लोकतंत्र में सरकारों का मूल्यांकन केवल उनकी सफलताओं से नहीं, बल्कि उनके नीतिगत फैसलों के बाद समाज में पैदा हुए असंतोष और चुनौतियों से भी होता है। पिछले 12 वर्षों (2014 से 2026 तक) के सफर में जहां एक ओर सरकार ने बुनियादी ढांचे और डिजिटल गवर्नेंस में बड़े बदलावों का दावा किया है, वहीं दूसरी ओर कई ऐसे मोर्चे रहे हैं जहां सरकार के फैसले गंभीर विवादों, जन-आक्रोश और नीतिगत विफलताओं के घेरे में आए हैं।
कृषि से लेकर शिक्षा और रोजगार तक, समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा उठाए जा रहे ये कुछ ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जो सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
कृषि कानून: दृढ़ता और वापसी के बीच का नीतिगत भटकाव
मोदी सरकार के सबसे विवादित फैसलों में 'तीन कृषि कानून' शीर्ष पर रहे। आलोचकों और कृषि विशेषज्ञों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि इन कानूनों को बिना व्यापक आम सहमति और राज्यों को भरोसे में लिए जल्दबाजी में लाया गया। इसके बाद जब देशव्यापी किसान आंदोलन शुरू हुआ, तो सरकार ने सख्त रुख अपनाया। लेकिन अंततः, कानून वापस ले लिए गए। यदि कानून वाकई सुधारवादी थे, तो सरकार उन्हें सुचारू रूप से समझाने और सख्त इरादे के साथ लागू करने में नाकाम रही। वहीं दूसरी ओर, इसके पीछे हट जाने को सरकार की 'नीतिगत कमजोरी' के रूप में देखा गया, जिससे सुधारों की प्रक्रिया अधर में लटक गई।
सरकारी नौकरियां और रोजगार संकट: युवाओं की अधूरी उम्मीदें
हर वर्ष करोड़ों नौकरियों का वादा करने वाली सरकार के लिए सरकारी
भर्तियों की सुस्त रफ्तार एक बड़ा सिरदर्द रही है। संसद में समय-समय पर सरकार ने भी
स्वीकार किया है कि रेलवे, रक्षा, गृह मंत्रालय,
डाक विभाग और अन्य केंद्रीय विभागों
में लाखों स्वीकृत पद खाली हैं। इन पदों पर भर्ती की प्रक्रिया अक्सर वर्षों तक चलती
रही, जिससे लाखों अभ्यर्थियों
को लंबा इंतजार करना पड़ा। इसके साथ ही, भर्ती परीक्षाओं में देरी और कई राज्यों में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं की निराशा
को और बढ़ाया। कई अभ्यर्थियों को एक ही परीक्षा के लिए वर्षों तक तैयारी करनी पड़ी,
जबकि कुछ भर्तियाँ न्यायालयी
विवादों या प्रशासनिक कारणों से लंबे समय तक अटकी रहीं।
नियमित सरकारी नौकरियों की जगह 'ठेका प्रथा' (Contractual jobs) लागू करने से युवाओं में सुरक्षा की भावना कम हुई है, जिसे युवा वर्ग सरकार के सबसे निराशाजनक फैसलों में से एक मानता है। सरकार का कहना है कि उसने भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाई, डिजिटल चयन प्रणाली लागू की और कौशल आधारित रोजगार को प्रोत्साहित किया, व्यावहारिक स्तर पर तार्किक नहीं प्रतीत होता है | यदि व्यवस्था इतनी प्रभावी हुई है, तो लाखों स्वीकृत सरकारी पद वर्षों तक खाली क्यों रहे? यदि भर्ती प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और तेज़ हुई है, तो परीक्षाओं और नियुक्तियों में बार-बार देरी क्यों देखने को मिली? और यदि रोजगार के अवसर वास्तव में बढ़े हैं, तो बड़ी संख्या में युवा अब भी नियमित सरकारी नौकरियों के लिए वर्षों तक तैयारी करने को मजबूर क्यों हैं?"
पेपर लीक और परीक्षा प्रणालियों की विफलता: छात्रों के भविष्य पर कुठाराघात
हाल के वर्षों में NEET, UGC-NET और विभिन्न राज्यों की कई भर्ती एवं प्रवेश
परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने देश की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर
गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कई परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं, दोबारा आयोजित हुईं या उनकी जाँच शुरू हुई, जिससे लाखों छात्रों का समय, धन
और वर्षों की मेहनत प्रभावित हुई। इन घटनाओं के बाद राष्ट्रीय परीक्षा
एजेंसी (NTA) सहित परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर व्यापक बहस
हुई। आलोचकों का कहना है कि संगठित पेपर लीक गिरोहों और कथित शिक्षा माफिया के
खिलाफ समय पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रही। जब बार-बार पेपर लीक हों, परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ें और लाखों युवाओं का भविष्य अधर में
लटक जाए, तब पारदर्शिता, डिजिटलीकरण, प्रशासनिक कुशलता और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन के दावे स्वतः कठघरे
में खड़े हो जाते हैं। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा उसकी नीतियाँ नहीं, बल्कि उनका ईमानदार और प्रभावी क्रियान्वयन होता है।
भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और राजनीतिक अवसरवाद का विरोधाभास
2014 में 'ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा' का नारा भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का प्रतीक बनकर उभरा था। केंद्रीय एजेंसियों (ED, CBI) द्वारा विपक्षी नेताओं पर ताबड़तोड़ कार्रवाइयां की गईं। हालांकि, जनता और आलोचकों के बीच इस बात को लेकर भारी असंतोष है कि जिन नेताओं पर खुद सरकार या उसकी पार्टी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाती है, वे जैसे ही पाला बदलकर सत्ताधारी दल (BJP) में शामिल होते हैं, उनके खिलाफ जांच ठंडी पड़ जाती है या उन्हें क्लीन चिट मिल जाती है। भारतीय राजनीति के गलियारों में इस वक़्त एक मुहावरा सबसे ज़्यादा मशहूर है—"बीजेपी की वॉशिंग मशीन"। यह महज़ आरोप नहीं, बल्कि आम जनता के बीच गहरा चुका वह सच है जिसने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दावों को एक मज़ाक बना कर रख दिया है। 'ट्रायल चलाकर जेल भेजने' के बजाय राजनीतिक समझौते करने की इस नीति ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की लड़ाई की साख को कमजोर किया है। ED (प्रवर्तन निदेशालय) और CBI जैसी देश की प्रीमियर जांच एजेंसियों का कनविक्शन रेट बेहद कम है, जिसका सीधा मतलब है कि इनका मकसद न्याय दिलाना नहीं, बल्कि सिर्फ 'प्रताड़ित करना' और 'डराना' है ताकि राजनीतिक सौदेबाजी की जा सके। उस आम नागरिक और टैक्सपेयर के साथ इससे बड़ा भद्दा मज़ाक क्या होगा, जो ईमानदारी से टैक्स भरता है और सोचता है कि देश से भ्रष्टाचार खत्म हो रहा है। लेकिन भ्रष्टाचारी जेल जाने के बजाय सत्ता के शीर्ष पर बैठकर देश की नीतियां तय करने लगता है |
एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और कानूनी यू-टर्न
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने का फैसला दिया था। इसके बाद देश भर में दलित संगठनों द्वारा भारी विरोध प्रदर्शन हुए। चुनावी और सामाजिक दबाव के चलते सरकार ने संसद में कानून पारित कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट (Overrule) दिया। यह कदम न्यायिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप और राजनीतिक तुष्टीकरण था न कि सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए उठाया गया कदम ।
चिकित्सा और शिक्षा का बाजारीकरण: आम जनता की जेब पर डाका
पिछले एक दशक में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी तरह से 'माफिया और कॉर्पोरेट' के नियंत्रण में चली गई हैं। निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर खुली लूट, दवाओं और मेडिकल उपकरणों के मनमाने दाम तय होने पर सरकार का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं दिख रहा है। सरकार ने कुछ जीवन रक्षक दवाओं की अधिकतम सीमा तय तो की , लेकिन मेडिकल माफिया ने 'कंसल्टेशन फीस' और 'सर्विस चार्ज' बढ़ाकर उसकी भी भरपाई जनता की जेब से कर ली। आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं कुछ हद तक राहत देती हैं, लेकिन वे निजीकरण की इस बड़ी समस्या का स्थायी इलाज नहीं बन पाई हैं। यह योजना सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के बजाय अंततः सरकारी खजाने का पैसा निजी अस्पतालों की जेब में ही डाल रही है। यह व्यवस्थागत निजीकरण का 'स्थायी इलाज' नहीं, बल्कि एक 'अस्थायी पेनकिलर' है।
निजी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों की बेलगाम फीस और व्यावसायिकता ने शिक्षा को एक आम भारतीय परिवार की पहुंच से दूर कर दिया है। एडमिशन फीस, डेवलपमेंट चार्ज, कस्टमाइज्ड ड्रेस और किताबों के नाम पर जो सिंडिकेट (माफिया) स्कूलों के भीतर चलता है, उस पर लगाम लगाने की हिम्मत किसी सरकार में नहीं दिखती। कोटा से लेकर देश के हर कोने में फैले कोचिंग संस्थानों ने समानांतर शिक्षा व्यवस्था खड़ी कर दी है। रेगुलेशन के नाम पर सरकारें केवल तब जागती हैं जब अवसाद के कारण किसी छात्र की आत्महत्या की खबर आती है या किसी बेसमेंट में पानी भरने से बच्चे मर जाते हैं। सरकारों ने जानबूझकर सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत को बदतर होने दिया, ताकि निजी हाथों के लिए बाजार तैयार किया जा सके। यह जन-कल्याणकारी राज्य के विचार पर सबसे बड़ा तमाचा है।
सवर्ण/मध्यम वर्ग: "टैक्सपेयर" बनाम "मजबूर वोटर" का संकट
इस वर्ग की यह शिकायत काफी हद तक धरातलीय हकीकत पर आधारित है।
इस देश का मिडिल क्लास और सवर्ण समाज आज
खुद को भारत का सबसे असहाय नागरिक महसूस करता है। वह सरकार के लिए महज एक 'दुधारू गाय' है, जिसे बिना चारा दिए
सिर्फ दुहा जाता है। एक मिडिल क्लास आदमी सुबह उठने से लेकर
रात को सोने तक सरकार को टैक्स देता है। वह अपनी गाढ़ी कमाई पर 30% तक इनकम टैक्स देता है। इसके बाद जो पैसा बचता है, उससे गाड़ी खरीदे तो 28% GST + रोड टैक्स देता है। पेट्रोल डलवाए तो आधे से ज्यादा टैक्स देता है। इस टैक्सपेयर वर्ग को लगता है कि उनके पैसे से मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, और तमाम कल्याणकारी योजनाएं
(Welfare Schemes) चलाई जा रही हैं, लेकिन बदले में उन्हें न तो अच्छी सरकारी शिक्षा मिलती है, न स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही
कोई सामाजिक सुरक्षा (Social Security)। उन्हें सब कुछ अपनी जेब से निजी क्षेत्र से खरीदना पड़ता है।
इतनी बड़ी आहुति देने के बाद उसके बच्चे
सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ सकते क्योंकि वहां की बदहाली जगजाहिर है, इसलिए वह लाखों की फीस देकर प्राइवेट स्कूल भेजता
है। बीमार पड़ने पर वह सरकारी अस्पताल जाने की हिम्मत नहीं कर सकता, क्योंकि वहां स्ट्रेचर तक के लिए धक्के खाने पड़ते
हैं, इसलिए वह प्राइवेट हॉस्पिटल को लाखों
लुटाता है।
राजनीतिक रूप से भी इस वर्ग को लगता है कि 'विकल्पहीनता' के कारण वे एक निश्चित दल को वोट देने के लिए मजबूर
हैं क्योंकि दूसरी तरफ जब वह देखता है, तो वहां 'खटाखट' मुफ्त पैसे बांटने
की रेस लगी है या घोर जातिवादी तुष्टिकरण का कुआं है। वह कुएं और खाई के बीच फंसा
ऐसा बंधुआ मजदूर है, जिसकी मजबूरी का
फायदा मौजूदा सरकार बखूबी उठा रही है।
आरक्षण और योग्यता बनाम सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस
मोदी सरकार ने खुद को 'मजबूत और कड़े फैसले लेने वाली सरकार' के रूप में विज्ञापित किया है, लेकिन जब बात वोट बैंक और आरक्षण की आती है, तो यह सरकार भी उतनी ही रीढ़विहीन नजर आती है जितनी पिछली सरकारें थीं। आरक्षण के कारण सेवाओं की गुणवत्ता और विकास पर पड़ने वाले नकारात्मक असर को लेकर मोदी सरकार ने पूरी तरह से अनदेखा किया है। वोट बैंक के नाराज होने के डर से मोदी सरकार आरक्षण प्राप्त उम्मीदवारों के लिए एक न्यूनतम मानक तय नहीं कर पाई है | परिणाम बहुत ही भयावह है, गैर आरक्षण प्राप्त उम्मीदवार 90-95% अंक लाने के बाद भी सीटों से वंचित रह जाते हैं, जबकि कम अंकों वाले उम्मीदवारों का चयन हो जाता है। विशेष रूप से चिकित्सा (Medical), अनुसंधान (Research), और तकनीकी सेवाओं जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में केवल और केवल 'मेरिट' को ही एकमात्र आधार होना चाहिए। संविधान निर्माताओं ने जब आरक्षण लागू किया था, तो अनुच्छेद 335 (Article 335) में साफ लिखा था कि आरक्षण देते समय 'प्रशासनिक दक्षता और कार्यकुशलता' (Administrative Efficiency) से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। लेकिन आज की राजनीति ने इस अनुच्छेद को कचरे के डिब्बे में डाल दिया है। जब आप चिकित्सा, अनुसंधान और इंजीनियरिंग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में मेरिट को लात मारकर केवल जातिगत पर्चियों के आधार पर चयन करेंगे, तो देश का विकास बाधित होना तय है।
आज का युवा और टैक्सपेयर वर्ग इस बात की वकालत कर रहा है कि अब आरक्षण का आधार 'जाति' के बजाय 'आर्थिक स्थिति' (Economic Status) होना चाहिए, ताकि सवर्ण वर्ग के गरीब बच्चों को भी आगे बढ़ने का मौका मिले और संपन्न हो चुके लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर (Creamy Layer का सख्ती से पालन) किया जा सके। इसके साथ ही, सरकार को टैक्स देने वाले वर्ग को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनके टैक्स के पैसे का इस्तेमाल केवल राजनीतिक लाभ के लिए मुफ्तखोरी में नहीं, बल्कि देश के बुनियादी ढांचे, विश्वस्तरीय सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को बनाने में हो रहा है, ताकि हर वर्ग को उसका हक मिल सके।
मोदी सरकार के 12 वर्षों का यह दौर जहां बड़े नीतिगत बदलावों और कड़े फैसलों के लिए जाना जाता है, वहीं रोजगार, पारदर्शिता, सामाजिक संतुलन और बुनियादी जन-सुविधाओं (स्वास्थ्य-शिक्षा) पर नियंत्रण के मोर्चे पर इसके फैसलों की तीखी आलोचना स्वाभाविक है। एक मजबूत लोकतंत्र में इन कमियों पर चर्चा होना और जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है, ताकि विकास का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सही मायने में पहुंच सके।