संसारी समाज रामनवमी के दिन राम के जन्मोत्सव
को बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाता है। जो स्वयं जन्म और मरण के बंधनों से परे
हैं, उनके अवतरण की कल्पना मात्र से ही लोक-मन
पुलकित हो उठता है। राम के आगमन के उत्साह में समाज विविध कल्पनाएँ सँजोता है—कोई अपने आँगन को सजा-सँवार कर उनका स्वागत करता है, तो कोई उनके लिए रुचिकर भोग की व्यवस्था करने में तल्लीन हो
जाता है। राम एक हैं, पर उन्हें देखने की दृष्टि भिन्न-भिन्न है- “जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन
तैसी॥“ राम को सब अपनी-अपनी अंतर्दृष्टि और भावना के अनुरूप देखते हैं। संतों के लिए
वे प्रेम और करुणा के सागर,
भक्तों के लिए आराध्य,
प्रजा के लिए आदर्श राजा,
तो सीता जी के लिए उनके प्राणप्रिय पति थे। राम सत्य, धर्म और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में
सबके हृदयों में रमे हैं। वाल्मीकि और तुलसीदास के राम में अंतर है, तुलसीदास ने सृष्टि के समस्त सजीव और निर्जीव को सियाराममय कहा, जबकि भवभूति के राम एक अलग
भावभूमि में स्थापित होते हैं। कबीर ने राम को निर्गुण माना, उन्होंने राम को परम ब्रह्म के रूप में देखा—“कस्तूरी कुण्डल
बसे, मृग ढूँढे बन
माही”—अर्थात राम हर
हृदय में हैं, पर मनुष्य उन्हें बाहर खोजता है और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने शक्ति और मर्यादा का आदर्श माना । महात्मा गांधी के राम सत्य और करुणा के प्रतीक हैं, राम मनोहर लोहिया के राम सामाजिक न्याय और लोककल्याण के प्रतीक हैं।
भारतीय समाज में राम केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि मर्यादा, आदर्श, विनम्रता, विवेक और संयम के
जीवंत रूप हैं। वे “मर्यादा पुरुषोत्तम” हैं—ऐसा आदर्श जिसे आस्तिक ही नहीं, बल्कि हर
संवेदनशील मनुष्य स्वीकार करता है। वे स्थितप्रज्ञ, अनासक्त और असंपृक्त लोकनायक हैं, जिनमें सत्ता के
प्रति मोह नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का भाव है। राम यह देश राम का है—राम जो किसी एक
मंदिर, कथा या रूप में
सीमित नहीं, बल्कि हर कण, हर भावना और हर कर्म में व्यापक हैं। वे केवल आस्था नहीं, बल्कि अनुभव हैं।
भाव की हर हिलोर में राम हैं, कर्म के हर छोर पर राम हैं। वे यत्र-तत्र नहीं, सर्वत्र हैं—जिसमें वे रम
जाएँ, वही राम हो जाता
है। है। राम धर्म के साकार रूप हैं—जिसे राम प्रिय नहीं, उसे धर्म भी प्रिय नहीं हो सकता।
राम इस देश की एकता के सूत्रधार भी हैं।
अयोध्या से लेकर लंका तक की उनकी यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, सांस्कृतिक एकता
का विस्तार है । राम साध्य हैं, साधन नहीं। राम
कोई मात्र ऐतिहासिक या राजनैतिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि सनातन, अजन्मा और अद्वितीय सत्ता के प्रतीक हैं। वे
केवल दशरथ के पुत्र या अयोध्या के राजा तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मशक्ति, नैतिकता और अटूट संकल्प के जीवंत प्रतीक हैं। राम उस आंतरिक
शक्ति का स्वरूप है, जो मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म के
मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है। वह निर्बलों के सहारा है और समाज के हर वर्ग के लिए आशा के स्रोत है। उनकी कसौटी किसी एक व्यक्ति या वर्ग
का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण
प्रजा के सुख और कल्याण का मापदंड है। राम का जीवन उस आदर्श का प्रतीक है, जहाँ उन्नति किसी
के अधिकारों का हनन करके नहीं, बल्कि सभी को साथ लेकर, न्याय और मर्यादा के मार्ग पर चलकर प्राप्त की
जाती है। यही राम महात्मा गांधी के लिए वह नैतिक
शक्ति बने, जिसके सहारे पूरे देश को अंग्रेज़ी साम्राज्य
से संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया और उसी राम के
नाम पर इस देश मे आदर्श
व्यवस्था की कल्पना की । गांधी ने रामराज्य का आदर्श इसलिए चुना क्योंकि वे भारत की एकता और मर्यादा के प्रतीक
हैं। वे ऐसे रामराज्य के पक्षधर थे जहाँ लोकहित सर्वोच्च हो। राम केवल अतीत नहीं, एक जीवित चेतना
हैं—जो समाज को दिशा
देती है और मनुष्य को उसका नैतिक दर्पण दिखाती है।
राम का जीवन त्याग और संतुलन का उदाहरण है। राम जनस्वीकृत, शक्तिशाली राजा थे, पर अहंकार से अछूते रहे। अपार शक्ति के बावजूद
उन्होंने कभी मनमाने निर्णय नहीं लिए। वे मर्यादा, सामूहिकता और धर्म के प्रति प्रतिबद्ध रहे, तथा मानव और वानर
सभी के प्रति करुणा व कर्तव्य निभाते रहे। वे शक्ति के केंद्र होते हुए भी उसका
विस्तार नहीं करते। अयोध्या से लंका तक विजय प्राप्त करने के बाद भी उन्होंने
राज्यों को अपने अधीन नहीं किया—लंका विभीषण को और किष्किंधा सुग्रीव को सौंप दी। यह उनके
वैराग्य और मर्यादा का प्रमाण है।
राम का आदर्श “लक्ष्मण रेखा” की मर्यादा में है —सीमा में जीवन सुख और
सुरक्षा देता है, उल्लंघन अनर्थ लाता है। वे जाति-वर्ग से परे
सबके हैं—निषादराज, सुग्रीव, शबरी, जटायु सभी को साथ लेकर
चलने वाले। राम ने राजा,
पुत्र, भाई और पति के रूप में उच्च आदर्श स्थापित किए, जो हर युग में प्रासंगिक हैं। भरत के लिए आदर्श भाई, हनुमान के स्वामी, और प्रजा के लिए
न्यायप्रिय राजा हैं। उन्होंने परिवार और दांपत्य को नई गरिमा दी—एकनिष्ठ दांपत्य प्रेम उनका जीवन-आदर्श रहा, सीता के वियोग में उनकी
करुणा स्पष्ट दिखती है। पिता की आज्ञा का पालन कर उन्होंने संबंधों को नई ऊंचाई
दी। उनका जीवन समावेश,
कर्तव्य और प्रेम का
अद्वितीय संतुलन है,
जो आज भी प्रेरणा देता
है।
विश्व साहित्य में राम जैसा चरित्र अद्वितीय है—न वैसी मर्यादा, न वैसा पौरुष, न वैसी तितिक्षा। वे संतुलन के प्रतीक हैं—अमीरों की आस्था भी, और गरीबों का संबल भी। उनका नाम ही कठिन से कठिन परिस्थितियों में जीने का
साहस देता है। त्रेतायुग में अवतरित होकर भी वे आज तक जन-जन के जीवन में उपस्थित
हैं-“जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।“ भक्तों के अनुभवों में राम बार-बार प्रकट होते हैं—कभी संकटमोचक बनकर, तो कभी मार्गदर्शक बनकर। विज्ञान और तर्क जहाँ सीमित हो जाते हैं, वहाँ से राम का भावलोक आरंभ होता है। वे अंतर्मन की शक्ति
हैं, जीवन की सृष्टि और सृष्टि के जीवन के आधार हैं।
राम जोड़ने वाले हैं,
तोड़ने वाले नहीं।
रामराज्य का आदर्श “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और "परहित सरिस धर्म नहीं भाई" की भावना पर आधारित है, जहाँ सभी के सुख और निर्भय जीवन की कामना की जाती है।
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