वास्तविकता यह है कि स्वतंत्रता के लगभग 79 वर्षों बाद भी भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी को पूरी तरह समाप्त करने की बात करना यथार्थ से दूर लगता है। विडंबना यह है कि समय के साथ ये समस्याएँ कम होने के बजाय कई रूपों में बढ़ती दिखाई देती हैं। इतना ही नहीं, बदलती आर्थिक और तकनीकी परिस्थितियों के साथ भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी के नए-नए तरीके भी विकसित हो गए हैं। पहले जहाँ जमाखोरी, राशन की कालाबाज़ारी या लाइसेंस-परमिट के लिए रिश्वत जैसे पारंपरिक तरीके अधिक दिखाई देते थे, वहीं आज ठेकों में कमीशन, फर्जी कंपनियों के माध्यम से धन का स्थानांतरण, कर चोरी, डिजिटल माध्यमों से आर्थिक हेरफेर और प्रभाव के दुरुपयोग जैसे अधिक जटिल रूप सामने आ रहे हैं।

इतिहास पर नजर डालें तो संकट के समय कालाबाज़ारी की घटनाएँ बार-बार सामने आई हैं। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी और कालाबाज़ारी की शिकायतें आई थीं। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भी कुछ क्षेत्रों में ईंधन और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में अचानक वृद्धि देखी गई। हाल के वर्षों में कोविड-19 महामारी के दौरान तो यह समस्या बेहद स्पष्ट रूप में सामने आई। ऑक्सीजन सिलेंडर, जीवन रक्षक दवाइयों, अस्पताल के बेड और यहां तक कि एंबुलेंस सेवाओं तक में कई जगहों पर अत्यधिक कीमत वसूली और कालाबाज़ारी की घटनाएँ सामने आईं। कई राज्यों में पुलिस ने ऑक्सीजन और दवाओं की जमाखोरी करने वाले गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई भी की।

इसी प्रकार आर्थिक संकट या आपूर्ति में कमी के समय भी कालाबाज़ारी सक्रिय हो जाती है। उदाहरण के लिए, 1970 और 1980 के दशक में जब भारत में लाइसेंस-परमिट राजका दौर था, तब कई वस्तुओं की कमी रहती थी। उस समय स्कूटर, टेलीफोन कनेक्शन, सीमेंट, स्टील और यहां तक कि गैस सिलेंडर तक पाने के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता था। इस कमी ने एक समानांतर ब्लैक मार्केटको जन्म दिया, जहाँ वही वस्तुएँ अधिक कीमत देकर तुरंत प्राप्त की जा सकती थीं। यह व्यवस्था धीरे-धीरे समाज में इतनी सामान्य हो गई कि कई लोग इसे व्यवस्था का हिस्सा मानने लगे।

भ्रष्टाचार का प्रश्न भी इसी तरह जटिल है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी करप्शन परसेप्शन इंडेक्स 2023 में भारत 180 देशों में लगभग मध्य स्थान पर रहा। यह दर्शाता है कि भारत में भ्रष्टाचार की धारणा अभी भी एक महत्वपूर्ण समस्या के रूप में मौजूद है। भारत में छोटे-मोटे प्रशासनिक कार्यों से लेकर बड़े ठेकों और परियोजनाओं तक कई स्तरों पर भ्रष्टाचार के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं।

हालाँकि यह भी सच है कि पिछले कुछ दशकों में भारत ने भ्रष्टाचार को कम करने के लिए कई संस्थागत कदम उठाए हैं। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम 2005 ने सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके माध्यम से आम नागरिक सरकारी दस्तावेज़ों और निर्णयों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसी तरह लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 भ्रष्टाचार के खिलाफ एक संस्थागत व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से लाया गया।

तकनीकी बदलावों ने भी भ्रष्टाचार को कम करने में कुछ हद तक मदद की है। डिजिटल भुगतान, आधार आधारित पहचान प्रणाली और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) जैसी योजनाओं ने सरकारी सब्सिडी और सहायता सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुँचाने की व्यवस्था बनाई है। सरकार के अनुसार डीबीटी के माध्यम से कई योजनाओं में बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और हजारों करोड़ रुपये की बचत हुई है।

इसके अलावा सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरणजैसे ऑनलाइन पासपोर्ट आवेदन, आयकर रिटर्न, भूमि रिकॉर्ड और रेलवे टिकट बुकिंगने भी कई क्षेत्रों में रिश्वतखोरी की संभावनाओं को कम किया है। जब प्रक्रियाएँ पारदर्शी और स्वचालित हो जाती हैं तो व्यक्तिगत हस्तक्षेप कम होता है, जिससे भ्रष्टाचार की गुंजाइश घटती है।

फिर भी समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इसका एक कारण सामाजिक मानसिकता भी है। कई बार लोग स्वयं भी छोटे-मोटे जुगाड़को गलत नहीं मानते। उदाहरण के लिए टैक्स बचाने के लिए नकद लेन-देन करना, संपत्ति के सौदे में वास्तविक कीमत से कम दिखाना या नियमों से बचने के लिए रिश्वत देनाये सब व्यवहार कई बार सामाजिक रूप से स्वीकार्य माने जाते हैं। जब समाज का एक बड़ा वर्ग इन प्रथाओं को सामान्य मानने लगे तो भ्रष्टाचार को समाप्त करना और कठिन हो जाता है।

दूसरी ओर यह भी सच है कि भारतीय समाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता भी बढ़ रही है। मीडिया और सोशल मीडिया ने कई मामलों को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज किसी भी घोटाले या अनियमितता की खबर कुछ ही घंटों में पूरे देश में फैल जाती है। इससे सरकार और प्रशासन पर जवाबदेही का दबाव बढ़ता है।

युवा पीढ़ी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। आज के युवा पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक शासन की मांग अधिक जोर से कर रहे हैं। कई सामाजिक आंदोलनों और नागरिक अभियानों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत तैयार किया है। 2011 का अन्ना हज़ारे आंदोलन इसका एक उदाहरण है, जिसने भ्रष्टाचार के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना दिया था।

आर्थिक सुधारों और उदारीकरण के बाद भारत में कई क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है, जिससे वस्तुओं की कमी कम हुई है और कालाबाज़ारी की संभावनाएँ भी घटती हैं। उदाहरण के लिए आज टेलीफोन कनेक्शन या स्कूटर के लिए वर्षों इंतजार नहीं करना पड़ता, जैसा कि 1980 के दशक में होता था। बाजार में उपलब्धता बढ़ने से ब्लैक मार्केटकी आवश्यकता भी कम हो जाती है।

फिर भी कुछ क्षेत्रों में संकट के समय जमाखोरी और मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति अभी भी दिखाई देती है। इसका कारण केवल लालच नहीं बल्कि कमजोर निगरानी, प्रशासनिक ढिलाई और कानूनी कार्रवाई में देरी भी है। जब तक नियमों का सख्ती से पालन नहीं होगा और दोषियों को समय पर दंड नहीं मिलेगा, तब तक ऐसी प्रवृत्तियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं होंगी।

निष्कर्षतः यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि भारतीय समाज भ्रष्टाचार और कालाबाज़ारी का अभ्यस्त हो चुका है। लेकिन यह भी सच है कि इन बुराइयों के प्रति समाज की संवेदनशीलता कई बार कमजोर पड़ जाती है और लोग उन्हें व्यवस्था का सामान्य हिस्सामान लेते हैं।

समाधान केवल कड़े कानूनों में नहीं बल्कि सामाजिक चेतना में भी है। जब नागरिक ईमानदारी को महत्व देंगे, नियमों का पालन करेंगे और भ्रष्टाचार को स्वीकार नहीं करेंगे, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा। पारदर्शी प्रशासन, प्रभावी कानून और जागरूक समाजइन तीनों के संयुक्त प्रयास से ही भारत इन चुनौतियों पर काबू पा सकता है।

Tuesday, 10 March 2026

डिफेंस फोर्सेज विजन 2047 : भविष्य की भारतीय सेना का रोडमैप

10 मार्च को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक महत्वपूर्ण सैन्य दृष्टि दस्तावेज जारी किया, जिसका नाम “डिफेंस फोर्सेज विजन 2047 : रोडमैप फॉर फ्यूचर रेडी इंडियन मिलिटरी” है। यह दस्तावेज हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ द्वारा तैयार किया गया एक व्यापक रणनीतिक खाका है। इसका मुख्य उद्देश्य 2047 तक भारतीय सेना को आधुनिक, एकीकृत और तकनीकी रूप से अत्यधिक उन्नत बनाना है, ताकि भारत के विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य को सुरक्षा के मजबूत आधार के साथ हासिल किया जा सके।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह विजन डॉक्यूमेंट बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। नई तकनीकों, उभरती युद्ध रणनीतियों और आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों के कारण सेना में रणनीतिक सुधार, क्षमता विस्तार और संगठनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता बताई गई है। इस योजना के तहत भारतीय सेना को भविष्य में एकीकृत, मल्टी-डोमेन और तेज प्रतिक्रिया देने वाली फोर्स के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि वह किसी भी संभावित खतरे का प्रभावी ढंग से सामना कर सके।

इस दस्तावेज का एक महत्वपूर्ण आधार तीनों सेनाओं—थलसेना, नौसेना और वायुसेना—के बीच बेहतर तालमेल और सहयोग है। इससे सैन्य योजना, संयुक्त अभियान और नई सैन्य क्षमताओं के विकास में तेजी आएगी।

विजन 2047 की प्रमुख विशेषताएँ

  • तीनों सेनाएँ मिलकर अधिक तेज, सटीक और प्रभावी तरीके से मिशन पूरा कर सकेंगी।

  • भविष्य के युद्धों को ध्यान में रखते हुए नवाचार, उन्नत तकनीक और आधुनिक प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जाएगी।

  • सेना नई तकनीकों को तेजी से अपनाने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलने में सक्षम होगी।

  • रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर दिया गया है।

  • घरेलू रक्षा उत्पादन और स्वदेशी तकनीक के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे अर्थव्यवस्था और उद्योग दोनों को लाभ मिलेगा।

क्यों महत्वपूर्ण है यह दस्तावेज

डिफेंस फोर्सेज विजन 2047 में कम अवधि, मध्य अवधि और दीर्घ अवधि के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय किए गए हैं। इन लक्ष्यों के माध्यम से सैन्य क्षमताओं का विकास, संस्थागत सुधार और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक सहयोग को मजबूत किया जाएगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस दस्तावेज में सुरक्षा को केवल सैन्य ताकत तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि कूटनीति, तकनीक और आर्थिक शक्ति को भी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का हिस्सा माना गया है। यही समग्र दृष्टिकोण भारत को आने वाले दशकों में जटिल सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए अधिक सक्षम बना सकता है।

Tuesday, 20 January 2026

अमेरिकी ट्रेजरी से दूरी: भारत की बदलती आर्थिक सोच

 भारत द्वारा अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में निवेश घटाना केवल एक वित्तीय आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन और बदलती आर्थिक प्राथमिकताओं के बीच भारत की परिपक्व होती रणनीतिक सोच का संकेत है। ऐसे समय में, जब अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ को लेकर तनाव बना हुआ है और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात लगातार अस्थिर हो रहे हैं, भारत का यह कदम उसकी दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को लेकर बढ़ती सतर्कता को दर्शाता है। 


डाइवर्सिफिकेशन की मजबूरी

पिछले एक साल में अमेरिकी ट्रेजरी में भारत की हिस्सेदारी में 21 प्रतिशत की गिरावट यह साफ़ करती है कि भारत अब “डॉलर-केन्द्रित” रिज़र्व रणनीति से धीरे-धीरे बाहर निकलना चाहता है। भले ही अमेरिकी बॉन्ड यील्ड आकर्षक बनी रही हों, लेकिन केवल रिटर्न के आधार पर निर्णय लेना आज के अनिश्चित वैश्विक माहौल में जोखिम भरा हो सकता है। डॉलर में संभावित कमजोरी, अमेरिकी फेड की भविष्य की नीतियाँ और घरेलू आर्थिक संकेतकों की अनिश्चितता—इन सबने मिलकर भारत को अपने रिज़र्व को फैलाने के लिए प्रेरित किया है।

डॉलर निर्भरता पर पुनर्विचार

अमेरिकी डॉलर दशकों से वैश्विक रिज़र्व मुद्रा रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में उस पर निर्भरता को लेकर सवाल बढ़े हैं। व्यापार प्रतिबंधों, आर्थिक दबावों और मुद्रा को भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने ने कई देशों को वैकल्पिक रास्तों पर सोचने को मजबूर किया है। भारत का ट्रेजरी निवेश कम करना इसी वैश्विक रुझान का हिस्सा है, जहाँ देश अपनी आर्थिक संप्रभुता को मज़बूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

सोने की ओर बढ़ता झुकाव

भारत के लिए सोना केवल एक पारंपरिक संपत्ति नहीं, बल्कि संकट के समय भरोसेमंद सुरक्षा कवच रहा है। वैश्विक महंगाई, युद्ध जैसे हालात और मुद्रा अस्थिरता के दौर में सोने की उपयोगिता फिर से बढ़ी है। यदि भारतीय रिज़र्व बैंक अपने गोल्ड रिज़र्व में बढ़ोतरी करता है, तो यह न केवल जोखिम प्रबंधन का साधन होगा, बल्कि वैश्विक केंद्रीय बैंकों के बढ़ते गोल्ड-रुझान के अनुरूप भी होगा।

संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती

हालाँकि अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश घटाना एक साहसिक और दूरदर्शी कदम माना जा सकता है, लेकिन इसमें जोखिम भी निहित हैं। अमेरिकी बॉन्ड अभी भी तरलता और सुरक्षा के लिहाज़ से दुनिया के सबसे भरोसेमंद साधनों में गिने जाते हैं। इसलिए भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह विविधीकरण और स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखे—ताकि विदेशी मुद्रा भंडार न तो अत्यधिक जोखिम में पड़े और न ही अवसरों से वंचित रहे।

निष्कर्ष

अमेरिकी ट्रेजरी से भारत की आंशिक दूरी किसी तत्काल प्रतिक्रिया से अधिक, एक सोची-समझी और दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है। यह कदम बताता है कि भारत अब वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों का केवल अनुयायी नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर निर्णय लेने वाला देश बन रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस विविधीकरण को किस गति और किस दिशा में आगे बढ़ाता है—क्योंकि यही उसकी आर्थिक मजबूती और रणनीतिक स्वायत्तता का आधार बनेगा।

Monday, 12 January 2026

चीन-रूस और अमेरिका के क्लब में भारत की धमाकेदार एंट्री: DRDO ने किया ‘हाइपरसोनिक’ इंजन का सफल टेस्ट

 चीन-रूस और अमेरिका के क्लब में भारत की धमाकेदार एंट्री: DRDO ने किया ‘हाइपरसोनिक’ इंजन का सफल टेस्ट


भारत ने रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक छलांग लगाई है। देश के वैज्ञानिकों ने एक अत्याधुनिक हाइपरसोनिक स्क्रैमजेट इंजन विकसित कर लिया है, जो दुश्मन के रडार से बचे रहते हुए बेहद तेज़ गति से हमला करने में सक्षम है। हैदराबाद में हाल ही में हुए परीक्षण के दौरान इस इंजन ने लगातार 12 मिनट से अधिक समय तक सफल संचालन कर अपनी विश्वसनीयता साबित की। इस उपलब्धि के साथ भारत अब उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है, जिनके पास इतनी उन्नत रक्षा तकनीक मौजूद है।
क्या है स्क्रैमजेट तकनीक और क्यों है यह खास?
यह इंजन हाइपरसोनिक स्क्रैमजेट (Supersonic Combustion Ramjet) तकनीक पर आधारित है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी असाधारण रफ्तार है—यह ध्वनि की गति से पांच गुना से भी अधिक, यानी करीब 6,100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर सकता है। इतनी तेज़ गति के कारण दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का लगभग कोई अवसर नहीं मिलता।
इसके अलावा, यह इंजन वातावरण से ही ऑक्सीजन लेकर ईंधन जलाता है। इससे मिसाइल को अलग से ऑक्सीजन ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती, वह हल्की बनती है और लंबी दूरी तक अत्यधिक सटीक वार करने में सक्षम होती है। यही वजह है कि यह तकनीक आधुनिक युद्धों में गेम-चेंजर मानी जा रही है।
DRDL की उपलब्धि और आत्मनिर्भर भारत की दिशा
हैदराबाद स्थित डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेटरी (DRDL) ने इस इंजन का डिज़ाइन और विकास किया है। यह सफल परीक्षण इस बात का संकेत है कि भारत अब अपनी खुद की हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल के विकास के बेहद करीब पहुंच चुका है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता को देश के लिए एक ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि न सिर्फ भविष्य के युद्धों में भारत की रणनीतिक क्षमता को मजबूत करेगी, बल्कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को भी सशक्त रूप से दुनिया के सामने रखेगी।

Wednesday, 24 December 2025

भारतीय स्मृति परंपरा और मनुस्मृति पर बहस

 भारतीय सामाजिक व्यवस्था और कानून–परंपरा को लेकर अक्सर एक ही ग्रंथ—मनुस्मृति—को केंद्र में रखकर बहस की जाती है, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक व्यापक, जटिल और बहुस्तरीय है। भारत की बौद्धिक परंपरा में सामाजिक, नैतिक और व्यवहारिक नियमों पर सैकड़ों चिंतकों ने अपने-अपने समय, समाज और परिस्थितियों के अनुसार विचार रखे। इन विचारों को स्मृतियों के रूप में संकलित किया गया, जो किसी एक व्यक्ति या सत्ता का आदेश नहीं, बल्कि विचार–परंपरा का संग्रह थीं।

स्मृतियों की बहुलता और प्रकृति

मनुस्मृति के अलावा भी अनेक महत्वपूर्ण स्मृतियाँ हैं—जैसे याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति, विष्णु स्मृति, नारद स्मृति, बृहस्पति स्मृति, कात्यायन स्मृति, देवल स्मृति, अंगिरस स्मृति, यम स्मृति, गौतम स्मृति, दक्ष स्मृति, हारीत स्मृति, शंख स्मृति, अत्रि स्मृति, संवर्त स्मृति, शातातप स्मृति आदि। ये सभी ग्रंथ अलग-अलग कालखंडों, सामाजिक संरचनाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप रचे गए थे। इनमें कानून, आचार, दंड, पारिवारिक संबंध, संपत्ति, न्याय और सामाजिक कर्तव्यों पर विचार मिलते हैं—पर ये एक-दूसरे से भिन्न भी हैं, कई जगह विरोधाभासी भी।

यही तथ्य स्पष्ट करता है कि स्मृतियाँ स्थिर कानून नहीं थीं, बल्कि विचारों का प्रवाह थीं। समय, स्थान और समाज के अनुसार इनमें चयन, संशोधन और व्याख्या की गुंजाइश हमेशा बनी रही।

औपनिवेशिक हस्तक्षेप और “डिवाइड एंड रूल”

औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने भारतीय समाज को समझने के बजाय उसे सरलीकृत और विकृत रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने अपनी डिवाइड एंड रूल नीति के तहत स्मृति–परंपरा की बहुलता को नजरअंदाज कर मनुस्मृति को प्रतीकात्मक रूप से चुन लिया। इसके बाद कुछ चयनित अंशों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया, भारतीय सहायकों के माध्यम से उनका प्रचार कराया गया और फिर उसी विकृत छवि के आधार पर विरोध और दहन जैसे नाटकीय प्रसंग खड़े किए गए। इसका उद्देश्य भारतीय समाज को भीतर से विभाजित करना था, न कि उसकी बौद्धिक परंपरा को समझना।

आज की बहस और अधूरा दृष्टिकोण

दुर्भाग्यवश, आज भी वही संकीर्ण दृष्टि जारी है। जब मनुस्मृति के अलावा अन्य स्मृतियों की बात की जाती है, तो अक्सर उत्तर मिलता है—“ये क्या हैं, हमने तो नाम ही नहीं सुना।” यह स्थिति हमारी ऐतिहासिक स्मृति और बौद्धिक आलस्य को उजागर करती है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कहीं भी ऐसा प्रमाण नहीं मिलता कि भारत में किसी काल में शासन केवल और केवल किसी एक स्मृति के आधार पर चला हो। वास्तविक शासन व्यवस्था सदैव राजनीतिक परिस्थितियों, लोकाचार, परंपराओं और व्यवहारिक जरूरतों से संचालित रही।

स्मृतियाँ: कानून नहीं, विचार–संग्रह

स्मृतियों को आधुनिक अर्थों में कानून की किताब समझना एक बुनियादी भूल है। वे अधिकतर नैतिक–सामाजिक विमर्श हैं—ठीक वैसे ही जैसे आज कानून पर वकीलों और विद्वानों द्वारा लिखी गई अलग-अलग किताबें, टीकाएँ और व्याख्याएँ होती हैं। किसी एक पुस्तक को अंतिम और सार्वभौमिक सत्य मान लेना न तो भारतीय परंपरा के अनुरूप है, न ही बौद्धिक ईमानदारी के।

निष्कर्ष

भारतीय समाज को समझने के लिए स्मृतियों को एकांगी नहीं, समग्र दृष्टि से देखना आवश्यक है। मनुस्मृति हो या कोई अन्य स्मृति—सब अपने समय की उपज हैं, स्थायी शासनादेश नहीं। इन्हें लेकर की जाने वाली आज की बहसें यदि ऐतिहासिक संदर्भ, बहुलता और विचार–परंपरा को ध्यान में रखकर हों, तभी वे सार्थक और ज्ञानवर्धक बन सकती हैं।