Thursday, 12 September 2024

आलोचना का महत्व

 

राम स्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार रचना यदि जीवन का अर्थ विस्तार करती है तो आलोचक रचना का अर्थ विस्तार करता है | दूसरे शब्दों में जीवन के अंतर्द्वंद्व को देखने-पहचानने में आलोचना दीपक की भूमिका अदा करती है। आलोचना रचनात्मक संकेतों को सामाजिक अनुभवों के आलोक में डी-कोडकरती है। इस तरह जहाँ रचनाकार की रचनाशीलता विराम लेती है वहीं से आलोचक का काम प्रारम्भ होता है। किसी भी साहित्य की आलोचना अपने समय और समाज की सापेक्षता एवं प्रसंगानुकूलता में ही संभव होती है, तभी आलोचना की सार्थकता और साथ ही साथ रचना की मूल्यवत्ता प्रमाणित होती है और इस प्रसंगानुकूलता और सापेक्षता की तलाश में अलोचना की सामाजिकता का प्रश्न उभरता है। इस प्रकार आलोचना परखे हुए को बार-बार परखती है और जीवन-संबंधों के विकल्पों की तलाश में साहित्य और आलोचना की सह-यात्रा जारी रहती है। आलोचना का संबंध एक साथ इतिहास बोध और सामाजिक विमर्श दोनों से होता है | आलोचना का इतिहास में परिवर्तन की दिशा और संवेदना की पहचान करने, उसका विश्लेषण करने, उस परिवर्तन के कारणों की पहचान करने और उसे अपने तत्कालीन समाज से जोड़ने की दृष्टि से व्यापक महत्व है| सामाजिक विमर्श के रूप में आलोचना के मूल्य सामाजिक मूल्य से भी संबंधित होते है | आलोचक जब इतिहास के साथ ही समाज, राजनीति, धर्म, नैतिकता और अर्थव्यवस्था के प्रश्नों से टकराता है तो इस टकराहट में वह साहित्य के मूल्य भी निर्मित करता है | मनुष्य के जातीय जीवन और उसकी संस्कृति से जोड़कर साहित्य का विश्लेषण करने में आलोचना का महत्व समझ में आता है| आलोचना से सहृदय को साहित्य के प्रमाणिक अनुशीलन की सुविधा प्राप्त होती है | सहृदय की रस ग्रहण क्षमता का परिष्कार करने के लिए उसकी संवेदनाओं को जागृत करने में आलोचना का अहम महत्त्व है | इससे कृतिकार को उत्साह, विचारों की प्रौढ़ता, रचनागत विचारों और शिल्प एवं भाषा के परिमार्जन की प्रेरणा मिलती है जबकि पाठक के बोध-वृति का परिष्कार भी होता है | 

आलोचक के गुण

 एक अच्छे आलोचक में इन गुणों का होना आवश्यक है- सहृदयता, निष्पक्षता, साहस, सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण, इतिहास और वर्तमान का सम्यक ज्ञान, संवेदनशीलता, अध्ययनशीलता और मननशीलता।

आलोचक का सबसे प्रधान गुण सहृदयता है| आलोचक के अन्य गुण उसकी सहृदयता के रहने पर ही सहायक हो सकते है | चुकि रचना की तरह आलोचना भी पुनर्रचना होती है | अतः आलोचक में कवि या काव्य की आत्मा में प्रवेश करने की उसकी क्षमता होनी चाहिए | अर्थात् जिस भाव-भंगिमा, मुद्रा और तन्मयता के साथ कवि ने अपने काव्य की रचना की हो, उसमे उतनी ही संवेदनशीलता और सहानुभूति के साथ प्रवेश कर जानेवाला पाठक ही उस कवि का सच्चा आलोचक हो सकता है| आचार्य शुक्ल के शब्दों में आलोचक में ‘कवि की अंतर्वृतियों के सूक्ष्म व्यवच्छेद’ की क्षमता होनी चाहिए| इसके लिए आलोचक को अपने आग्रहों से मुक्त होना आवश्यक है | आलोचक के आग्रह, अहम या उसकी इच्छाएं और भावनाएं निष्पक्ष आलोचना में बाधा बनती है | किसी भी रचना के मूल्यांकन में अपनी बातों को तर्कसंगत और तथ्यपरक ढंग से रखना आलोचक के लिए आवश्यक है, भले उसकी स्थापनाएं पूर्व स्थापित मान्यताओं और सिद्धान्तों के प्रतिकूल क्यों न पड़ती हो| ऐसी स्थापनाओं के लिए आलोचक में व्यापक अध्ययन एवं देशी-विदेशी साहित्य और कलाओं का ज्ञान होना चाहिए| इसके साथ ही अतीत की घटनाओं, परिस्थितियों और परम्परा एवं वर्तमान के परिवेश का सम्यक ज्ञान होना चाहिए | वर्तमान या समकालीनता से जुड़कर ही कोई आलोचक अपनी दृष्टि को अद्यतन बनाए रखता है | आलोचक को किसी सामान्य तथ्य या तत्व तक पहुँचने की जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए बल्कि रचना के अक्षय स्रोत को बचाए रखना का गुण होना चाहिए |

भारत की उत्सवधर्मिता और उसकी सामाजिकता

 भारत एक उत्सवधर्मी देश है और इसकी उत्सवधर्मिता पूरी तरह से सामाजिक है| वर्ष के 365 दिन कोई-न-कोई उत्सव या त्योहार होता रहता है। इस उत्सवधर्मिता के मूल में वह भारतीय-दर्शन है, जो जीवन की हर परिस्थिति में आपको सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण एवं प्रसन्न रहने की सतत् प्रेरणा देता है। उत्सव और त्योहारों के माध्यम से जीवन में खुशी और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भारतीय दर्शन में भी जीवन के हर क्षेत्र में खुशी और संतोष का महत्व है। यह सकारात्मकता न केवल व्यक्तिगत सुख और मानसिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज में भी एक सामूहिक खुशी का माहौल बनाती है। इन उत्सवों के माध्यम से धार्मिक संस्कार और आध्यात्मिक मूल्य प्रकट होते हैं, जो लोगों को जीवन में स्थिरता और संतोष का अनुभव कराते हैं।

भारत की उत्सवधर्मिता का मुख्य आधार उसकी विविध सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। यह उत्सवधर्मिता न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिकसांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधताओं को भी दर्शाती है।

जहाँ तक सनातन की बात है तो सामाजिकता सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण पहलू हैऔर इसके विभिन्न पहलू समाज के विभिन्न अंगों से जुड़ते हैं। होली से लेकर दिवाली तक के त्यौहार सदियों से न केवल धार्मिक भावनाओं को प्रकट करते हैंबल्कि सामाजिक समरसता और एकता को भी बढ़ावा देते रहे हैं।

भारत के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों में अपनी विशेष सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक उत्सवों का आयोजन होता है। उदाहरण के लिएपंजाब में लोहड़ी और मकर संक्रांति मनाई जाती हैजबकि बंगाल में दुर्गा पूजा और होली की धूम रहती है। ये सांस्कृतिक उत्सव स्थानीय परंपराओं और रीति-रिवाजों को संजोए रखते हैं और क्षेत्रीय विशेषताओं को उजागर करते हैं।

भारतीय उत्सवों का एक महत्वपूर्ण पहलू परिवार और समुदाय के एकत्र होने का होता है। त्योहारों के दौरान परिवार के सदस्य एक साथ मिलते हैंविशेष भोजन का आनंद लेते हैंऔर एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं। इससे पारिवारिक संबंध मजबूत होते हैं और सामाजिक संबंधों में भी गहराई आती है।

उत्सवों और त्योहारों के दौरान बाजारों की रौनक बढ़ जाती हैशॉपिंग और खरीददारी की गतिविधियाँ बढ़ जाती हैंजिससे आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलता है। साथ हीउत्सवों के दौरान लोगों के बीच मेल-मिलाप और सामाजिक एकता को प्रोत्साहन मिलता है।

कई उत्सवों के दौरान पारंपरिक कला और लोककला का प्रदर्शन भी होता हैजैसे कि नृत्यसंगीतरंगोलीऔर कला प्रदर्शन। ये गतिविधियाँ स्थानीय संस्कृति और कला को संरक्षित और प्रोत्साहित करती हैं।

भारतीय उत्सव विविधता में एकता का प्रतीक हैं। ये पहलू इस बात को दर्शाता है कि कैसे विभिन्न क्षेत्रों में एक ही त्योहार के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं। यह सांस्कृतिक समन्वय और आदान-प्रदान का एक शानदार उदाहरण हैजो समाज के विभिन्न हिस्सों को जोड़ता है और एकता को बढ़ावा देता है। अलग-अलग धर्मजातिऔर भाषाओं के लोग एक ही त्योहार के दौरान एकजुट होते हैंजिससे सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा मिलता है।


Tuesday, 6 August 2024

इकोसिस्टम का जवाब अब जुमला नहीं, समूल नाश होना चाहिए

संसद मे बहस के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेसियों और उनके वैचारिक पोषक वामपंथियों  के इकोसिस्टम को खुली चेतावनी देते हुए कहा कि वो देशविरोधी साजिशें रचने से बाज आए वरना उसे अब उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा। लेकिन 2014 के बाद का रिकार्ड उनकी इस चेतावनी के कही भी अनुकूल नहीं है | पिछले 10 वर्षों में जमीनी स्तर पर हम ऐसा कहीं भी कुछ होते देख नही रहे। इसके विपरीत कांग्रेस और कांग्रेस से मिले खाद-पानी से पला-बढ़ा 70 वर्षों का इकोसिस्टम ऐसा कोई भी अवसर गंवाया नहीं है, जिससे देश की विकास यात्रा को रोक दिया जाय, देश को सामाजिक और साम्प्रदायिक विद्वेष की आग में झोंक दिया जाय, देशविरोधी साजिशों और ताकतों को बढ़ावा दिया जाय |  यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट को भी अपने फैसले में कहना पड़ा कि, “ऐसा लगता है इस महान देश की प्रगति पर संदेह प्रकट करने, उसे कम करने और हरसंभव मोर्चे पर उसे कमजोर करने का एक ठोस प्रयास किया जा रहा है। इस तरह के किसी भी प्रयत्न या प्रयास को आरंभ में ही रोक दिया जाना चाहिए।“

लेकिन क्या मोदी सरकार पिछले 10 वर्षों में पूर्ण बहुमत के बावजूद इस देशद्रोही, और समाजद्रोही इकोसिस्टम की जड़ों में मट्ठा डालकर समूल नाश करने जैसी कोई कार्रवाई की है ? अगर कार्रवाई की होती तो आज चेतावनी देने की जरुर नहीं पड़ती | कार्रवाई करना तो दूर, मोदी सरकार के समर्थकों और कोर वोटरों का एक बड़ा वर्ग इसी बात से नाराज है कि 10  वर्षों के मोदी शासन में कोई राष्ट्रवादी इकोसिस्टम नहीं बनाया गया। ‘सरकार बदली है, सिस्टम तो हमारा ही है’ की पंचलाइन भी इसी इकोसिस्टम की है, जो उन्हें भरोसा देता है कि वे अपने नैरेटिव एवं एजेंडे का खुल्लम-खुल्ला प्रचार कर पाने में सक्षम होते है| हर संस्था पर, हर संस्थान पर, हर जगह-संसद से सड़क तक, शिक्षण-संस्थानों से सुप्रीम कोर्ट तक, बॉलीवुड से व्यवसाय तक, साहित्य से लेकर इतिहास तक, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक- उन्होंने ऐसी पकड़ बना रखी है कि सरकार के बदलने के बाद भी वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आते है | ये लोग स्वयं को लिबरल बताते हैं, जबकि इनसे ज्यादा असहिष्णु, कट्टर, और तानाशाही प्रवृत्ति के लोग आपको ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे। हर जगह ये अपने तरह के विचारों को ही सेकुलर और लोकतांत्रिक मानते हैं,  और उसे ही सही मानते है |  अगर आपने उसके अलावा किसी और विचार या नैरेटिव का समर्थन कर दिया, तो आपको सांप्रदायिक और फासिस्ट कह कर ख़ारिज कर देंगे। ये अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए उन समस्त प्रतीकों को ख़ारिज करते है या उनका भौंडा मजाक बनाते है, जिसका सम्बन्ध देश की सनातन संस्कृति से है, लोकतांत्रिक अस्मिता से है, राष्ट्रीय संप्रभुता से और संवैधानिक संरक्षा से है| कभी प्रभु श्री राम को काल्पनिक बताते है, कभी सनातन को डेंगू, मलेरिया और कैंसर कहकर मजाक उड़ाते हैं, कभी चार पड़ोसी इस्लामिक देशों के धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोगों को नागरिकता देने का कानून सीएए को देश विरोधी बताकर देश को सुलगाने की पूरी व्यवस्था करते है, गुजरात कभी नहीं भूलते नहीं,  लेकिन गोधरा की चर्चा नहीं करते है| नारी सशक्तीकरण का पुरोधा बनेंगे, लेकिन बुरका, तीन तलाक और हलाला की अमानवीय प्रथा को मजहब का अंदरूनी मामला बताएँगे | ये अपने ही देश की सेना के जवानों की नृशंस हत्या, देश को तोड़ने की बातें, आतंकियों के लिए रातोरात सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलवायेंगे, घुसपैठियों को शरण देने और चुने गए नेता को मारने की योजना बनाते हैं | गरीबों और किसानों के नाम पर दलालों और विदेशी एजेंटों को मसीहा बताएँगे और गरीबों और किसानों लगातार सरकारी योजनाओं से, विकास से दूर रखने की कोशिश करते है | है। जरूरत पड़ी तो तुमने उन्हीं गरीबों को ढाल बना कर सुरक्षाबलों के आगे कर दिया।

इसलिए इस इकोसिस्टम को चेतावनी देने से काम नहीं चलने वाला है, समूल नष्ट करना जरुरी है अन्यथा ये इस चेतावनी का भी ऐसा मजाक बनायेंगे कि स्वयं प्रधानमंत्री मोदी भी हास्यास्पद हो जाएंगे | मोदी ने यदि अपनी चेतावनी के मुताबिक इन पर सख्त कार्रवाई नहीं की, तो जनमानस में निराशा बढ़ेगी, जिसका कुछ असर लोकसभा चुनावो में देखा जा चुका है जहाँ 400 का नारा जनमानस में वह उत्साह नहीं जगा पाया, जो 56 इंच के सीने के लिए उठ खड़ा हुआ था | इकोसिस्टम की प्रोपेगेंडा फैक्ट्री ने चुनावों के दौरान संविधान बदलने और आरक्षण समाप्त करने का फर्जी वीडियो गाँव-गाँव फैला दिया था, लेकिन मोदी जी का प्रशासन आत्ममुग्ध बना रहा | कही ऐसा न हो कि इकोसिस्टम को उन्ही की भाषा में जवाब देने की चेतावनी 15 लाख वाली बात की तरह जुमला साबित हो जाय| जनता ने 15 लाख वाली बात को कभी गंभीरता से नहीं लिया था, लेकिन आपकी चेतावनी के बावजूद पिछले 10 वर्षों में इकोसिस्टम को तहस-नहस नहीं करने को लेकर आपकी पोलिटिकल करेक्टनेस की नीति से जनमानस पहले से ही उत्साहित नहीं है | अब वह करने की जरुरत है जिसके लिए जनता ने 2014 और 2015 में भारी बहुमत देकर मोदी सरकार को पर्याप्त समय दिया था | अब संविधान की प्रति हाथों में लहराकर सरकार को चुनौती देने वालों को  संविधान को माथे से लगा लगा कर जवाब देने का समय नहीं है | सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का परिणाम देख लिया | अब इसका समय नहीं है | अब देश का विकास जरुरी है और इस विकास की टांग खींचने वाले इकोसिस्टम की टांग काट देने की जरुरत है |

 

Monday, 8 April 2024

हिंदी रेखाचित्र : उद्भव और विकास

 

हिंदी गद्य के क्षेत्र में भारतेंदु युग मुख्यतः निबंधों का युग है। इस युग में विभिन्न ऐतिहासिक पुरुषों पर लिखे गए निबंधों में रेखाचित्र की झलक अवश्य मिलती है परन्तु कहीं से भी इन्हें रेखाचित्र नहीं माना जा सकता है।

रेखाचित्र आधुनिक युग में विकसित एक गद्य विधा है | वैसे तो रेखाचित्र की कई परिभाषाएँ प्रस्तुत की गयी हैं, परन्तु सबसे सटीक और व्यापक परिभाषा डॉ. भगीरथ मिश्र की है जिनके अनुसार संपर्क में आये किसी विलक्षण व्यक्ति अथवा संवेदनाओं को जगानेवाली सामान्य विशेषताओं से युक्त किसी प्रतिनिधि चरित्र के मर्मस्पर्शी स्वरुप को, देखी-सुनी या संकलित घटनाओं की पृष्ठभूमि में इस प्रकार उभारकर रखना कि उसका हमारे हृदय पर एक निश्चित प्रभाव अंकित हो जाए रेखाचित्र या शब्दचित्र कहलाता है।

पं. पद्म सिंह शर्मा और श्रीराम शर्मा हिंदी के प्रारंभिक रेखाचित्रकार माने जाते हैं। पं. पद्म शर्मा द्वारा महाकवि अकबर पर लिखा गया रेखाचित्र पहली बार हिंदी पाठकों का ध्यान खींचने में सफल रहा। यद्यपि रेखाचित्र को एक विधा के रूप में बाद में स्वीकार किया गया किन्तु इस रचना में रेखाचित्र के विविध गुण विद्यमान थे। 1936  तक अनेक रेखाचित्र विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे किन्तु रेखाचित्र से सम्बंधित कोई संग्रह सामने नहीं आया। 1937 में श्रीराम शर्मा का एक संग्रह बोलती प्रतिमाप्रकाशित हुआ। इसमें संग्रहीत रचनाओं में रेखाचित्र के कतिपय लक्षण पर्याप्त मात्रा में दिखाई पड़े। बोलती प्रतिमा’, ‘ठाकुर की आन’, ‘वरदान’, ‘हरनामदास’, ‘पीताम्बर’, ‘अपराधी’, ’रतना की अम्मा’, ‘इदन्नममआदि इस संग्रह की रचनाओं के आधार पर इस संग्रह को एक सफल रेखाचित्र के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। आगे चलकर बोलती प्रतिमाके चार रेखाचित्रों में सोलह नए रेखाचित्र जोड़कर वे जीते कैसे हैंनाम से एक और संग्रह भी प्रकाशित हुआ।

हिंदी रेखाचित्र के प्रमुख रचनाकारों में श्री राम शर्मा के अतिरिक्त वेंकटेश नारायण तिवारी, वृन्दावनलाल वर्मा, महादेवी वर्मा, सियारामशरण गुप्त, हरिशंकर शर्मा, अन्नपूर्णानंद, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, मोहनलाल महतो वियोगी’, रामनाथ सुमन आदि शामिल हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाके कुल्ली भाटऔर बिल्लेसुर बकरिहाको उपन्यास और रेखाचित्र दोंनों के अंतर्गत मान्यता दी गयी है। रेखाचित्र की दो प्रमुख विशेषताओं विषय के प्रति एकाग्रता तथा संक्षिप्तता का अपेक्षित मात्रा में इन रचनाओं में न होना इसके रेखाचित्र होने या मानने की सीमाओं का संकेत करता है।

हिंदी के रेखाचित्रकारों में महादेवी वर्मा का नाम आदर के साथ लिया जाता है। 1941 में प्रकाशित इनके पहले गद्य संग्रह अतीत के चलचित्रको हिंदी का प्रथम सफल रेखाचित्र माना जा सकता है। इसके अतिरिक्त स्मृति की रेखाएंऔर पथ के साथीसंग्रह भी अत्यंत ही महत्वपूर्ण हैं। पथ के साथीको रेखाचित्र से अधिक संस्मरण के रूप में स्वीकार किया गया है। किन्तु रेखाचित्र की अनेक विशेषताओं की उपस्थिति के चलते इसे संस्मरणात्मक रेखाचित्र भी माना गया है। महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों की मूल प्रेरक-धारा करुणा ही रही है। वे सामाजिक विकृतियों के खंड-चित्र अंकित करने में ही व्यस्त रही हैं।  इसके अलावा पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की कुछ रचनाओं का संग्रह कुछनाम से प्रकाशित हुआ जिसमें रामलाल पंडित, कुञ्ज बिहारी, चक्करदार चोरी आदि को रेखाचित्र माना जा सकता है।

हिंदी रेखाचित्र के रचनाकारों में रामवृक्ष बेनीपुरी का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। लालतारा’, ‘माटी की मूरतें’, ‘गेहूँ और गुलाबतथा मील के पत्थरइनका प्रमुख रेखाचित्र संग्रह है। बेनीपुरी की माटी की मूरतेंको  किसी ने उन्हें हाथी दांत पर की तस्वीरेंकहा तो किसी ने बेनीपुरी की लेखनी को जादू की छड़ीकी संज्ञा दी। उनके इन संग्रहों में संग्रहीत रेखाचित्रों में लेखक का सामाजिक एवं राजनीतिक विषमताओं के प्रति आक्रोश, समाज के दीन-दलित व्यक्तियों के प्रति ममता और उनके उज्ज्वल भविष्य में दृढ आस्था आदि भावनाओं का प्रकाशन हुआ है। प्रकाशचंद्र गुप्त के रेखाचित्र पुरानी स्मृतियाँ और नए स्केचभी महत्वपूर्ण हैं। इसमें  लेखक की राजनीतिक चेतना, समाजवादी दृष्टिकोण, स्नेह, सहानुभूति, करुणा आदि का प्राधान्य रहा है। परन्तु इनमें स्वानुभूति की वह गहराई नहीं मिलती जो महादेवी वर्मा एवं बेनीपुरी की विशेषता है।

अन्य रेखाचित्रों में बनारसीदास चतुर्वेदी का ‘रेखाचित्र’, देवेन्द्र सत्यार्थी का रेखाएं बोल उठींउल्लेखनीय है | जबकि  हिन्दी के अन्य अनेक लेखकों ने रेखाचित्रों की रचनाएं की हैं। इनमें कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर’, डॉ. विनयमोहन शर्मा, विष्णु प्रभाकर, डॉ. नगेन्द्र, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र, गुलाब राय, शांतिप्रिय द्विवेदी, प्रेमनारायण टंडन सत्यवती मल्लिक, रघुवीर सहाय, अविनाश, विद्या माथुर, डॉ. मक्खनलाल शर्मा आदि अनेक लेखकों के नाम शामिल हैं। कुल मिलाकर इतने सारे लेखकों की रचनाओं के बावजूद हिन्दी के रेखाचित्र साहित्य को अत्यधिक समृद्ध नहीं कहा जा सकता है, अन्य विधाओं की तुलना में यह अब भी काफी पीछे है।