Monday, 16 June 2025

अनिवार्य प्रतिज्ञप्तियों का भाषाई सिद्धांत

अनिवार्य प्रतिज्ञप्तियों के भाषाई सिद्धांत का संबंध तार्किक प्रत्यक्षवादियों से हैं | चूकि यहाँ अनिवार्य प्रतिज्ञप्तियों की व्याख्या भाषाई आधार ( शब्दों के अर्थ के आधार ) पर की जाती है , इसलिए इसे अनिवार्य प्रतिज्ञप्तियों का भाषाई सिद्धांत कहा गया है |

तार्किक प्रत्यक्षवाद भी एक प्रकार अनुभववादी दर्शन है | अनुभववाद अर्थ और ज्ञान दोनों की व्याख्या इन्द्रिय अनुभव के आधार पर करता है | अनुभव से प्राप्त ज्ञान संभाव्य होता है, वहाँ अनिवार्यता नहीं होती है| अतः ऐसी स्थिति में तार्किक भाववादियों के समक्ष यह समस्या खड़ी होती है कि गणित और तर्कशास्त्र, जहाँ अनिवार्य और एवं सार्वभौम ज्ञान की प्राप्ति होती है, उसकी व्याख्या कैसे की जाए ? अतः अनिवार्य प्रतिज्ञप्ति तार्किक प्रत्यक्षवाद के लिए एक चुनौती है| अनिवार्य प्रतिज्ञप्तियों की व्याख्या करने के लिए अनुभववादियों के समक्ष दो विकल्प उभरकर सामने आते हैं :

(1) गणित और तर्कशास्त्र की प्रतिज्ञप्तियाँ भी अनुभव पर ही निर्भर हैं |

(2)  गणित और तर्कशास्त्र की प्रतिज्ञप्तियों में तथ्यात्मक अंतर्वस्तु नहीं है |

मिल पहले विकल्प को स्वीकार करते हैं मिल के अनुसार गणित और तर्कशास्त्र के कथन भी अनुभव पर आश्रित हैं | इन्हें आगमनात्मक सामान्यीकारण के माध्यम से प्राप्त किया जाता है | यहाँ मिल का यह कहना है कि हम ऐसे कथनों में अनिवार्यता इसलिए मान लेते हैं क्योंकि यहाँ इसका अपवाद नहीं दिखाई देता | ऐसे कथन अधिक दृष्टान्तों पर आधारित हैं, परन्तु वास्तव में यह भी अनुभव पर आधारित हैं |  

तार्किक भाववादियों का कहना है कि मिल का मत दोषपूर्ण है | मिल ज्ञान की उपस्थिति(आरम्भ) और ज्ञान की प्रामाणिकता में भेद नहीं कर पाते हैं | यह सही है कि उत्पति की दृष्टि से सारा ज्ञान अनुभव से प्रारंभ होता है| परन्तु अनुभव से आरम्भ कुछ ज्ञान ऐसे भी है, जिनकी प्रामाणिकता अनुभव पर निर्भर नहीं करती, उनकी प्रामाणिकता अनुभव से स्वतंत्र होती है | गणित और तर्कशास्त्र के कथन इसी श्रेणी के हैं |

कांट का मत- कांट ने सर्वप्रथम स्पष्ट रूप से संश्लेषणात्मक एवं विश्लेषणात्मक निर्णयों में भेद किया था | कांट के अनुसार विश्लेषणात्मक निर्णय ऐसे निर्णय हैं जिनमें विधेय, उद्देश्य में ही निहित रहता है | ऐसे निर्णयों में अनिवार्यता और सार्वभौमता होती है | इनका निषेध व्याघाती होता है | दूसरी ओर संश्लेषणात्मक निर्णय ऐसे निर्णय हैं जिनमें विधेय, उद्देश्य में निहित नहीं रहता है, उससे बाहर होता है | इसका भी निषेध संभव है | यहाँ कांट कुछ संश्लेषणात्मक निर्णयों को प्रागनुभविक के रूप में स्वीकार कर उसमें अनिवार्यता को भी मान लेता है |

तार्किक भाववादियों का मत है कि कांट द्वारा संश्लेषणात्मक एवं विश्लेषणात्मक में किया गया भेद तो सही है लेकिन जिस मापदंड या कसौटी के आधार पर वे यह भेद करते हैं, वह तार्किक नहीं है, गलत है | कांट के इस मत में निम्नलिखित कमियां हैं:

(1) कांट के मत की सबसे बड़ी कमी यह है कि उनके द्वारा प्रतिपादित मापदंड केवल उन्हीं निर्णयों के लिए है जो उद्देश्य-विधेय स्वरुप की है, जबकि बहुत सी प्रतिज्ञप्तियाँ इससे भिन्न रूप में भी होती हैं | जैसे-ए, बी से आगे है, बी सी आगे है तो ए सी से आगे है |

(2) कांट के अनुसार विधेय के उद्देश्य में निहित होने पर कथन विश्लेषणात्मक और निहित नहीं होने पर कथन संश्लेषणात्मक होता है | परन्तु निहित होना या नहीं होना मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण पर निर्भर करता है | वास्तविकता से उसका कोई संबंध नहीं है |

(3) कांट संश्लेषण और विश्लेषण के अंतर के लिए दो आधार मानते हैं-1. तार्किक आधार और 2. मनोवैज्ञानिक आधार | यहाँ कांट इन दोनों आधारों को एक ही रूप में लेकर चलने का प्रयास करते हैं, जबकि तार्किक आधार मनोवैज्ञानिक आधार से भिन्न होता है |

(4) ए. जे. एयर कांट से भिन्न अर्थ में संश्लेषणात्मक एवं विश्लेषणात्मक को स्वीकार करते हैं | इस अंतर का स्पष्टीकरण वे भाषाई आधार पर करते हैं | एयर के अनुसार विश्लेषणात्मक कथन ऐसे कथन है जिनकी सत्यता का निश्चय उसमें प्रयुक्त शब्दों के अर्थों के आधार पर होता है, जिनके द्वारा उनको व्यक्त किया गया है | इसकी सत्यता या असत्यता के निश्चय के लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है| जैसे-सभी कुँवारे अविवाहित पुरुष हैं, त्रिभुज में तीन भुजाएं होती हैं |

संश्लेषणात्मक कथन वे कथन है जिनकी सत्यता या असत्यता का निश्चय वाक्य में प्रयुक्त शब्दों के अर्थों के आधार पर न होकर इंद्रिय अनुभव द्वारा होता है | जैसे-दीवार पीली है |

इस प्रकार तार्किक भाववादियों के अनुसार दो ही प्रकार के कथन संभव हैं:-

1.   विश्लेषणात्मक प्रागनुभविक

2.   संश्लेषणात्मक आनुभविक

उल्लेखनीय है कि कांट ने कुछ संश्लेषणात्मक प्रतिज्ञप्तियों को प्रागनुभविक भी मान लिया था | तार्किक भाववादियों के अनुसार कोई भी संश्लेषणात्मक प्रतिज्ञप्ति प्रागनुभविक नहीं हो सकती है |

इस प्रकार तार्किक भाववादी यह बताते हैं कि गणित और तर्कशास्त्र की प्रतिज्ञप्तियाँ प्रागनुभविक-विश्लेषणात्मक हैं | इसप्रकार तार्किक भाववादी पहले विकल्प को स्वीकार न कर दूसरे विकल्प को स्वीकार कर लेते हैं | उनके अनुसार गणित और तर्कशास्त्र के कथनों में तथ्यात्मक अंतर्वस्तु का अभाव है | यहाँ केवल वे भाषाई अंतर्वस्तु को स्वीकार करते हैं | यहीं कारण है कि एयर कहते है कि वहीँ कथन सार्थक है, जो या तो विश्लेषणात्मक हो या अनुभव द्वारा सत्यापित |

 

Thursday, 12 June 2025

ब्रजभाषा का विकास...आरंभिक अवस्था

ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से ‘ब्रजभाषा’ शौरसेनी अपभ्रंश से निःसृत भाषा है| ब्रज का अर्थ है ‘गोस्थली’, वह क्षेत्र, जहाँ गायें रहती है | उस ब्रज प्रदेश में प्रचलित भाषा को ब्रजभाषा कहा गया | यह मथुरा, अलीगढ, आगरा, बुलंदशहर, एटा, मैनपुरी, बदायूं, बरेली, भरतपुर, धौलपुर,करौली और जयपुर के पूर्वी भाग में बोली जाती है | लल्लूजीलाल के अनुसार ब्रजभाषा का क्षेत्र "ब्रजभाषा वह भाषा है, जो ब्रज, जिला ग्वालियर, भरतपुर, बटेश्वर, भदावर, अंतर्वेद तथा बुंदेलखंड में बोली जाती है। इसमें (ब्रज) शब्द मथुरा क्षेत्र का वाचक है।' लल्लूजीलाल ने यह भी लिखा है कि ब्रज और ग्वालियर की ब्रजभाषा शुद्ध एवं परिनिष्ठित है।

ब्रजभाषा बोलने वालों की संख्या लगभग 4 करोड़ का आसपास है | ब्रजभाषा का नामकरण अठारहवीं शताब्दी में हुआ | इसके पूर्व यह ‘पिंगल’ या ‘भाखा’ नामों से प्रसिद्ध थी|

काव्यभाषा के रूप में ब्रजभाषा की विकास परंपरा में सबसे हस्ताक्षर महाकवि सूरदास हैं, जिनके पदों आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘चलती हुई ब्रजभाषा में सबसे पहली साहित्यिक रचना’ माना है | यहाँ हम सूरदास को केंद्र में रखकर ब्रजभाषा की विकास परंपरा तीन चरणों में विभाजित कर सकते हैं:-

                                                        I.            सूरदास पूर्व ब्रजभाषा

                                                      II.            सूरदास कालीन ब्रजभाषा

                                                    III.            सूरदास के बाद ब्रजभाषा

सूरदास के पूर्व आरंभिक काल में ब्रजभाषा में काव्य-रचना के छिटपुट उदाहरण ही मिलते हैं | इन छिटपुट काव्य-रचनाओं के दो रूप हैं-एक प्राकृत पैंगलम एवं रासो ग्रंथों जैसे पिंगल कृतियों में मिलता है और दूसरा रूप उक्ति-व्यक्ति प्रकरण और उक्ति रत्नाकर जैसी रचनाओं में मिलता हैं, जिसके कुछ नमूने इसप्रकार हैं:-

(1)     अक्खर, अग्गे, अग्गि, अज्जु आदि में द्वित्व व्यंजन बाद में आखर, आगे, आग और आज हो गया |

(2)     नअण झंपिओ (प्राकृत पैंगलम)

(3)     पृथ्वीराज रासो के प्रामाणिक अंशों की भाषा भी ब्रजभाषा मानी जाती है-एत्तुलो(इतना), गड्डो(गड्ढा), घट्टो(घाट)

(4)     उक्ति-व्यक्ति प्रकरण में भी ब्रजभाषा के प्रभाव दिखाई देते हैं- जैसे- कुंभार हांडो घउइ

धीरे-धीरे ब्रजभाषा में निरंतर और स्वतंत्र साहित्य मिलने लगता है | लेकिन ब्रजभाषा में सबसे प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ सुधीर अग्रवाल कृत ‘प्रद्युम्न चरित्र’ है, जिसकी भाषा लोकभाषा के काफी निकट है, जैसे-की मझं पुरिष विद्रोही नारि |

इसके बाद सर्वश्रेष्ठ कवि विष्णु दास आते है, जिनकी ‘रुक्मिणी मंगल’ की भाषा इसप्रकार है-

                     मोहन महलन करत निवास |

                     कनक मंदिर में केलि करत है और कोउ नहीं पास |

मानों बालक सूरदास कविता लिखने का अभ्यास कर रहे हों |

गुरुग्रंथ साहब के कवियों की भाषा में भी ब्रजभाषा के नमूने देखे जा सकते हैं | कबीर आदि संतों की वाणी तो ब्रजभाषा में भी मुखर हुई है, जैसे-

                           माधो भरम कैसेहू न बिलाई | ताते द्वैत दरसै आई||

सूरदास पूर्व काव्यभाषा के लक्षण:-

        I.            अक्षर के अंत में ‘अ’ का उच्चारण होता था, जैसे संस्कृत में होता था | बाद की ब्रजभाषा में यह मूक हो गया |

      II.            ब्रजभाषा के स्वरों में अनुनासिकता आ गई थी, इसके लिए चंद्र बिंदु का प्रयोग आवश्यक होने लगा| जैसे कहँ, महँ |

    III.            बहुत से शब्दों में ‘न’ के स्थान पर ‘ण’ पाया जाता है, जो बाद की ब्रजभाषा में नहीं हैं-वयण,नयण, निरंजण, गण|

    IV.            ऐ और औ का बाहुल्य ब्रजभाषा की विशेषता है| परन्तु इस युग में ऐसे प्रयोग तीन तरह के थे- एक अवहट्ट की तरह, जैसे-चाल्यउ, करउ, धरइं| दूसरे ए, ओ वाले-गयो, मिल्यो और तीसरे ऐ, और औ वाले |

      V.            कर्ता परसर्ग ‘ने’ का प्रयोग यदा-कदा मिलने लगता है | शेष परसर्गों में स्थिरता आ गई-सम, सउ, तौं ते, लागि, को, के, की, माँझि

सर्वनामों में हउ, हौं, मउ, मैं |

    VI.            सहायक क्रिया में ह्वै, है, ह्वैं, भयो, भये, भई विकास की दिशा का संकेत करते हैं |

Thursday, 29 May 2025

लोकतंत्र..........जनता का शासन

लोकतंत्र शब्द democracy का हिंदी रूपांतर है, जिसकी उत्पति ग्रीक के demo(जनता) और Kratia(शासन) के मिलने से हुई है | इसका तात्पर्य है जनता का शासन | इस प्रणाली की चर्चा अरस्तू ने उस प्रसंग में की है जहाँ वह इस बात पर विचार कर रहा है कि शासन का सबसे उत्तम स्वरुप या प्रणाली क्या है ? इस क्रम वह राजतन्त्र की चर्चा करते हुए कहा कि राजतन्त्र शासन की दृष्टि से सबसे अच्छा है | लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमी शासक के निरंकुश हो जाने की होती है | इसलिए अच्छी शासन प्रणाली नहीं है |

फिर उसने प्रजातंत्र की चर्चा की | यह ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें शासक या राज्य के निरंकुश होने का कोई भय नहीं रहता, क्योंकि यह सबका शासन है | इस प्रणाली का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें किसी निर्णय तक जल्द पहुंचना संभव नहीं होता है | इस आधार पर वह demokratia को भी निरस्त करता है |

demokratia के जिस रूप की परिकल्पना अरस्तू ने की थी, वह असंभव सी शासन प्रणाली थी | यह व्यावहारिकरूप से संभव नहीं थी, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी हो|

आधुनिक युग में हम जिसे लोकतंत्र कहते है, वह फ़्रांसिसी क्रांति से उत्पन्न राजनीतिक मूल्यों पर आधारित एक अवधारणा है | उस क्रांति में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व, ये तीन मूल्य नारे के रूप में उभरे और उसके पश्चात विकसित होनेवाली सभी राजनीतिक प्रणालियों को प्रभावित किया | इसने दो आधारभूत विचारधाराओं के लिए भूमि तैयार की : लोकतंत्र और समाजवाद | दोनों में अंतर यह है कि लोकतंत्र स्वतंत्रता को प्राथमिक मूल्य मानता है और समता को गौण मूल्य| समाजवाद में समता को प्राथमिक मूल्य और स्वतंत्रता को गौण मूल्य माना गया | लेकिन दोनों का उद्देश्य सामाजिक बंधुत्व को विकसित करना ही था |

यह स्वाभाविक था कि लोकतंत्र का जो विकास स्वतंत्रता को प्राथमिक मूल्य मानकर किया गया, वह निश्चित ही समाजवाद की तुलना में एक भिन्न समाज का निर्माण करता है, जहाँ स्वतंत्रता को प्रथम मूल्य माना गया है | आधुनिक समय में लोकतंत्र शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है- (1) लोकतंत्र एक राजनीतिक पद्धति के रूप में और (2) जनता के लिए, जनता द्वारा और जनता की शासन पद्धति के अर्थ में | यह इस शब्द का संकीर्ण अर्थ है| इस शब्द का जब हम व्यापक अर्थ में प्रयोग करते है तो लोकतंत्र एक जीवन पद्धति है, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों परा आधारित है | इन मूल्यों को जीवन में जीना वास्तविक लोकतंत्र है |

आधुनिक युग में लोकतंत्र के विकास के आरंभिक चरण में स्वतंत्रता प्राथमिक मूल्य है | इस चरण में समानता का तात्पर्य इतना ही था कि प्रत्येक व्यक्ति को मत देने का अधिकार है | यह विचार इस तर्क पर आधारित था कि प्रकृति ने सभी मनुष्यों को समान नहीं बनाया है, अर्थात लोग शारीरिक, बौद्धिक और आर्थिक दृष्टि से अलग-अलग हैं। ऐसे में यदि सभी को पूरी स्वतंत्रता मिल जाए, तो समाज में असमानता और विषमता और भी बढ़ सकती है, क्योंकि कुछ लोग अपनी स्वतंत्रता का उपयोग कर दूसरों से अधिक संसाधन, शक्ति और अवसर प्राप्त कर सकते हैं। अर्थात् सभी को समान स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी | किन्तु समाजवादी आन्दोलन के प्रभाव में और विशेषतः साम्यवाद के उदय के बाद लोकतंत्र के स्वरुप में परिवर्तन अनिवार्य हो गया | इसलिए लोकतंत्र की दूसरी अवस्था में स्वतंत्रता के मूल्य की रक्षा के लिए समानता के मूल्य को पूर्ण रूप से त्याग देना संभव नहीं रहा | इस तरह दूसरी अवस्था में लोकतंत्र समाजवादी लोकतंत्र के रूप में विकसित हुआ |

समाजवादी लोकतंत्र का आरंभिक लोकतंत्र से केवल एक बिंदु पर मतभेद था कि स्वतंत्रता का अर्थ अतंत्रता नहीं होनी चाहिए और स्वतंत्रता के नाम पर विषमता को उचित नहीं माना जा सकता | समाजवादी लोकतंत्र यह मानता है कि स्वतंत्रता को पूर्णतः सुरक्षित रखते हुए यथासंभव सामाजिक समरसता का निर्माण ही वास्तविक लोकतंत्र है | इसलिए समाजवादी लोकतंत्र में राज्य की ओर से विभिन्न प्रकार के नियम-उपनियम बनाए गए, जिससे आर्थिक अधिकारों पर नियंत्रण किया गया |

वास्तव में समाजवादी लोकतंत्र का विकास मार्क्स की विचारधारा के विकल्प के रूप में किया गया, जिससे सामाजिक समरसता को निर्माण वर्ग संघर्ष के बिना भी क्या जा सके | लोकतंत्र यह स्वरुप तब तक रहा जब तक विश्व दो ध्रुवों में बंटा रहा | किन्तु साम्यवादी व्यवस्था के विघटन के पश्चात लोकतंत्र के स्वरुप में पुनः परिवर्तन हुआ, जिसे हम लोकतंत्र की तीसरी अवस्था कह सकते है | इस तीसरी अवस्था में भूमंडलीकरण और विश्वग्राम आदि आदर्श जो विकसित हुए, वे वस्तुतः स्वतंत्रता के मूल्य को ही विकसित करते है | इस अवस्था में स्वतंत्रता फिर से सर्वोच्च मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित होती है | इस चरण में बंधुत्व के विकास का प्रयास उन्मुक्त स्वतंत्रता के आधार पर किया गया | लेकिन स्वतंत्रता जब अनुशासन, जिम्मेदारी और मर्यादा के साथ न हो, तो वह अंततः विनाश या अव्यवस्था का कारण बनती है। इसलिए किसी भी समाज में टिकाऊ स्वतंत्रता वही होती है जो संतुलित और उत्तरदायित्वपूर्ण हो। उन्मुक्त स्वतंत्रता की प्रबुता दीर्घ काल तक नहीं चल सकती| इसलिए लोकतंत्र को अराजक तंत्र बनने से रोकने के लिए समता अथवा किसी अन्य मूल्य को स्वीकार करना पड़ेगा | स्वतंत्रता एक प्रकार का मध्यमान है | स्वतंत्रता के प्रत्यय में आत्म नियंत्रण विद्यमान है | इसलिए समस्त बंधनों से अलग करके हम इसे नहीं देख सकते |

आधुनिक युग में लोकतंत्र की अवधारणा अरस्तू की अवधारणा से भिन्न है | वर्तमान युग में लोकतंत्र प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र है, क्योंकि सभी व्यक्तियों की साक्षात् भागीदारी शासन में संभव नहीं | इस व्यावहारिक आवश्यकता ने प्रतिनिधिमूलकता को जन्म दिया | मतदान का अधिकार परोक्ष रूप से स्वतंत्रता की रक्षा करता है | स्वतंत्र वरण इच्छा के माध्यम से व्यक्ति शासन में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करता है| कांट ने एक जगह कहा है-कोई भी नियम मेरे ऊपर तभी लागू हो सकता है, जब मैं यह मानकर चलूँ कि इस नियम का निर्माण मैंने स्वयं किया, अन्यथा किसी भी नियम को स्वीकार करने में मेरी स्वतंत्रेच्छा बाधित होती है | वर्तमान लोकतंत्र में कांट के इस नैतिक सूक्त का अघोषित उपयोग दिखाई पड़ता है, क्योंकि राज्य के द्वारा निर्मित नियम को स्वीकार करते हुए भी लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसका अपना शासन है |

इस लोकतान्त्रिक प्रणाली के दो रूप विकसित हुए-(1) संसदीय प्रणाली और (2) अध्यक्षीय प्रणाली | पहले में संसद का प्रत्येक सदस्य सीधे जनता के द्वारा चुना जाता है और फिर नीति निर्माण संसद करती है | अध्यक्षीय प्रणाली अपेक्षाकृत अधिक परोक्ष प्रणाली है | राज्य के संचालक का सीधा चुनाव जनता के स्वतंत्र वरण से होता है | दोनों में यह बात समान है कि जनता को स्वतंत्र वरण का अधिकार है | अध्यक्षीय प्रणाली व्यक्ति की स्वतंत्रता को अधिक प्रकट करती है|  

Thursday, 24 April 2025

मध्यकालीन काव्यात्मक उत्कर्ष की भाषा-अवधी

अवधी अर्धमागधी अपभ्रंश से निःसृत पूर्वी हिंदी परिवार की उपभाषा है | यह अवध प्रदेश में बोली जाने वाली बोली है | यह अवध प्रान्त के लखीमपुर खीरी, बहराइच, गोंडा, बाराबंकी, लखनऊ, सीतापुर, उन्नाव, फैज़ाबाद, सुल्तानपुर और रायबरेली जिलों में बोली जाती है | वर्तमान समय में अवधी बोलने वालों की संख्या 4 करोड़ के आसपास है |

एक साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी का इतिहास काफी पुराना है | भाषा के रूप में ‘अवधी’ का प्रथम स्पष्ट उल्लेख अमीर खुसरो की ‘खालिकबारी’ में मिलता है | इससे स्पष्ट है कि अवधी का अस्तित्व पहले से रहा होगा | इस दृष्टि से अवधी का प्रथम प्राचीन साहित्यिक प्रयोग रोडा कृत ‘राउलवेल’ में मिलता है, जो 1001-1025 ई. से बीच की रचना मानी जाती है | इस भाषा के प्रयोग का दूसरा उदाहरण दामोदर पंडित द्वारा रचित ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ में मिलता है | इसमें अवधी के बोलचाल रूप का प्रयोग हुआ है | इस दौर की भाषा पर निःसंदेह अपभ्रंश का प्रभाव अधिक है | लेकिन अवधी अपभ्रंश के प्रभावों से मुक्त होने की कोशिश करती दिखाई पड़ती है | फिर भी अवधी में किसी संपूर्ण काव्य-रचना का उदाहरण 1379 ई. में मुल्ला दाऊद की ‘चंदायन’ या ‘लोरकहा’ है | इसलिए मुल्ला दाऊद को केंद्र में रखकर अवधी के साहित्यिक विकास को हम तीन चरणों में विभाजित कर सकते है-

1.       1379 ई से पूर्व की अवधी-जब अवधी अपभ्रंश के प्रभावों से मुक्त होने का प्रयास करती है और रचनाओं में अवधी भाषा के प्रयोग मिलते हैं | लेकिन अवधी में रचित कोई साहित्यिक रचना नहीं मिलती है |

2.       1379 ई से तुलसीदास के अविर्भाव तक की अवधी

3.       तुलसीदास और उसके बाद की अवधी

1379 ई में रचित चंदायन में ठेठ अवधी भाषा का प्रयोग हुआ है | चंदायन में उपलब्ध आवहिं, चढ़ावहिं, बहिराहिं, कहहिं, आवइ, भावइ आदि क्रिया रूप जायसी कृत ‘पद्मावत’ और तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ में भी मिलते हैं | साथ ही अरबी-फ़ारसी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग हुआ है | इसलिए साहित्यिक भाषा के रूप में अवधी की नींव रखने का श्रेय मुल्ला दाऊद को है | चंदायन के 124 वर्ष बाद कुतुबन कृत मृगावती भी ठेठ अवधी में रचित काव्य है | लेकिन मृगावती की अवधी पर अपभ्रंश का प्रभाव अधिक है |

अवधी भाषा को साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध करने का श्रेय मलिक मुहम्मद जायसी को है | जायसी ने ‘पद्मावत’ और ‘अखरावट’ में अवध क्षेत्र में प्रचलित बोलचाल की भाषा को उसकी स्वाभाविक मिठास के साथ काव्य की भाषा बना दिया | इन्होने बोलचाल की भाषा में कोई भारी परिवर्तन किए बिना उसे सर्जनात्मक बनाने वाले समस्त शैलीय उपकरणों, अलंकारों, शब्द-शक्तियों, अर्थगुणों, वक्रताओं, ध्वन्यात्मक प्रभाव पैदा करने वाली शब्द-योजना द्वारा अवधी को कलात्मक ऊंचाई प्रदान की | अवधी में बोलचाल के रूप में प्रयुक्त हो रहे अपभ्रंश के शब्दों का प्रयोग जायसी ने किया है, लेकिन तत्सम शब्दों का प्रयोग काफी कम है |

जायसी के समकालीन मंझन ने अपभ्रंश के प्रचलित रूपों के प्रति रूचि नहीं दिखाई| उनकी ‘मधुमालती’ में अधिक से अधिक द्वित्व या व्यंजन लोप वाले कुछ शब्दों के प्रयोग दिखाई पड़ते हैं | जैसे-खप्प, तत्त, दिब्ब, दुग्गम, पुब्ब आदि | जायसी के बाद ‘चित्रावली’ के रचयिता उसमान, ‘इंद्रावती’ और ‘अनुराग बाँसुरी’ के रचयिता नूर मोहम्मद और ‘युसूफ-जुलेखा’ के रचयिता निसार ने ठेठ अवधी की भाषा को व्यापकता प्रदान की | इन सूफी रचनाकारों ने जिस अवधी भाषा में रचना की, उसकी व्याकरणिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

1.       संज्ञा रूपों में कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं आ पायी थी |

2.       पुलिंग संज्ञा की पहचान उकारांत शब्दों से और स्त्रीलिंग संज्ञा की इकारांत शब्दों से होती है |

3.       बहुबचन के अंत में न, नि, न्हि मिलता है |

4.       सर्वनाम- महँ, मैं, हौं, हम्ह, हम्हार, तूँ तुइँ, तुम्ह, वह ओइ, ते, जो, जेइँ जेहिं

5.       संज्ञा और सर्वनाम-ऐ( ने के लिए), क, कहँ काँ, काँह( को के लिए), सों, सौं, तें सेंती( से के लिए)

6.       क्रिया—वर्तमान काल—करत, सूझ;  भूतकाल—आव, छूट, कइल, केन्हसि, दीन्हि; भविष्यत काल—हुत, अहा, अछिलो, आहि, आहै

अब तक अवधी में काव्य रचना करने वाले अधिकांश कवि सूफी थे, जिन्हें अपभ्रंश और फ़ारसी काव्य-परंपरा का ज्ञान तो था लेकिन कदाचित् संस्कृत परंपरा से अनभिज्ञ थे |

अवधी के विकास के तृतीय दौर में गोस्वामी तुलसीदास ‘रामचरितमानस’ लेकर आए, जिसके माध्यम से अबतक काव्यरूप में प्रचलित बोलचाल की अवधी एकबारगी परिनिष्ठित साहित्यिक अवधी के रूप में प्रतिष्ठित हो गई | सूफी कवियों की भाषा की तुलना में अब तत्सम शब्दों का प्रचुर प्रयोग होने से अवधी की सर्जनात्मक संभावनाओं में अपरिमित वृद्धि हुई | गोस्वामी तुलसीदास ने ठेठ अवधी की मधुरता को बनाए रखते हुए उसे परिमार्जित कर संस्कृत की कोमल-कांत पदावली से समृद्ध किया |

जैसे- नाम राम लछिमन दोउ भाई, संग नारि सुकुमारि सुहाई |

इहाँ हरि निसिचर बैदेही, विप्र फिरहिं हम खोजत तेहीं |

इन पंक्तियों में तत्सम शब्दों का अद्भुत प्रयोग हुआ है | गोस्वामी जी की विशेषता यह है कि वे तत्सम शब्दों को बिल्कुल ही तत्सम रूप में रहने नहीं देते हैं| जैसे-करुणा, गुण, अमृत और वल्कल का करुना, गुन, अमिय और बलकल में अवधीकरण हो जाता है |

अमिय मूरि मय चूरन चारू | समन सकल भवरुज परिवारू ||

अपनी समन्वयवादी प्रकृति के कारण उन्होंने भोजपुरी, राजस्थानी, खड़ी बोली और अरबी-फ़ारसी प्रयोगों को भी उचित स्थान दिया और उन्हें अवधी बाना पहनाने में पर्याप्त सफलता मिली है | जैसे-खलक, खसम, गरूर, गुमान, रहम, सबील, सरकार, साहेब | तुलसी के पारस-स्पर्श से अवधी जिस साहित्यिक और परिनिष्ठित काव्य-भाषा के पद पर प्रतिष्ठित हुई, उसकी व्याकरणिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

1.       परिनिष्ठित अवधी में सूफियों के बहुत से प्रयोग समाप्त हो गए, लेकिन भाषा प्राचीन रूपों से पूर्णतया अलग नहीं हुई |

2.       क्रिया रूप सरल हो गए-आटै, बाटै का प्रयोग बहुत ही कम हो गया है | सहायक क्रिया में अछ् धातु नहीं रही |

3.       सर्वनाम- मैं-हम, तु-तुम्ह, जो, को कौन

4.       संज्ञा-सर्वनाम के परसर्ग- का, कहँ(को)  लागि, हित(के लिए), सईं, सैं तैं(से) कै, केर, केरा की

तुलसी की काव्य भाषा का अनुसरण बाद के प्रायः सभी रचनाकार करते रहे, परन्तु तुलसी ने अवधी को काव्य-भाषा के जिस शिखर पर पहुँचाया, बाद के रचनाकारों के लिए कुछ नवीन प्रयोग संभव नहीं हुआ | परन्तु मुल्ला दाऊद से लेकर जायसी और तुलसीदास जैसे महान कवियों के योगदान से अवधी जिस काव्यात्मक उत्कर्ष पर पहुंची, वह संसार की किसी भी अन्य भाषा के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकता है |  

 

Wednesday, 23 April 2025

मध्यकालीन आर्यभाषा अपभ्रंश

अपभ्रंश मध्यकालीन आर्यभाषा की तीसरी अवस्था है | अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ है-भ्रष्ट, विकृत, अशुद्ध या संस्काररहित | सर्वप्रथम जो शब्द भाषा के सामान्य मानदंड या मानक रूप से विकृत या अशुद्ध होते थे, उनके लिए ‘अपभ्रंश’ शब्द का प्रयोग होता था | भाषा विशेष के सन्दर्भ में अपभ्रंश शब्द का प्रयोग प्रायः छठी शती ईस्वी में प्राकृत वैयाकरण चंड ने सर्वप्रथम किया है | कुछ विद्वानों ने इसे देश-भाषा या देशी भाषा कहा है | वाग्भट्ट और आचार्य हेमचन्द्र ने इसे ग्राम-भाषा कहा है | सातवीं से ग्यारहवीं शती के अंत तक यह साहित्य-भाषा, देश-भाषा   और राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई | नाथों, सिद्धों और जैनियों का विपुल साहित्य इसी भाषा में रचा गया | स्वयंभू अपभ्रंश भाषा के आदि कवि माने जाते हैं | जसहर चारिउ, णायकुमार चारिउ, करकंड चारिउ, भविस्यत्त कहा और पाहुड़ दोहा आदि अपभ्रंश में रचित महान कृतियाँ हैं |

अपभ्रंश की ध्वनिगत विशेषताएँ

1.       ह्रस्व स्वर-अ इ उ  

दीर्घ स्वर-आ ई ऊ ए ओ

2.       ऐ और औ अपभ्रंश में नहीं मिलते है |

3.       ऋ के स्थान पर अ इ उ ए और रि हो गया

       जैसे- कृष्ण> कण्ह (अ)

कृत>किय (इ)

पृच्छ>पुच्छ (उ)

गृह> गेह (ए)

ऋण> रिण (रि)

4.       कई शब्दों में अकारण अनुनासिकता आ गई | जैसे पंखि(पक्षि), मंजार(मार्जार), वंक(वक्र)|

5.       अपभ्रंश को उकार बहुला भाषा कहा गया है-जैसे- मनु, कारणु, अंगु |

6.       व्यंजन संयोग को सरल करने के लिए प्रायः संयुक्त व्यंजनों के बीच कोई स्वर लाया गया

जैसे- आर्य>आरिय

क्रिया>किरिया

वर्ष>वरिस

7.       कई शब्दों में स्वरलोप की प्रवृति पाई जाती है

जैसे- अरण्य>रण्ण

अहं>हउं  

8.       अपभ्रंश में ङ ञ न श और ष ध्वनियाँ नहीं हैं | लेकिन ‘ण’ का बहुप्रयोग अपभ्रंश की विशेषता है |

9.       अपभ्रंश चवर्ग स्पर्श-संघर्षी थे तो कवर्ग कोमलतालव्य |

10.    न का ण, य का ज और श-ष का स हो गया |

जैसे- णयर(नगर), जइ (यदि), केस(केश)

11.    शब्द के मध्य में आने वाले क, ग, च, ज, त, द का अ या य हो गया |

जैसे- वचन>वयण

कोकिल> कोअल

 नगर> णयर

12.    अन्त्य व्यंजन(हलन्त) के लोप की प्रवृति पाई जाती है|

जैसे- जगत्>जग

पश्चात्>पच्छा

13.    आदि व्यंजन को सुरक्षित करने की प्रवृति दिखाई पड़ती है | पर कहीं- कहीं आदि व्यंजन के महाप्राणीकरण(ज्वल>झल्ण) और अल्पप्राणीकरण(क्षुधित>खुहिय) की प्रवृति भी दिखाई देती है |

 

व्याकरणिक विशेषता

1.       अपभ्रंश में दो लिंग (स्त्रीलिंग और पुलिंग) और दो ही वचन मिलते हैं | लेकिन पुलिंग की प्रधानता होती है |

2.       विभक्तियों के ह्रास की जो प्रवृति ‘पालि’ से प्रारंभ हुई थी, वह अपभ्रंश में बढ़ जाती है   | अपभ्रंश में केवल तीन कारक समूह हैं:

()  कर्त्ता-कर्म-संबोधन  (ख) करण-अधिकरण (ग) सम्प्रदान-संबंध-आपादान

3.       अपभ्रंश के अधिकांश कर्त्ता, कर्म और संबंध कारक में विभक्तियों का प्रयोग होता ही नहीं है | इन्हें लुप्तविभक्तिक पद कहते हैं, जिनका निर्देश हेमचंद्राचार्य ने किया है | विभक्तियों की कमी को परसर्गों द्वारा पूरा किया गया | करण का परसर्ग ‘सहुँ’, सम्प्रदान के लिए ‘रेसि’ और ‘केहि’, आपादान के लिए ‘होन्तउ और होन्त’, संबंध के लिए ‘केरअ-केर-केरा’ और अधिकरण के लिए ‘मज्झी-मज्झे’ का प्रयोग होता है|

4.       संस्कृत में संज्ञा के 24 रूप और प्राकृत में 12 रूप थे, लेकिन अपभ्रंश एसा केवल 6 रूप ही प्रचालन में रह गए थे |

5.       अपभ्रंश में सर्वनामों के विभिन्न रूप पाए जाते हैं |

6.       अपभ्रंश में काल-रचना में तिडन्त रूपों के स्थान पर कृदन्त का व्यवहार अधिक होता है | वर्तमान काल और भविष्यत काल में तिडन्त रूप मिलता है, लेकिन भूतकाल में कृदन्त का प्रयोग होता है |

7.       धातु रूपों का सरलीकरण और एकीकरण अपभ्रंश की विशेषता है | इसमें परस्मै पद रूप नहीं मिलते हैं|

8.       अपभ्रंश में तत्सम शब्दों का प्रयोग बढ़ने लगा था | जैसे-कबंध, गगन, चरण, पंचम | लेकिन तद्भव शब्दों की संख्या अधिक है | मुसलमानों के संपर्क में आने से अरबी-फ़ारसी शब्दों का प्रयोग होने लगा- आल-माल(माल-मत्ता), सुल्ताण, रूमाल|