Thursday, 30 April 2026

“फ्यूल फॉर फ्यूचर: भारत ने यूरेनियम बाजार में खेला मास्टरस्ट्रोक”

 भारत और कजाकिस्तान के बीच यूरेनियम आपूर्ति को लेकर हुआ हालिया समझौता केवल एक व्यापारिक डील नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन का संकेत है। लगभग 4 अरब अमेरिकी डॉलर के इस करार में कजाकिस्तान की राष्ट्रीय परमाणु कंपनी काजाटोमप्रोम भारत को दीर्घकालिक रूप से प्राकृतिक यूरेनियम कंसन्ट्रेट उपलब्ध कराएगी।

इस समझौते को काजाटोमप्रोम के शेयरधारकों ने 92.9% बहुमत से मंजूरी दी—जो यह दर्शाता है कि यह सौदा केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि रणनीतिक प्राथमिकता भी है। एशिया में यह इस दशक की सबसे बड़ी परमाणु ईंधन साझेदारियों में गिना जा रहा है।

भारत ने लंबे समय से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की बात की है, लेकिन आधुनिक अर्थों में आत्मनिर्भरता का मतलब ‘सब कुछ देश में पैदा करना’ नहीं, बल्कि एक ऐसी मजबूत और विविध आपूर्ति शृंखला बनाना है, जो किसी भी वैश्विक संकट में बाधित न हो। यूरेनियम के लिए कजाकिस्तान, तेल के लिए बहुस्तरीय स्रोत, गैस के लिए दीर्घकालिक अनुबंध और नवीकरणीय ऊर्जा में घरेलू विस्तार—ये सभी मिलकर ही वास्तविक ऊर्जा सुरक्षा का ढांचा तैयार करते हैं।

यह डील भारत की ऊर्जा रीढ़ को मजबूत करने के साथ-साथ उसके परमाणु कार्यक्रम को स्थिरता देगी। साथ ही, मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को भी मजबूती मिलेगी। कजाकिस्तान के लिए यह निर्यात विस्तार हो सकता है, लेकिन भारत के लिए यह भविष्य की औद्योगिक शक्ति, निरंतर बिजली आपूर्ति और रणनीतिक स्वायत्तता में निवेश है।

इस समझौते का प्रभाव वैश्विक यूरेनियम बाजार पर भी पड़ेगा। जब इतना बड़ा हिस्सा द्विपक्षीय अनुबंधों में “लॉक” हो जाता है, तो खुले बाजार (स्पॉट और टर्म मार्केट) की तरलता घटती है। इसका सीधा अर्थ है—आने वाले समय में आपूर्ति सीमित और कीमतों में अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत ने इस संभावित कमी से पहले ही अपनी स्थिति मजबूत कर ली है।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि काजाटोमप्रोम दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादक है। ऐसे उत्पादक के साथ दीर्घकालिक संबंध स्थापित करना यह संकेत देता है कि भारत अब ऊर्जा को केवल आर्थिक जरूरत नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति-प्रक्षेपण के साधन के रूप में देख रहा है।

कजाकिस्तान के लिए भी यह डील सामान्य नहीं है। कंपनी ने इसके लिए औपचारिक Extraordinary General Meeting आयोजित की, मतदान कराया और परिणाम सार्वजनिक किए—यह सब इस बात का संकेत है कि भारत अब उसके लिए एक साधारण ग्राहक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक साझेदार बन चुका है।

वैश्विक संसाधन राजनीति की वास्तविक भाषा यही है—जहां कुछ देश बयान देते हैं, वहीं उभरती शक्तियां आपूर्ति शृंखलाएं गढ़ती हैं। आज के दौर में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि यूरेनियम, तेल, गैस, सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ और समुद्री मार्गों पर नियंत्रण को लेकर भी लड़े जा रहे हैं।

इस समझौते ने एक बात स्पष्ट कर दी है—नई दिल्ली अब केवल प्रतिक्रिया देने वाली शक्ति नहीं रही, बल्कि वह पहले कदम उठाने वाली, भविष्य की दिशा तय करने वाली शक्ति के रूप में उभर रही है।

Thursday, 2 April 2026

भारत के रक्षा निर्यात में बड़ी छलांग


भारत के रक्षा क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। अगर पिछले साल से तुलना करें, तो यह लगभग 62.66% की जबरदस्त बढ़ोतरी है। पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 23,622 करोड़ रुपये था।

इस सफलता में सरकारी कंपनियों (डीपीएसयू) और निजी कंपनियों—दोनों का बड़ा योगदान रहा है। कुल निर्यात में सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 54.84% रही, जबकि निजी कंपनियों का योगदान 45.16% रहा। इसका मतलब यह है कि भारत में अब रक्षा उत्पादन सिर्फ सरकारी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी कंपनियां भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं।


रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस उपलब्धि की तारीफ करते हुए कहा कि यह भारत की स्वदेशी ताकत का प्रमाण है। दुनिया अब भारत के हथियारों और रक्षा तकनीक पर भरोसा करने लगी है। उन्होंने इसे भारत की “सफलता की शानदार कहानी” बताया।

अगर आंकड़ों को और सरल तरीके से समझें, तो इस साल करीब 14,802 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निर्यात हुआ है। खास बात यह है कि सरकारी कंपनियों के निर्यात में पिछले साल के मुकाबले 151% की बहुत तेज बढ़ोतरी हुई है। वहीं निजी कंपनियों ने भी 14% की अच्छी ग्रोथ दिखाई है। निजी क्षेत्र ने 17,353 करोड़ रुपये का निर्यात किया, जबकि सरकारी कंपनियों का योगदान 21,071 करोड़ रुपये रहा।

आज भारत 80 से ज्यादा देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। साथ ही, निर्यात करने वाली कंपनियों की संख्या भी बढ़कर 128 से 145 हो गई है। यानी अब ज्यादा कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं।

अब बात करते हैं उन हथियारों की, जिनकी दुनिया में सबसे ज्यादा मांग है—

1. ब्रह्मोस मिसाइल
यह एक सुपरसोनिक मिसाइल है, जो बहुत तेजी से लक्ष्य पर हमला करती है। इसकी मारक क्षमता करीब 300 किलोमीटर है। फिलीपींस, वियतनाम, इंडोनेशिया और यूएई जैसे देश इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

2. तेजस फाइटर जेट
तेजस भारत का अपना बनाया हुआ लड़ाकू विमान है। यह हवा में और जमीन पर दोनों तरह के मिशन कर सकता है। अर्जेंटीना, मलेशिया और नाइजीरिया जैसे देश इसे खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं।

3. आकाश मिसाइल सिस्टम
यह एक एयर डिफेंस सिस्टम है, जो दुश्मन के हवाई हमलों को रोक सकता है। सऊदी अरब, वियतनाम और केन्या जैसे देश इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं।

4. पिनाका रॉकेट लॉन्चर
यह एक ऐसा सिस्टम है जो एक साथ कई रॉकेट दाग सकता है। इसकी रेंज 75 से 120 किलोमीटर तक है। इसे आर्मेनिया को निर्यात किया जा चुका है और कई अन्य देशों में भी इसकी मांग है।

5. अर्जुन टैंक
यह एक आधुनिक युद्धक टैंक है, जिसमें उन्नत तकनीक और शक्तिशाली हथियार लगे हैं। अफ्रीकी देशों और नाइजीरिया जैसे देशों ने इसमें रुचि दिखाई है।

इन सबके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत अब अपने हथियार खुद बना रहा है और उनकी गुणवत्ता भी अच्छी है। दुनिया को भारत के उत्पाद सस्ते, भरोसेमंद और प्रभावी लग रहे हैं।

सरकार का लक्ष्य है कि भारत दुनिया के बड़े रक्षा निर्यातक देशों में शामिल हो। इसके लिए ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी योजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही, व्यापार को आसान बनाने और कंपनियों को ज्यादा सुविधाएं देने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

कुल मिलाकर, यह उपलब्धि सिर्फ आंकड़ों की नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि भारत अब रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बन रहा है और दुनिया में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। आने वाले समय में भारत एक बड़े रक्षा निर्यातक देश के रूप में उभर सकता है।