Tuesday, 11 September 2018

'जनकवि हूँ मैं साफ कहूँगा क्यों हकलाऊँ'-नागार्जुन

इस बात में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है कि तुलसीदास के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी कविता की पहुंच किसानों की चौपाल से लेकर काव्यरसिकों की गोष्ठी तक है।” 
नामवर जी यह टिप्पणी नागार्जुन की लोक-संपृक्तता की ओर संकेत करती है । लेकिन इसका प्रमाण तो उनकी कविताएं ही हैं । नागार्जुन की कविता समकालीन प्रगतिशील काव्य-धारा का अभिन्न अंग होते हुए भी पूरे कविता विधान की दृष्टि से अपना निजी वैशिष्ट्य रखती हैं। नागार्जुन की कविता आधुनिकता की प्रचलित अवधारणा और उसके प्रतिमानों को चुनौती देने के साथ ही अपनी जनोन्मुख संवेदना और सहज लोकधर्मिता के कारण तत्कालीन दौर में एक महत्वपूर्ण पहचान बनाती हैं। उनकी कविताओं में जो लोकोन्मुखता है उसका मुख्य प्रयोजन लोकबंधुत्व और लोक समर्पण की भावना को उभारकर मानव समाज को मनुष्य के रहने योग्य बनाना है । जब तुलसीदास ने कविता को गंगा के समान लोकोद्धारक शक्ति कहा, तो उसके पीछे यहीं मूल उद्देश्य था । नागार्जुन भी अपनी कविता से यहीं काम लेना चाहते थे ।
नागार्जुन ने लोक जीवन को बहुत करीब से देखा ही नहीं है, बल्कि स्वयं जनजीवन को जीया है । वे जीवन के बारे में अपनी राय नही देते है, वरन जीवन की जीती-जागती तस्वीर देते हैं । इसलिए उनकी कविताओं में लोकजीवन का वैविध्य है । लोक जीवन में रचे-बसे नागार्जुन के यहाँ जीवन के कोमल पक्ष से लेकर उसकी विडम्बना और विद्रूपता, ग्रामीण जीवन की सहजता से लेकर नगर जीवन की जटिलता, निर्धनों की फटेहाली से अभिजात्य जीवन की विलासिता और कुटिलता की बेबाक तस्वीर मिलती है। उनकी कविता के व्यापक सामाजिक फलक का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जो संवेदना औरों से अछूती रह जाती है वहां नागार्जुन का लोकह्रदय खूब रमा है। जेल के अमानवीय वातावरण में नेवले की क्रीड़ा, लालू साह का अपनी पत्नी की चिता में अपने को डालकर सतीहो जाना, यमुना किनारे बैठी मादा सुअर, पका हुआ कटहल और बस सर्विस का बंद हो जाना कुछ ऐसे दुर्लभ और अद्भुत चित्र हैं, जहाँ नागार्जुन की काव्य-प्रतिभा की खूब रमी है । ऐसा वहीं कवि कर सकता है जो लोक जीवन से गहरे स्तर पर जुड़ा है और जो मिट्टी की महक से चिर-परिचित हो । उनके रचना लोक में दृश्यों और घटनाओं की बहुलता हमें केवल विस्मित ही नहीं करती है बल्कि जीवन की वास्तविकता को परत-दर-परत उघाड़कर उसका साक्षात्कार भी कराती हैं । इसप्रकार नागार्जुन की कविताएं हमारे भौगोलिक, प्राकृतिक, जैविक और प्रतिपल घटित मानव व्यवहार का इतिहास हैं और जीवन्त साक्ष्य भी । पका हुआ कटहल का चित्र महज फोटोग्राफी नहीं है, यह जीवन का गतिशीलता का भी प्रमाण है ।
"अह् क्या खूब पका है कटहल
अह् कितना बड़ा है यह कटहल
डाल-डाल में पोर-पोर में कलियों का गुच्छा फूटा
सोया सहजन हंसा ठठाकर"
यहां कटहल देखने का मतलब केवल देखनाभर नही है, बल्कि इसमें हर इन्द्रिय की सक्रिय उपस्थिति है । नागार्जुन की लोकदृष्टि कटहल को देखकर मानव जीवन की घटनाओं और स्थितियों को भेदकर भीतर तक उतर जाती है ।
नागार्जुन के काव्य में सामान्तया ग्रामीण और जनपदीय परिवेश और उसकी विशिष्टताओं का चित्रण हुआ है, परन्तु दृष्टि की गहराई के कारण वे चित्र पूरे राष्ट्रीय परिवेश और संवेदना का प्रतिविम्ब बन जाते हैं । गाँव या जनपद का जीवन पूरे देश का जीवन बरकर उभर आता हैः-
"याद आता मुझे अपना वह तरउनीग्राम
याद आती लीचियाँ औ आम
याद आते मुझे मिथिला के रूचिर भूभाग
याद आते धान
याद आते कमल, कुमुदिनी और तालमखान"
यहां लीचियों और आम की रसभरी मिठास तरउनीग्राम से निकलकर पूरे देश को मिठास से भर देती है जबकि कमल, कुमुदिनी और तालमखान की महक पूरे देश में फैल जाती है।
नागार्जुन की कविता में अनुभवों की दुनिया सचमुच विराट है। भारतीय समाज में जितनी विविधता और व्यापकता है, वह नागार्जुन की रचनाशीलता में मौजूद है। समुद्र, जंगल, कस्बा, गाँव, नगर, उपनगर, कल-करखाने, श्मशान, नौटंकी, खेल तमाशे, शहरी मध्यवर्ग, निम्नवर्ग, मजदूर, निपट देहाती, चतुर बुद्धिजीवी, पत्रकार, राजनेता, अध्यापक, कलाकार, आदिवासी क्रांतिकारी, सर्वोदयी कांग्रेसी, विपक्ष, जवान और बूढ़े, शिशु और किशोर, वसंत, पावस, ग्रीष्म, शिशिर, होली-दीपावली, गणतंत्र दिवस, जन्म दिवस, यथार्थ बोध और भावुकता का महामिश्रण नागार्जुन की रचना संसार का अभिन्न अंग है।
ग्रामीण परिवेश में रचे-बसे नागार्जुन ग्रामीण जीवन की पूरी जीवंतता और सम्पूर्णता के साथ अभिव्यक्त करते हैं। नागार्जुन गाँव में रहे है जहाँ संध्या समय खेतों से थके-मादे किसान और मजदूर लौटते दिखाई देते है, जिनके पैरों की बिवाइयाँ फटी हुई हैं और उनके बच्चे गलियों की धूल में नंगे बदन खेल रहे है-----
"देर तक टकराए
उस दिन इन आँखों से पैर
भूल नहीं पाऊँगा फ़टी बिवाइयाँ
खूब गई हैं दूधिया निगाहों में
धँस गई कुसुम कोमल मन में"
नागार्जुन की आँखें गाँव की झोपड़ी, अलाव के पास गप्पे मारते, अपने कटु-मधु अनुभवों को सुनाते और फसलों को लेकर विचारगोष्ठी करते बच्चे, जवान और बूढ़े सबसे टकराती हैं । गाँव की पगडंडियों पर सरपट दौड़ते, गायों-बछड़ों के पीछे भागते हलवाहे, चरवाहे और उनके बच्चे दिखाई देते हैं । खेतों में लहलहाती धान की बालियाँ, सरसों की पीली-पीली पंखुडि़याँ और आमों में लगते बौर ऐसे दिखाई देते हैं मानों यह सारी धरती चमकते मोतियों और तारों से पट गई है । एक ओर जहाँ
"दमक रहे हैं
बालों के गुच्छे कि
चमकाए धान के मृदु हरित नवांकुरों को
सीढ़ीनुमा खेतों मेंय्
वहीं दूसरी ओर
गेहूँ की फसलें तैयार हैं
बुला रहीं हैं
किसानों को
ले चलो हमें खलिहान में
कवि इस अद्भुत सौंदर्य को देखकर आसक्त हो जाता है और उसका कुसुम कोमल मनजी भरके पकी-सुनहली फसलों की मुस्काननिरखता है । इस नैसर्गिक मुस्कान को निरखने के बाद कवि जब गाँव की गलियों में घूमता है तो उसे जीवनदायिनी मधुर संगीत सुनायी पड़ती है और बहुत दिनों के बादजब कवि धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तानसुनता है तो अपना सुध-बुध खोकर रम जाता है । इस कोकिल कंठी तानमें रस है, जो प्राणदायी शक्ति है, वह आधुनिक सिनेमा कर्ण-अप्रिय कर्कश ध्वनि में कहाँ है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ऐेसे ही जीवन्त, प्राणदायी और नैसर्गिक संगीत से युक्त लोक को जीवनोत्सवके रूप में देखा है ।
लोक जीवन के मधुर और क्रीड़ामय पक्ष के साथ-साथ उसकी विडम्बना ओर त्रासदी भी है, जिसका नागार्जन साक्षात्कार करते हैं। अकाल या भूख मानव जीवन की एक भयानक विडम्बना है क्योंकि क्षुधा-पूर्ति जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है। आम जन-जीवन या किसानों एवं मजदूरों, जो अन्न उपजाता है, के जीवन के लिए त्रासदी है । इसके विपरीत जमींदारों, सामंतों और धनलोलुप महाजनों का विलासिता पूर्ण जीवन और गरीबों पर उनका अत्याचार एक अलग तरह की विडम्बना है जो प्रामाणित करती है कि धन की भूख ईंसान को किस प्रकार मानवीय संवेदना से रहित और अमानवीय बना देती है। नागार्जुन के पैनी नजर इन परस्पर विरोधी स्थितियों को आमने-सामने रखकर व्यंग्य के माध्यम से मानवता विरोधी स्थितियों पर प्रहार करते हैं । व्यंग्य परस्पर विरोधी भावों और स्थितियों को आमने-सामने खड़ा करने पर पैदा होता है जिसमें एक पक्ष, जो मानवता का पक्ष होता है, से प्रेम और सहानुभूति होती है और दूसरे पक्ष, जो मानवता विरोधी होता है, से घृणा होती है। व्यंग्य में संवेदना की धार उल्टी होती है । जन से प्रेम और सहानुभूति ही जन-विरोधी स्थितियों और भावों के प्रति घृणा और विक्षोभ में बदल जाती हैं । एक ओर अकाल और भूख के कारण मानव जीवन और उसके साथ रहने वाले जीवों की हालत ही त्रस्त और पस्त नही रहती है बल्कि चूल्हा भी कई दिनों तक नही जलने के कारण रोता हुआ दिखाई देता है और चक्की नही चलने के कारण उदास हो जाती है
"कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोयी उसके पास"
क्योंकि घर में अन्न के दाने नहीं थे, जिसे चूल्हे में पकाया जाता या चक्की से पीसा जाता । अकाल और भूख से इंसान का ही अस्तित्व संकट में नही है बल्कि कानी कुतियाभी चुल्हे के पास सोती है और छिपकलयिों और चूहों की हालत भी शिकस्त हो जाती है । दूसरी ओर पूँजीपति जमींदार और धनलोलुप महाजन है जिसके यहाँ-
"वहाँ एक हरियाणवी गाय
फ्रिज वाली घास खाती है
और 45 लीटर दूध देती है रोज
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आए दिन / कोटपति, युवक या अधेड़ पूँजीपुत्र
छिप-छिपकर सेवन करता है
सिंगी और भांगुर मछलियाँ"
अकाल, भूख, महामारी, कुशासन, भ्रष्टाचार और अंत में पुलिस की गोली के दुष्चक्र की अनवरत त्रसदी का शिकार होने वाले गरीबों के प्रति गहरी संवेदना के कारण ही नागार्जुन राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक पाखंडों पर प्रहार करते हैं। उनकी मंत्रकविता
" ॐ वक्तव्य, उद्गार, घोषणाएं
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भाषण/ ॐ नारे, और नारे, और नारे, और नारे
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दलों में एक दल अपना दल
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ॐ काली काली काली महाकाली महाकाली
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हम चबायेंगे तिलक और गाँधी की टाँग
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हमेशा हमेशा राज करेगा मेरा पोता"

राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक सत्ता के माफियाओं और मठाधीशों का पर्दाफाश करती है। ऐसा करके वे जनता को क्रांतिधर्मी चेतना से युक्त करना चाहते है और ऐसा करने में उन्हे कोई हिचक नही है । वे पूरी साफगोई के साथ घोषणा करने हैं कि
"जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊँ
जनकवि हूँ मैं साफ कहूँगा क्यों हकलाऊँ"
वे सच्चे अर्थों में जनकवि थे । उनकी लोकबद्धता का इससे बड़ा प्रमाण नही हो सकता है कि भारतीय समाज के सबसे कमजोर और निचले तबके के वर्गों-दलित, आदिवासी और औरत- पर होने वाले अत्याचार और उनके जीवन कष्टों को अपने काव्य में सबसे अधिक स्थान दिया है। बाबा नागार्जुन से पहले बाबा तुलसीदास ने दलितों, आदिवासियों और औरतों की पराधीनता और यातना को बड़े ही मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है। यहीं कारण है कि बाबा तुलसीदास जहाँ लोकवादी है, तो बाबा नागार्जुन जनवादी कवि है। लोकऔर जनकेवल अलग-अलग शब्द मात्र है अर्थ के स्तर पर समान हैं। नागार्जुन ने जीवन और शास्त्र में से जीवन को चुना क्योंकि वे जीवन को अलभ्यमानते हैं । इस अलभ्य जीवन के मुरीद होने के कारण वे 1975 के आन्दोलन में वे खुद जेल भी गए ।
नागार्जुन संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश सभी प्राचीन भाषाओं के जानकार थे और इसके साथ ही भारतीय संस्कृति और परंपरा में भी उनकी गहरी पैठ थी । उनकी रचनाशीलता इस विविधभाषी समृद्ध ज्ञान परंपरा का प्रतिबिम्ब है । लेकिन उनकी दृष्टि किसानों-मजूरो की है और उन्ही की सहज और निश्चल भाषा में जब वे राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक नकलीपन पर व्यंग्य करते हैं तो उसकी मार अत्यंत तीखी हो जाती है। लोक जीवन के बिम्बों को अपने समृद्ध ज्ञान के माध्यम से दोहे जैसे पारंपरिक छंदों का प्रयोग करते हुए जो कविता रचते हैं जो जन संवेदना की जोरदार अभिव्यक्ति बन जाती है। उनकी जीवनधर्मी भाषा उनकी लोकधर्मिता को रचनात्मक रूप प्रदान करती हैं। जब वे बादलका चित्रण करते हैं तो वे सदियों से चले आ रहे प्रकृति और मनुष्य के बीच जीवन्त साहचर्य से गुजरते हैं ।
"महामेघ को झंझानिल से, गरज-गरज भीड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है"
बादल के प्रति उनका लगाव ठेठ किसानों और मजदूरों का लगाव है । इसलिए बादल और उससे होने वाली वर्षा नागार्जुन के भीतर रोमांटिक भावनाओं को प्रेरित नही करती है बल्कि उन्हें वहीं सुख और प्रसन्नता होती है जो किसानों को होती है ।
इसीलिए वे सच्चे अर्थो में जनता के प्रति प्रतिबद्ध रचनाकार थे । समसामयिक मुद्दों पर उनकी जो टिप्पणियां हैं, उसका संबंध गहरे सामाजिक राजनीतिक सरोकारों से है। इसी को लक्षित करते हुए आलोचक मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं- "वर्ष 1935-36 से 90 के दशक तक के भारतीय समाज में स्वाधीनता आंदोलन से लेकर आम जनता की बदहाली, तबाही और तंगी के बीच जनता के विद्रोह, प्रतिरोध और सत्ता में संघर्ष का इतिहास अगर आप एक जगह देखना चाहते हैं तो वह नागार्जुन की कविताओें में मौजूद है।"



Tuesday, 21 August 2018

अशोक-देवानाम् प्रियदर्शी.......शास्त्रीय और लोक नृत्य की अनुपम जुगलबंदी


हाल ही में खजुराहो नृत्य समारोह और देश के विभिन्न भागों में प्रदर्शित नृत्य नाटक 'अशोक-देवानाम् प्रियदर्शी' अपने बिल्कुल ही अनोखे विषय के साथ ओडिसी जैसी शास्त्रीय और छऊ जैसी आदिवासी लोक नृत्य की अद्वितीय जुगलबंदी की कलात्मक प्रस्तुति द्वारा भारतीय संस्कृति के सौन्दर्य और माधुर्य को उदभाषित करने की दृष्टि से एक अनूठा एवं सफल प्रयास है | इस जुगलबंदी में विषय के अनूठेपन की परिकल्पना का श्रेय पटकथा(स्क्रिप्ट) लेखक डॉ सुजीत कुमार प्रूसेठ को है, वहीँ इस विषय को ओडिसी और छऊ नृत्य शैलियों की नवीनतम एवं कलात्मक प्रस्तुति के माध्यम से मंच पर दर्शनीय बनाने का श्रेय कबिता मोहंती और उनके सहयोगी नृत्यकारों को जाता है|

किसी भी रचनाकार की महानता और सजगता इस बात में निहित होती है कि वह अतीत के पन्नों से किन पक्षों को अपने समकालीन समाज के अनुरूप या प्रासंगिक पाता है और नवीन परिवेश एवं परिस्थितियों में कितनी सार्थकता से अभिव्यक्त करता है | जैसा कि नृत्य नाटक 'अशोक-देवानाम् प्रियदर्शी' से स्पष्ट है कि इसका विषय महान सम्राट अशोक के जीवन काल से जुड़ा हुआ है, लेकिन पटकथा लेखक डॉ प्रूसेठ ने अशोक के कलिंग युद्ध और उस युद्ध की विभीषिका के बाद अशोक के ह्रदय-परिवर्तन एवं सर्वजन हिताय के लिए उसकी कल्याणकारी योजनाओं को इस नृत्य नाटक का विषय बनाया है क्योंकि वे अशोक के कल्याणकारी मार्गदर्शक सिद्धांतों को समकालीन परिवेश के लिए समानधर्मा सिद्धांत के रूप में देखते है |
अब इस विषय को ओडिसी और छऊ नृत्य शैलियों की जुगलबंदी के द्वारा मंचित करने के पीछे पटकथा लेखक और साथी कलाकारों का यह मंतव्य जरूर रहा होगा कि भारत की पारंपरिक नृत्य शैलियां या लोक नाट्य विधाएं भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा की सहज वाहक रही हैं | रामलीला और रासलीला जैसे लोक नाट्यों से लेकर यक्षगान, नाचा, जात्रा, छऊ आदि लोक नृत्यों में भारतीय धर्म, दर्शन और ज्ञान के वे सभी तत्व मौजूद रहे है जो मानव को मानव बनाते है | कहना न होगा कि भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा या रचनात्‍मक साहित्‍य पर ओड़ीसी नृत्‍य की संबद्धता नैसर्गिक है | भारतीय संस्कृति के उच्च और उज्ज्वल पक्ष ओड़ीसी ही नहीं, समस्त भारतीय शास्त्रीय और लोक कलाकारों को प्रेरणा प्रदान करते है | महान अशोक के कल्याणकारी मार्गदर्शक सिद्धांत भारतीय समाज के सनातन सिद्धांत और आदर्श हैं | इन सिद्धांतों और आदर्शों को नृत्य नाटक में साकार कर समकालीन समय में 'सभी के कल्याण और विकास' की संकल्पना को पुष्ट करने की पटकथाकार की परिकल्पना निःसंदेह प्रशंसनीय है |
इस नृत्य-नाटक 'अशोक-देवानाम् प्रियदर्शी' के द्वारा एक अन्य तथ्य की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ जो मेरी समझ से इस नृत्य-नाटक की सफलता के पीछे अहम कारक है | भारतीय कला जगत में कोई भी कला कभी भी अकेली नहीं होती है, उसका अंतर्संबंध दूसरी कलाओं से भी होता है| हमारी संस्कृति की कोई भी अवधारणा एक-दूसरे से अलग नहीं होती है | कलाओं के अंतर्संबंध को विष्णुधर्मेत्तर पुराण में राजा वज्र और ऋषि मार्कंडेय के बीच हुए संवाद में देखा जा सकता है | नृत्य और नाटक दोनों ही समावेशी (Inclusive) कलाएं हैं, जो न केवल एक दूसरे को अपने भीतर समावेशित कर लेती है, बल्कि अन्य कलाओं या विधाओं-गीत, संगीत, कथा, गायन, वादन, चित्रकला, मनोविज्ञान, साहित्य आदि-को भी अपने भीतर समावेशित कर लेती है| पटकथाकार और नृत्य-निर्देशक ने इन दोनों विधाओं की इस क्षमता का जिस तरह से बखूबी उपयोग किया है, वह अविश्वसनीय है | इसके साथ ही एल.इ.डी डिस्प्ले जैसी आधुनिक तकनीक के द्वारा मंच पर तत्कालीन परिवेश को दृश्य बनाते हुए असाधारण प्रस्तुति की गई है | नृत्य शुरू होने के साथ अपने मधुर संगीत और कलाकारों की भाव मुद्राओं में दर्शकों का मन औचक ही रमने लगता है और रमता हुआ मन नृत्य से जुड़े विषयों, उसमें निहित घटनाओं, तत्कालीन स्थितियों से अनायास ही एकाकार हो जाता है | नृत्य के बैकग्राउंड में सूत्रधार के संवाद यद्यपि अंग्रेजी में है, जो इस नृत्य-नाटक के अस्वाद में भारतीय दर्शकों के एक बड़े हिस्से के लिए बाधक हो सकता है लेकिन नृत्यकारों की भंगिमाएं इतनी आकर्षक है कि भाषा की कमी की भरपायी कर देती हैं |   
नृत्य-नाटक की शुरुआत ओडिशा के भुवनेश्वर के पास दया नदी के तट पर धौली की तलहटी पर बने 'शिला लिपि' की आवाज़ से होती है जो इस नृत्य-नाटक की सूत्रधार भी है और कलिंग युद्ध एवं उसके बाद अशोक के युद्ध-प्रेमी शासक से एक उदार कल्याणकारी सेवक के रूप में परिवर्तन की साक्षी भी रही है | 'शिला लिपि' का प्रतिनिधित्व कर रही नृत्यांगना और उनके साथियों ने अशोक चक्र की 24 तीलियों से जुड़े सद्गुणों और उससे जुड़े दर्शन को हाथ, पैर, कमर, नेत्र आदि की विभिन्न भंगिमाओं से मंच पर इस तरह से साकार किया है कि वह मंत्र मुग्ध कर देता है |
भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार पुराण और वेदों में 24 की संख्या का बहुत महत्व है। यह हिंदू धर्म के गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों को भी सूचित करता है जिसका प्रतिनिधित्व 24 धर्म ऋषि करते है और जो गायत्री मंत्र की पूरी शक्ति को पूरा करने में सक्षम थे | अशोक चक्र की पहली तीली विश्वामित्र ऋषि का प्रतिनिधित्व करती है। अशोक चक्र को धर्म चक्र या समय चक्र के रूप में भी जाना जाता है। अशोक चक्र का गहरा संबंध गौतम बुद्ध के धर्म-चक्र से है जिसका प्रवर्तन उन्होंने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद पहली बार सारनाथ में पांच भिक्षुओं को उपदेश देकर किया था| यही नहीं, 24 तीलियाँ दिन के 24 घंटे का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस चक्र को कर्तव्य का पहिया भी कहा जाता है, जिसकी 24 तीलियाँ किसी व्यक्ति के 24 सद्वृतियों को अभिव्यक्त करती हैं। दूसरे शब्दों में उन्हें मनुष्यों के लिए 24 धार्मिक मार्ग भी कहा जा सकता है। ये वे सद्वृतियां हैं या धार्मिक मार्ग हैं जिन पर चलकर कोई भी मानव संस्कृति या राष्ट्र एक कल्याणकारी समाज का निर्माण कर सकता है | 'अशोक-देवानाम् प्रियदर्शी' में पटकथाकार ने 24 तीलियों के माध्यम से संयम, आरोग्य, शांति, त्याग, शील, सेवा, क्षमा, प्रेम, मैत्री, बंधुत्व, अहिंसा, सहिष्णुता, कल्याण, समता, न्याय, अधिकार, आत्मनियंत्रण, आदि जैसे 24 विशिष्ट मानव सद्वृतियों और उनसे जुड़े दर्शन को ही केंद्र में रखा है जिसे कलाकारों ने अपने नृत्य और अभिनय से प्रस्तुति की है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से पूरी भारतीय संस्कृति एवं पूरे वांग्मय की ओर भी संकेत कर दिया है | कहना न होगा कि यही वे सद्गुण है जिससे सम्मिलित रूप से देश और समाज का चहुमुखी विकास संभव हैं| इसी प्रासंगिकता को लक्षित करते हुए पटकथाकार ने अशोक चक्र को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करने का सर्वथा अभिनव प्रयोग किया है | ये तीलियाँ सभी देशवासियों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में स्पष्ट सन्देश देने के साथ साथ यह भी बताती हैं कि हमें अपने रंग, रूप, जाति और धर्म के अंतरों को भुलाकर पूरे देश को एकता के धागे में पिरोकर देश को समृद्धि के शिखर तक ले जाने के लिए सतत प्रयास करते रहना चाहिए |
अशोक चक्र और उससे जुड़े संदेशों को अभिव्यक्त करने के बाद उस त्रासदी का मंचन किया गया है, जिसके बाद अशोक जन-कल्याण को अपना मिशन बना लेता है | पटकथाकार ने कलिंग युद्ध को मंचित करने के लिए छऊ लोक नृत्य का सहारा लिया है | छऊ नृत्य में नृत्यकार जिस सुर-ताल-धुन एवं लयबद्धता के साथ तलवार एवं ढाल आदि शस्त्र का सञ्चालन करते है और जिस शारीरिक सौष्ठव के साथ एक साथ कई कलाबाजियां लगाते है, वह युद्ध के लिए सैनिकों की निपुणता एवं युद्ध की विभीषिका को साकार करने में किसी भी तरह की कमी की गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं | प्रसिद्ध छऊ नर्तक राकेश साईं बाबू ने अशोक के अनुपम शौर्य एवं उसके योद्धा रूप के साथ ही उसके लोकहितकारी व्यक्तित्व को अपने नृत्याभिनय से सजीव कर दिया है और हमारे मन-हृदय को अपने सुर-ताल-धुन-भाव-भंगिमा के प्रवाह में बहा ले जाता है |
छऊ नृत्य के तेज-तर्रार अभिनय के बाद युद्धोत्तर विभीषिका का विषादपूर्ण दृश्य उपस्थित होता है जो दर्शक के दिलो-दिमाग पर वितृष्णा के बजाय कुतूहल पैदा करता है जो अशोक के महायोद्धा से बौद्ध धर्म अनुयायी और धर्म-प्रचारक एवं लोकहितकारी रूप में बदलाव को सहज ही आत्मसात कर लेता है | 'बुद्ध शरणम् गच्छामि', 'धम्म शरणम् गच्छामि' और 'संघ शरणम् गच्छामि' के शांतिमय स्वर के साथ कलाकारों की मुद्रायें और भाव दर्शकों के भाव के साथ एकाकार हो जाते हैं |
अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद देश-विदेश में शिलालेखों के द्वारा और राज्य कर्मचारियों को भेजकर धम्म प्रचार को प्रमुख ध्येय माना | 'धम्म' का अर्थ है साधुता अर्थात् बहुत से कल्याणकारी कार्य करना, पापरहित होना, मृदुता, दूसरों के प्रति व्यवहार में मधुरता, दया-दान तथा शुचिता, जीव-हिंसा न करना, माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों एवं बड़ों के प्रति आदर के साथ ही दासों तथा भृत्यों के प्रति उचित व्यवहार और इसका उद्देश्य था अच्छे आचरण तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को जगाकर अपने विशाल साम्राज्य में शांति बनाए रखना एवं लोगों को सर्वांगीण प्रगति के पथ पर अग्रसर करना । अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को धम्म का प्रचार करने के लिए पीपल वृक्ष के साथ श्रीलंका भी भेजा | निःसंदेह ये ऐसे नैतिक आदर्श या मूल्य है जिनकी प्रासंगिकता वर्तमान समय में ज्ञान और सूचना के अथाह प्रवाह के बावजूद नैतिक रूप से रुग्ण होते समाज में सबसे अधिक है | यही कारण है कि ये मूल्य या आदर्श जब नृत्याभिनय के रूप में दर्शकों के समक्ष आते है तो उनके ह्रदय को स्पंदित करते है |  
नृत्यकारों ने अशोक द्वारा सारनाथ में स्थापित एक-दूसरे के पीछे चार शेरों के समूह अर्थात् सिंह-चतुर्मुख को इस रूप में मूर्त किया कि उनके प्रतीकार्थ सहज ही हृदयंगम हो जाते है | वे एक-दूसरे के पीछे एक पैर पर खड़े होकर और मंच की पृष्ठभूमि में शेर की दहाड़ के साथ उनके प्रतीकात्मक अर्थों को एक-एक कर खोलते जाते हैं | अशोक स्तम्भ के ये चार शेर समान महत्त्व के चार चीजों के समूह के प्रतीक है। शेर को बुद्ध के प्रतीक के रूप में अक्सर प्रयोग किया जाता है| यह चार शेरों और घंटी का समूह संयुक्त रूप से बौद्ध धर्म के 'चार आर्य सत्य' का प्रतीक है, जो मध्यम मार्ग पर जोर देते हैं। मध्यम मार्ग बौद्ध धर्म का मौलिक दर्शन है। यही नहीं यह सभी दिशाओं में धर्म के प्रसार का प्रतीक है और इसके साथ ही सभी दिशाओं में मौर्य साम्राज्य की सीमा या साम्राज्य के चार हिस्सों को भी अभिव्यक्त करते है ।
इसी धम्म यात्रा और समाज कल्याण के संकल्प के साथ नृत्य के अंत में जिस मनमोहक माहौल की सृष्टि होती है वह दर्शकों के दिलोदिमाग को अलौकिक शांति से भर देता है, किसी विषाद भाव की ओर नहीं ले जाता है |    

काल के कपाल पर अमिट अटल

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।
अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही दीदावर थे, जिन्होंने अपने विलक्षण व्यक्तित्व से चमन को जीवनपर्यन्त गुलज़ार किया | सक्रिय राजनीति से 13-14 वर्षों तक दूर रहने और पिछले १० वर्षों से बीमारी की अवस्था में रहने के कारण नयी पीढ़ी उनके विराट व्यक्तित्व को जानती भी नहीं थी | इसके बावजूद उनके महाप्रयाण पर पीढ़ियों ही नहीं बल्कि सभी तरह की जातीय, धार्मिक और दलीय सीमाएं टूट गई | देश की जनता ने जिस भाव-विह्वलता से अटल जी को अंतिम विदाई दी, वह अतुलनीय था, अविश्वसनीय था |
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से उस शुचिता का जाना है जिसने राजनीति की काली कोठरी में अपने आश्रय के लिए अटल जी दामन थाम रखा था | भारतीय राजनीति से उस गरिमा और प्रतिष्ठा का जाना है, जो समकालीन राजनीति के आचरण एवं चरित्र में अलभ्य है | अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से उस ईमानदारी और भलमनसाहत का जाना है, जो महज एक वोट से अपनी सरकार गवां देता है लेकिन किसी भी कुत्सित तरीके से परहेज करने पर अडिग रहता है | अटल जी का जाना भारतीय राजनीति एवं साहित्यिक जगत के मुखरित स्वर का मौन हो जाना है। 
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति के उस ध्रुवतारे का अस्त होना है, जो अपनी चमक से भारतीय राजनीति और समाज को कई दशकों से आलोकित करता रहा है |
अटल जी का जाना राजनीति के शिखर पुरूष का जाना है जो भारतीय लोकतंत्र को एक मानवोचित ऊंचाई प्रदान किया करता था |
अटल जी का महाप्रयाण उस महान सपूत का महाप्रयाण है जिसने माँ भारती के कण-कण और बूंद-बूंद को पवित्र और पूजनीय माना और विश्व में मां भारती के मान सम्मान को बुलंदी पर पहुँचाया |
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से उस अनन्य राष्ट्रप्रेमी का जाना है, जो मानता था कि उसकी अस्थियों को नदियों में प्रवाहित कर यदि कान लगाकर सुना जाय तो उससे एक ही आवाज निकलेगी-भारत माता की जय |
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से उस महान देशभक्त का जाना है, जिसने राष्ट्रहितों से कभी समझौता करना स्वीकार नहीं किया और उस प्रहरी का जाना है जिसने तमाम अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बावजूद राष्ट्र की सुरक्षा के लिए पोखरण जैसे परीक्षण को अंजाम देकर पुरी दुनिया को हिला दिया ताकि कोई हिदुस्तान की ओर हिकारत की नजरों से देखने की हिमाकत न कर सके | अटल जी की अंतिम यात्रा उस प्रखर राष्ट्रवादी की यात्रा थी, जिसके लिए राष्ट्रवाद विचारधारा, शिगूफा या नारा नहीं, बल्कि एक जीवन शैली थी |

अटल जी का जाना भारतीय राजनीति के उस अजातशत्रु का जाना है, जो अपने विरोधियों को भी अपना मुरीद बना लेता था |
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति के उस भीष्म पितामह का जाना है, जिसने अपने भीष्म त्याग और अनन्य समर्पण से राष्ट्र निर्माण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया |
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से उस महान कूटनीतिज्ञ का जाना है, जिसने चीन जैसे अक्खड़ देश को भी अपनी अक्खड़ता छोड़ने पर विवश किया |
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से उस आवाज़ का मौन होना है, जिसकी अनुगूँज संसद के गलियारों से लेकर देश के कोने-कोने में प्रतिध्वनित होती है | अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से वाणी के उस जादूगर का जाना है, जो अपनी जादू से जनमानस को सम्मोहित किए रखता था | भारतीय राजनीति से उस जिन्दादिली का जाना है, जो अपने निराले और चुटिले अंदाज से लाखों के जन सैलाब को ठहाके लगाने पर विवश कर देता था | अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से उस हाजिरजवाबी का जाना है, जो प्रत्युत्तर करने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता था |

अटल जी का जाना भारतवर्ष के उस अप्रतिम योद्धा और महानायक का जाना है, जिसे विपरीत परिस्थितियों में हार स्वीकार नहीं था और पराजय को भी विजय के गगन भेदी विश्वास में बदलने की ताकत थी | उस कर्मवीर का जाना है, जो लक्ष्य तक पहुंचे बिना कर्तव्य पथ से विमुख होना नहीं जानता था | उस साहस का जाना है जिसमें 'आंधियों में भी दीये जलाने' की क्षमता थी |
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से उस विकास पुरूष का जाना है, जिसने पूरे देश में डिजिटल क्रांति को जन्म दिया और साथ ही स्वर्णिम चतुर्भुज की धमनियां बिछा दी |
अटल जी का जाना उस संवेदनशील कवि का जाना है, जो अपनी कविताओं से जनमानस को आंदोलित कर देता था| अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से उस आलोचक का जाना है, जो अपने प्रतिपक्ष की आलोचना में भी इसका ख्याल रखता था कि उसे किसी प्रकार का ठेस न पहुंचे | कभी किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की।
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति के उस महागुरु का जाना है, जिससे कई पीढ़ियों ने राजनीति का ककहरा सीखा है|
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति से उस महामानव का जाना है, जो इंसानों के बीच देवता-तुल्य हुआ करता था |
अटल जी का जाना भारतीय राजनीति के उस यारबाज का जाना है, जो सदैव अटल भरोसे को निभाने का माद्दा रखता था |
अटल जी का जाना उस स्वप्नद्रष्टा का जाना है जो हिंदुस्तान के प्रत्येक नागरिक को गरिमा और मान-सम्मान दिलाना चाहता था, उन्हें खुशहाल देखना चाहता था और दुनिया में वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना का प्रसार देखना चाहता था|












Tuesday, 17 April 2018

भारतीय वांड्मय में कृषि संस्कृति

भारतीय वांड्मय में कृषि संस्कृति.....उत्तम चाकरी से पिकनिक की ओर (हिंदी साहित्य के सन्दर्भ में)
कविता  या साहित्य मनुष्य की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति की सबसे प्राचीन विधा है और कृषि कार्य भी एक प्राचीनतम पेशा है। ऐसी स्थिति में प्राचीन ग्रंथों में आदि मानव के इस आदि व्यवसाय से जुडी गतिविधियों का उल्लेख होना स्वाभाविक है | वैदिक वांड्मय में जिस यज्ञ की अभूतपूर्व प्रतिष्ठा रही है, उसकी मुख्य वजह यह रही है कि मनुष्य और देवता सभी का गुजर-बसर यज्ञ पर ही निर्भर करता है | यदि हम यज्ञ के विवरणों पर ध्यान दें, तो पाएंगे कि इसका संबंध कृषि कर्म या उत्पादन पक्ष से था | ब्रीहि(धान), यव (जौ), माण(उड़द),मुदंग (मूंग), गोधूम (गेहूँ), और मसूर आदि अनाजों, जो यज्ञ क्रिया के प्रमुख घटक रहे हैं, का वर्णन आयुर्वेद में मिलता है | इसलिए वेदों में कृषि कार्य को यज्ञ या सर्वश्रेष्ठ कार्य का दर्जा दिया गया है| सभी ऋषि-मुनियों ने कृषि कर्म को सर्वोपरि सम्मान दिया है | वैदिक व्याख्याकार मानते हैं कि राजा जनक कृषि के अधिष्ठाता हैं और सीता कृषि की अधिष्ठातृ देवी हैं। रामविलास शर्मा ने वेदों में खेती करने वाले ऋषि-मुनियों का विशेष रूप से उल्लेख किया है। विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में कृषि का गौरवपूर्ण उल्लेख मिलता है-“अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्‌ कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः। अर्थात जुआ मत खेलो, कृषि करो और सम्मान के साथ धन पाओ।  हमारे समाज में प्रचलित जन-उक्ति कृषि कार्य की श्रेष्ठता को अभिव्यक्त करती है –‘उत्तम खेती मध्यम बान, नीच चाकरी कुक्कर निदान|’ खेती उत्तम इसलिए है क्योंकि इस क्रिया के प्रारंभ होने से अन्न उत्पादित होने तक करोड़ों सूक्ष्म जीवियों से लेकर गाय-बैल आदि पशुओं एवं करोड़ों लोगों का पेट भरता है। गुरुकुलों में राजा और प्रजा दोनों के पुत्र खेती करते हुए ज्ञानार्जन करते थे। अर्थात् ज्ञान और श्रम के बीच कोई दूरी नहीं थी।

इस प्रकार ऋग्वेद एवं उत्तरवैदिक काल में आर्यो का मुख्य व्यवसाय कृषि ही था। यजुर्वेद संहिता में मानसून का वर्णन सल्लिवात के रूप में आता है। शतपथ ब्राह्यण में कृषि की क्रियाओं-जुताई, कटाई, मड़ाई, का उल्लेख मिलता है। कालांतर में वृहत्संहिता, मेघदूत आदि ग्रंथों में महर्षि पाराशर, वराहमिहिर, कश्यप, गर्ग और कालिदास आदि विद्वानों से लेकर भक्तिकालीन साहित्य और रीतिकालीन साहित्य में घाघ और भड्डरी जैसे कवियों ने समय-समय पर कृषि संबंधी अनुभवों और वर्षा एवं मौसम पूर्वानुमान व्यक्त किया हैं। 11वीं शती के 'कृषिपाराशर' नामक ग्रन्थ में जल संसाधनों से सिंचाई के साधनों के सभी विवरण मिलते हैं|

हिंदी साहित्य के इतिहास में कबीर, जायसी, सूर, तुलसी से लेकर जयशंकर प्रसाद, निराला, माखनलाल चतुर्वेदी नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, रामधारी सिंह दिनकर, भवानीप्रसाद मिश्र और केदारनाथ सिंह तक के कवियों के साथ-साथ प्रेमचंद, सुदर्शन, रेणू, शिवप्रसाद सिंह, मार्कंडेय, काशीनाथ सिंह, शिवमूर्ति और अमरकांत इत्यादि साहित्यकारों ने किसान को केंद्र में रख कर कृषि कार्यों एवं उससे जुडी समस्याओं और उनके जीवन-यापन के तौर-तरीकों को अपनी रचनाओं में गंभीरता से उकेरा है। किसान-जीवन की ‘मरजाद’ है खेती और उस जीवन का सबसे बड़ा यथार्थ भी है। कबीर ने अपनी आध्यात्मिक चेतना और जीवनानुभूति को बड़ी ही सूक्ष्मता से कृषि संबंधी कार्य-व्यापार से जोड़ा है | उन्होंने कृषि कार्य को साधना प्रक्रिया का समान धर्मी माना है-
“ज्ञान कुदार ले बंजर गोडे, नाम का बीज बुआवै|
सुरतसुरावन नय कर फेरे, ढेला रहन न पावै|
उलटि-पलटि के खेत को जोते, पूर किसान कहावै ||”
कृषि कार्य में बीज की अहम भूमिका है जिसे कबीर ने गूढ़ रूपक द्वारा प्रस्तुत किया है-
“राम नाम करि बोहड़ा, बाहों बीज अघाई
खण्ड ब्रह्माण्ड सूखा परै, तऊ न निष्फल जाई” |
यहाँ बोहड़ा बांस की नलिका होती है जिसके द्वारा बुआई करने से बीज खेत की नीची सतह तक पहुँच जाता है | कृषि कार्य का इतना सूक्ष्म ज्ञान कृषक जीवन से वगैर आत्मीयता के नहीं हो सकता है |
यही नहीं, पशुपालन भारतीय कृषिव्यवस्था का अनिवार्य अंग रहा है जिसकी पूरी प्रक्रिया का समग्र दिग्दर्शन हमें सूर के काव्य में होता है |
                                प्रभु जू यौं कीन्हीं हम खेती
                                बंजर भूमि गाउं हर जोते, अरु जेती की तेती।
                                काम क्रोध दोउ बैल बली मिलि, रज तामस सब कीन्हौं।
                                अति कुबुद्धि मन हांकनहारे, माया जूआ दीन्हौं।
                                इन्द्रिय मूल किसान, महातृन अग्रज बीज बई।
                                जन्म जन्म को विषय वासना, उपजत लता नई।
                                कीजै कृपादृष्टि की बरषा, जन की जाति लुनाई।
                                सूरदास के प्रभु सौ करियै, होई न कान-कटाई।
इस रूपक में खेती से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात, भूमि के गुण-धर्म की पहचान, खेती के साधन, उसकी प्रक्रिया, कठिनाइयाँ आदि सभी आवश्यक बातें आ गई हैं| सूर ने विभिन्न पौधों की प्रकृति और वर्षा से उनके संबंध जैसे गूढ़ ज्ञान के माध्यम से कृष्ण के बिना गोपियों की दशा को अभिव्यक्त किया है– ‘सूखति सूर धान अंकुर सी, बिनु बरसा ज्यों मुल तुई। अर्थात् धान का पौधा पानी की कमी से मुरझाकर मर जाता है। सूर ने प्रेम और योग को एक साथ साधने की व्यर्थता को-सूरदास तीनौ नहिं उपजत धनियाँ धान कुम्हाड़े।– के द्वारा व्यक्त किया है |
तुलसी के काव्य की लोकप्रियता का एक अहम कारण कृषि संबंधी वस्तुओं का रचनात्मक उपयोग है | उन्हें ‘ईति’ अर्थात् फसल को नुकसान करने वाले छह संकटों-अतिवृष्टि, अनावृष्टि, चूहों, टिड्डियों, पक्षियों और राजा के आक्रमण- से कृषि और किसान को होने वाली दुर्दशा का गहरा एहसास था | वे रामचरितमानस के प्रारभ में खलों की विशिष्टता के द्वारा ओले से फसल को होने वाले नुकसान की बाते करते है-“पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं||”
हम विद्यालयी जीवन से ही रटते आये है कि भारतीय कृषि मानसून के साथ जुआ है | समुचित वर्षा होने पर ही अन्न की उपज ठीक से हो सकती है। अत: वर्षा कब होगी, होगी कि नहीं होगी, कितनी मात्रा में होगी- इसका ज्ञान होना कृषि कर्म के लिए बहुत आवश्यक है। रीतिकालीन कवि घाघ और भड्डरी की कृषि एवं ऋतु संबंधी उक्तियाँ कृषि जीवन में एक ज्योतिष विज्ञान की तरह कार्य करती रही है और करती हैं | इसमें महाकवि घाघ के खेती, सूखा, अतिवृष्टिकृषि कार्य से जुड़े अच्छे एवं स्वस्थ पशुओं की पहचान, अच्छे बीजों की पहचान, कृषि की फसलों की पैदावार कम या अधिक होने के संबंध में तथा फसलों की बुआई, कटाई और मडाई के उपयुक्त समय के बारे में ज्ञान भी होता है | उनकी रचनाओं में बारिश की सटीक भविष्यवाणी देखी जा सकती है-आदि न बरसे अद्रा, हस्त न बरसे निदान। कहै घाघ सुनु घाघिनी, भये किसान-पिसान||” इसीप्रकार जब बरखा चित्रा में होय। सगरी खेती जावै खोय|| अर्थात यदि चित्रा नक्षत्र में वर्षा होती है तो संपूर्ण खेती नष्ट हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि चित्रा नक्षत्र की वर्षा ठीक नहीं होती। यही नहीं, कौन सा अनाज कितनी मात्रा और कितनी दूरी पर बोया जाए, इसका भी  घाघ ने बेहद बारीकी से विवेचन किया है|
आधुनिक काल में मैथिलीशरण गुप्त ‘साकेत’ में होने वाली फसल की स्थिति का जायजा सीता के मुख से लेते है-“कैसी हुई उपज कपास, ईख, धान की?” तब किसान भी अन्न, गुड़ और दूध की वृद्धि की सूचना देते है | छायावादी साहित्य या यों कहा जाय कि आधुनिक हिदी साहित्य भारतीय किसान जीवन के बिना सम्पूर्ण नहीं होता । आधुनिक हिदी साहित्य ने कृषक संस्कृति के विभिन्न पक्षों और उसकी दारुण व्यथा को नए सिरे से साहित्य का विषय बनाया | कामायनी में जिस व्यापक संस्कृति को आधार बनाया गया है उसमें कृषि संस्कृति का व्यापक महत्व है | कृषि-व्यवस्था केवल अर्थव्यवस्था नहीं होती, बल्कि एक मुकम्मल सभ्यता-संस्कृति होती है| निराला का कृषक जीवन से अनन्य सम्बन्ध है, चाहे कविता 'बादल राग' हो या उपन्यास 'बिल्लेसुर बकरिहा’ । एक किसान के लिए बादलों के उमड़-घुमड़ कर बरसने का क्या महत्त्व होता है, इसे 'बादल राग'  में देखा जा सकता है | निराला ने किसानों के कार्य क्षेत्र के बीच सरस्वती की प्रतिष्ठा की है। जिस तरह तुलसी ने अन्नपूर्णा को राजमहलों से निकालकर भूखे-कंगालों के बीच स्थापित किया उसी तरह निराला ने सरस्वती को मंदिरों, पूजा-पाठ के कर्मकांड से बाहर लाकर खेतों-खलिहानों में श्रमजीवी किसानों के सुख-दुख भरे जीवन क्षेत्र में स्थापित किया -
हरी-भरी खेतों की सरस्वती लहराई
मग्न किसानों के घर उन्मद बजी बधाई
प्रेमचंद ने कृषक संस्कृति को साहित्य के केंद्र में प्रतिष्ठित किया और यह सन्देश दिया है कि कृषि-व्यवस्था और किसान के बिना भारतीय संस्कृति का कोई भी विश्लेषण अधूरा होगा। भारत की संस्कृति का मुख्य पक्ष कृषि संस्कृति है जिसे बनाने में किसान-समाज की भूमिका है। उनके पहले तथा उनके बाद किसी भी रचनाकार ने इतने विस्तार से किसान जीवन को आधार बनाकर हिंदी में साहित्य-सृजन नहीं किया। केदार नाथ अग्रवाल की कविता ‘बसंती हवा’ एक साथ महुआ और आम से लेकर अरहर, अलसी और सरसों की फसलों के मिले-जुले नैसर्गिक सौन्दर्य को अभिव्यक्त करती है | बाद में रेणू ने ‘मैला आँचल, जगदीश चन्द्र ने धरती धन न अपना’ और ‘कभी न छोड़े खेत’, शिवप्रसाद सिंह ने ‘अलग-अलग वैतरणी’ और विवेकी राय ने ‘लोकऋण’ में कृषक संस्कृति के विविध और बदलते पहलुओं पर प्रकाश डाला है |

इस प्रकार हिंदी वांडमय प्रारंभ से ही गाँव और किसानी जन-जीवन के साथ-साथ ऋतुओं, फसलों, नदियों, इनसे जुड़े गीतों, पर्व-त्योहारों आदि से जुड़ा हुआ रहा है | लेकिन आज विडम्बना है कि जैसे-जैसे देश की अर्थव्यवस्था और उसके विमर्श में कृषि और किसान हाशिए पर चला गया है वैसे-वैसे हमारे हिंदी साहित्य से ये सब धीरे-धीरे ग़ायब हो रहे हैं| आज का अधिकांश साहित्य नगरों में रहने वाले ऐसे लेखकों द्वारा रचा जा रहा है जो ग्रामीण संस्कृति और इस तरह कृषि संस्कृति से पूरी तरह से कट गए है | इसलिए उनकी रचनाओं से कृषि गतिविधियों के साथ ही ऋतुओं, फसलों, नदियों, इनसे जुड़े गीतों, पर्व-त्योहारों आदि का वर्णन भी पिकनिक मानने जैसा हो गया है |

Thursday, 22 March 2018

जल....... सहज सुलभ प्राकृतिक संसाधन से दुर्लभता की ओर

प्राणी जगत के लिए जल प्रकृति प्रदत्त एक अनमोल उपहार है। राम चरित मानस में जब गोस्वामी तुलसीदास कहते है कि "क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा-पंच तत्व से बना शरीरा" तो जल की महत्ता का अंदाजा लगाया जा सकता है कि मनुष्य सहित पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जंतु एवं वनस्पति का अस्तित्व जल के बिना संभव नहीं है। यही नहीं, जल की अमूल्यता इस तथ्य से भी प्रमाणित होती है कि विश्व की सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं का जन्म भी प्रमुख नदियों के किनारे ही हुआ था। जल की महत्ता का उल्लेख हमारे प्राचीन वांड्मय में अक्सर हुआ है| जल एक प्राकृतिक एवं अमूल्य संसाधन है जो सजीव जगत की जीविका, खाद्य सुरक्षा और निरंतर विकास का आधार है। यह किसी भी राष्ट्र के आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक विकास एवं प्रगति का एक आधारभूत संकेतक भी है।
बढ़ती आबादी के दबाव, बड़े पैमाने पर शहरीकरण, बढ़ती आर्थिक गतिविधियाँ, उपभोग की बदलती प्रवृत्तियाँ, रहन-सहन के स्तर में सुधार से स्वच्छ पेयजल की बढ़ती माँग, जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश की घटती मात्रा, कृषि के लिए सिंचित क्षेत्र के विस्तार एवं जल की अधिकांश माँग करने वाली फसलों की पैदावार आदि से जल की माँग का दायरा बढ़ा है | लेकिन धरती के तीन चौथाई हिस्से पर पानी भरा होने के बावजूद भी महासागरों का पानी खारा होने के कारण हमारे किसी काम का नहीं। धरती पर उपलब्ध पानी का मात्र 2.7% हिस्सा ही मीठा है। मीठे पानी का लगभग 22.6% पानी भूमिगत जल के रूप में है। 52% झीलों और तालाबों में और 1% नदियों में निहित है। इसलिए आज का विश्व जल संकट की समस्या से त्रस्त है। गोल्डमैन सैक्स ने एक बार पानी को अगली शताब्दी का पेट्रोलियमकहा था, जिसके लिए युद्ध भी हो सकते हैं। तीसरी दुनिया के देशों में यह संकट अधिक गंभीर हैं। भारत के कई राज्य जल संकट की त्रासदी भोग रहे हैं। कावेरी से लेकर रावी, व्यास, कृष्णा और कई अन्य नदियों के पानी पर अधिकार को लेकर अनेकों बार हिंसात्मक टकराव हो चुके है। यह विडम्बना है कि सूचना प्रौद्योगिकी में अग्रणी देश होने के बावजूद भारत सभी के लिए जल की व्यवस्था करने में काफी पीछे है। प्राचीन काल से पेय जल के लिए इस्तेमाल होते आ रहे सतही और भूजल जैसे परम्परागत स्रोत सूखते और प्रदूषित होते जा रहे है जबकि आज भी देश में कई बीमारियों का एकमात्र कारण प्रदूषित जल है।
संकट की गम्भीरता का सबसे अधिक असर कृषि और पेयजल की उपलब्धता पर होता है |  देश में उपलब्ध पानी का 80 % खेती में इस्तेमाल होता है जबकि उद्योग इस पानी का 10 % से भी कम इस्तेमाल करते हैं| किन्तु पानी को प्रदूषित करने में उद्योगों का रवैया सबसे अधिक असंवेदनशील है | एक ओर कृषि उत्पादकता में कमी की स्थिति में न केवल किसानों की आजीविका बुरी तरह प्रभावित होती है, बल्कि देश को अनाज के लिए अन्य देशों से आयात पर निर्भर होना पड़ता है, महंगाई में वृद्धि, आय की विषमता में भी वृद्धि होती है |
लेकिन जल का मौजूदा संकट सिर्फ बारिश की कमी और मांग के बढ़ने की वजह से ही नहीं है, बल्कि समुचित जल प्रबंधन की कमी की सबसे बड़ी भूमिका है | दूसरे शब्दों में संकट का मुख्य कारण भारत में जल के उपयोग की क्षमता का काफी कम होना हैं | भारत में वर्षा से प्रतिवर्ष औसतन 4,000 अरब घन मीटर जल  प्राप्त होता है। लेकिन भंडारण प्रक्रिया की कमी, पर्याप्त बुनियादी ढांचे की कमी, अनुचित जल प्रबंधन के कारण वास्तव में केवल 18-20% जल का ही समुचित उपयोग किया जाता है जबकि कुल वर्षा जल के 5 प्रतिशत से भी कम जल का संरक्षण कर पाते हैं। शेष जल बहकर बर्बाद हो जाता है | जलप्रबंधन के लिए अब तक कोई क्रांतिकारी प्रयास नहीं किए जाने की मुख्य वजह यह रही है कि खनिज संसाधनों की तरह जल के उपयोग और योगदान को सकल घरेलू उत्पाद में जोड़ा नहीं जाता है |
जल प्रबंधन का सरल सिद्धांत यह है कि पानी जहां गिरता है,  उसे आगे बढ़ने से रोकना है| धरती पर गिरने वाले वर्षा जल की प्रत्येक बूंद को रोका जा सकता है। लेकिन जल निकायों को रिचार्ज करने में असफलता और अनियंत्रित शहरीकरण से जहाँ जल खपत में अनियंत्रित वृद्धि हुई है और उत्सर्जित जल के परिवहन, शोधन एवं निस्तारण करने वाले ढाँचें की अपर्याप्तता से संकट विकराल होता गया है, वहीँ पारम्परिक जल संग्रहण संरचनाओं की उपेक्षा एवं उनकी जलग्रहण क्षमता में कमी के कारण भी हमारी जल-प्रबंधन की प्रक्रिया बाधित हुई है| यही नहीं, असमान बंटवारे और पानी के अवैध इस्तेमाल ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है| मानसून के दौरान दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े नगर हर साल भारी जल जमाव से थम जाते है, लेकिन अभी तक उस पानी को संगृहीत एवं शोधन करके उपयोग में लाने का आधारभूत ढांचा विकसित नहीं हो पाया है|
भारत में जल की अधिक माँग वाली फसलों-धान, गेहूं, गन्ना और कपास- की खेती, नहरों से जल आपूर्ति की अनियमितता के साथ-साथ ही जलस्रोतों पर माफियाओं के कब्जे आदि ने सिंचाई के लिये भूजल पर निर्भरता बढ़ा दी है| यदि भूमिगत जल के दोहन की मौजूदा गति बनी रहती है, तो भारत में 2050 में वर्तमान में उपलब्ध प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी का 22% ही उपलब्ध होगा और संभवतः देश पानी आयात करने के लिए मजबूर हो जाएगा। दूसरी ओर नहरों और जलाशयों के जरिये सतह और वर्षा जल का उपयोग करने के लिए पर्याप्त निवेश नहीं किया गया है। नहरों से खेतों तक पहुँचते-पहुँचते लगभग 70 प्रतिशत जल के रिसाव के साथ ही किसानों द्वारा खेतों में आवश्यकता से अधिक पानी भर लेने की प्रवृति से बर्बादी बढ़ती गई है |

कृषि सिंचाई के लिए फव्वारा सिंचाई प्रणाली, ड्रिप-इरीगेशन या टपक सिंचाई पद्धति को विस्तार देने के लिए जिस भारी निवेश की जरूरत है, उससे सरकारें अभी तक बचती रही है | इस विधि के उपयोग द्वारा जल की 30 से 75 प्रतिशत तक बचत की जा सकती है। पानी की हर एक बूंद से अधिक उत्पादन (पर ड्राप मोर क्रॉप) की प्रक्रिया तभी सफलीभूत हो सकती है जब सिंचाई के ढाँचे में आमूल बदलाव किया जाय | शहरों के सीवेज के साथ ही अधिक जल उपयोग वाले उद्योगों को, जो जल उपयोग करने और प्रदूषण रोकने हेतु मानकों का पालन नही करते हैं, जल स्रोतों के रिचार्ज से लेकर इस्तेमाल किए गए जल के शोधन और निस्तारण के लिए बाध्य किया जाना चाहिए| सिंगापुर में 20 फीसदी पेय जल गंदे नालों के पानी को नवीनतम अतिसूक्ष्म फिल्टरों द्वारा शुद्ध बनाकर प्राप्त किया जाता है। चीन कृषि और औद्योगिक कार्यों के लिए नए सोनेके उत्पादन और सरंक्षण को लेकर काफी गंभीर है। पिछले एक दशक मे अमेरिकी मोटर कं फोर्ड मोटर्स ने जीवन-शक्ति पानी के इस्तेमाल को कम करने के लिए वर्ष के प्रत्येक दिन को जल दिवस घोषित कर दिया था । इस प्रकार जल के समुचित प्रबंधन से आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ मानव विकास और विभिन्न क्षेत्रों में पानी के उपयोग के स्तर भी सुनिश्चित होता है|