Thursday, 24 April 2025

मध्यकालीन काव्यात्मक उत्कर्ष की भाषा-अवधी

अवधी अर्धमागधी अपभ्रंश से निःसृत पूर्वी हिंदी परिवार की उपभाषा है | यह अवध प्रदेश में बोली जाने वाली बोली है | यह अवध प्रान्त के लखीमपुर खीरी, बहराइच, गोंडा, बाराबंकी, लखनऊ, सीतापुर, उन्नाव, फैज़ाबाद, सुल्तानपुर और रायबरेली जिलों में बोली जाती है | वर्तमान समय में अवधी बोलने वालों की संख्या 4 करोड़ के आसपास है |

एक साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी का इतिहास काफी पुराना है | भाषा के रूप में ‘अवधी’ का प्रथम स्पष्ट उल्लेख अमीर खुसरो की ‘खालिकबारी’ में मिलता है | इससे स्पष्ट है कि अवधी का अस्तित्व पहले से रहा होगा | इस दृष्टि से अवधी का प्रथम प्राचीन साहित्यिक प्रयोग रोडा कृत ‘राउलवेल’ में मिलता है, जो 1001-1025 ई. से बीच की रचना मानी जाती है | इस भाषा के प्रयोग का दूसरा उदाहरण दामोदर पंडित द्वारा रचित ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ में मिलता है | इसमें अवधी के बोलचाल रूप का प्रयोग हुआ है | इस दौर की भाषा पर निःसंदेह अपभ्रंश का प्रभाव अधिक है | लेकिन अवधी अपभ्रंश के प्रभावों से मुक्त होने की कोशिश करती दिखाई पड़ती है | फिर भी अवधी में किसी संपूर्ण काव्य-रचना का उदाहरण 1379 ई. में मुल्ला दाऊद की ‘चंदायन’ या ‘लोरकहा’ है | इसलिए मुल्ला दाऊद को केंद्र में रखकर अवधी के साहित्यिक विकास को हम तीन चरणों में विभाजित कर सकते है-

1.       1379 ई से पूर्व की अवधी-जब अवधी अपभ्रंश के प्रभावों से मुक्त होने का प्रयास करती है और रचनाओं में अवधी भाषा के प्रयोग मिलते हैं | लेकिन अवधी में रचित कोई साहित्यिक रचना नहीं मिलती है |

2.       1379 ई से तुलसीदास के अविर्भाव तक की अवधी

3.       तुलसीदास और उसके बाद की अवधी

1379 ई में रचित चंदायन में ठेठ अवधी भाषा का प्रयोग हुआ है | चंदायन में उपलब्ध आवहिं, चढ़ावहिं, बहिराहिं, कहहिं, आवइ, भावइ आदि क्रिया रूप जायसी कृत ‘पद्मावत’ और तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ में भी मिलते हैं | साथ ही अरबी-फ़ारसी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग हुआ है | इसलिए साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी की नींव रखने का श्रेय मुल्ला दाऊद को है | चंदायन के 124 वर्ष बाद कुतुबन कृत मृगावती भी ठेठ अवधी में रचित काव्य है | लेकिन मृगावती की अवधी पर अपभ्रंश का प्रभाव अधिक है |

अवधी भाषा को साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध करने का श्रेय मलिक मुहम्मद जायसी को है | जायसी ने ‘पद्मावत’ और ‘अखरावट’ में अवध क्षेत्र में प्रचलित बोलचाल की भाषा को उसकी स्वाभाविक मिठास के साथ काव्य की भाषा बना दिया | इन्होने बोलचाल की भाषा में कोई भारी परिवर्तन किए बिना उसे सर्जनात्मक बनाने वाले समस्त शैलीय उपकरणों, अलंकारों, शब्द-शक्तियों, अर्थगुणों, वक्रताओं, ध्वन्यात्मक प्रभाव पैदा करने वाली शब्द-योजना द्वारा अवधी को कलात्मक ऊंचाई प्रदान की | अवधी में बोलचाल के रूप में प्रयुक्त हो रहे अपभ्रंश के शब्दों का प्रयोग जायसी ने किया है, लेकिन तत्सम शब्दों का प्रयोग काफी कम है |

जायसी के समकालीन मंझन ने अपभ्रंश के प्रचलित रूपों के प्रति रूचि नहीं दिखाई| उनकी ‘मधुमालती’ में अधिक से अधिक द्वित्व या व्यंजन लोप वाले कुछ शब्दों के प्रयोग दिखाई पड़ते हैं | जैसे-खप्प, तत्त, दिब्ब, दुग्गम, पुब्ब आदि | जायसी के बाद ‘चित्रावली’ के रचयिता उसमान, ‘इंद्रावती’ और ‘अनुराग बाँसुरी’ के रचयिता नूर मोहम्मद और ‘युसूफ-जुलेखा’ के रचयिता निसार ने ठेठ अवधी की भाषा को व्यापकता प्रदान की | इन सूफी रचनाकारों ने जिस अवधी भाषा में रचना की, उसकी व्याकरणिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

1.       संज्ञा रूपों में कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं आ पायी थी |

2.       पुलिंग संज्ञा की पहचान उकारांत शब्दों से और स्त्रीलिंग संज्ञा की इकारांत शब्दों से होती है |

3.       बहुबचन के अंत में न, नि, न्हि मिलता है |

4.       सर्वनाम- महँ, मैं, हौं, हम्ह, हम्हार, तूँ तुइँ, तुम्ह, वह ओइ, ते, जो, जेइँ जेहिं

5.       संज्ञा और सर्वनाम-ऐ( ने के लिए), क, कहँ काँ, काँह( को के लिए), सों, सौं, तें सेंती( से के लिए)

6.       क्रिया—वर्तमान काल—करत, सूझ;  भूतकाल—आव, छूट, कइल, केन्हसि, दीन्हि; भविष्यत काल—हुत, अहा, अछिलो, आहि, आहै

अब तक अवधी में काव्य रचना करने वाले अधिकांश कवि सूफी थे, जिन्हें अपभ्रंश और फ़ारसी काव्य-परंपरा का ज्ञान तो था लेकिन कदाचित् संस्कृत परंपरा से अनभिज्ञ थे |

अवधी के विकास के तृतीय दौर में गोस्वामी तुलसीदास ‘रामचरितमानस’ लेकर आए, जिसके माध्यम से अबतक काव्यरूप में प्रचलित बोलचाल की अवधी एकबारगी परिनिष्ठित साहित्यिक अवधी के रूप में प्रतिष्ठित हो गई | सूफी कवियों की भाषा की तुलना में अब तत्सम शब्दों का प्रचुर प्रयोग होने से अवधी की सर्जनात्मक संभावनाओं में अपरिमित वृद्धि हुई | गोस्वामी तुलसीदास ने ठेठ अवधी की मधुरता को बनाए रखते हुए उसे परिमार्जित कर संस्कृत की कोमल-कांत पदावली से समृद्ध किया |

जैसे- नाम राम लछिमन दोउ भाई, संग नारि सुकुमारि सुहाई |

इहाँ हरि निसिचर बैदेही, विप्र फिरहिं हम खोजत तेहीं |

इन पंक्तियों में तत्सम शब्दों का अद्भुत प्रयोग हुआ है | गोस्वामी जी की विशेषता यह है कि वे तत्सम शब्दों को बिल्कुल ही तत्सम रूप में रहने नहीं देते हैं| जैसे-करुणा, गुण, अमृत और वल्कल का करुना, गुन, अमिय और बलकल में अवधीकरण हो जाता है |

अमिय मूरि मय चूरन चारू | समन सकल भवरुज परिवारू ||

अपनी समन्वयवादी प्रकृति के कारण उन्होंने भोजपुरी, राजस्थानी, खड़ी बोली और अरबी-फ़ारसी प्रयोगों को भी उचित स्थान दिया और उन्हें अवधी बाना पहनाने में पर्याप्त सफलता मिली है | जैसे-खलक, खसम, गरूर, गुमान, रहम, सबील, सरकार, साहेब | तुलसी के पारस-स्पर्श से अवधी जिस साहित्यिक और परिनिष्ठित काव्य-भाषा के पद पर प्रतिष्ठित हुई, उसकी व्याकरणिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

1.       परिनिष्ठित अवधी में सूफियों के बहुत से प्रयोग समाप्त हो गए, लेकिन भाषा प्राचीन रूपों से पूर्णतया अलग नहीं हुई |

2.       क्रिया रूप सरल हो गए-आटै, बाटै का प्रयोग बहुत ही कम हो गया है | सहायक क्रिया में अछ् धातु नहीं रही |

3.       सर्वनाम- मैं-हम, तु-तुम्ह, जो, को कौन

4.       संज्ञा-सर्वनाम के परसर्ग- का, कहँ(को)  लागि, हित(के लिए), सईं, सैं तैं(से) कै, केर, केरा की

तुलसी की काव्य भाषा का अनुसरण बाद के प्रायः सभी रचनाकार करते रहे, परन्तु तुलसी ने अवधी को काव्य-भाषा के जिस शिखर पर पहुँचाया, बाद के रचनाकारों के लिए कुछ नवीन प्रयोग संभव नहीं हुआ | परन्तु मुल्ला दाऊद से लेकर जायसी और तुलसीदास जैसे महान कवियों के योगदान से अवधी जिस काव्यात्मक उत्कर्ष पर पहुंची, वह संसार की किसी भी अन्य भाषा के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है |  

 

Wednesday, 23 April 2025

मध्यकालीन आर्यभाषा अपभ्रंश

अपभ्रंश मध्यकालीन आर्यभाषा की तीसरी अवस्था है | अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ है-भ्रष्ट, विकृत, अशुद्ध या संस्काररहित | सर्वप्रथम जो शब्द भाषा के सामान्य मानदंड या मानक रूप से विकृत या अशुद्ध होते थे, उनके लिए ‘अपभ्रंश’ शब्द का प्रयोग होता था | भाषा विशेष के सन्दर्भ में अपभ्रंश शब्द का प्रयोग प्रायः छठी शती ईस्वी में प्राकृत वैयाकरण चंड ने सर्वप्रथम किया है | कुछ विद्वानों ने इसे देश-भाषा या देशी भाषा कहा है | वाग्भट्ट और आचार्य हेमचन्द्र ने इसे ग्राम-भाषा कहा है | सातवीं से ग्यारहवीं शती के अंत तक यह साहित्य-भाषा, देश-भाषा   और राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई | नाथों, सिद्धों और जैनियों का विपुल साहित्य इसी भाषा में रचा गया | स्वयंभू अपभ्रंश भाषा के आदि कवि माने जाते हैं | जसहर चारिउ, णायकुमार चारिउ, करकंड चारिउ, भविस्यत्त कहा और पाहुड़ दोहा आदि अपभ्रंश में रचित महान कृतियाँ हैं |

अपभ्रंश की ध्वनिगत विशेषताएँ

1.       ह्रस्व स्वर-अ इ उ  

दीर्घ स्वर-आ ई ऊ ए ओ

2.       ऐ और औ अपभ्रंश में नहीं मिलते है |

3.       ऋ के स्थान पर अ इ उ ए और रि हो गया

       जैसे- कृष्ण> कण्ह (अ)

कृत>किय (इ)

पृच्छ>पुच्छ (उ)

गृह> गेह (ए)

ऋण> रिण (रि)

4.       कई शब्दों में अकारण अनुनासिकता आ गई | जैसे पंखि(पक्षि), मंजार(मार्जार), वंक(वक्र)|

5.       अपभ्रंश को उकार बहुला भाषा कहा गया है-जैसे- मनु, कारणु, अंगु |

6.       व्यंजन संयोग को सरल करने के लिए प्रायः संयुक्त व्यंजनों के बीच कोई स्वर लाया गया

जैसे- आर्य>आरिय

क्रिया>किरिया

वर्ष>वरिस

7.       कई शब्दों में स्वरलोप की प्रवृति पाई जाती है

जैसे- अरण्य>रण्ण

अहं>हउं  

8.       अपभ्रंश में ङ ञ न श और ष ध्वनियाँ नहीं हैं | लेकिन ‘ण’ का बहुप्रयोग अपभ्रंश की विशेषता है |

9.       अपभ्रंश चवर्ग स्पर्श-संघर्षी थे तो कवर्ग कोमलतालव्य |

10.    न का ण, य का ज और श-ष का स हो गया |

जैसे- णयर(नगर), जइ (यदि), केस(केश)

11.    शब्द के मध्य में आने वाले क, ग, च, ज, त, द का अ या य हो गया |

जैसे- वचन>वयण

कोकिल> कोअल

 नगर> णयर

12.    अन्त्य व्यंजन(हलन्त) के लोप की प्रवृति पाई जाती है|

जैसे- जगत्>जग

पश्चात्>पच्छा

13.    आदि व्यंजन को सुरक्षित करने की प्रवृति दिखाई पड़ती है | पर कहीं- कहीं आदि व्यंजन के महाप्राणीकरण(ज्वल>झल्ण) और अल्पप्राणीकरण(क्षुधित>खुहिय) की प्रवृति भी दिखाई देती है |

 

व्याकरणिक विशेषता

1.       अपभ्रंश में दो लिंग (स्त्रीलिंग और पुलिंग) और दो ही वचन मिलते हैं | लेकिन पुलिंग की प्रधानता होती है |

2.       विभक्तियों के ह्रास की जो प्रवृति ‘पालि’ से प्रारंभ हुई थी, वह अपभ्रंश में बढ़ जाती है   | अपभ्रंश में केवल तीन कारक समूह हैं:

()  कर्त्ता-कर्म-संबोधन  (ख) करण-अधिकरण (ग) सम्प्रदान-संबंध-आपादान

3.       अपभ्रंश के अधिकांश कर्त्ता, कर्म और संबंध कारक में विभक्तियों का प्रयोग होता ही नहीं है | इन्हें लुप्तविभक्तिक पद कहते हैं, जिनका निर्देश हेमचंद्राचार्य ने किया है | विभक्तियों की कमी को परसर्गों द्वारा पूरा किया गया | करण का परसर्ग ‘सहुँ’, सम्प्रदान के लिए ‘रेसि’ और ‘केहि’, आपादान के लिए ‘होन्तउ और होन्त’, संबंध के लिए ‘केरअ-केर-केरा’ और अधिकरण के लिए ‘मज्झी-मज्झे’ का प्रयोग होता है|

4.       संस्कृत में संज्ञा के 24 रूप और प्राकृत में 12 रूप थे, लेकिन अपभ्रंश एसा केवल 6 रूप ही प्रचालन में रह गए थे |

5.       अपभ्रंश में सर्वनामों के विभिन्न रूप पाए जाते हैं |

6.       अपभ्रंश में काल-रचना में तिडन्त रूपों के स्थान पर कृदन्त का व्यवहार अधिक होता है | वर्तमान काल और भविष्यत काल में तिडन्त रूप मिलता है, लेकिन भूतकाल में कृदन्त का प्रयोग होता है |

7.       धातु रूपों का सरलीकरण और एकीकरण अपभ्रंश की विशेषता है | इसमें परस्मै पद रूप नहीं मिलते हैं|

8.       अपभ्रंश में तत्सम शब्दों का प्रयोग बढ़ने लगा था | जैसे-कबंध, गगन, चरण, पंचम | लेकिन तद्भव शब्दों की संख्या अधिक है | मुसलमानों के संपर्क में आने से अरबी-फ़ारसी शब्दों का प्रयोग होने लगा- आल-माल(माल-मत्ता), सुल्ताण, रूमाल| 

Wednesday, 26 March 2025

स्वतंत्रता और समानता: सामाजिक मूल्यों का सामंजस्य

स्वतंत्रता, समानता और न्याय को सामाजिक-राजनीतिक मूल्यों के रूप में देखा जाता है, जिसकी प्राप्ति के लिए हमें प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि इसकी प्राप्ति से समाज में सुधार होता है | इसलिए जब हम कहते है कि स्वतंत्रता, समानता और भातृत्व भावना सामाजिक मूल्य है तो इसका अर्थ है कि इनकी प्राप्ति के लिए समाज को प्रयत्नशील होना चाहिए |

स्वतंत्रता- स्वतंत्रता दो अतिवादी स्थितियों अतंत्रता और परतंत्रता के मध्य का मार्ग है | अतंत्रता वह स्थिति है जिसपर कोई नियंत्रण न हो | जो पूर्णतः अनियंत्रित होता है | किसी अन्य के द्वारा नियंत्रित स्थिति परतंत्रता है | इन दोनों के मध्य स्वतंत्रता वह स्थिति है जिस पर कुछ नियंत्रण होता है, किन्तु वह नियंत्रण स्वयं द्वारा स्थापित नियंत्रण है | इसलिए नियंत्रित होने के बाद भी इसे स्वतंत्रता कहा जाता है | परन्तु जब हम अपना नियंत्रण स्वयं कर रहे होते है तो उस नियंत्रण के स्वच्छंदता में परिवर्तित होने का भय बना रहता है |

निश्चित रूप से स्वतंत्रता व्यक्ति का एक नैतिक अधिकार है | लेकिन यह अधिकार नितांत साध्य नहीं है | वास्तव में इस अधिकार के साथ कुछ कर्त्तव्य भी जुड़े होते है | प्राचीन यूनानी विचारकों का कहना था कि व्यक्ति को स्वतंत्र इसलिए होना चाहिए, जिससे वह अपने अन्दर निहित समस्त संभावनाओं का विकास कर सके | इसप्रकार यहाँ पर स्वतंत्र होने का अर्थ स्वच्छंद होना नहीं है | यह किसी आदर्श के साथ बंधा हुआ होता है, इसलिए यह अतंत्रता से अलग है |

स्वतंत्रता की सबसे अच्छी परिभाषा जॉन लॉक के विचारों में दिखाई देती है जिसके अनुसार स्वतंत्रता मनुष्य का अधिकार है | क्या करें और क्या न करें? इस बात का निर्णय करने के लिए व्यक्ति का जो अधिकार है वहीँ स्वतंत्रता है, बशर्ते कि मनुष्य इसी प्रकार का अधिकार अन्य व्यक्तियों को भी प्रदान करने के लिए तैयार रहे | इस परिभाषा का प्रथम अंश स्वतंत्रता को और दूसरा अंश समता को परिभाषित करता है |

समता- समता का मूल्य केवल इस बात की मांग करता है कि प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों में समता होनी चाहिए | समता का संप्रत्यय आरंभिक यूनानी दर्शन में नहीं दिखाई देता है | तब समानता का एक सीमित अर्थ था | प्लेटो का कहना है कि समता की स्थिति में समान लोगों के अधिकार समान होने चाहिए | यद्यपि विभिन्न समुदायों के अधिकार में अन्तर हो सकता है, लेकिन एक ही समुदाय के विभिन्न व्यक्तियों के अधिकारों में अंतर नहीं होना चाहिए |

व्यापक अर्थ में समानता का संप्रत्यय आधुनिक युग की देन है | विशेष रूप से समाजवादी आन्दोलन के दौर में इसका पूर्ण विकास हुआ |

राजनीतिक विचारों का इतिहास दो युगों में विभाजित है-

1.     समाजवाद के उद्भव के पूर्व का युग- इसे व्यक्तिवादी युग कहा जाता है क्योंकि इस युग में व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता था | यद्यपि समानता के बिना स्वतंत्रता अर्थहीन है क्योंकि एक व्यक्ति की स्वतंत्रता अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता के सापेक्ष होती है | कोई व्यक्ति अकेले अपनी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर सकता है | इसलिए लॉक का मानना है कि ‘एक स्वतंत्र व्यक्ति का अधिकार तभी तक सुरक्षित रह सकता है, जब तक वह अन्य व्यक्तिओं को स्वतंत्रता का अधिकार देने के लिए तैयार रहे |

2.       लोकतंत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोत्तम मूल्य के रूप में स्वीकार किया गया है और इसलिए लोकतंत्र का विकास पूंजीवादी लोकतंत्र के रूप में हुआ | अतः जिनके अंदर बौद्धिक और शारीरिक क्षमता अधिक थी, उनका विकास अधिक हुआ और जिनमें ये क्षमता कम थी उनका विकास कम होने के कारण समाज में विषमता उत्पन्न हुई | इसका निराकरण करने के लिए लोकतंत्र में समानता की स्थापना का प्रयत्न किया गया | इसमें तीन मूल्य स्वीकार किए गए- स्वतंत्रता, समानता और भातृत्व भाव| फिर भी स्वतंत्रता को सर्वोच्च मूल्य के रूप स्वीकार किया जाता रहा है | इन तीन मूल्यों में से स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी मूल्य माना जाता रहा है | इसप्रकार लोकतंत्र की अवधारणा ही विरोधाभासी हो गई | स्वतंत्रता को स्वीकार कर लेने पर समानता बाधित होती है और समानता को स्वीकार कर लेने पर स्वतंत्रता बाधित होती है|

इस विरोधाभास को दूर करने के लिए समाजवाद का संप्रत्यय विकसित हुआ, जिसमें स्वतंत्रता और समानता के संपूर्ण सामंजस्य का प्रयत्न किया गया, जो अलग-अलग दार्शनिक धारणाओं में अलग-अलग ढंग से व्यक्त हुआ|

जहाँ व्यक्तिवादी अवधारणा में स्वतंत्रता को अधिक महत्व है, वहीँ समाजवादी अवधारणा में समानता को सर्वोच्च महत्त्व दिया गया है | समाजवादी अवधारणा में वे सभी सिद्धांत सम्मिलित हैं जो व्यक्ति का साधन और समष्टि को साध्य मानते हैं और इसके व्यापक अर्थ में फासीवाद को भी समाजवादी विचारधारा के अंतर्गत शामिल किया जाता है क्योंकि वह समष्टिवाद का समर्थक है | वह व्यक्ति की स्वतंत्रता को निरर्थक मानता है | मुसोलिनी का मानना है कि स्वतंत्रता नाम का जो विशेषण है उसका प्रयोग केवल राज्य के साथ किया जा सकता है | स्वतंत्रता का अर्थ है राष्ट्र या समष्टि की स्वतंत्रता| व्यक्ति के साथ स्वतंत्रता का प्रयोग नहीं करना चाहिए | वे समानता को भी मूल्य नहीं मानते हैं | उनका मत है कि प्रकृति में विषमता है |  इसलिए समानता का भाव वास्तविक नहीं है | नीत्शे का कहना है कि कुछ लोग शासन करने के लिए और कुछ लोग शासित होने के लिए पैदा होते है | अतः समानता की बात करना निरर्थक है |

लेकिन जब हम खुले मष्तिष्क से विचार करते है तो पाते है कि दो व्यक्तियों के बीच समानता होनी चाहिए | यदि प्रकृति ने हमें विषम पैदा किया है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि जो कुछ भी प्राकृतिक है, उसका हम विरोध नहीं कर सकते | प्रकृति के उचित पक्ष को स्वीकार करके तथा अनुचित पक्ष को अस्वीकार करके सुसंस्कृत समाज की स्थापना करते है | यह संभव है कि पूर्ण सामंजस्य की स्थापना केवल एक आदर्श हो किन्तु साम्य के अधिक निकट पहुंचना असंभव नहीं है और यह समाज व्यवस्था का दायित्व भी है | 

समता और सर्वांगसमता में अंतर है | दोनों अलग-अलग अवधारणा है| जब कभी समानता की बात करते है तो इसकी यह कहकर आलोचना की जाती है कि प्रकृति ने ही मनुष्य को विषम पैदा किया है, इसलिए वह समान नहीं हो सकता | परन्तु जो लोग ऐसा कहकर समता की आलोचना करते है, वे समता और सर्वांगसमता का अर्थ ठीक से नहीं जानते हैं|  

समता का अर्थ सर्वांगसमता नहीं है | समता का अर्थ एक मनुष्य के रूप में प्राप्त होने वाले अधिकारों की समता है | अर्थात् विधान के द्वारा प्रदत्त अधिकारों में समता होनी चाहिए | परन्तु समानता का अर्थ शारीरिक और बौद्धिक समानता नहीं है | समानता का अर्थ शक्ति को विकसित करने की अवसर की समानता से है | कोई भी दो व्यक्ति एक-दूसरे से बिलकुल समान नहीं होते हैं | प्रत्येक व्यक्ति की अलग-अलग क्षमताएं होती है | इसलिए सबको विकास का समान अवसर मिलना चाहिए | भारतीय संविधान के अनुसार भाषा, लिंग, नस्ल और रंग आदि के आधार पर किसी भी व्यक्तियों में भेद नहीं किया जाना समानता है | लेकिन कोई व्यक्ति अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग कर लेता है और दूसरा नहीं कर पाता है | परिणामस्वरूप विषमता हो सकता है या होती है | कुछ दार्शनिक या विचारक ऐसे भी है, जिन्होंने समानता को सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्वीकार किया है | साम्यवादी समानता को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मूल्य मानते है | लेकिन यहाँ समानता से तात्पर्य आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और आचरण की समानता आदि से है | किन्तु इतनी समानता के बावजूद साम्यवादी और सभ्य समाजों में प्राकृतिक विषमता समाप्त नहीं की जा सकती है |

कुछ लोग समानता और स्वतंत्रता को परस्पर विरोधी मानते है | इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा तबतक नहीं की जा सकती है, जबतक समानता को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्वीकार न किया जाय | यहाँ समानता को सर्वोच्च मूल्य मानकर स्वतंत्रता का निषेध किया गया है | यहाँ स्वतंत्रता का अर्थ केवल इतना ही है कि लोकहित को दृष्टि में रखते हुए अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग | साम्यवादी समाज में व्यक्तिगत सम्पति और स्वतंत्रता का निषेध किया गया है | लेकिन स्वतंत्रता के ऐसे भी पक्ष है जिन्हें मानव व्यक्तित्व का केंद्र माना जाता है | जैसे-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता | स्व+तंत्र का शाब्दिक अर्थ ही है अपने अधीन होना | यदि व्यक्ति ने अपने को ठीक से पहचान लिया है तो उसके विचार और कर्म कभी भी लोकहित या समाज के व्यापक हितों के विरोध में नहीं हो सकते। समानता पर अधिक जोर देने वाले सिद्धांत और समाज में स्वतंत्रता का निषेध हुआ है | साम्यवादी समाज में संपत्ति का अधिकार या संपत्ति-स्वामित्व का निषेध किया गया है जबकि संपत्ति का अधिकार या संपत्ति-स्वामित्व मानव-व्यक्तित्व के लिए आवश्यक होता है | संपत्ति-स्वामित्व व्यक्ति को समाज में कर्मशील रहने और समाज के कुछ करने या समाज में कुछ जोड़ने के लिए प्रेरित करता है |

अतः स्वतंत्रता का निषेध मानव-व्यक्तित्व के लिए घातक होता है और समानता का निषेध समाज के लिए घातक होता है | इसलिए इन दोनों संप्रत्ययों के बीच सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए, जिससे व्यक्ति और समाज दोनों का समुचित विकास हो सके |

फासीवाद में समानता और स्वतंत्रता दोनों का निषेध किया गया है | यहाँ स्वतंत्रता का प्रयोग एक विशेष अर्थ में किया गया है | यह राष्ट्र की स्वतंत्रता है, व्यक्ति की नहीं | फासीवाद में शक्ति का अर्थ है राष्ट्र की शक्ति | जितने भी सामाजिक और राजनीतिक मूल्य है वे सभी राष्ट्र सापेक्ष हैं | यहाँ तक कि न्याय का अर्थ राष्ट्र के प्रति न्यायपूर्ण आचरण करना है | जिसे अरस्तू corrective justice कहता है, उसे फासीवाद अर्थहीन मानता है | राज्य से किसी प्रकार के अधिकार की मांग करना अन्यायपूर्ण है | मुसोलिनी का मानना था कि व्यक्ति का केवल इतना ही अधिकार है कि वह राष्ट्र के प्रति अपने जीवन का बलिदान कर दे |

उपयोगितावादी समानता और स्वतंत्रता दोनों का मूल्यांकन अपने मूल सिद्धांत अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख के आधार पर करते है |  उपयोगितावादी जॉन ऑस्टिन का मानना है कि वास्तव में सारे मूल्य इस महामूल्य की दृष्टि से अर्थ ग्रहण करते है | कोई भी मूल्य इस सर्वोच्च मूल्य की प्राप्ति में सहायक है तो मूल्य हैं, अन्यथा नहीं |

अर्थक्रियावादी विचारकों के अनुसार स्वतंत्रता अपने आप में कोई मूल्य नहीं है | यह मूल्य तब बनती है जब उसे मानव इच्छा की संतुष्टि के पैमाने पर मापते हैं | इसीप्रकार समता तभी मूल्य कही जाएगी, जब वह मानव इच्छा की संतुष्टि में सहायक हो |  

क्या स्वतंत्रता और समानता के मूल्यों को कोई भी समाज एक साथ प्राप्त कर सकता है ? क्या इन दोनों में सामंजस्य हो सकता है ?

अनेक चिंतकों ने इसका सकारात्मक उत्तर दिया है क्योंकि जब भी हम स्वतंत्रता की बात करते है तो उसकी कुछ सीमाएँ अवश्य होती है और स्वतंत्रता की यहीं सीमा समता की स्थापना में सहायक होती है | एक प्रचलित उक्ति है कि ‘हमारी स्वतंत्रता वहीँ समाप्त हो जाती है, जहाँ से दूसरे की स्वतंत्रता आरम्भ होती है|’

स्वतंत्रता के संप्रत्यय में नियंत्रण का तत्व अपने आप जुड़ा हुआ है और जिसे हम परम स्वतंत्रता समझते है, वह वास्तविक स्वतंत्रता नहीं है | संकल्प की स्वतंत्रता का अर्थ स्वयं अपने नियंत्रण में होना है | अतः नैतिक और राजनीतिक दृष्टियों से स्वतंत्रता एक सीमित अधिकार है | लॉक ने स्वतंत्रता को सीमित माना है | लॉक के अनुसार स्वतंत्रता व्यक्ति का वह अधिकार है, जिससे वह कुछ करने और नहीं करने का निर्णय लेता है, बशर्ते वह यही अधिकार अन्य लोगों को भी दे रहा है | लॉक का स्पष्टिकरण है कि एक व्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता से अधिक या कम मूल्यवान नहीं होती | सभी मनुष्यों की स्वतंत्रता का मूल्य समान है | इसलिए समानता का मूल्य स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है | एक उक्ति है कि ‘एक स्थान की गरीबी प्रत्येक अन्य स्थान की समृद्धि के लिए खतरा है | ठीक यही स्थिति स्वतंत्रता और समता के प्रत्यय के संबंध में भी सत्य है | अर्थात् यदि कहीं असमानता है तो वह व्यापक स्वतंत्रता के लिए खतरा है | अतः स्वतंत्रता की स्थापना के लिए समता की स्थापना आवश्यक है |

प्रश्न है कि स्वतंत्रता और समता में से कौन सा मूल्य मनुष्य के व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है ? स्वतंत्रता मनुष्य का स्वरुप लक्षण है, इसलिए सर्वाधिक प्रिय है | यह व्यक्ति स्वरुप लक्षण है | यह ने केवल सभ्य और सुसंस्कृत समाज की चीज है, बल्कि प्राकृतिक भी है, क्योंकि यदि कोई मूल्य केवल मनुष्य के लिए है तो उसे मानवकृत कह सकते है | लेकिन मानवेत्तर प्राणियों में भी स्वतंत्रता किसी न किसी रूप में दिखाई देती है | यद्यपि वहाँ यह स्वतंत्रता स्वच्छंदता के रूप में होती है | स्वच्छंद होना एक सहज प्रवृति है और इसी स्वच्छंदता के संप्रत्यय से स्वतंत्रता के संप्रत्यय को गढ़ा गया है | वेदांत दर्शन स्वतंत्रता को जीव का लक्षण मानता है | मोक्ष का व्यावहारिक रूप स्वतंत्रता है | यह स्वतंत्रता एक ओर बाह्य बंधन के निषेध की बात करती है तो दूसरी ओर आत्मनियंत्रण की बात करती है और यहीं आत्मनियंत्रण समता की स्थापना करती है | सच्ची स्वतंत्रता के लिए समानता अनिवार्य है | मनुस्मृति में कहा गया है कि जो मनुष्य सभी प्राणियों में स्वयं को देखता है और सभी प्राणियों को स्वयं में देखने लगता है, वही सच्चा स्वराज्य प्राप्त करता है | स्वराज्य का आदर्श स्वतंत्रता की भावना को प्रकट करता है |  


Tuesday, 25 March 2025

शंकर का जीव विचार..... ' जीवो ब्रह्मैव नापरः’

शंकराचार्य के अनुसार पारमार्थिक दृष्टिकोण से 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः’ अर्थात् ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और जगत मिथ्या है | जीव ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं है | जब आत्मा का प्रतिबिम्ब अविद्या पर पड़ता है तो जीव की उत्पति होती है | जीव आत्मा या ब्रह्म का व्यावहारिक रूप है | जब आत्मा शरीर, मन, बुद्धि आदि उपाधियों से युक्त होता है, सीमित होता है, तब वह जीव के रूप में दृष्टिगोचर होता है|  

जीव और आत्मा

·         जीव अनेक है | आत्मा एक है

·         जीव शरीरधारी है | आत्मा अशरीरधारी है |

·         जीव बंधन युक्त है | आत्मा बंधन मुक्त है

·         जीव व्यावहारिक सत्ता है | आत्मा पारमार्थिक सत्ता है |

·         जीव ज्ञाता, कर्त्ता और भोक्ता है | आत्मा कर्त्ता और भोक्ता नहीं है

जीव भिन्न-भिन्न शरीरों में अलग-अलग रूप में रहता है | जीव भौतिक और अभौतिक तत्वों का संगठन है| इसका भौतिक तत्व शरीर है जबकि अभौतिक तत्व चैतन्य है | यह चेतन तत्व निष्क्रिय दृष्टा या साक्षी है | साक्षी स्वयंप्रकाश है, स्वयंसिद्ध है | यह बिना किसी उपकरण के स्वतः अभिव्यक्त होता है | जीव का भौतिक तत्व अंतःकरण है, जो शरीर के रूप में अभिव्यक्त होता है | यह अविद्या का परिणाम है | इसी संदर्भ में यहाँ जीव को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि अंतःकरण से व्याप्त चैतन्य ही जीव है-अंतःकरण विशिष्टो जीवः| यह जीव न तो आत्मा है और न आत्मा से पृथक कोई स्वतंत्र सत्ता है | इसकी सत्ता आभासी है | शंकराचार्य के दर्शन में जीव और ब्रह्म के संबंध को स्पष्ट करने के लिए तीन सिद्धांतों का उल्लेख है-

·         प्रतिबिम्बवाद

·         अवच्छेद्वाद

·         आभासवाद

प्रतिबिम्बवाद-इसके अनुसार जिसप्रकार एक ही चन्द्रमा विभिन्न जलाशयों में अलग-अलग रूप में दृष्टिगोचर होता है | उसीप्रकार आत्मा या ब्रह्म वस्तुतः एक ही है, किन्तु वह नाना प्रकार के जीवों के रूप में प्रतिबिंबित होता है | इसकी आलोचना में यह कहा गया है कि यदि ब्रह्म निर्गुण और निराकार है तो फिर जीव में उसके प्रतिबिम्ब की व्याख्या नही की जा सकती है क्योंकि कोई सगुण और साकार वस्तु ही अपना प्रतिबिम्ब उत्पन्न कर सकती है |

अवच्छेद्वाद-इसके अनुसार जिसप्रकार एक ही आकाश कई स्थानों में सीमित रूप में अवलोकित होता है, जैसे-घटाकाश आदि, उसीप्रकार यद्यपि ब्रह्म एक ही है, किन्तु वह अविद्या और उपाधि भेद के कारण विभिन्न जीवों में सीमित रूप में दिखाई देता है | इसकी आलोचना में यह कहा गया है कि सर्वव्यापक तत्व को किसी भी प्रकार से सीमित नहीं किया जा सकता है इस सिद्धांत को मानने पर जीव की स्थिति रामानुजाचार्य के सदृश्य अर्थात् ब्रह्म के अंश के रूप में हो जाती है |

आभासवाद(विवर्तवाद)-इसके अनुसार वास्तव में जीव न तो ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है और न ही अवच्छेदित रूप रूप है | जीव ब्रह्म का विवर्त रूप है | दोनों तत्वतः एक ही है | जीव की ब्रह्म से पृथक अपनी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है | अविद्या के समाप्त होने पर दोनों के मध्य तादात्म्य की स्थिति उत्पन्न हो जाती है | अहं ब्रह्मास्मि, तत्तत्वमसि जैसे महावाक्य जीव और ब्रह्म की एकता को ही प्रतिपादित करते है |

Monday, 24 March 2025

रामानुजाचार्य द्वारा शंकराचार्य के मायावाद की आलोचना

रामानुजाचार्य ने शंकराचार्य के मायावाद को तर्कसंगत नहीं माना है | रामानुज के अनुसार माया एक वास्तविक दैवीय शक्ति है | यह ईश्वरीय शक्ति है जिसका स्वरुप रहस्यमय है | ईश्वर अपनी जिस रहस्यमयी शक्ति से जगत की सृष्टि करता है, वह मनुष्य की समझ से परे है और इसलिए इस शक्ति को माया कहा गया है | चूकि यह शक्ति वास्तविक है, अतः यह जगत भी वास्तविक है |

 रामानुजाचार्य ने शंकराचार्य के मायावाद को सात प्रमुख दोषों से युक्त माना है | अर्थात् यह मायावाद सात प्रकार से असिद्ध है | इन्हें सप्त-अनुपपत्ति कहा गया है | ये सात आक्षेप इस प्रकार है:-

1.       आश्रयानुपपत्ति- रामानुज का प्रश्न है कि आखिर माया का आश्रय क्या है | यदि ब्रह्म को माया का आश्रय माना जाय तो फिर इससे ब्रह्म का शुद्ध ज्ञानस्वरूप होने और उसकी अद्वैतवादी अवधारणा का खंडन होगा |  ब्रह्म को माया का आश्रय मानने पर ब्रह्म के साथ-साथ माया की भी सत्ता माननी पड़ेगी | पुनः माया का आश्रय जीव भी नहीं हो सकता है क्योंकि जीव स्वयं अविद्याजन्य है |

इस आक्षेप के उत्तर में शंकर के अनुयायियों का कहना है कि यद्यपि ब्रह्म ही माया का आश्रय है लेकिन वह स्वयं माया से प्रभावित नहीं होता है | जिसप्रकार जादूगर अपनी जादुई शक्ति से स्वयं प्रभावित नहीं होता है, उसी प्रकार ब्रह्म भी अपनी इस माया शक्ति से प्रभावित नहीं होता है |

2.       तिरोधानुपपत्ति-यदि ब्रह्म शुद्ध स्वप्रकाश व ज्ञानस्वरूप है तो फिर माया उसे आच्छादित या तिरोहित नहीं कर सकती | अतः या तो ब्रह्म ज्ञानस्वरूप है या फिर अज्ञान या माया उसे आच्छादित नहीं कर सकती |

शंकर के अनुयायियों का कहना है कि जिसप्रकार मेघ कुछ देर के लिए सूर्य को आच्छादित कर लेता है | उसी प्रकार ब्रह्म भी अज्ञान से ढक जाता है लेकिन उससे ब्रह्म के वास्तविक स्वरुप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता |

3.       स्वरूपानुपपत्ति-रामानुज का प्रश्न है कि माया का स्वरुप क्या है ? माया के चार स्वरुप संभव है-सत्, असत्, सद्सत्(सत्-असत्), न सत् न असत् | यदि माया सत् स्वरुप है, तो फिर इसका खंडन नहीं हो सकता | यदि असत् है तो जगत प्रपंच का ब्रह्म पर आरोप नहीं हो सकता है | पुनः इसे सद्सत् भी नहीं माना जा सकता है क्योंकि ऐसा मानना आत्मव्यघाति दोष होगा | इसे सद्सत् से परे मानना चिंतन प्रक्रिया से विमुख होने के समान होगा | स्पष्ट है कि माया का स्वरुप नहीं बताया जा सकता है |

शंकर के अनुयायियों का कहना है कि माया भाव रूप है | यहाँ माया को भाव रूप कहने का तात्पर्य केवल इतना ही है कि वह अभाव मात्र नहीं है | माया भाव रूप होते हुए भी अपनी सत्ता के लिए ब्रह्म पर आश्रित है |

4.     अनिर्वचनीयानुपपत्ति-शंकर माया को अनिर्वचनीय मानते है | रामानुज के अनुसार माया को अनिर्वचनीय कहना भी उसके सन्दर्भ में व्यक्त करने के समान है | पुनः विश्व के सभी पदार्थ या तो सत् हैं या असत् है | इन दो कोटियों से परे अनिर्वचनीयता को मानना तर्कशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करना है ( मध्यम परिहार का दोष) |

इसके जवाब में शंकर के अनुयायियों का कहना है कि सत् और असत् से विलक्षण होने के कारण माया को अनिर्वचनीय मानने में कोई दोष नहीं है | माया सत् नहीं है क्योंकि उसका खंडन ब्रह्म के ज्ञान से हो जाता है | पुनः वह बंध्या-पुत्र की भांति असत् भी नहीं क्योंकि इसकी प्रतीति होती है |

5.      प्रमाणअनुपपत्ति- रामानुज के अनुसार माया की सिद्धि का कोई प्रमाण नहीं है | प्रत्यक्ष प्रमाण से इसकी सिद्धि नहीं हो सकती क्योंकि वह सत् और असत् से विलक्षण है | यह अनुमानगम्य भी नहीं है क्योंकि माया का कोई हेतु नहीं है | पुनः शब्द प्रमाण से भी इसकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि शास्त्र इसे केवल ब्रह्म की लीला कहते है | कहने का आशय यह है कि मायावाद अप्रमाणित है |

शंकर के अनुयायियों के अनुसार माया का ज्ञान अर्थापत्ति प्रमाण से होता है |

6.       निवृत्यानुपपत्ति- रामानुज का कहना है कि यदि माया भाव रूप है तो इसका विनाश तर्कतः संभव नहीं है | भावरूप सत्ता का नाश ज्ञान से नहीं हो सकता |

शंकर के अनुयायियों ने इसके जवाब में कहा कि माया को भाव रूप कहने का आशय सिर्फ इतना है कि वह असत् रूप नहीं है | ब्रह्म ज्ञान से इसका निराकरण हो जाता है |

7.       निवर्तकअनुपपत्ति- रामानुज के अनुसार माया का कोई निवर्तक( नष्ट करने वाला) नहीं है | अद्वैत वेदांती निर्गुण, निराकार, निर्निवेष ब्रह्म के ज्ञान को माया का निवर्तक मानते हैं | रामानुज के अनुसार निर्गुण, निराकार, निर्निवेष ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त ही नहीं किया जा सकता है |

अद्वैतवादियों के अनुसार ब्रह्म ज्ञान ही माया का निवर्तक है | निर्गुण, निराकार, निर्निवेष ब्रह्म के ज्ञान के लिए आत्मानुभूति आवश्यक है | यह ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय के भेद पर आधारित नही है | यह ज्ञान अपरोक्षानुभूतिगम्य है |

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जिस अर्थ में शंकराचार्य ने माया का वर्णन किया है, उस अर्थ से भिन्न अर्थ में रामानुजाचार्य माया का खंडन करते है | वे भाव, सत् और असत् के अर्थ को शंकराचार्य दे द्वारा स्वीकृत अर्थ से भिन्न अर्थ लेकर मायावाद का खंडन करने का प्रयास करते है | अतः रामानुजाचार्य द्वारा शंकर के मायावाद पर किया गया आक्षेप तार्किक रूप से पूर्णतः संगत नहीं है |

मायावाद के द्वारा शंकराचार्य जहाँ एक ओर एकमात्र पारमार्थिक तत्व के रूप में ब्रह्म की सत्ता को स्थापित करते हैं तो दूसरी तरफ जगत की उत्पति, विनाश और विविधता की व्याख्या करते है | इसप्रकार नित्यता-अनित्यता, एकता-अनेकता, वास्तविकता-भ्रम इन सभी की व्याख्या मायावाद के आधार पर की गई है |