Monday, 28 September 2026

सनातन की मूल चेतना: विश्वास नहीं, जिज्ञासा

 भारतीय दार्शनिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता शायद यह है कि यहाँ धर्म की यात्रा केवल विश्वास से शुरू नहीं होती, बल्कि जिज्ञासा से शुरू होती है। जीवन का सबसे मूल प्रश्न है—मैं कौन हूँ? मैं केवल यह शरीर हूँ, मेरे विचार हूँ, मेरी भावनाएँ हूँ, मेरी स्मृतियाँ हूँ या इन सबसे परे भी मेरा कोई अस्तित्व है?

सनातन परंपरा के साथ बौद्ध, जैन और सिख चिंतन की अनेक धाराओं में भी आत्म-अन्वेषण, अनुभव, साधना और जीवन के मूल प्रश्नों पर विचार की समृद्ध परंपरा दिखाई देती है। इन परंपराओं में मतभेद भी हैं और अपनी-अपनी विशिष्ट दार्शनिक स्थापनाएँ भी, लेकिन प्रश्न करने और अनुभव के माध्यम से सत्य की खोज की परंपरा भारतीय चिंतन की एक महत्वपूर्ण विशेषता रही है।

उपनिषदों की परंपरा हो या ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’, मूल आग्रह यही है कि मनुष्य अस्तित्व के अंतिम सत्य को जानने की कोशिश करे। यहाँ गुरु का कथन यात्रा का अंत नहीं, बल्कि खोज की शुरुआत हो सकता है। इसलिए किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार कर लेना कि किसी महान व्यक्ति ने उसे कहा है, भारतीय ज्ञान-परंपरा की जिज्ञासु वृत्ति के अनुकूल नहीं माना जा सकता।

भगवद्गीता इसका सुंदर उदाहरण है। अर्जुन युद्धभूमि में श्रीकृष्ण के सामने लगातार प्रश्न रखता है। वह केवल आदेश स्वीकार नहीं करता; वह अपने संशय, भ्रम और दुविधाओं को सामने रखता है। श्रीकृष्ण भी उसे केवल विश्वास करने के लिए नहीं कहते, बल्कि कर्म, ज्ञान, योग, आत्मा और जीवन के अनेक पक्षों पर विस्तृत संवाद करते हैं। अंततः अर्जुन को निर्णय स्वयं करना है।

यहीं से एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है—जानना और मानना एक बात नहीं है।

यदि कोई कहता है कि ‘मैं आत्मा हूँ’, तो यह कथन किसी गुरु, ग्रंथ या परंपरा से प्राप्त हो सकता है। लेकिन उस कथन को स्वयं अनुभव करना बिल्कुल अलग बात है। किसी दूसरे व्यक्ति का अनुभव हमारे लिए केवल सूचना हो सकता है; जब तक वह हमारे अपने अनुभव का हिस्सा न बने, तब तक वह हमारा ज्ञान नहीं बनता।

हम सामान्यतः अपने अस्तित्व को कई परतों से पहचानते हैं। सबसे पहली परत है शरीर। दूसरी है मन, जिसमें विचार और भावनाएँ आती हैं। तीसरी परत हमारी स्मृतियों, इच्छाओं, भूमिकाओं और सामाजिक पहचान की है। धीरे-धीरे हम इन सबके साथ इतना तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं कि हमें लगता है—यही मैं हूँ।

समस्या तब शुरू होती है जब हमारे विचार और भावनाएँ हमें नियंत्रित करने लगती हैं। क्रोध आता है और हम क्रोध बन जाते हैं। भय आता है और हम भय में जीने लगते हैं। चिंता आती है और पूरा जीवन चिंता से संचालित होने लगता है। साधना का उद्देश्य शायद इसी उलटे संबंध को बदलना है—विचार हमारे नियंत्रण में हों, हम विचारों के नियंत्रण में न हों।

इसी आत्म-अन्वेषण के लिए भारतीय योग परंपरा ने अष्टांग योग जैसी साधना-पद्धति विकसित की। यह केवल पढ़ने या समझने की विषय-वस्तु नहीं, बल्कि अभ्यास का मार्ग है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—इन चरणों के माध्यम से साधक बाहरी जीवन से धीरे-धीरे भीतर की ओर यात्रा करता है।

यह यात्रा कठिन हो सकती है, लेकिन असंभव नहीं।

हमने जीवन में अब तक जो कुछ प्राप्त किया है, उसके पीछे भी संघर्ष रहा है। आज पीछे मुड़कर देखने पर कई कठिनाइयाँ छोटी लग सकती हैं, क्योंकि समय ने उनके दर्द को कम कर दिया है। लेकिन क्या जीवन में उपलब्धियाँ प्राप्त करने के बाद संघर्ष समाप्त हो गया? क्या चिंता समाप्त हो गई? क्या तनाव समाप्त हो गया? क्या मन के भीतर के द्वंद्व समाप्त हो गए?

यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो शायद अगली यात्रा बाहर की नहीं, भीतर की है।

और उस यात्रा का पहला प्रश्न वही है—

मैं कौन हूँ?

शायद भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी खोज इसी प्रश्न के भीतर छिपी है। उत्तर किसी दूसरे से सुन लेना पर्याप्त नहीं। उसे अपने भीतर खोजना होगा, देखना होगा और अंततः अनुभव करना होगा। यही जिज्ञासा साधना का आरंभ है और संभवतः आत्म-ज्ञान की पहली सीढ़ी भी।

क्रोचे का अभिव्यंजनावाद

 बेनेदेत्तो क्रोचे (Benedetto Croce) आधुनिक पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र के प्रमुख विचारक और अभिव्यंजनावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं। वे मूलतः आत्मवादी दार्शनिक थे। उनके साहित्यिक एवं सौंदर्यशास्त्रीय चिंतन का केंद्रीय प्रश्न यह था कि कला का वास्तविक तत्त्व क्या है और उसकी आत्मा किसे कहा जाए। क्रोचे ने कला के मूल में कलाकार की चेतना, अंतःप्रज्ञा और आंतरिक अभिव्यक्ति को प्रतिष्ठित किया। उनके अनुसार कला का वास्तविक स्वरूप किसी बाहरी वस्तु, विषय या उपयोगिता में नहीं, बल्कि कलाकार के अंतर्मन में उत्पन्न होने वाली कलात्मक अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति में निहित है।


सहजानुभूति और तर्कज्ञान

क्रोचे के अनुसार मनुष्य को संसार का बोध मुख्यतः दो प्रकार से होता है—सहजानुभूति (Intuition) और तर्कज्ञान (Concept)। सहजानुभूति भावात्मक एवं प्रत्यक्ष बोध है। यह ऐसी मूर्त अनुभूति है, जो बिना तर्क-वितर्क या बौद्धिक विश्लेषण के मन में स्वतः उत्पन्न होती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, यह मूर्त भावना अथवा कल्पना आत्मा की अपनी क्रिया है, जो दृश्य जगत के विविध रूपों और व्यापारों को सामग्री के रूप में ग्रहण करके सक्रिय होती है।

क्रोचे ने इसी सहज और स्वयंप्रकाशित ज्ञान को अंतःप्रज्ञा या सहजानुभूति कहा है। उनके अनुसार कला का जन्म इसी सहजानुभूति से होता है। इसके विपरीत तर्कज्ञान बुद्धि-प्रधान होता है। इसमें मनुष्य विचार, तर्क और अवधारणाओं के माध्यम से जगत को समझने का प्रयास करता है। इस प्रकार सहजानुभूति का संबंध कला से और तर्कज्ञान का संबंध बौद्धिक चिंतन से है।

सहजानुभूति और अभिव्यंजना का संबंध

क्रोचे के अभिव्यंजनावाद का सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है कि सहजानुभूति और अभिव्यंजना अभिन्न हैं। सहजानुभूति के बिना अभिव्यंजना और अभिव्यंजना के बिना सहजानुभूति की कल्पना नहीं की जा सकती। उनके अनुसार कलाकार के मन में जब कोई अनुभूति स्पष्ट, मूर्त और संगठित रूप ग्रहण कर लेती है, तभी वह कलात्मक अभिव्यक्ति बनती है।

क्रोचे ने ‘अभिव्यंजना’ शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया है। सहज ज्ञान जब कलाकार की चेतना के साँचे में ढलकर निश्चित रूप ग्रहण करता है, तो वही कल्पना है और यही कल्पना मूलतः आंतरिक अभिव्यंजना है। बाद में यह आंतरिक रूप शब्द, रंग, रेखा, ध्वनि आदि माध्यमों से बाह्य रूप में व्यक्त हो सकती है। इस प्रकार कला की वास्तविक सृष्टि कलाकार के भीतर होती है, बाहर नहीं।

क्रोचे के अनुसार मनुष्य बाहरी जगत को केवल ग्रहण और अनुभव करता है; उसकी वास्तविक कलात्मक सृष्टि तब होती है, जब वह अनुभूति कलाकार की अंतःप्रज्ञा के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। इसलिए वे सहजानुभूति को आंतरिक अभिव्यंजना अथवा आंतरिक रूप-रचना मानते हैं। यही सौंदर्य का मूल आधार है।

क्रोचे का सौंदर्य-दर्शन

क्रोचे के अनुसार सौंदर्य किसी बाहरी वस्तु में स्वतंत्र रूप से विद्यमान गुण नहीं है। सौंदर्य कलाकार की आंतरिक सृजनात्मक क्रिया से उत्पन्न होता है। अर्थात् सौंदर्य की वास्तविक सत्ता बाह्य पदार्थ में नहीं, बल्कि कलाकार की अनुभूति और अभिव्यक्ति में है। इसी कारण कला की सफलता का निर्धारण उसके बाहरी आकार या विषय से नहीं, बल्कि उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति की पूर्णता से होता है।

क्रोचे के सिद्धांत की प्रमुख स्थापनाएँ इस प्रकार हैं—

  • सहजज्ञान और अभिव्यंजना में अभेद है।
  • प्रत्येक वास्तविक सहजज्ञान कलात्मक स्वरूप रखता है।
  • कला-सृष्टि मूलतः आंतरिक है।
  • कला वस्तु में नहीं, उसके कलात्मक रूप में निहित है।
  • कला अखंड और अविभाज्य है।

क्रोचे और कुन्तक का अभिव्यंजनावाद

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने क्रोचे के अभिव्यंजनावाद को ‘भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान’ कहते हुए इसे ‘वाग्वैचित्र्यवाद’ की संज्ञा दी। इसके बाद क्रोचे के अभिव्यंजनावाद और आचार्य कुन्तक के वक्रोक्तिवाद की तुलना की परंपरा विकसित हुई। दोनों सिद्धांतों में कुछ महत्त्वपूर्ण समानताएँ हैं, किंतु उनके आधार और निष्कर्षों में पर्याप्त अंतर भी है।

क्रोचे और कुन्तक दोनों अभिव्यक्ति को काव्य का मूल तत्त्व मानते हैं। दोनों के यहाँ कला में कल्पना और सृजनात्मकता की प्रधानता है तथा कलात्मक अभिव्यक्ति को अखंड, अविभाज्य और अद्वितीय माना गया है। इस दृष्टि से दोनों कलावादी चिंतक हैं।

किन्तु दोनों में मूलभूत अंतर है। कुन्तक आलंकारिक आचार्य हैं, जबकि क्रोचे दार्शनिक। कुन्तक के वक्रोक्तिवाद में काव्य-सौंदर्य के लिए वक्रता और वैदग्ध्यपूर्ण अभिव्यक्ति महत्त्वपूर्ण है, जबकि क्रोचे के यहाँ आंतरिक अभिव्यंजना ही कला का मूल स्वरूप है। कुन्तक आनंद को सौंदर्य की सिद्धि और उसके कारण दोनों से जोड़ते हैं, जबकि क्रोचे के अनुसार सौंदर्य और अभिव्यंजना अपने आप में ही साध्य हैं। अभिव्यंजनावाद में कला के मूल्यांकन का आधार मुख्यतः उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति है; इसके विपरीत वक्रोक्तिवाद काव्य की अभिव्यक्ति के साथ उसके व्यापक काव्यगत मूल्यों की भी उपेक्षा नहीं करता। इसी प्रकार कुन्तक वक्रता और सामान्य उक्ति के बीच स्पष्ट अंतर करते हैं, जबकि क्रोचे कला की मूल अभिव्यंजना के स्तर पर इस प्रकार का भेद स्वीकार नहीं करते।

इस प्रकार अभिव्यंजनावाद काव्य की आत्मा, उसकी रचना-प्रक्रिया और कलाकार की आंतरिक अनुभूति को समझने का महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है। काव्य-सृजन को बाहरी अनुकरण के बजाय अंतःप्रज्ञा और आंतरिक अभिव्यक्ति से जोड़ना इसकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है। इसी कारण आधुनिक साहित्यिक आलोचना और सौंदर्यशास्त्र के विकास में क्रोचे के अभिव्यंजनावाद का विशिष्ट स्थान है।

अरस्तू : अनुकरण और विरेचन सिद्धांत

 अरस्तू (384 ई.पू.–322 ई.पू.) प्राचीन यूनान के महान दार्शनिक और प्लेटो के शिष्य थे। उन्हें पाश्चात्य काव्यशास्त्र का आद्याचार्य माना जाता है। साहित्य और कला के क्षेत्र में उन्होंने प्लेटो की अनेक मान्यताओं को स्वीकार किया, किंतु कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर उनसे असहमति भी व्यक्त की। अरस्तू ने विशेष रूप से महाकाव्य और त्रासदी के स्वरूप, उद्देश्य तथा प्रभाव का विस्तार से विवेचन किया। उनके काव्य-चिंतन में अनुकरण सिद्धांत और विरेचन सिद्धांत का विशेष महत्त्व है। इन सिद्धांतों ने आगे चलकर पाश्चात्य साहित्यिक आलोचना को व्यापक रूप से प्रभावित किया।

(1) अनुकरण सिद्धांत

प्लेटो की तरह अरस्तू भी कला को प्रकृति का अनुकरण मानते हैं, किंतु अनुकरण के मूल्यांकन में दोनों के दृष्टिकोण में मूलभूत अंतर है। प्लेटो के अनुसार भौतिक जगत स्वयं आदर्श जगत की अनुकृति है और कला भौतिक जगत का अनुकरण करती है; इसलिए कला सत्य से दूर चली जाती है। इसके विपरीत अरस्तू अनुकरण को केवल नकल या प्रतिलिपि नहीं मानते। उनके लिए अनुकरण पुनःसृजन की प्रक्रिया है। कलाकार अपनी कल्पना, संवेदना और रचनात्मक शक्ति के माध्यम से जीवन और प्रकृति को नए कलात्मक रूप में प्रस्तुत करता है।

अरस्तू के अनुसार कवि किसी वस्तु या घटना को उसके प्रतीयमान, संभाव्य अथवा आदर्श रूप में चित्रित कर सकता है। इसलिए काव्य का अनुकरण केवल स्थूल और तथ्यपरक चित्रण तक सीमित नहीं है। कवि केवल जो दिखाई देता है, उसका यथावत् अनुकरण नहीं करता, बल्कि अपनी कल्पना और सृजनात्मक प्रतिभा से उसे अधिक व्यापक और अर्थपूर्ण रूप प्रदान करता है। इसी कारण अरस्तू के लिए कविता इतिहास से भी अधिक दार्शनिक और सार्वभौमिक हो सकती है। इतिहास मुख्यतः यह बताता है कि वास्तव में क्या हुआ, जबकि काव्य यह उद्घाटित कर सकता है कि क्या हो सकता है। इस प्रकार काव्य संभाव्यता और सार्वभौमिक सत्य को अभिव्यक्त करता है।

अरस्तू ने अनुकरण से उत्पन्न आनंद को भी महत्त्व दिया है। उनके अनुसार मनुष्य स्वभावतः अनुकरणशील प्राणी है और अनुकरण की गई वस्तुओं को पहचानने तथा उनके अर्थ को समझने से उसे ज्ञान और आनंद प्राप्त होता है। इस प्रकार प्लेटो जहाँ अनुकरणजन्य आनंद को मिथ्या वस्तु पर आधारित मानते हैं, वहीं अरस्तू उसे ज्ञानार्जन से उत्पन्न आनंद मानते हैं। अरस्तू का ‘अनुकरण’ अंग्रेजी के सामान्य अर्थ वाले ‘इमिटेशन’ से भिन्न है; यह यांत्रिक नकल नहीं, बल्कि रचनात्मक पुनर्सृजन है। इस दृष्टि से पाश्चात्य काव्यशास्त्र में अनुकरण सिद्धांत का वही केंद्रीय महत्त्व है, जो भारतीय काव्यशास्त्र में रस सिद्धांत का माना जाता है।

(2) विरेचन (Catharsis) सिद्धांत

अरस्तू के काव्यशास्त्र का दूसरा प्रमुख सिद्धांत विरेचन है। ‘विरेचन’ मूलतः चिकित्सा-शास्त्र से संबंधित शब्द है, जिसका अर्थ शरीर से अनावश्यक या दूषित पदार्थों का निष्कासन है। अरस्तू ने इसका काव्यशास्त्रीय अर्थ में प्रयोग करते हुए इसे भाव-परिष्कार, भाव-शुद्धि और भाव-संस्कार की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया। विशेष रूप से त्रासदी के संदर्भ में विरेचन का सिद्धांत अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

अरस्तू के अनुसार त्रासदी दर्शकों के मन में भय और करुणा जैसे भावों को जागृत करती है। इन भावों के माध्यम से दर्शक अपने भीतर विद्यमान सुप्त और संचित मनोभावों का अनुभव करता है। त्रासदी के कलात्मक प्रभाव से इन भावों का क्रमशः विरेचन होता है और मानसिक उद्वेग शांत होकर भावों में संतुलन स्थापित होता है। इस प्रकार त्रासदी मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियों का पोषण करने के बजाय उसके मनोभावों का परिष्कार करती है।

त्रासदी के प्रभाव की प्रक्रिया को तीन चरणों में समझा जा सकता है—

  1. भाव-जागरण — त्रासदी दर्शकों के मन में भय, करुणा आदि भावों को तीव्र करती है।
  2. भाव-अनुभूति — दर्शकों के भीतर सुप्त और संचित भाव जागृत होकर कलात्मक अनुभव का रूप ग्रहण करते हैं।
  3. भाव-विरेचन — जागृत भावों का परिष्कार और शमन होता है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है तथा मनोवृत्तियों में संतुलन और संस्कार उत्पन्न होता है।

इस प्रकार विरेचन केवल भावों का निष्कासन नहीं, बल्कि भावों के कलात्मक परिष्कार की प्रक्रिया है। अरस्तू ने संगीत और त्रासदी जैसी ललित कलाओं के प्रभाव में मनोविकारों के शुद्धीकरण की संभावना स्वीकार की। इस दृष्टि से कला मनुष्य को मानसिक संतुलन प्रदान करने वाली सृजनात्मक शक्ति बन जाती है।

अरस्तू ने त्रासदी को महाकाव्य की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली माना है। उनके अनुसार त्रासदी का कथानक अपेक्षाकृत संक्षिप्त, संगठित और सुगठित होता है, इसलिए उसका कलात्मक प्रभाव अधिक तीव्र होता है। इसके विपरीत महाकाव्य का फलक व्यापक होने के कारण उसमें कथा-विस्तार और प्रभाव के बिखराव की संभावना रहती है।

भारतीय काव्यशास्त्र की दृष्टि से अरस्तू की त्रासदी और करुण रस में पर्याप्त साम्य दिखाई देता है। दोनों में दुख, करुणा और भावानुभूति की केंद्रीय भूमिका है। भारतीय काव्यशास्त्र में ‘शोक’ करुण रस का स्थायी भाव है, जबकि अरस्तू के यहाँ त्रासदी का प्रभाव मुख्यतः भय और करुणा के माध्यम से निर्मित होता है। फिर भी दोनों अवधारणाओं में अंतर है—भारतीय काव्यशास्त्र का शोक स्थायी भाव के रूप में मूलतः विशिष्ट और अमिश्रित है, जबकि अरस्तू का त्रासद प्रभाव भय और करुणा जैसे भावों के सम्मिलित प्रभाव से निर्मित होता है।

इस प्रकार अरस्तू ने अनुकरण को रचनात्मक पुनर्सृजन और त्रासदी को भाव-परिष्कार की प्रक्रिया के रूप में स्थापित करके पाश्चात्य काव्यशास्त्र को वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण आधार प्रदान किया। उनके अनुकरण और विरेचन सिद्धांत साहित्य के स्वरूप, प्रयोजन और प्रभाव को समझने की दृष्टि से आज भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

प्लेटो का साहित्य-चिंतन

 प्लेटो पाश्चात्य साहित्य-चिंतन के प्रमुख दार्शनिक और आदर्शवादी विचारक थे। उनके साहित्यिक चिंतन का मूल आधार आदर्श राज्य, नैतिकता और लोककल्याण की अवधारणा है। वे साहित्य और कला को केवल मनोरंजन अथवा सौंदर्य-बोध का साधन नहीं मानते, बल्कि उनके सामाजिक और नैतिक उपयोग को अधिक महत्त्व देते हैं। प्लेटो के अनुसार काव्य का प्रयोजन लोकमंगल होना चाहिए। काव्य में मानव-प्रकृति के महान, शुभ, नैतिक और न्यायपरायण पक्षों का उद्घाटन होना चाहिए तथा वह मानव-कल्याण, राष्ट्रोत्थान और ज्ञान-वृद्धि में सहायक होना चाहिए। इस दृष्टि से प्लेटो के यहाँ कला की कसौटी केवल ‘आनंद’ और ‘सौंदर्य’ नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता और नैतिकता है। इस संदर्भ में उनका विचार भारतीय लोकमंगलवादी साहित्य-दृष्टि के निकट दिखाई देता है। वे मानते हैं कि चमचमाती हुई स्वर्णजटित किंतु अनुपयोगी ढाल की अपेक्षा गोबर रखने वाली उपयोगी टोकरी अधिक सुंदर है।

प्लेटो की साहित्य-दृष्टि में अनुकरण सिद्धांत का विशेष महत्त्व है। उनकी दो प्रमुख स्थापनाएँ हैं— (1) कला प्रकृति की अनुकृति है और (2) काव्य मनुष्य की भावनाओं को उद्वेलित करता है। प्लेटो के अनुसार वास्तविक सत्य भौतिक जगत में नहीं, बल्कि आदर्श या प्रत्यय-जगत में स्थित है। भौतिक जगत स्वयं उस आदर्श जगत की अनुकृति है और कला एवं काव्य भौतिक जगत की अनुकृति करते हैं। इस प्रकार काव्य सत्य से तीन स्तर दूर हो जाता है। इसलिए प्लेटो के अनुसार काव्य में सत्य का प्रत्यक्ष अनुकरण संभव नहीं है।

यहाँ प्लेटो का विरोध अनुकरण की प्रक्रिया से अधिक उसके विषय को लेकर है। उनके अनुसार कवि और कलाकार मूलतः अनुकरणकर्ता हैं। यदि अनुकरण का विषय आदर्श, नैतिक और सत्यपरक है, तो कला समाज के लिए उपयोगी हो सकती है; लेकिन यदि उसका विषय असत्य, अनैतिक अथवा निम्न प्रवृत्तियों को बढ़ाने वाला है, तो उसका प्रभाव समाज पर हानिकारक हो सकता है।

प्लेटो ने काव्य की विषय-वस्तु को लेकर भी गंभीर आपत्तियाँ व्यक्त की हैं। उनका मानना था कि ऐसा काव्य, जो मनुष्य की भावनाओं और वासनाओं को अनियंत्रित रूप से उद्वेलित करता है, समाज में दुर्बलता और अनाचार को बढ़ावा दे सकता है। इसलिए वे साहित्य में सद्गुण, नैतिकता, विवेक और न्याय पर आधारित विषयों के समावेश के पक्षधर थे। विवेकहीन, असंगत, अपरिपक्व, अनैतिक तथा मन पर दुष्प्रभाव डालने वाली रचनाओं का उन्होंने विरोध किया। इसी कारण वे वीर पुरुषों के गुणों का वर्णन करने वाले तथा देवताओं के स्तुतिपरक काव्य को अधिक उपयुक्त मानते हैं।

प्लेटो के अनुसार श्रेष्ठ काव्य-रचना के लिए कवि को अपने विषय का पूर्ण और स्पष्ट ज्ञान होना चाहिए। रचना के सभी अंगों का विन्यास निश्चित क्रम, संतुलन और पारस्परिक संगति के साथ होना आवश्यक है। इस प्रकार प्लेटो की साहित्य-दृष्टि में नैतिकता, लोकमंगल, आदर्शवाद, अनुकरण, सत्य और रचना-संगति प्रमुख तत्त्व हैं। उनके विचारों ने आगे चलकर पाश्चात्य साहित्यिक आलोचना को गहरे स्तर पर प्रभावित किया।

हिंदी आलोचना पर पाश्चात्य प्रभाव का विकासक्रम

 

प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और साहित्य-चिंतन के विकास में यूनान का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पाश्चात्य साहित्य-चिंतन की परंपरा में प्लेटो का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनके चिंतन से पाश्चात्य साहित्य-सिद्धांत को एक व्यवस्थित दार्शनिक आधार प्राप्त हुआ। प्लेटो के शिष्य अरस्तू ने अपने गुरु के अनेक सिद्धांतों से असहमति व्यक्त करते हुए तर्कपूर्ण ढंग से उनका प्रतिपादन और समाधान किया। इस प्रकार प्लेटो और अरस्तू के माध्यम से पाश्चात्य साहित्यशास्त्र की एक सुदृढ़ वैचारिक परंपरा विकसित हुई। यूनान के तीसरे प्रमुख साहित्य-चिंतक लोंजाइनस ने ‘औदात्य’ की अवधारणा को केंद्र में रखकर काव्य के प्रभाव और उसकी महानता पर विचार किया। उनके औदात्य-संबंधी चिंतन ने आगे चलकर पाश्चात्य साहित्य में स्वच्छंदतावाद और सौंदर्यवाद के विकास को वैचारिक आधार प्रदान किया। उन्नीसवीं शताब्दी में स्वच्छंदतावादी काव्य-प्रतिमानों का पर्याप्त विकास हुआ, जिसे वर्ड्सवर्थ के काव्य-चिंतन से दृढ़ आधार मिला। बीसवीं शताब्दी में विश्वयुद्धों के बाद उत्पन्न सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक परिस्थितियों ने अस्तित्ववादी चिंतन को जन्म दिया, जिसने साहित्य के मूल्यों, प्रतिमानों और रचना-दृष्टि को व्यापक रूप से प्रभावित किया।

हिंदी आलोचना का विकास भी पाश्चात्य साहित्य-चिंतन से निरंतर संवाद करते हुए हुआ। पाश्चात्य साहित्यशास्त्र के सिद्धांतों और समीक्षा-पद्धतियों के प्रभाव ने हिंदी आलोचना को अधिक वस्तुपरक, विवेचनात्मक, तर्कसंगत और विचार-समृद्ध बनाया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भारतीय साहित्यशास्त्रीय परंपरा को पाश्चात्य चिंतन के साथ जोड़ते हुए उसे आधुनिक दृष्टि प्रदान की। उन्होंने ‘आनंद की साधनावस्था’ जैसी अवधारणाओं को पाश्चात्य विचारकों के सिद्धांतों के संदर्भ में भी समझने का प्रयास किया। उनके द्वारा निर्मित आलोचना-पद्धति ने आगे आने वाले आलोचकों को भारतीय और पाश्चात्य साहित्यशास्त्र के बीच संवाद स्थापित करने की प्रेरणा दी।

आचार्य शुक्ल के बाद बाबू गुलाब राय, नंद दुलारे वाजपेयी और डॉ. नगेन्द्र आदि आलोचकों ने भारतीय तथा पाश्चात्य साहित्य-सिद्धांतों के समन्वय का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया। हिंदी आलोचना पर पाश्चात्य चिंतन का प्रभाव मुख्यतः चार प्रमुख धाराओं के माध्यम से दिखाई देता है।

पहली धारा स्वच्छंदतावादी आलोचना की है। इसने हिंदी आलोचना को व्यक्ति, कल्पना, अनुभूति, प्रकृति और सौंदर्य के महत्त्व को समझने की दृष्टि प्रदान की। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के आलोचनात्मक चिंतन में भी कुछ आधारों पर स्वच्छंदतावादी प्रभाव देखा गया है। इस दृष्टि ने विशेष रूप से छायावादी साहित्य को समझने और उसका मूल्यांकन करने के लिए नई आलोचनात्मक दृष्टि प्रदान की। नंद दुलारे वाजपेयी हिंदी आलोचना में स्वच्छंदतावादी प्रवृत्तियों को विकसित करने वाले प्रमुख आलोचक रहे।

दूसरी प्रमुख धारा मार्क्सवादी आलोचना की है। मार्क्सवादी चिंतन ने साहित्य को सामाजिक, आर्थिक और वर्गीय यथार्थ के संदर्भ में देखने की दृष्टि प्रदान की। प्रकाशचंद्र गुप्त से लेकर शिवदान सिंह चौहान, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध और नामवर सिंह तक अनेक आलोचकों ने मार्क्सवादी मान्यताओं के आधार पर हिंदी साहित्य की समीक्षा को नई दिशा दी।

तीसरी धारा मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण की है। इसके माध्यम से रचनाकार के अंतर्मन, अवचेतन, मानसिक संघर्ष और सृजन-प्रक्रिया को समझने का प्रयास किया गया। हिंदी साहित्य में अज्ञेय पर आधुनिक मनोविज्ञान और टी. एस. इलियट के चिंतन का प्रभाव दिखाई देता है। डॉ. नगेन्द्र पाश्चात्य साहित्यिक अवधारणाओं के प्रति विशेष रूप से ग्रहणशील रहे, यद्यपि उनका मूल आलोचनात्मक आधार रसवादी रहा। डॉ. देवराज भी कथाकारों के अंतर्मन और उनकी मनोवैज्ञानिक संरचना को समझने के समर्थक रहे।

चौथी धारा अस्तित्ववादी चिंतन की है। विश्वयुद्धोत्तर परिस्थितियों में विकसित अस्तित्ववाद ने व्यक्ति की स्वतंत्रता, अकेलेपन, संकट, अस्मिता और जीवन की अर्थहीनता जैसे प्रश्नों को साहित्य के केंद्र में स्थापित किया। स्वतंत्रता के बाद हिंदी आलोचना के विकास के साथ आधुनिकतावाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, संरचनावाद और उत्तर-संरचनावाद जैसी अनेक पाश्चात्य अवधारणाओं एवं समीक्षा-पद्धतियों का प्रभाव भी हिंदी आलोचना पर पड़ा। इस प्रकार हिंदी आलोचना ने भारतीय परंपरा को आधार बनाते हुए पाश्चात्य साहित्य-चिंतन के साथ निरंतर संवाद स्थापित किया और आधुनिक आलोचना के व्यापक स्वरूप का निर्माण किया।