Monday, 28 September 2026

भारत को अमेरिका और चीन से नहीं बल्कि स्वयं से आगे निकलना है

 23 सितंबर 2026 को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिका की राजकीय यात्रा पर पहुँचे। वॉशिंगटन के ज्वाइंट बेस एंड्रयूज़ पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्वयं उनका स्वागत किया। किसी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष का एयरपोर्ट पर व्यक्तिगत रूप से स्वागत करना सामान्य प्रोटोकॉल से अलग और अपेक्षाकृत दुर्लभ कूटनीतिक संकेत माना जाता है। इस दृश्य से कुछ भारतीय असहज हुए, जबकि कुछ परिपक्व लोगों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का सामान्य हिस्सा मानकर अधिक ध्यान नहीं दिया।

दरअसल, समस्या उस दृश्य में कम और हमारी मानसिकता में अधिक है। हमारी कल्पना की दुनिया बहुत बड़ी है। हमने मन ही मन मान लिया है कि चीन हमसे बेहतर है और हमारा स्थायी शत्रु है, जबकि अमेरिका के प्रति हमारे भीतर एक विचित्र मिश्रण है—थोड़ी ईर्ष्या, थोड़ी प्रशंसा और कहीं न कहीं एक बड़े भाई की तलाश।
विडंबना यह है कि कोई भारत की बढ़ती ताकत की बात करे तो हमारे भीतर संशय जाग जाता है। हमारे मन के भारत में अक्सर ईर्ष्यालु पड़ोसी और षड्यंत्रकारी रिश्तेदार बसे हुए हैं। पड़ोसी या रिश्तेदार की सफलता देखने से बेहतर हमें कभी-कभी आँखें बंद कर लेना लगता है। कड़वा है, लेकिन यह हमारे सामाजिक मन का एक हिस्सा है।
अमेरिका और चीन आज अनेक क्षेत्रों में भारत से आगे हैं, लेकिन वे हमसे किसी दूसरी दुनिया में नहीं खड़े। हमें न उनसे हीनभावना रखनी चाहिए, न उनकी उपलब्धियों को चमत्कार मानकर स्वयं को छोटा समझना चाहिए।
चीन की सफलता का आकलन उसके आँकड़ों से होता है, लेकिन किसी भी समाज की वास्तविक तस्वीर उसकी जनता की स्वतंत्र आवाज़ में भी दिखाई देती है। यदि चीन अपनी जनता को व्यापक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देकर पूछे कि वे अपने देश की प्रगति को किस रूप में देखते हैं, तो उसकी सफलता का सामाजिक पक्ष भी सामने आएगा।
फिर भी एक क्षेत्र में चीन हमसे स्पष्ट रूप से बहुत आगे है—उद्योग और विनिर्माण। यही वह आधार है जिसने उसे अनेक क्षेत्रों में तेज गति दी है। भारत इस दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन अब केवल तेजी पर्याप्त नहीं; हमें युद्धस्तर की प्राथमिकता के साथ उद्योगों का विस्तार करना होगा।
अमेरिका भी पिछले कुछ वर्षों में भारत को एक महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति और आर्थिक प्रतिस्पर्धी के रूप में देखने लगा है। यह अपने आप में संकेत है कि भारत की दिशा वैश्विक शक्ति-संतुलन के लिए महत्वपूर्ण हो रही है।
इसलिए अमेरिका को बहुत बड़ा और चीन को अजेय मानने की आवश्यकता नहीं। हमें अपना ध्यान अपनी कमजोरियों पर लगाना है।
पढ़ना है तो खूब पढ़िए। खेलना है तो पूरे मन से खेलिए। लिखना है तो खूब लिखिए। और सबसे महत्वपूर्ण—अपने आसपास वस्तुओं और सेवाओं की ऐसी माँग पैदा कीजिए, जो नए व्यवसायों और उद्योगों को जन्म दे।
माँग उद्योगों को बुलाती है। उद्योग रोजगार पैदा करते हैं, रोजगार आय पैदा करता है और आय फिर नई माँग को जन्म देती है। यही विकास का चक्र है।
लेकिन आर्थिक विकास के साथ हमारी सामाजिक मानसिकता भी बदलनी होगी। आत्मविश्वास की कमी, आपसी मनमुटाव और दूसरों की सफलता से ईर्ष्या हमें भीतर से कमजोर करते हैं। कोई एक व्यक्ति आगे बढ़ता है तो कई लोग उसे आगे बढ़ाने के बजाय पीछे खींचने लगते हैं।
इस मानसिकता को बदलने के लिए छोटी-छोटी सामाजिक परंपराएँ शुरू की जा सकती हैं। किसी रिश्तेदार या परिचित ने नया व्यापार शुरू किया है तो उसे 100-200 रुपये का छोटा-सा लिफाफा ही सही, लेकिन दीजिए। रकम छोटी होगी, संदेश बड़ा—तुम्हारी सफलता में हम तुम्हारे साथ हैं।
जैन समाज सहित सभी संपन्न समुदायों से आग्रह है कि दान और सामाजिक सेवा के साथ नए उद्यमों तथा उद्योगों को भी प्रोत्साहन दें। दुकानदार 2 रुपये का पेन बेचता हो, वह भी किसी नए उद्यमी का छोटा-सा सहयोगी बन सकता है।
मंदिरों और सामुदायिक मंचों पर धार्मिक गतिविधियों के साथ व्यापार, उद्योग, रोजगार और नए अवसरों पर चर्चा की संस्कृति विकसित हो। जैसे गाँव में एक बेटी पूरे गाँव की बेटी होती है, वैसे ही यह भावना बने कि किसी का व्यापार पूरे समाज की प्रगति है।
जब छोटे-छोटे आर्थिक इंजन एक-दूसरे से जुड़ेंगे, तो वातावरण बदलेगा। घरेलू विवादों और टांग खींचने की जगह नए व्यापारिक विचारों पर चर्चा होगी। रिश्तेदार एक-दूसरे की सफलता से जलेंगे नहीं, उसे आगे बढ़ाएँगे।
हमें अमेरिका और चीन से सीखना चाहिए, लेकिन अपनी हठधर्मिता छोड़कर हंस की तरह विवेक रखना चाहिए—जहाँ से जो उपयोगी हो, उसे ग्रहण करें और जो अनुपयोगी हो, उसे छोड़ दें।
सरकार और नेतृत्व अपना काम करेंगे। नागरिकों का धर्म है—शिक्षा, श्रम, उद्यम, अनुशासन, नवाचार और परस्पर सहयोग।
एक एस. जयशंकर सौ लोगों पर भारी पड़ सकते हैं, लेकिन राष्ट्र केवल एक व्यक्ति से महान नहीं बनता। असली शक्ति तब पैदा होगी, जब करोड़ों भारतीय अपनी-अपनी भूमिका निभाएँगे।
हमें अमेरिका या चीन से आगे निकलने की चिंता से पहले ऐसा भारत बनाना है, जहाँ एक भारतीय दूसरे भारतीय की सफलता में अपनी सफलता देखे। जिस दिन यह सोच बदल गई, उस दिन भारत की वास्तविक शक्ति सामने आएगी।

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