Wednesday, 8 July 2026

मोदी सरकार के 12 साल: नीतिगत विफलताएँ

लोकतंत्र में सरकारों का मूल्यांकन केवल उनकी सफलताओं से नहीं, बल्कि उनके नीतिगत फैसलों के बाद समाज में पैदा हुए असंतोष और चुनौतियों से भी होता है। पिछले 12 वर्षों (2014 से 2026 तक) के सफर में जहां एक ओर सरकार ने बुनियादी ढांचे और डिजिटल गवर्नेंस में बड़े बदलावों का दावा किया है, वहीं दूसरी ओर कई ऐसे मोर्चे रहे हैं जहां सरकार के फैसले गंभीर विवादों, जन-आक्रोश और नीतिगत विफलताओं के घेरे में आए हैं।

कृषि से लेकर शिक्षा और रोजगार तक, समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा उठाए जा रहे ये कुछ ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जो सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

कृषि कानून: दृढ़ता और वापसी के बीच का नीतिगत भटकाव

मोदी सरकार के सबसे विवादित फैसलों में 'तीन कृषि कानून' शीर्ष पर रहे। आलोचकों और कृषि विशेषज्ञों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि इन कानूनों को बिना व्यापक आम सहमति और राज्यों को भरोसे में लिए जल्दबाजी में लाया गया। इसके बाद जब देशव्यापी किसान आंदोलन शुरू हुआ, तो सरकार ने सख्त रुख अपनाया। लेकिन अंततः, कानून वापस ले लिए गए। यदि कानून वाकई सुधारवादी थे, तो सरकार उन्हें सुचारू रूप से समझाने और सख्त इरादे के साथ लागू करने में नाकाम रही। वहीं दूसरी ओर, इसके पीछे हट जाने को सरकार की 'नीतिगत कमजोरी' के रूप में देखा गया, जिससे सुधारों की प्रक्रिया अधर में लटक गई।

सरकारी नौकरियां और रोजगार संकट: युवाओं की अधूरी उम्मीदें

हर वर्ष करोड़ों नौकरियों का वादा करने वाली सरकार के लिए सरकारी भर्तियों की सुस्त रफ्तार एक बड़ा सिरदर्द रही है। संसद में समय-समय पर सरकार ने भी स्वीकार किया है कि रेलवे, रक्षा, गृह मंत्रालय, डाक विभाग और अन्य केंद्रीय विभागों में लाखों स्वीकृत पद खाली हैं। इन पदों पर भर्ती की प्रक्रिया अक्सर वर्षों तक चलती रही, जिससे लाखों अभ्यर्थियों को लंबा इंतजार करना पड़ा। इसके साथ ही, भर्ती परीक्षाओं में देरी और कई राज्यों में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं की निराशा को और बढ़ाया। कई अभ्यर्थियों को एक ही परीक्षा के लिए वर्षों तक तैयारी करनी पड़ी, जबकि कुछ भर्तियाँ न्यायालयी विवादों या प्रशासनिक कारणों से लंबे समय तक अटकी रहीं।

नियमित सरकारी नौकरियों की जगह 'ठेका प्रथा' (Contractual jobs) लागू करने से युवाओं में सुरक्षा की भावना कम हुई है, जिसे युवा वर्ग सरकार के सबसे निराशाजनक फैसलों में से एक मानता है। सरकार का कहना है कि उसने भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाई, डिजिटल चयन प्रणाली लागू की और कौशल आधारित रोजगार को प्रोत्साहित किया, व्यावहारिक स्तर पर तार्किक नहीं प्रतीत होता है | यदि व्यवस्था इतनी प्रभावी हुई है, तो लाखों स्वीकृत सरकारी पद वर्षों तक खाली क्यों रहे? यदि भर्ती प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और तेज़ हुई है, तो परीक्षाओं और नियुक्तियों में बार-बार देरी क्यों देखने को मिली? और यदि रोजगार के अवसर वास्तव में बढ़े हैं, तो बड़ी संख्या में युवा अब भी नियमित सरकारी नौकरियों के लिए वर्षों तक तैयारी करने को मजबूर क्यों हैं?"

पेपर लीक और परीक्षा प्रणालियों की विफलता: छात्रों के भविष्य पर कुठाराघात

हाल के वर्षों में NEET, UGC-NET और विभिन्न राज्यों की कई भर्ती एवं प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने देश की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कई परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं, दोबारा आयोजित हुईं या उनकी जाँच शुरू हुई, जिससे लाखों छात्रों का समय, धन और वर्षों की मेहनत प्रभावित हुई। इन घटनाओं के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) सहित परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर व्यापक बहस हुई। आलोचकों का कहना है कि संगठित पेपर लीक गिरोहों और कथित शिक्षा माफिया के खिलाफ समय पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रही। जब बार-बार पेपर लीक हों, परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ें और लाखों युवाओं का भविष्य अधर में लटक जाए, तब पारदर्शिता, डिजिटलीकरण, प्रशासनिक कुशलता और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन के दावे स्वतः कठघरे में खड़े हो जाते हैं। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा उसकी नीतियाँ नहीं, बल्कि उनका ईमानदार और प्रभावी क्रियान्वयन होता है।

भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और राजनीतिक अवसरवाद का विरोधाभास

2014 में 'ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा' का नारा भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का प्रतीक बनकर उभरा था। केंद्रीय एजेंसियों (ED, CBI) द्वारा विपक्षी नेताओं पर ताबड़तोड़ कार्रवाइयां की गईं। हालांकि, जनता और आलोचकों के बीच इस बात को लेकर भारी असंतोष है कि जिन नेताओं पर खुद सरकार या उसकी पार्टी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाती है, वे जैसे ही पाला बदलकर सत्ताधारी दल (BJP) में शामिल होते हैं, उनके खिलाफ जांच ठंडी पड़ जाती है या उन्हें क्लीन चिट मिल जाती है। भारतीय राजनीति के गलियारों में इस वक़्त एक मुहावरा सबसे ज़्यादा मशहूर है"बीजेपी की वॉशिंग मशीन"। यह महज़ आरोप नहीं, बल्कि आम जनता के बीच गहरा चुका वह सच है जिसने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दावों को एक मज़ाक बना कर रख दिया है। 'ट्रायल चलाकर जेल भेजने' के बजाय राजनीतिक समझौते करने की इस नीति ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की लड़ाई की साख को कमजोर किया है। ED (प्रवर्तन निदेशालय) और CBI जैसी देश की प्रीमियर जांच एजेंसियों का कनविक्शन रेट बेहद कम है, जिसका सीधा मतलब है कि इनका मकसद न्याय दिलाना नहीं, बल्कि सिर्फ 'प्रताड़ित करना' और 'डराना' है ताकि राजनीतिक सौदेबाजी की जा सके। उस आम नागरिक और टैक्सपेयर के साथ इससे बड़ा भद्दा मज़ाक क्या होगा, जो ईमानदारी से टैक्स भरता है और सोचता है कि देश से भ्रष्टाचार खत्म हो रहा है। लेकिन भ्रष्टाचारी जेल जाने के बजाय सत्ता के शीर्ष पर बैठकर देश की नीतियां तय करने लगता है |

एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और कानूनी यू-टर्न

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने का फैसला दिया था। इसके बाद देश भर में दलित संगठनों द्वारा भारी विरोध प्रदर्शन हुए। चुनावी और सामाजिक दबाव के चलते सरकार ने संसद में कानून पारित कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट (Overrule) दिया। यह कदम न्यायिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप और राजनीतिक तुष्टीकरण था न कि सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए उठाया गया कदम ।

चिकित्सा और शिक्षा का बाजारीकरण: आम जनता की जेब पर डाका

पिछले एक दशक में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी तरह से 'माफिया और कॉर्पोरेट' के नियंत्रण में चली गई हैं। निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर खुली लूट, दवाओं और मेडिकल उपकरणों के मनमाने दाम तय होने पर सरकार का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं दिख रहा है। सरकार ने कुछ जीवन रक्षक दवाओं की अधिकतम सीमा तय तो की , लेकिन मेडिकल माफिया ने 'कंसल्टेशन फीस' और 'सर्विस चार्ज' बढ़ाकर उसकी भी भरपाई जनता की जेब से कर ली। आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं कुछ हद तक राहत देती हैं, लेकिन वे निजीकरण की इस बड़ी समस्या का स्थायी इलाज नहीं बन पाई हैं। यह योजना सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के बजाय अंततः सरकारी खजाने का पैसा निजी अस्पतालों की जेब में ही डाल रही है। यह व्यवस्थागत निजीकरण का 'स्थायी इलाज' नहीं, बल्कि एक 'अस्थायी पेनकिलर' है।

निजी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों की बेलगाम फीस और व्यावसायिकता ने शिक्षा को एक आम भारतीय परिवार की पहुंच से दूर कर दिया है। एडमिशन फीस, डेवलपमेंट चार्ज, कस्टमाइज्ड ड्रेस और किताबों के नाम पर जो सिंडिकेट (माफिया) स्कूलों के भीतर चलता है, उस पर लगाम लगाने की हिम्मत किसी सरकार में नहीं दिखती। कोटा से लेकर देश के हर कोने में फैले कोचिंग संस्थानों ने समानांतर शिक्षा व्यवस्था खड़ी कर दी है। रेगुलेशन के नाम पर सरकारें केवल तब जागती हैं जब अवसाद के कारण किसी छात्र की आत्महत्या की खबर आती है या किसी बेसमेंट में पानी भरने से बच्चे मर जाते हैं। सरकारों ने जानबूझकर सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत को बदतर होने दिया, ताकि निजी हाथों के लिए बाजार तैयार किया जा सके। यह जन-कल्याणकारी राज्य के विचार पर सबसे बड़ा तमाचा है।

सवर्ण/मध्यम वर्ग: "टैक्सपेयर" बनाम "मजबूर वोटर" का संकट

इस वर्ग की यह शिकायत काफी हद तक धरातलीय हकीकत पर आधारित है। इस देश का मिडिल क्लास और सवर्ण समाज आज खुद को भारत का सबसे असहाय नागरिक महसूस करता है। वह सरकार के लिए महज एक 'दुधारू गाय' है, जिसे बिना चारा दिए सिर्फ दुहा जाता है। एक मिडिल क्लास आदमी सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक सरकार को टैक्स देता है। वह अपनी गाढ़ी कमाई पर 30% तक इनकम टैक्स देता है। इसके बाद जो पैसा बचता है, उससे गाड़ी खरीदे तो 28% GST + रोड टैक्स देता है। पेट्रोल डलवाए तो आधे से ज्यादा टैक्स देता है। इस टैक्सपेयर वर्ग को लगता है कि उनके पैसे से मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, और तमाम कल्याणकारी योजनाएं (Welfare Schemes) चलाई जा रही हैं, लेकिन बदले में उन्हें न तो अच्छी सरकारी शिक्षा मिलती है, न स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा (Social Security)। उन्हें सब कुछ अपनी जेब से निजी क्षेत्र से खरीदना पड़ता है। इतनी बड़ी आहुति देने के बाद उसके बच्चे सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ सकते क्योंकि वहां की बदहाली जगजाहिर है, इसलिए वह लाखों की फीस देकर प्राइवेट स्कूल भेजता है। बीमार पड़ने पर वह सरकारी अस्पताल जाने की हिम्मत नहीं कर सकता, क्योंकि वहां स्ट्रेचर तक के लिए धक्के खाने पड़ते हैं, इसलिए वह प्राइवेट हॉस्पिटल को लाखों लुटाता है।

राजनीतिक रूप से भी इस वर्ग को लगता है कि 'विकल्पहीनता' के कारण वे एक निश्चित दल को वोट देने के लिए मजबूर हैं क्योंकि दूसरी तरफ जब वह देखता है, तो वहां 'खटाखट' मुफ्त पैसे बांटने की रेस लगी है या घोर जातिवादी तुष्टिकरण का कुआं है। वह कुएं और खाई के बीच फंसा ऐसा बंधुआ मजदूर है, जिसकी मजबूरी का फायदा मौजूदा सरकार बखूबी उठा रही है।

आरक्षण और योग्यता बनाम सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस

मोदी सरकार ने खुद को 'मजबूत और कड़े फैसले लेने वाली सरकार' के रूप में विज्ञापित किया है, लेकिन जब बात वोट बैंक और आरक्षण की आती है, तो यह सरकार भी उतनी ही रीढ़विहीन नजर आती है जितनी पिछली सरकारें थीं।  आरक्षण के कारण सेवाओं की गुणवत्ता और विकास पर पड़ने वाले नकारात्मक असर को लेकर मोदी सरकार ने पूरी तरह से अनदेखा किया है। वोट बैंक के नाराज होने के डर से मोदी सरकार आरक्षण प्राप्त उम्मीदवारों के लिए एक न्यूनतम मानक तय नहीं कर पाई है | परिणाम बहुत ही भयावह है, गैर आरक्षण  प्राप्त उम्मीदवार 90-95% अंक लाने के बाद भी सीटों से वंचित रह जाते हैं, जबकि कम अंकों वाले उम्मीदवारों का चयन हो जाता है। विशेष रूप से चिकित्सा (Medical), अनुसंधान (Research), और तकनीकी सेवाओं जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में केवल और केवल 'मेरिट' को ही एकमात्र आधार होना चाहिए। संविधान निर्माताओं ने जब आरक्षण लागू किया था, तो अनुच्छेद 335 (Article 335) में साफ लिखा था कि आरक्षण देते समय 'प्रशासनिक दक्षता और कार्यकुशलता' (Administrative Efficiency) से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। लेकिन आज की राजनीति ने इस अनुच्छेद को कचरे के डिब्बे में डाल दिया है। जब आप चिकित्सा, अनुसंधान और इंजीनियरिंग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में मेरिट को लात मारकर केवल जातिगत पर्चियों के आधार पर चयन करेंगे, तो देश का विकास बाधित होना तय है।

आज का युवा और टैक्सपेयर वर्ग इस बात की वकालत कर रहा है कि अब आरक्षण का आधार 'जाति' के बजाय 'आर्थिक स्थिति' (Economic Status) होना चाहिए, ताकि सवर्ण वर्ग के गरीब बच्चों को भी आगे बढ़ने का मौका मिले और संपन्न हो चुके लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर (Creamy Layer का सख्ती से पालन) किया जा सके। इसके साथ ही, सरकार को टैक्स देने वाले वर्ग को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनके टैक्स के पैसे का इस्तेमाल केवल राजनीतिक लाभ के लिए मुफ्तखोरी में नहीं, बल्कि देश के बुनियादी ढांचे, विश्वस्तरीय सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को बनाने में हो रहा है, ताकि हर वर्ग को उसका हक मिल सके।

मोदी सरकार के 12 वर्षों का यह दौर जहां बड़े नीतिगत बदलावों और कड़े फैसलों के लिए जाना जाता है, वहीं रोजगार, पारदर्शिता, सामाजिक संतुलन और बुनियादी जन-सुविधाओं (स्वास्थ्य-शिक्षा) पर नियंत्रण के मोर्चे पर इसके फैसलों की तीखी आलोचना स्वाभाविक है। एक मजबूत लोकतंत्र में इन कमियों पर चर्चा होना और जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है, ताकि विकास का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सही मायने में पहुंच सके। 

Wednesday, 10 June 2026

12 साल में मोदी सरकार के 12 बड़े फैसले, जिसने बदल दी देश की राजनीति

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने सत्ता में 12 वर्ष पूरे कर लिए हैं। एक दशक से अधिक के इस कार्यकाल में सरकार ने कई ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं, जिन्होंने देश की राजनीति की दिशा को बदल दिया है और भारत के सामाजिक तथा आर्थिक ढांचे पर गहरा प्रभाव डाला है। यहां ऐसे 12 प्रमुख निर्णयों का उल्लेख किया जा रहा है।

अनुच्छेद 370 का समाप्त होना
5 अगस्त 2019 को सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया। इसके साथ ही राज्य का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त हो गया।

ईडब्ल्यूएस 10% आरक्षण
2019 में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को शिक्षा और नौकरी में 10% आरक्षण देने का प्रावधान लागू किया गया।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA)
2019 में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए धार्मिक रूप से प्रताड़ित हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी समुदायों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया।

अयोध्या राम मंदिर निर्माण
2019 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई और आज यह भव्य रूप में तैयार हो चुका है।

प्रमुख कल्याणकारी योजनाएं
स्वच्छ भारत मिशन, जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, पीएम आवास योजना, आयुष्मान भारत और जल जीवन मिशन जैसी योजनाएं लागू की गईं।

वस्तु एवं सेवा कर (GST)
1 जुलाई 2017 से जीएसटी लागू कर पूरे देश में एकीकृत कर प्रणाली स्थापित की गई।

नोटबंदी
8 नवंबर 2016 को 500 और 1000 रुपये के नोट बंद कर काले धन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का प्रयास किया गया।

पुराने कानूनों का अंत
ब्रिटिश काल के 1200 से अधिक कानून समाप्त किए गए तथा आईपीसी, सीआरपीसी और एविडेंस एक्ट की जगह नए भारतीय कानून लागू किए गए।

तीन तलाक पर रोक
मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा हेतु तीन तलाक को अपराध घोषित किया गया और इसे कानूनन प्रतिबंधित किया गया।

बुनियादी ढांचे का विस्तार
रेलवे, सड़क, हवाई अड्डे और मेट्रो नेटवर्क का बड़े स्तर पर विस्तार हुआ। वंदे भारत ट्रेनें शुरू हुईं, एयरपोर्ट की संख्या बढ़ी और रेलवे विद्युतीकरण तेजी से पूरा किया गया। 

Thursday, 30 April 2026

“फ्यूल फॉर फ्यूचर: भारत ने यूरेनियम बाजार में खेला मास्टरस्ट्रोक”

 भारत और कजाकिस्तान के बीच यूरेनियम आपूर्ति को लेकर हुआ हालिया समझौता केवल एक व्यापारिक डील नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन का संकेत है। लगभग 4 अरब अमेरिकी डॉलर के इस करार में कजाकिस्तान की राष्ट्रीय परमाणु कंपनी काजाटोमप्रोम भारत को दीर्घकालिक रूप से प्राकृतिक यूरेनियम कंसन्ट्रेट उपलब्ध कराएगी।

इस समझौते को काजाटोमप्रोम के शेयरधारकों ने 92.9% बहुमत से मंजूरी दी—जो यह दर्शाता है कि यह सौदा केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि रणनीतिक प्राथमिकता भी है। एशिया में यह इस दशक की सबसे बड़ी परमाणु ईंधन साझेदारियों में गिना जा रहा है।

भारत ने लंबे समय से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की बात की है, लेकिन आधुनिक अर्थों में आत्मनिर्भरता का मतलब ‘सब कुछ देश में पैदा करना’ नहीं, बल्कि एक ऐसी मजबूत और विविध आपूर्ति शृंखला बनाना है, जो किसी भी वैश्विक संकट में बाधित न हो। यूरेनियम के लिए कजाकिस्तान, तेल के लिए बहुस्तरीय स्रोत, गैस के लिए दीर्घकालिक अनुबंध और नवीकरणीय ऊर्जा में घरेलू विस्तार—ये सभी मिलकर ही वास्तविक ऊर्जा सुरक्षा का ढांचा तैयार करते हैं।

यह डील भारत की ऊर्जा रीढ़ को मजबूत करने के साथ-साथ उसके परमाणु कार्यक्रम को स्थिरता देगी। साथ ही, मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को भी मजबूती मिलेगी। कजाकिस्तान के लिए यह निर्यात विस्तार हो सकता है, लेकिन भारत के लिए यह भविष्य की औद्योगिक शक्ति, निरंतर बिजली आपूर्ति और रणनीतिक स्वायत्तता में निवेश है।

इस समझौते का प्रभाव वैश्विक यूरेनियम बाजार पर भी पड़ेगा। जब इतना बड़ा हिस्सा द्विपक्षीय अनुबंधों में “लॉक” हो जाता है, तो खुले बाजार (स्पॉट और टर्म मार्केट) की तरलता घटती है। इसका सीधा अर्थ है—आने वाले समय में आपूर्ति सीमित और कीमतों में अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत ने इस संभावित कमी से पहले ही अपनी स्थिति मजबूत कर ली है।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि काजाटोमप्रोम दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादक है। ऐसे उत्पादक के साथ दीर्घकालिक संबंध स्थापित करना यह संकेत देता है कि भारत अब ऊर्जा को केवल आर्थिक जरूरत नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति-प्रक्षेपण के साधन के रूप में देख रहा है।

कजाकिस्तान के लिए भी यह डील सामान्य नहीं है। कंपनी ने इसके लिए औपचारिक Extraordinary General Meeting आयोजित की, मतदान कराया और परिणाम सार्वजनिक किए—यह सब इस बात का संकेत है कि भारत अब उसके लिए एक साधारण ग्राहक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक साझेदार बन चुका है।

वैश्विक संसाधन राजनीति की वास्तविक भाषा यही है—जहां कुछ देश बयान देते हैं, वहीं उभरती शक्तियां आपूर्ति शृंखलाएं गढ़ती हैं। आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि यूरेनियम, तेल, गैस, सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ और समुद्री मार्गों पर नियंत्रण को लेकर भी लड़े जा रहे हैं।

इस समझौते ने एक बात स्पष्ट कर दी है—नई दिल्ली अब केवल प्रतिक्रिया देने वाली शक्ति नहीं रही, बल्कि वह पहले कदम उठाने वाली, भविष्य की दिशा तय करने वाली शक्ति के रूप में उभर रही है।

Thursday, 2 April 2026

भारत के रक्षा निर्यात में बड़ी छलांग


भारत के रक्षा क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। अगर पिछले साल से तुलना करें, तो यह लगभग 62.66% की जबरदस्त बढ़ोतरी है। पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 23,622 करोड़ रुपये था।

इस सफलता में सरकारी कंपनियों (डीपीएसयू) और निजी कंपनियों—दोनों का बड़ा योगदान रहा है। कुल निर्यात में सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 54.84% रही, जबकि निजी कंपनियों का योगदान 45.16% रहा। इसका मतलब यह है कि भारत में अब रक्षा उत्पादन सिर्फ सरकारी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी कंपनियां भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं।


रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि की तारीफ करते हुए कहा कि यह भारत की स्वदेशी ताकत का प्रमाण है। दुनिया अब भारत के हथियारों और रक्षा तकनीक पर भरोसा करने लगी है। उन्होंने इसे भारत की “सफलता की शानदार कहानी” बताया।

अगर आंकड़ों को और सरल तरीके से समझें, तो इस साल करीब 14,802 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निर्यात हुआ है। खास बात यह है कि सरकारी कंपनियों के निर्यात में पिछले साल के मुकाबले 151% की बहुत तेज बढ़ोतरी हुई है। वहीं निजी कंपनियों ने भी 14% की अच्छी ग्रोथ दिखाई है। निजी क्षेत्र ने 17,353 करोड़ रुपये का निर्यात किया, जबकि सरकारी कंपनियों का योगदान 21,071 करोड़ रुपये रहा।

आज भारत 80 से ज्यादा देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। साथ ही, निर्यात करने वाली कंपनियों की संख्या भी बढ़कर 128 से 145 हो गई है। यानी अब ज्यादा कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं।

अब बात करते हैं उन हथियारों की, जिनकी दुनिया में सबसे ज्यादा मांग है—

1. ब्रह्मोस मिसाइल
यह एक सुपरसोनिक मिसाइल है, जो बहुत तेजी से लक्ष्य पर हमला करती है। इसकी मारक क्षमता करीब 300 किलोमीटर है। फिलीपींस, वियतनाम, इंडोनेशिया और यूएई जैसे देश इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

2. तेजस फाइटर जेट
तेजस भारत का अपना बनाया हुआ लड़ाकू विमान है। यह हवा में और जमीन पर दोनों तरह के मिशन कर सकता है। अर्जेंटीना, मलेशिया और नाइजीरिया जैसे देश इसे खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं।

3. आकाश मिसाइल सिस्टम
यह एक एयर डिफेंस सिस्टम है, जो दुश्मन के हवाई हमलों को रोक सकता है। सऊदी अरब, वियतनाम और केन्या जैसे देश इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं।

4. पिनाका रॉकेट लॉन्चर
यह एक ऐसा सिस्टम है जो एक साथ कई रॉकेट दाग सकता है। इसकी रेंज 75 से 120 किलोमीटर तक है। इसे आर्मेनिया को निर्यात किया जा चुका है और कई अन्य देशों में भी इसकी मांग है।

5. अर्जुन टैंक
यह एक आधुनिक युद्धक टैंक है, जिसमें उन्नत तकनीक और शक्तिशाली हथियार लगे हैं। अफ्रीकी देशों और नाइजीरिया जैसे देशों ने इसमें रुचि दिखाई है।

इन सबके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत अब अपने हथियार खुद बना रहा है और उनकी गुणवत्ता भी अच्छी है। दुनिया को भारत के उत्पाद सस्ते, भरोसेमंद और प्रभावी लग रहे हैं।

सरकार का लक्ष्य है कि भारत दुनिया के बड़े रक्षा निर्यातक देशों में शामिल हो। इसके लिए ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी योजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही, व्यापार को आसान बनाने और कंपनियों को ज्यादा सुविधाएं देने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

कुल मिलाकर, यह उपलब्धि सिर्फ आंकड़ों की नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि भारत अब रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बन रहा है और दुनिया में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। आने वाले समय में भारत एक बड़े रक्षा निर्यातक देश के रूप में उभर सकता है।

Monday, 30 March 2026

जन-जन के राम: आस्था, साहस और संतुलन की जीवंत शक्ति


संसारी समाज रामनवमी के दिन राम के जन्मोत्सव को बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाता है। जो स्वयं जन्म और मरण के बंधनों से परे हैं, उनके अवतरण की कल्पना मात्र से ही लोक-मन पुलकित हो उठता है। राम के आगमन के उत्साह में समाज विविध कल्पनाएँ सँजोता हैकोई अपने आँगन को सजा-सँवार कर उनका स्वागत करता है, तो कोई उनके लिए रुचिकर भोग की व्यवस्था करने में तल्लीन हो जाता है। राम एक हैं, पर उन्हें देखने की दृष्टि भिन्न-भिन्न है- जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥ राम को सब अपनी-अपनी अंतर्दृष्टि और भावना के अनुरूप देखते हैं। संतों के लिए वे प्रेम और करुणा के सागर, भक्तों के लिए आराध्य, प्रजा के लिए आदर्श राजा, तो सीता जी के लिए उनके प्राणप्रिय पति थे। राम सत्य, धर्म और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में सबके हृदयों में रमे हैं। वाल्मीकि  और तुलसीदास के राम में अंतर है, तुलसीदास ने सृष्टि के समस्त सजीव और निर्जीव को सियाराममय कहा, जबकि भवभूति  के राम एक अलग भावभूमि में स्थापित होते हैं। कबीर ने राम को निर्गुण माना, उन्होंने राम को परम ब्रह्म के रूप में देखा—“कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूँढे बन माही”—अर्थात राम हर हृदय में हैं, पर मनुष्य उन्हें बाहर खोजता है और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने शक्ति और मर्यादा का आदर्श माना । महात्मा गांधी के राम सत्य और करुणा के प्रतीक हैं, राम मनोहर लोहिया के राम सामाजिक न्याय और लोककल्याण के प्रतीक हैं।

भारतीय समाज में राम केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि मर्यादा, आदर्श, विनम्रता, विवेक और संयम के जीवंत रूप हैं। वे मर्यादा पुरुषोत्तमहैंऐसा आदर्श जिसे आस्तिक ही नहीं, बल्कि हर संवेदनशील मनुष्य स्वीकार करता है। वे स्थितप्रज्ञ, अनासक्त और असंपृक्त लोकनायक हैं, जिनमें सत्ता के प्रति मोह नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का भाव है। राम यह देश राम का हैराम जो किसी एक मंदिर, कथा या रूप में सीमित नहीं, बल्कि हर कण, हर भावना और हर कर्म में व्यापक हैं। वे केवल आस्था नहीं, बल्कि अनुभव हैं। भाव की हर हिलोर में राम हैं, कर्म के हर छोर पर राम हैं। वे यत्र-तत्र नहीं, सर्वत्र हैंजिसमें वे रम जाएँ, वही राम हो जाता है। है। राम धर्म के साकार रूप हैंजिसे राम प्रिय नहीं, उसे धर्म भी प्रिय नहीं हो सकता।

राम इस देश की एकता के सूत्रधार भी हैं। अयोध्या से लेकर लंका तक की उनकी यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, सांस्कृतिक एकता का विस्तार है । राम साध्य हैं, साधन नहीं। राम कोई मात्र ऐतिहासिक या राजनैतिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि सनातन, अजन्मा और अद्वितीय सत्ता के प्रतीक हैं। वे केवल दशरथ के पुत्र या अयोध्या के राजा तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मशक्ति, नैतिकता और अटूट संकल्प के जीवंत प्रतीक हैं। राम उस आंतरिक शक्ति का स्वरूप है, जो मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है। वह निर्बलों के सहारा है और समाज के हर वर्ग के लिए आशा के स्रोत है। उनकी कसौटी किसी एक व्यक्ति या वर्ग का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रजा के सुख और कल्याण का मापदंड है। राम का जीवन उस आदर्श का प्रतीक है, जहाँ उन्नति किसी के अधिकारों का हनन करके नहीं, बल्कि सभी को साथ लेकर, न्याय और मर्यादा के मार्ग पर चलकर प्राप्त की जाती है। यही राम महात्मा गांधी  के लिए वह नैतिक शक्ति बने, जिसके सहारे पूरे देश को अंग्रेज़ी साम्राज्य से संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया और उसी राम के नाम पर इस देश मे आदर्श व्यवस्था की कल्पना की । गांधी ने रामराज्य का आदर्श इसलिए चुना क्योंकि वे भारत की एकता और मर्यादा के प्रतीक हैं। वे ऐसे रामराज्य के पक्षधर थे जहाँ लोकहित सर्वोच्च हो। राम केवल अतीत नहीं, एक जीवित चेतना हैंजो समाज को दिशा देती है और मनुष्य को उसका नैतिक दर्पण दिखाती है।

राम का जीवन त्याग और संतुलन का उदाहरण है। राम जनस्वीकृत, शक्तिशाली राजा थे, पर अहंकार से अछूते रहे। अपार शक्ति के बावजूद उन्होंने कभी मनमाने निर्णय नहीं लिए। वे मर्यादा, सामूहिकता और धर्म के प्रति प्रतिबद्ध रहे, तथा मानव और वानर सभी के प्रति करुणा व कर्तव्य निभाते रहे। वे शक्ति के केंद्र होते हुए भी उसका विस्तार नहीं करते। अयोध्या से लंका तक विजय प्राप्त करने के बाद भी उन्होंने राज्यों को अपने अधीन नहीं कियालंका विभीषण को और किष्किंधा सुग्रीव को सौंप दी। यह उनके वैराग्य और मर्यादा का प्रमाण है।

राम का आदर्श लक्ष्मण रेखाकी मर्यादा में है सीमा में जीवन सुख और सुरक्षा देता है, उल्लंघन अनर्थ लाता है। वे जाति-वर्ग से परे सबके हैंनिषादराज, सुग्रीव, शबरी, जटायु सभी को साथ लेकर चलने वाले। राम ने राजा, पुत्र, भाई और पति के रूप में उच्च आदर्श स्थापित किए, जो हर युग में प्रासंगिक हैं। भरत के लिए आदर्श भाई, हनुमान के स्वामी, और प्रजा के लिए न्यायप्रिय राजा हैं। उन्होंने परिवार और दांपत्य को नई गरिमा दीएकनिष्ठ दांपत्य प्रेम उनका जीवन-आदर्श रहा, सीता के वियोग में उनकी करुणा स्पष्ट दिखती है। पिता की आज्ञा का पालन कर उन्होंने संबंधों को नई ऊंचाई दी। उनका जीवन समावेश, कर्तव्य और प्रेम का अद्वितीय संतुलन है, जो आज भी प्रेरणा देता है।

विश्व साहित्य में राम जैसा चरित्र अद्वितीय हैन वैसी मर्यादा, न वैसा पौरुष, न वैसी तितिक्षा। वे संतुलन के प्रतीक हैंअमीरों की आस्था भी, और गरीबों का संबल भी। उनका नाम ही कठिन से कठिन परिस्थितियों में जीने का साहस देता है। त्रेतायुग में अवतरित होकर भी वे आज तक जन-जन के जीवन में उपस्थित हैं-जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।भक्तों के अनुभवों में राम बार-बार प्रकट होते हैंकभी संकटमोचक बनकर, तो कभी मार्गदर्शक बनकर। विज्ञान और तर्क जहाँ सीमित हो जाते हैं, वहाँ से राम का भावलोक आरंभ होता है। वे अंतर्मन की शक्ति हैं, जीवन की सृष्टि और सृष्टि के जीवन के आधार हैं। राम जोड़ने वाले हैं, तोड़ने वाले नहीं। रामराज्य का आदर्श सर्वे भवन्तु सुखिनःऔर "परहित सरिस धर्म नहीं भाई" की भावना पर आधारित है, जहाँ सभी के सुख और निर्भय जीवन की कामना की जाती है।