Thursday, 31 January 2019

सांस्कृतिक उपनिवेशवाद और विषैला वामपंथ


औपनिवेशिकता एक देश का दूसरे देश पर अधिकार करना मात्र नहीं है, और यह महज राजनीतिक विचारधारा भी नहीं है| यह एक सांस्कृतिक वर्चस्व की लड़ाई है | यह एक खेल भी है जिसमें खेल का मैदान लोगों का मानस है | इस खेल में वामपंथी माहिर हैं, चाहे वे कहीं के भी हों-भारत के हों या पश्चिम के| वैसे भारत के वामपंथी पश्चिमी वामियों के तलुए चाटुकार हैं| कहने का मतलब इतना ही है कि भारत के वामपंथी पश्चिम के वामियों के बौद्धिक उपनिवेश हैं | खेल के नियम भी उन्ही के बनाए हुए है | नया नियम है कि किसी देश की भौगोलिक और संवैधानिक संप्रभुता पर कब्जा न करके वहाँ के लोगों के मन-मस्तिष्क पर कब्जा करना है | जिन अंग्रेजो ने भारत पर राजनीतिक अधिपत्य स्थापित किया था, वह वामपंथी अंग्रेज नहीं था बल्कि पूंजीवादी अंग्रेज था | लेकिन जब से देशों की भौगोलिक इकाई पर कब्ज़ा करके उसकी संप्रभुता को हस्तगत करने का खेल समाप्त हो गया, तब यही पूंजीवादी अंग्रेज वामपंथ का दामन थाम लिया और इस तरह से पूंजीवादी-वामपंथ जैसा एक अत्यंत ही खतरनाक समीकरण बन गया| इसका यह मतलब नहीं कि वामपंथ का दामन पाक साफ था| यह खतरनाक समीकरण इसलिए बना क्योंकि दोनों एक दूसरे के पूरक थे| इन्होने जो नया खेल शुरू किया वह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का खेल है| इस खेल में कथित शोषण और दमन के नाम पर फूट डालने और लोगों को लड़ाने पर, गृहयुद्ध भड़काने पर और अपनी कठपुतली सरकार बनाने पर कोई रोक नहीं है | इनका एक ही उद्देश्य था कि दुनिया के लोगों को अपने जैसा सोचने, समझने और आचरण करने पर विवश करना, भले ये ऊपर से सांस्कृतिक बहुलता और विविधता के संरक्षण का ढोल पिटते रहे हों | वे व्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तियों के बीच समानता के नाम पर समलैंगिकता को गौरवान्वित करते है और चाहते है ही नहीं बल्कि आपको भी मजबूर करते है कि आप भी अपने बच्चों के लिए इसे स्वीकार करें| यदि वे अपनी दमित भावनाओं को 'किस ऑफ़ लव' और 'फ्री सेक्स' कहते है तो वे चाहते है कि आप भी इसे प्रेम की अभिव्यक्ति की आजादी माने | स्वतंत्रता और समानता के नाम पर अगर वह अपने माँ-बाप और बड़ों का सम्मान नहीं करता है, अनैतिक और उच्श्रृंखल बर्ताव करता है तो आपको भी इसे ही मुक्ति का मार्ग मानने के लिए विवश किया है | अगर उन्हें परिवार संस्था एवं उसके मूल्यों पर भरोसा नहीं है तो आपको भी विश्वास दिलाता है कि पारिवारिक दायरों में आपके बच्चों का दम घुट रहा है | अगर वह बिना बाप का है तो आपके देश को भी पितृहीन पीढ़ी बनने को विवश कर रहा है| अगर उन्होंने राम और कृष्ण को एवं रामायण और महाभारत को काल्पनिक घोषित कर दिया तो हम भी उसे काल्पनिक मानकर अपनी ही संस्कृति और परम्पराओं से घृणास्पद दूरी बना लेते हैं | उन्होंने कहा कि 400 वर्ष ईसा पूर्व अयोध्या का कोई अस्तित्व नहीं था, लेकिन यह सवाल खड़ा करने कि तब ईसा का कहाँ अस्तित्व था, आपने मान लिया कि अयोध्या का कोई अस्तित्व नहीं था| उन्होंने कहा कि आर्य बाहर से आये थे तो आपने मान लिया लेकिन जयशंकर प्रसाद जैसे कवि कहते रह गए कि हम कही से नहीं आये थे, हमारा मूल यही है तो यह आपके मन-मस्तिष्क को झंकृत नहीं कर पाया | वामपंथियों ने अंग्रेजियत को आधुनिकता का पर्याय घोषित किया तो हमने कान्वेंट स्कूलों के कुकुरमुत्तों का जंगल खड़ा कर दिया, जहाँ से जिस गुलाम मानसिकता की पौध तैयार हो रही है जिन्हें अपनी गौरवशाली प्राचीन संस्कृति के बारे में कुछ पता ही नहीं होता।

उनके लिए पूरी सृष्टि भोग की वस्तु है-चाहे वह इंसान ही क्यों न हो, फिर कुत्ते, बिल्ली, भेड़ गाय की क्या बिसात है| उनके लिए ईसा मसीह धर्मनिरपेक्ष है इसलिए वे (और आप भी ) क्रिसमस बड़े शान से मनाते है, लेकिन उनकी नजर में यदि पीपल को जल देना ढोंग है तो आप पीपल को काट देने में ही अपना शान समझते हो| यदि वे गोमांस भक्षण को आधुनिकता कहते है तो आप गाय के बछड़े का सर काटकर सड़क पर खुलेआम प्रदर्शन करते है| कहने का तात्पर्य यह है उनकी पाशविक परभक्षी प्रवृति आपको केवल सदियों से आपके जीवन और समाज का आधार रहे जंतुओं की हत्या करने और उनके भक्षण को गौरवान्वित करने पर विवश नहीं करती है बल्कि उसे अपने ही अन्य साथी मनुष्यों, प्रकृति और सभ्यता-संस्कृति की हत्या करने को भी प्रेरित करती है| इस काम के लिए वे बहुत बारीकी से मीडिया का इस्तेमाल करते है, जिनमें उनकी मानसिकता के गुलाम लोग उनके मोहरे होते है| ये वो मोहरे है जो झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सदियों से विद्यालयों और गुरुकुलों में होते आ रहे देश प्रार्थना, योग व्यायाम विशेषकर सूर्य नमस्कार तथा बाद में वन्देमातरम हटाने के लिए अभियान चलाते रहे है |
सांस्कृतिक उपनिवेशवाद और विषैले वामपंथ के कुचक्र ने भारतीय समाज, संस्कृति और इतिहास में काफी ज़हर बोया है और कथित धर्मनिरपेक्षता और विकृत आधुनिकता के नाम पर कटुता एवं झूठ को बढ़ावा दिया| यह जल्लादों का वह गिरोह है जो अपने विरोधी विचार वालों के साथ धोखाधड़ी करने, उन्हें साम्प्रदायिकघोषित करने, राष्ट्र के गौरवशाली प्रतीकों और पन्नों को विकृत करने के लिए संवैधानिक, शैक्षणिक संस्थाओं और मीडिया का इस्तेमाल चाकू के रूप में करता रहा है |



Wednesday, 16 January 2019

गठबंधन का गड़बड़झाला

घटना आज से 21 साल पहले 2 जून 1995 की है, लखनऊ के गेस्टहाउस में वर्तमान बसपा प्रमुख के साथ जो हुआ वह राजनीति की निर्ममता का एक उदाहरण मात्र था | दरअसल, 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा गठबंधन की जीत हुई और मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे | लेकिन कांसीराम और मायावती की अतिशय महत्वाकांक्षाओं के कारण 2 जून, 1995 को बसपा ने सरकार से किनारा क लिया और समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। इसी दिन दैनिक जागरण में मुलायम सिंह यादव का इसी गेस्टहाउस में तत्कालीन बसपा प्रमुख कांसीराम और मायावती के समक्ष अपना कान पकड़े हुए एक फोटो छपा था, जिसे देखकर मुलायम सिंह के समर्थकों का खून खौल गया। मुलायम सिंह का इशारा पाकर उनके समर्थक गुंडों ने 2 जून , 1995 की सुबह ही गेस्ट हाऊस में ठहरीं मायावती पर हमला बोल दिया। उस समय कांसीराम तत्कालीन सरकार से समर्थन वापसी का फैसला लेकर लखनऊ से दिल्ली चले गए थे | मुलायम के समर्थक गुंडों ने मायावती के कपड़े पूरी तरह से फाड़ दिए थे और मायावती के साथ न जाने क्या करने वाले थे | उत्तर प्रदेश के डीजीपी से लेकर लखनऊ के तत्कालीन एसएसपी तक सभी इस घटना को जानते हुए भी ख़ामोश थे । लेकिन तभी उसी गेस्टहाउस में ठहरे हुए संघ के स्वंयसेवक और यूपी बीजेपी के महामंत्री और विधायक स्वर्गीय ब्रह्मदत्त द्विवेदी संकटमोचक के रूप में सामने आये और अपनी जान की परवाह किए बिना मायावती को उनके कमरे में बंद कर सपा के गुंडों से अकेले लोहा लिया | इस प्रयास में उनका सिर फट गया था लेकिन उन्होंने मायावती की जान और इज्जत दोनों को सकुशल बचाया था और उन्हें अपना कुर्ता पहनने को दिया था | अंत में पुलिस की मदद से गेस्टहाउस का दरवाजा तोड़कर मायावती को सकुशल बाहर निकाल लाये थे। अजय बोस ने अपनी किताब बहनजीमें गेस्टहाउस में उस दिन मायावती के साथ घटी घटना की अहम जानकारी दी है |
लोकसभा चुनाव 2019 में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने 25 वर्ष पहले की कड़वाहट को किनारे कर(भुलाकर कहना उचित नहीं होगा) फिर से गठबंधन किया हैं। 25 साल पहले जब हाथ मिलाया था वह दौर मंडल और कमंडल का था। एक ओर मंडल की पुरजोर हिमायत और दूसरी ओर राम मंदिर आन्दोलन विरोधी अपने रुख के सहारे मुलायम सिंह यादव उत्तरप्रदेश में न केवल ओबीसी के बड़े नेता बन गए थे बल्कि मुस्लिम मतदाताओं को भी अपने पाले में कर लिया था | सामाजिक न्याय की उम्मीदों को उभारकर कांशीराम भी दलित जातियों के नेता बनकर उभरे थे। परिणामस्वरूप बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी भाजपा विधानसभा चुनाव हार गई | लेकिन 1995 की गेस्टहाउस घटना ने यादव और दलितों के बीच एक ऐसी गहरी खाई पैदा की, जो भले ही मौजूदा गठबंधन में पाटी जाती दिखाई दे रही है लेकिन जमीनी धरातल पर भी पाट दी जाएगी, यह तो चुनाव के परिणाम ही बताएँगे | 
दरअसल मौजूदा भाजपा नेतृत्व ने देश की सियासत के सारे परंपरागत समीकरणों को उलट-पलट कर रख दिया है। भाजपा ने 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में अपना जनाधार बढाने के लिए गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को अपने साथ मिलाने में कामयाब रही । दूसरी ओर न सपा ने यादवों और मुस्लिमों की और न बसपा ने जाटवों की पार्टी होने के आरोप से मुक्त होने कभी कोशिश की | नतीजा इनके सामने है कि इनका जनाधार इस कदर सिकुड़ता गया है कि ये अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए दशकों तक एक-दूसरे के लिए अछूत रहने के बावजूद आज बेमेल गठबंधन बनाने के लिए मजबूर हुए है | अब महज जातीय समीकरणों की राजनीति करने वाली इन दोनों पार्टियों के गठबंधन की जनता के बीच स्वीकार्यता कितनी होती है यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा | लेकिन इनके मजबूर गठबंधन के पीछे का सच यही है कि यादवों, मुस्लिमों और जाटवों को फिर से एक-मुश्त वोट बैंक के रूप में परिणत किया जाय | जाहिर है इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक है | इस गठबंधन से गैर यादव ओबीसी, जो अब सपा का पिछलग्गू नहीं रहा, और गैर जाटव, जो अब बसपा से दूर हो चुका है, के बीच यही सन्देश जाता है कि इसमें उनके हितों कि कोई कोई सुनवाई नहीं होने वाली है | यही नहीं, अलग-अलग दोनों दलों की सरकारों के दौरान भ्रष्टाचार, अनियमितता, अपराधियों को संरक्षण देने और विकास कार्यों की जो अनदेखी हुई है, उसकी स्मृतियाँ अभी भी जनता के जेहन में बरकरार है | इसके अतिरिक्त अखिलेश सरकार के दौरान दलितों पर अत्याचार और मायावती सरकार के कार्यकाल में यादवों को निशाना बनाया जाने की कड़वे  अनुभवों के कारण दोनों दलों के वोट बैंक के एक-दूसरे को ट्रांसफर होने को लेकर भी दोनों दल संशय में है | कुल मिलाकर इस गठबंधन में अभी बहुत गांठ है ।
इस बेमेल गठबंधन के पीछे कोई सकारात्मक उद्देश्य नहीं है, बल्कि यह 'मोदी रोको अभियान' की नकारात्मक सियासत है | इनका मानना है कि यदि उत्तरप्रदेश में भाजपा को रोक दिया जाय तो केंद्र में उसे सत्ता में आने से रोका जा सकता है | लेकिन इस गठबंधन से कांग्रेस को दूर रखने की नीति इसके संकीर्ण सोच को ही उजागर करती है और और उनकी मंशा को ही कमजोर करती है क्योंकि चुनाव में इनकी जीत के बाद भी राष्ट्रीय राजनीति में इनकी सकारात्मक भूमिका नजर नहीं आती है|

Monday, 10 December 2018

हिंदुत्व सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना है, राजनीतिक केंचुल नहीं


कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा हालिया विधानसभा चुनावी अभियानों के दौरान जिस तरह से मंदिर दौड़ लगायी जा रही है, हिन्दू दिखाने के लिए खुद को जनेऊधारी हिंदू और शिवभक्त तक बताने से लेकर कई स्थानों पर तो मंच पर जाकर 11 कन्याओं से तिलक और इतने ही ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन, शंख ध्वनि करवा रहे है, जिससे मीडिया से लेकर आम जनों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में उनकी या उनकी पार्टी की सोच में बदलाव आया है ? उनकी पार्टी कांग्रेस ने हिन्दू प्रतीकों से जुड़े मुद्दों पर अचानक ही ताबड़तोड़ घोषणाएं करने लगी है | मध्यप्रदेश और राजस्थान में गोशालाओं के निर्माण का आश्वासन दे रही है। मध्य प्रदेश में राम वनगमन मार्ग के विकास की घोषणा कर चुकी है। उसने राजस्थान के चुनाव घोषणा पत्र में वेदों के अध्ययन का बोर्ड बनाने और संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने की घोषणा की है। गोशालाओं के लिए सब्सिडी बढ़ाने का वादा भी किया है। कांग्रेस की देखादेखी ममता बनर्जी भी हिंदू दिखने की कोशिश में लगी है | सपा के अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में अंकोरवाट जैसा विष्णु मंदिर बनाने की बात कह चुके हैं।
राहुल गांधी के हिन्दू होने और उनकी कांग्रेस पार्टी के ब्राह्मण डीएनए वाली पार्टी बनने के पीछे के कारणों का खुलासा करते हुए उनके महान बुद्धिजीवी सांसद शशि थरूर ने स्वीकार किया है कि "कांग्रेस को ऐसा करने के लिए बीजेपी ने 'मजबूर' किया है। बीजेपी ने 'सच्चे हिंदू और नास्तिक धर्मनिरपेक्ष' के बीच अंतर दिखाने की यह 'लड़ाई' छेड़ी है|" उनका तर्क है कि "लंबे समय से हमें (कांग्रेस) लगता रहा है कि सार्वजनिक तौर पर अपनी निजी भावनाओं को व्यक्त क्यों करें। हम अपनी आस्था को फॉलो करते हैं लेकिन कभी उसे सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित करने के लिए बाध्य नहीं हुए। ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस नेहरू के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत वाली पार्टी है जिसकी जड़े स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन से जुड़ी हैं।" अब शशि थरूर ने जितना कहा उतना सच है, लेकिन सच के उस बड़े हिस्से को दबा दिया कि जिसके चलते आखिर हिन्दू होने और उसके हितों की तरफदारी करनी पड़ रही है |
यह सही है कि प्रत्येक व्यक्ति की किसी-न-किसी धर्म या संप्रदाय में आस्था होती है और उसे अपनी आस्था या धार्मिक भावना का सार्वजनिक प्रदर्शन करना आवश्यक नहीं होता है | किन्तु समस्या तब होती है जब आपके आचरण, नीतियाँ और वक्तव्य किसी व्यक्ति या समुदाय की धार्मिक आस्था को लगातार हेय व घृणित साबित करते है, उपहास करते है और अपमानित करते है | भाजपा को छोड़कर भले ही कांग्रेस और अन्य दल अपनी आस्था या धार्मिक भावना का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करते हो, एक धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था में ऐसा ही होना चाहिए, किन्तु वोट बैंक के लिए अन्य धर्मों के हितों और मान्यताओं के प्रति सुनियोजित रूप से अतिशय सार्वजनिक पक्षपात का प्रदर्शन कर, जो एक धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था में नहीं होना चाहिए, बहुसंख्‍यकों की भावनाओं को चोट पहुंचाने का कार्य भी इन्ही दलों द्वारा किया गया|
आजादी के पहले भारतीय मूल्यों और परंपराओं के प्रति आदर भाव रखने वाली कांग्रेस में आज़ादी के बाद तुष्टिकरण की सियासत इस कदर शिकार हुई कि वह भूल गई कि सर्वधर्म समभाव भारत की मूल प्रकृति है | उसे यह एहसास नहीं रहा कि सर्वधर्म समभाव ही धर्मनिरपेक्षता का मूल आधार है | यहाँ तक कि धर्मनिरपेक्षता को भी तुष्टिकरण का पर्याय बना डाला | आज़ादी के बाद सोमनाथ मंदिर के नवीनीकरण और पुर्नर्स्‍थापना के कार्य से खुद को अलग करने से लेकर इस देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का पहला हक़ घोषित करने और 2008 के मुंबई हमले को हिन्दू आतंकवाद की साजिश ठहराने तक कांग्रेस ने तुष्टिकरण का जिस तरह से सार्वजानिक प्रदर्शन किया, उससे बहुसंख्यकों की भावनाएं लगातार आहत हुई | मंदिरों में बलात्कार होते हैं (संदर्भ कठुआ), हिंदू पुजारी बलात्कारी होते हैं, लेकिन मदरसों का मौलवी सत्य और अहिंसा का पुतला होता है, चर्चो का पादरी बलात्कार कर ही नहीं सकता, हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्र बनाए जा सकते है, मंदिर के कलश को कंडोम से सुशोभित किया जा सकता है, मस्जिद की मीनारों को नहीं।  बहुसंख्यकों के हितों और हिंदुत्व की बात करने वालों को सांप्रदायिक और फासिस्ट भी कहा जाने लगा| यहाँ तक कि गर्व से हिंदू कहना भी सांप्रदायिक माना गया था। जबकि धर्म और मजहब के नाम पर उन्माद पैदा करने वाले और अपनी धार्मिक अस्मिता का दूसरों को चोट पहुँचाने तक प्रदर्शन करने को धार्मिक स्वतंत्रता का दर्जा दिया गया | इस तरह की नैरेटिव-बिल्डिंग के खेल में कांग्रेस अगुआ रही है और इसके लिए मीडिया से लेकर और बुद्धिजीवियों तक का इस्तेमाल किया गया | कांग्रेस की इस छद्म धर्मनिरपेक्षता की नीति का असर दूसरी राजनीतिक पार्टियों पर भी पड़ा | राजनीतिक पार्टियों ने जहाँ मुस्लिम वोट बैंक को आकर्षित करने के लिए हिन्दू हितों से दूरी बना ली वहीँ मीडिया और बुद्धिजीवियों ने हिंदू विरोधी रवैया अपनाकर भारतीय परंपराओं और मूल्यों की अनदेखी करने लगी | धर्मनिरपेक्षता के ऐसे रहनुमा अनवरत चीख-चीखकर हिंदुत्व को राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा घोषित करते रहे है | इसी का परिणाम यह हुआ है कि ये सभी कथित सेकुलर दलों का जनाधार सिकुड़ता जा रहा और हाशिये पर जाने से बचने के लिए स्वयं को हिंदू सिद्ध करने की प्रतिस्पर्धा में लगे हुए है |
महात्मा गांधी ने एक बार कहा था हिंदुत्व छोड़ना असंभव है क्योंकि हिंदुत्व के कारण ही मैं ईसाइयत, इस्लाम और अन्य धर्मों से प्रेम करता हूं।" तात्पर्य है कि हिंदुत्व में ही वह क्षमता, साहस और सहिष्णुता है कि वह अन्य धर्मों को समभाव रूप से स्वीकार करता है | गांधी जी की चेतावनी थी कि हिंदुत्व छोड़ देने पर कुछ भी नहीं बचेगा। आज़ादी के बाद कांग्रेस ने गांधीवाद को तो त्यागा ही, साथ ही हिंदुत्व छोड़ दिया। आज  कांग्रेस अपने अस्तित्व को बचने के लिए उसी हिंदुत्व का दामन थामने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है |
कांग्रेस या अन्य राजनीतिक दल स्वयं को हिंदूवादी दिखाने को लेकर कितने गंभीर है,  इसका अनुमान ही इस बात से लगाया जा सकता है कि जो स्वयं को ब्राह्मण की तुलना में पारसी को कमतर मानते है ऐसी भेद-बुद्धि वालों से हिंदुत्ववादी होने की उम्मीद नहीं की जा सकती है | जिस भाजपा की हिंदुत्व पैरोकारी से विवश होकर आज कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी स्वयं को हिंदू सिद्ध करने के लिए अपनी जाति और गोत्र की हास्यास्पद घोषणा कर रहे हैं, उसके किसी भी नेता को स्वयं के जाति और गोत्र की घोषणा कभी नहीं करनी पड़ी | अगर राहुल गाँधी हिंदुत्व को सही अर्थों में समझे होते तो उन्हें आज हिन्दू होने और जाति और गोत्र का प्रदर्शन करने की जरुरत नहीं पड़ती |
अब नैरेटिव बदल गया है | हिंदुत्व की धुर विरोधी रही पार्टियाँ की हिंदू हितैषी होने की छटपटाहट से पता चलता है कि हिंदुत्व राजनीति की मूल धुरी बन गई है। अब कोई भी हिंदुओं या हिंदुत्व को सांप्रदायिकता जैसी गाली देने से बच रहा है | लेकिन इनका पूरी तरह से ह्रदय परिवर्तन हो गया है, ऐसा बिल्कुल नहीं माना जा सकता है | ये अभी हिंदुत्व विरोध का केंचुल उतारने में लगे हैं | इनका विष अभी समाप्त नहीं हुआ है | उन्हें अभी इस कसौटी पर खरा उतरना शेष है कि क्या वे भारत को एक सनातन संस्कृति पर आधारित राष्ट्र मानते हैं या नहीं ?  हिंदुत्व की मूल अवधारणा सांस्कृतिक है, राजनीतिक नहीं । हिंदुत्व की स्वीकृति इस धरातल पर संभव है, अन्यथा हिंदू हितैषी होने का प्रदर्शन वैसा ही होगा जैसे पोशाक के ऊपर धारण किया गया जनेऊ | इसी संदर्भ में यह कहना प्रासंगिक होगा कि लोकतंत्र और हिंदू सनातन परंपरा में बहुत समानता है। लोकतंत्र ऐसे लोगों को भी रहने-जीने-बोलने-संगठित होने का अधिकार दे देता है, जिनका लोकतंत्र में भरोसा ही नहीं हो। हिंदू सनातन परंपरा भी इसी तरह उदार है। आप हमारे भगवान को नहीं मानते, इस या उस भगवान को मानते हैं तो आप अपना अलग उपासना-स्थल बना लीजिए। आप अपना अलग पंथ बना लीजिए। अपने पंथ का प्रचार भी कर लीजिए। हिंदुत्व ने सभी को समभाव से स्वीकार किया है| तात्पर्य है कि हिंदुत्व का सार समझे और जाने बिना केवल मंदिर जाने या फिर पूजा-पाठ करने और चुनावी घोषणाओं में गोशालाओं के निर्माण की घोषणा मात्र से उन भारतीय परंपराओं और मूल्यों से स्वयं को एकाकार नहीं कर सकते है जिसका मूल तत्व वसुधैव कुटुंबकमहै, सर्व-धर्म समभाव है और जो राष्ट्रीयता को धर्म, जाति और नस्ल से परे होकर देखता है | अत: हिंदू होने का ढ़ोल पीटने वाले ये सभी दल जब तक भारतीय संस्कृति, सनातन संस्कृति, से पूरी तरह से जुड़ नहीं पाते हैं, तबतक यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि हिंदुत्व विरोध के नख-दंत से ये विहीन हो चुके है |  


रेगिस्तानीकरण की ओर बिहार


एक समय था जब बिहार के गांवों में बच्चे काल्पनिक नदी के पानी की थाह लगाने वाला खेल-घोघो रानी कितना पानी, कितना पानी-का खेल खेला करते थे। यह खेल अब भी खेलते है लेकिन अब इसके खेल के अवसर कम हो गए हैं क्योंकि तब बिहार में बरसात खूब हुआ करती थी। पिछले कुछ वर्षों से बिहार में मानसूनी बारिश लगातार कम होती जा रही है जिसके कारण बिहार की धरती पानी के एक-एक बूँद के लिए मोहताज होती जा रही है। बिहार के गांवों के पारंपरिक जलस्रोत कुओं-तालाबों धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे है | हिमालय से निकलकर बिहार से गुजरने वाली नदियाँ भी पानी के लिए तरसने लगी है | एक ओर बारिश की कमी एवं सतही जल को रोककर रखने की व्यवस्था के अभाव और दूसरी ओर बढ़ती आबादी के लिए पानी की मांग, कृषि कार्य के लिए भूमिगत जलस्रोतों के अतिशय दोहन, और भूमिगत जल के प्रदूषित होते जाने के कारण पानी का संकट विकराल होता जा रहा है|
इस वर्ष मानसूनी सीजन में एक तो देर से (जुलाई में) बारिश शुरू हुई, दूसरे सीजन की समाप्ति (सितम्बर के अंत में) तक सामान्य से 40-85 फीसदी तक कम बारिश हुई है| कई जिलों बारिश की यह कमी 70-75 फीसदी रही है | इसे देखते हुए बिहार के आपदा प्रबंधन विभाग ने हाल ही में राज्य के 23 प्रभावित जिलों के 206 प्रखण्डों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। बारिश कम होने से नहरों से भी पानी गायब हो गया | कई जिलों में किसानों ने अपनी धान की फसलों को बचाने के लिए बोरिंग चलाकर भूमिगत जल का इस कदर दोहन किया कि कई इलाकों में कुओं का जल स्तर काफी नीचे चला गया और कहीं-कहीं तो चापाकलों से पानी निकलना भी बंद हो गया है | शोध पत्रिका करंट साइंस के ताजा अध्ययन के अनुसार बिहार के कई जिलों में भूमिगत जल स्तर की स्थिति पिछले 30 सालों में चिंताजनक हो गई है | कुछ जिलों में भूजल स्तर दो से तीन मीटर तक गिर गया है| पिछले 25-30 वर्षों में सतही जल के समुचित उपयोग और इसे रोककर रखने की व्यवस्था के अभाव के अभाव और नहर-तंत्र के पूरी तरह से ध्वस्त हो जाने के कारण लोग यहां सिंचाई के लिए पूरी तरह भूमिगत जल पर आश्रित हो गए हैं| पहले जहाँ दस से लेकर तीस फीट नीचे ही भूजल मिल जाता था, वही अब सौ से डेढ़ सौ फीट नीचे पानी मिलता है। अब स्थिति यह है कि बोरिंग के पानी के बिना रबी की बुवाई शायद ही हो सके। अब यदि जाड़े के दौरान होने वाली बारिश भी दगा दे जाती है तो रबी फसलों की क्या दशा होगी, जबकि नहरों में पानी की उपलब्धता नहीं होने से किसानों को भूमिगत जल के दोहन के सिवा कोई विकल्प नहीं होगा, जो पहले से ही अतिशय दोहन और रिचार्ज के अभाव में संकट ग्रस्त हो गया है | फिर अगले वर्ष में मानसून के आने के पहले गर्मी के दिनों में पानी को लेकर होने वाले संकट की गंभीरता काफी भयावह है | बिहार की अधिकांश आबादी के लिए भूजल ही पेयजल का एकमात्र बारहमासी स्रोत है। ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी के रूप में 85 प्रतिशत भूजल का इस्तेमाल होता है | भूमिगत जल का प्रदूषित होना एक अलग समस्या है |
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार बिहार में हर साल लगभग 1200  मिलीमीटर बारिश होती है| बिहार के उत्तरी इलाकों से होकर हिमालय की कई नदियां निकलती हैं | लेकिन अब तक बारिश से पानी की पर्याप्त उपलब्धता की वजह से इस क्षेत्र में भूजल के पुनर्भरण को नजरअंदाज किया जाता रहा है। एक ओर कृषि क्षेत्र के दायरे में लगभग 950 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई है तो दूसरी ओर जल निकायों का क्षेत्र 2029 वर्ग किलोमीटर से सिमटकर 1539 वर्ग किलोमीटर रह गया है| एक अनुमान के अनुसार 2050 तक बिहार में पानी की मांग 145 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) रहेगी। 105 बीसीएम पानी कृषि कार्य के लिए जरूरी होगा, जबकि 40 बीसीएम गैर कृषि कार्य के लिए। इसकी तुलना में बारिश के बाद सतह जल की उपलब्धता 132  बीसीएम है। मांग और उपलब्धता में इस अंतर को पाटने के लिए भूमिगत जल के दोहन में बढ़ोतरी होगी और अंततः संकट भी बढ़ेगा |
बिहार में बारिश के बाद सतह के जल को रोककर रखने को लेकर कतिपय प्रयासों को छोड़कर न तो जागरूकता है और न व्यवस्था है। बिहार सरकार के जल प्रबंधन की दशा और दिशा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है है कि बारिश के इस पानी को प्रभावकारी ढंग से रोककर जलाशय में रखने की क्षमता एक बिलियन क्यूबिक मीटर से भी कम है। नदियों और जलाशयों में तेजी से बढ़ते गाद के कारण उनकी जल धारण क्षमता कम हुई है, जिससे बारिश का पानी जल्दी बाढ़ का रूप लेकर तेजी से बह जाता है | नीति आयोग द्वारा तैयार किए गए समग्र जल प्रबंधन के सूचकांक के आधार पर जल प्रबंधन, जल संचयन के क्षेत्र में गुजरात का स्थान प्रथम है | इसके बाद मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र का स्थान है|
बिहार सरकार को परम्परागत जल निकायों-तालाबों, कुंडों, जोहड़ आदि-को पुनर्जीवित करने की दिशा में तेजी से अभियान शुरू किया जाना चाहिए | गाँव स्तर पर सरकारी स्कूललों, मदरसों, निजी स्कूरलों, आंगनबाडियों, स्वालस्य्य   केंद्रों, थानों और प्रखंड कार्यालयों में सोक पिट (सोख्ता) के निर्माण द्वारा जल संरक्षण का प्रयास किया जा सकता है | इस दिशा में राजस्थान सरकार द्वारा केवल 2 वर्ष पहले शुरू की गई जल स्वालंबन योजना को बेहतर तरीके से लागू किया गया है, जिसके कारण बिहार की तुलना कम नदियों और कम मानसूनी बारिश वाले इस राज्य के कई इलाकों के भूमिगत जल स्तर लगभग 4-66 फुट बढ़ा है | राज्य के 33 में से 21 जिलों के भूजल में बढ़ोतरी यह रेगिस्तानी राज्य जल संरक्षण और संचय की अद्भुत मिसाल बन गया है |


Monday, 26 November 2018

साम्प्रदायिकता के खिलाफ मानव संघर्ष के रचनाकार


साम्प्रदायिकता आधुनिक भारतीय समाज की एक गंभीर परिघटना है। भीष्म साहनी हिंदी के उन रचनाकारों में से हैं जिनकी रचनाओं में साम्प्रदायिकता जैसे सामाजिक समस्याओं की असलियत को पहचानने और उससे संघर्ष करने की कोशिश लगातार बनी रहती है। अंग्रेजों ने अपनी सता को बनाए रखने हेतु हिन्दू व मुसलमानों में फूट डालने के लिए दोनों सम्प्रदायों के हितों की टकराहट को हवा दी, जिसकी परिणति भारत विभाजन, भीषण सांप्रदायिक दंगे और लाखों लोगों के निर्मम विस्थापन के रूप में हुई | भीष्म साहनी स्वयं इस अनचाही और जबरन थोपी गई विभीषिका के गवाह रहे है जिन्हें अपना रावलपिंडी छोड़कर दिल्ली आना पड़ा था | उन दृश्यों ने न केवल साहनी की ज़िंदगी को प्रभावित किया बल्कि उनके साहित्य सृजन पर भी उसका गहरा असर दिखता है | विडंबना यह है कि आजादी के बाद हमारे देश के राजनीतिक दलों ने कभी वोट बैंक की राजनीति या कभी तुष्टिकरण के द्वारा इसका घृणित उपयोग करना जारी रखा हैं। ऐसी स्थिति में साम्प्रदायिकता पर भीष्म साहनी द्वारा कलम का चलाया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है और वे साम्प्रदायिकता और सांप्रदायिक मानस की अचूक पहचान करने में समर्थ रचनाकार साबित हुए है | इसी तथ्य को लक्षित करते हुए हिन्दी के प्रतिष्ठित समीक्षक और आलोचक नामवर सिंह का मानना है कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी भीष्म साहनी की तुलना किसी अन्य लेखक से नहीं की जा सकती|
साम्प्रदायिकता और विभाजन की विभीषिका को लेकर हिंदी-उर्दू में अनेकों रचनायें हुई हैं|  सबकी अपनी विशिष्टता है|  लेकिन भीष्म साहनी जैसा सूक्ष्म रेखांकन और व्यापक प्रभाव वाली रचनायें अत्यल्प है| इसकी सबसे बड़ी वजह साम्प्रदायिकता के कारणों और उसके वीभत्स प्रभाव को महज देखा ही नहीं बल्कि स्वयं उसके दंश को उन्होंने झेला है| खूनी साम्प्रदायिक दंगे, शरणार्थियों के काफ़िले, विस्थापन की समस्या और घृणा का जहर किसी न किसी रूप में उनकी चेतना को कचोटता रहा है | इसलिए उनकी रचनाएँ साम्प्रदायिकता का सिर्फ़ निषेध नहीं करतीं,  बल्कि उनके कारणों की तह तक जाती हैं और उस साजिश की भी पहचान करती हैं जिसे राजनीति और धर्म की जुगलबंदी अंजाम देती हैं और साम्प्रदायिकता की सच्चाई को बेनकाब करती है| ‘अमृतसर आ गया है’, पाली’, जैसी कहानियाँ, ‘तमस’ जैसा उपन्यास और ‘आलमगीर’, मुआवजे’, हानूश और ‘कबीरा खड़ा बाजार में’ जैसे नाटक में किसी भी प्रकार के पक्षपात तथा पूर्वाग्रह से दूर हटकर भीष्म साहनी ने दंगा एवं साम्प्रदायिकता की असलियत को बेनकाब किया है| वे एक ऐसे साहित्यकार हैं जो समस्या को मात्र कह कर नहीं छोड़ देते बल्कि उसकी सच्चाई का पर्दाफाश करना भी अपनी जिम्मेदारी समझते हैं|  
तमसका आधार भीष्म साहनी के जीवन के कुछ सच्चे अनुभव है | 'तमस' की कथा परिधि में अप्रैल 1947 के समय के रावलपिंडी को परिवेश के रूप में लिया गया है। काल-विस्तार की दृष्टि से 'तमस'  की केवल पाँच दिनों की कथा में सांप्रदायिकता के विभिन्न प्रसंग, संदर्भ और पहलू जिस तरह से उदघाटित होते जाते हैं, उससे यह पांच दिवस की कथा न होकर बीसवीं सदी के हिंदुस्तान के लगभग सौ वर्षो की कथा हो जाती है। भीष्म साहनी ने आजादी के समय देश विभाजन की त्रासदी के साथ साम्प्रदायिक दंगों की विभीषिका को आधार बनाकर इस समस्या का सूक्ष्म विश्लेषण किया है और उन मनोवृत्तियों को उघाड़कर सामने रखा है जिसका शिकार निर्दोष और गरीब लोग, जो न हिन्दू हैं, न मुसलमान बल्कि सिर्फ इन्सान हैं, हुए है| तमसमें साहनी ने साम्प्रदायिकता के साये तले राष्ट्रीय कांग्रेस की समझौतापरस्त नीति को रेखांकित करने की कोशिश की है। उस समय कांग्रेस ने साम्प्रदायिकता से संघर्ष करने के बजाय समझौता करने की जो नीति अपनायी, बाद के वर्षों में भी वहीँ उसका चरित्र बन गया | तमसका जनरैल हिन्दुस्तान की एकता एवं अखंड़ता को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता है, और साम्प्रदायिकता के लिए अन्य कारणों सहित कांग्रेस को भी जिम्मेदार ठहराता है |
यह सच है कि अंग्रेजों की ‘फूट डालो, शासन करो’ भारत में साम्प्रदायिकता की मूल जड़ है| लेकिन इस जड़ के भारत से उखड़ जाने के बाद भी साम्प्रदायिकता का अंत नहीं होता बल्कि यह भारतीय समाज का अंग बन जाता है| ‘तमस’ में साहनी उन कारकों की ओर भी संकेत करते है जिसके कारण साम्प्रदायिकता भारतीय समाज और सियासत की त्रासदी बन जाती है | भारतीय समाज में साम्प्रदायिकता धर्म के प्रति नकारात्मक सोच की देन है जो यह स्थापित करती है कि विभिन्न धर्मों, सम्प्रदायों या मजहब के आर्थिक और सामाजिक हित एक समान नहीं होते है| ‘तमस’ में साहनी ने दंगा के कारणों में सामाजिक-आर्थिक कारण को ही अहम माना है | मस्जिद के सामने सूअर मरवाकर रखनेवाला कोई हिन्दू नहीं बल्कि वह मुसलमान है | जब अमन कमेटी बनाकर सांप्रदायिक हिंसा ख़तम करने की अपीलें की जाती हैं तो वही आदमी अमन के नारे लगाता मिलता है जिसने दंगा शुरू करवाया था। इससे प्रमाणित होता है कि दंगा का कारण धर्म नहीं है बल्कि धर्म तो हाथी के सिर्फ दो दिखावटी दांत की तरह है| कट्टर या साम्प्रदायिक व्यक्ति की शत्रुता दूसरे धर्म के कट्टर और साम्प्रदायिक व्यक्ति से नहीं होती बल्कि अपने ही धर्म को मानने वाले उदार व्यक्ति और सच्चे धार्मिक से होती है। साम्प्रदायिकता का धर्म से गहरा ताल्लुक होते हुए भी धर्म उसकी उत्पति का कारण नहीं है। किसी समाज में विभिन्न धर्मों के होने मात्र से ही साम्प्रदायिकता पैदा नहीं होती| ‘तमस’ में साहनी का संकेत है कि साम्प्रदायिकता की असली वजह भौतिक स्वार्थ है जिससे धर्म का कोई लेना देना नहीं होता है और साम्प्रदायिक लोग अपने भौतिक स्वार्थों जैसे राजनीति, सत्ता, व्यापार आदि के लिए समाज में उन्माद और नफ़रत फैलाते है| असल में साम्प्रदायिकता राजनैतिक और आर्थिक हितों से जुड़ा हुआ है। साम्प्रदायिकता को फैलाने वाले स्वार्थी लोग इतने चालाकी से इस काम को करते हैं कि उन स्वार्थी-साम्प्रदायिक लोगों के भौतिक स्वार्थ लोगों को अपने आध्यात्मिक हित नजर आएं और वे इसके लिए धर्म का सहारा लेते हैं। भीष्म साहनी बताते हैं कि दंगे कभी स्वत: स्फूर्त कभी नहीं होते बल्कि संस्थाओं द्वारा प्रायोजित होते है |
पूरे उपन्यास में भीष्म साहनी स्वयं को सामान्य जनता के स्तर पर रखकर लेखन किया है | आम जनता चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, चाहे वह गाँव की है शहर की, चैन की जिंदगी जीना चाहती है। लेकिन सांप्रदायिक वैमनस्य की आग किस प्रकार सामान्य मनुष्य को पूर्णतः जला डालती है, ‘तमस’ में इसका सटिक चित्रण हुआ है | गांव के सारे लोग चाहे वे किसी भी जाति या सम्प्रदाय के क्यों न हों, आपस में सहानुभूति तथा प्रेम के साथ जीना चाहते हैं। लेकिन परिस्थितियों के दबाव में उनके आपसी स्नेह सूत्र टूटते-विखरते चले जाते हैं | हर व्यक्ति चाहे वह हिन्दू हो मुसलमान अपना घर छोड़ते यही सोच रहा था कि वह इसे सदा के लिए थोड़े ही छोड़ रहा है। जाहिर है, आम जनता साम्प्रदायिक नहीं होती शांति चाहती है।
साहनी द्वारा दंगा के कारणों में सामाजिक-आर्थिक कारकों को महत्वपूर्ण माने जाने और उनके वामपंथी रूझान को देखते हुए कुछ विचारकों ने तमसको मार्क्सवाद से जोड़कर देखने की जरूरत पर जोर दिया है| उनका मानना है कि ‘तमस’ में वर्ग संघर्ष है।  आदमी को कत्ल करने से ज्यादा मकानों को लूटा जाता है। यह सब वैसे लोग करते हैं जिनका एकमात्र उद्येश्य लोगों को लूटना होता है। स्पष्ट है, साम्प्रदायिकता धर्म और सम्प्रदाय का नहीं आर्थिक हितों का सवाल है। वामपंथी विचारधारा से प्रभावित होने के कारण भीष्म साहनी द्वारा साम्प्रदायिकता के मूल में केवल आर्थिक कारकों का निहित मानना स्वाभाविक है| वे साम्प्रदायिकता समस्या की जटिलता से अनभिज्ञ नहीं थे और उन्होंने साम्प्रदायिकता के बहाने देश की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक कुरूपताओं को प्रखरता से उजागर किया है| किन्तु वे शायद यह देखने में चूक कर जाते है कि जब राष्ट्रवादी शक्तियां कमजोर पड़ती हैं तो साम्प्रदायिक शक्तियां स्वयं को राष्ट्रवादी घोषित करके उनका स्थान लेने की कोशिश करती हैं और कई बार कामयाब भी हो जाती हैं। वामपंथी सिद्धांतों के अंतर्गत विकास की प्रक्रिया को आर्थिक हितों का टकराव से देखने की कोशिश की जाती है | साम्प्रदायिकता सामाजिक और आर्थिक विकास की प्रक्रिया नहीं है| इसके बरक्स जिन राष्ट्रों ने धर्म को सर्वोच्चता प्रदान की है, वह आर्थिक हितों के टकराव का अधिक शिकार हुआ है, परिणामतः आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन से अभिशप्त होता गया है| वर्तमान समय में देश के विभिन्न हिस्सों में नक्सलवाद के विस्तार के मूल में उन इलाकों के आर्थिक पिछड़ेपन को माना जाता रहा है | लेकिन सच्चाई है कि सरकारें जब उन इलाकों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए आधारभूत संरचना (बिजली, सड़क, स्कूल, हॉस्पिटल और मोबाइल टावर आदि) स्थापित करने की कोशिश करती है तो नक्सली उन प्रतिष्ठानों को नष्ट कर देते है | तात्पर्य है कि सब कुछ आर्थिक कारण नहीं होता है | वास्तव में साम्प्रदायिक शक्तियां संस्कृति और धर्म के तत्वों को आपस में घालमेल करती है और धर्म को संस्कृति से श्रेष्ठ या ऊपर मानती है जबकि धर्म संस्कृति का एक अंश मात्र है| ‘तमस’ में  भीष्म साहनी संस्कृति और धर्म को एक दूसरे के पर्याय के तौर पर प्रयोग करके भ्रम पैदा करने की कोशिश के साथ ही साम्प्रदायिकता के कारण संस्कृति के खंडित होने पर नजर तो रखते है लेकिन साम्प्रदायिकता के उत्स में केवल आर्थिक कारकों को मान लेना उनके वैचारिक आग्रह को ही दर्शाता है | इसके उलट इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है साम्प्रदायिकता की मानसिकता के उभार के साथ ही आर्थिक हितों के टकराव भी प्रबल होता जाता है| अर्थात् यह उतना ही सच है कि साम्प्रदायिकता अपने पीछे आर्थिक हितों के टकराव को लेकर आती है |  
तमस’ में आज़ादी से कुछ पहले और कुछ बाद की साम्प्रदायिकता केंद्र में है | लेकिन भीष्म साहनी ने आज़ादी के वर्षों बाद भारतीय समाज और राजनीति में स्थायी तौर अपना स्थान सुरक्षित कर चुकी साम्प्रदायिकता का भी पर्दाफाश किया है | आलमगीरनाटक में भीष्म साहनी ने मुगल सम्राट औरंगजेब के माध्यम से वर्तमान भारतीय राजनीति के साम्प्रदायिक चरित्र को पहचानने की कोशिश की है। यह एक साथ सत्ता और व्यक्ति के कट्टर होने पर उसकी पतन की अनिवार्य नियति को दर्शाता है। औरंगजेब और दारा शिकोह धार्मिक कट्टरता और उदारता के प्रतिनिधि हैं। वे मात्र दो व्यक्तित्व नहीं, बल्कि दो जीवन-दृष्टियाँ हैं। औरंगजेब संस्थागत धर्म का प्रतिनिधित्व करता है। साम्प्रदायिक-उन्मादी शक्तियां संस्थागत धर्म को अपनाती हैं| इस्लाम के मूल्यों से उसका वास्ता नहीं है| इस्लाम और अल्लाह उसकी राजनीतिक स्वार्थ और पैतरेबाजी का हिस्सा है, वह अपने हर अमानवीय कृत्य को खुदा के नाम पर वैध ठहराता है। साम्प्रदायिक-उन्मादी शक्तियां संस्थागत धर्म को अपनाती हैं तथा धर्म के मानवीय पहलुओं से उसका कोई सरोकार नहीं होता। दीन का शासन स्थापित करने की बात की जाति है, लेकिन इस्लाम के मूल्यों से उसका वास्ता नहीं होता । औरगंजेब के लिए रिश्ते-नाते, इंसानियत या मानवीय संवेदनाओं का कोई मूल्य नहीं है|  वह भारतीय इतिहास का एक ऐसा पात्र है जो भारत की बहुलतावादी संस्कृति पर कठिन प्रहार करते हुए धार्मिक असहिष्णुता की सारी सीमाओं को पार कर जाता है।

भीष्म साहनी मुआवजेऔर कबीरा खड़ा बाजार मेंभी साम्प्रदायिकता की समस्या से टकराते हैं। कबिरा खड़ा बजार मेंकबीर की आध्यात्मिक ऊँचाई एवं समर्थ कवि व्यक्तित्व के बरक्स उनके समकालीन राजसत्ता एवं समाजसत्ता के उस अविवेकी, दुराग्रही, अहंग्रस्त एवं असहिष्णु स्वरूप को उजागर करते है समाज में साम्प्रदायिक विभेद को पोषित और सिंचित करते रहते हैं | यही नहीं साहनी ने कबीर के क्रान्तिदर्शी सामाजिक पक्ष के बरक्स तत्कालीन समय और समाज ही नहीं बल्कि अपने भी समय समाज की चेतना, द्वन्द्व एवं विद्रूप को अभिव्यक्त कर दिया है । कबीर के बहाने भीष्म साहनी ने सत्ता के विरुद्ध विशेष रुप से धार्मिक सत्ता, धर्म के आडम्बर, ढोंग, धर्म के नाम पर ठगी, सबका विरोध किया। वे कबीर की बातों के माध्यम से जनता तक सन्देश पहुंचाते है कि मजहबइंसानों के बीच का आपसी सद्भाव नष्ट कर रहे हैं। कबीर के साथ समाज जुड़ जाता है और इसलिए उनकी आवाज़ समूह की, समाज की आवाज़ बन जाती है। यह नाटक इसी युग चेतना की प्रस्तुति है|
 मुआवज़ेनाटक  का तानाबाना स्वातन्त्र्योत्तर भारत में साम्प्रदायिक दंगे भड़कने की आशंका के बीच राजनीति, प्रशासन, आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न वर्ग, अपराधी और नागरिक समाज किस प्रकार इस तनावपूर्ण स्थिति का सामना करते हैं, इसी यथार्थ को आधार बनाकर बुना गया है । यहाँ तमस की ही वेदना का विस्तार नाटक ‘मुआवजे’ में होता है जिसमें सियासती तिकड़मों पर करारा व्यंग्य है और साथ ही उसके साये में मानवता की कराहटें शिद्दत से उभरती हैं| विभाजन का दंश झेलने वाले भीष्म साहनी ने जिस स्वतंत्र एवं समरसतापूर्ण भारतीय समाज की कल्पना की थी, वह आज़ाद भारत के बाद भी पूरी होती नहीं दिखी | इस नाटक की घटनाएँ दंगे के बाद मिलने वाले मुआवज़े के चारों तरफ घूमती हैं और इसी के साथ नेताओं, अफसरों, व्यापारियों, दलालों, अपराधियों और जनता की बदलती मनोवृत्ति की भी गहराई से पड़ताल करती है जो छोटेछोटे स्वार्थों के लिए तरहतरह की चालाकियाँ बुनती रहती है । यह वह वर्ग है जिसे दंगा होने का इंतजार रहता है | दरअसल दंगा एक ऐसा अवसर है जिसमें राजनीति को चमकाने, चुनाव में उसकी फसल काटने, कालाबाजारी करने और लूटखसोट करने का सुनहरा मौका मिलता है| इसलिए राजनीतिक दल और नेता से लेकर सरकारी अधिकारी, दलाल, व्यापारी और गुण्डे तक सभी एक दूसरे का भरपूर सहयोग करते है| मुआवज़ेके पहले दृश्य में कमिश्नर को टेलीफोन पर निर्देश देते दिखाया गया है । वह कह रहा है कि -अगर हालात इसी तरह बिगड़ते गये तो सोमवार तक दंगा हो जाना चाहिए––––‘अबकी बार दंगा ज़बर्दस्त होगा.........उम्मीद है, सोमवार तक दंगा हो जाएगा| यानी, दंगा कराने की योजना पहले से बना ली गयी है जिसमें मन्त्री, अफसर, व्यापारी और गुण्डे सही शामिल हैं| सेठ को अपनी फैक्टरी से जुड़ी सरकारी जमीन पर कब्जा करना है जो अफसरों तथा गुण्डों के सहयोग के बिना नहीं हो सकता है। इसके लिए उसे दंगे का शिद्दत से इंतजार है और उसे भी पक्का यकीन है कि दंगा होकर रहेगा। यही नहीं, दंगा होने से पहले ही मुआवज़ा देने की तैयारी कर ली गयी है, ताकि मुआवजे के नाम पर लूटखसोट का बंदर-बाँट किया जा सके | यह इक्कीसवीं सदी के भारत के लोकतान्त्रिक समाज एवं व्यवस्था का ज्वलन्त सच है जो भीष्म साहनी की सर्जनात्मक दृष्टि में रचबस कर अपनी पूरी विद्रूपता के साथ अभिव्यक्त हुआ है ।
साम्प्रदायिकता व्यक्ति के मन-मस्तिष्क को किस प्रकार प्रभावित करती है कि एक परिवेश में जिस व्यक्ति में भय होता है वही भय परिवेश बदलते ही हिंसा में परिणत हो जाता है | भीष्म साहनी अमृतसर आ गयाजैसी कहानी के आधार पर आम आदमी की मानसिकता पर साम्प्रदायिकता के कब्जा करते जाने और उसकी वीभत्स परिणति का मार्मिक चित्रण करते है | अमृतसर आ गया में गाड़ी जब हिन्दू बहुल इलाके में प्रवेश करती है तो दुबले बाबू का भयातुर चेहरा क्रूर हो जाता है| कहानी में वजीराबाद एक प्रतीक है मुस्लिम बहुल इलाके और साम्प्रदायिक सोच का और अमृतसर एक दूसरा प्रतीक है हिंदू बहुल इलाके और साम्प्रदायिक सोच का | इन दोनों धरातलों पर साम्प्रदायिक सोच का स्तर अलग-अलग होता है | साम्प्रदायिक सोच का एक स्तर तब देखने को मिलता है जब गाड़ी वजीराबाद रेलवे स्टेशन से निकलती है और पठानों की अन्तश्चेतना में हिंदू-मुस्लिम दंगों के दौरान विकसित तनाव मौजूद है और इसीलिए वे एक ओर दुबले बाबू का उपहास करते हैं। उसे दाल पीने वाला कहते हैं और दूसरी गरीब हिंदू औरत की छाती पर लात मारकर संतोष महसूस करते हैं। कहानी में दूसरा स्तर तब देखने को मिलता है जब गाड़ी हरबंसपुरा से निकलकर अमृतसर की ओर जाती है जो हिंदू और सिक्ख बहुल शहर है और जहाँ दुबला बाबू साम्प्रदायिक उन्माद से ग्रस्त हो जाता है और अंतत: उसका क्रूर चेहरा सामने आता है। दरअसल अमृतसर आते ही दुबले बाबू में अचानक ऊर्जा और शक्ति का आ जाना हमारी सामूहिक सोच और सामाजिक स्थितियों का द्योतक है। साम्प्रदायिकता का जहर सामूहिक शक्ति बनकर हमारी चेतना का नाश करता है और मनुष्य को विवेकहीन बनाता है। हत्या करके दुबले बाबू का मुस्कराना साम्प्रदायिक वीभत्सता को और अधिक बढ़ाता है। साम्प्रदायिक मानसिकता का जितना गहरा और सूक्ष्म चित्रण भीष्म जी की कहानियों में देखने को मिलता है उतना शायद किसी अन्य कथाकार की कहानियों में नहीं।  
पाली’, ‘माता विमाताऔर वांग्चूजैसी कहानियाँ भी सभी प्रकार की कट्टरता के खिलाफ मानवीय मूल्यों को स्थापित करती हैं। उन्हें साम्प्रदायिकता एक बड़ी समस्या लगती है क्योंकि इसके कारण हमारा समाज विखरता जा रहा है जिसे समाप्त किए बिना कोई भी देश और समाज प्रगति की राह पर बढ़ नहीं सकता है | पालीमें परस्पर विरोधी साम्प्रदायिक मानसिकता के कारण एक बच्चे की मन:स्थिति का बड़ा सूक्ष्म और मार्मिक अंकन किया गया है| सांप्रदायिक मानसिकता का चित्रण करते समय भीष्म जी उन स्थितियों व कारणों का उल्लेख नहीं करते जिनके कारण ऐसी मानसिकता बनी बल्कि उस मानसिकता की विद्रूपता का संकेत करते हैं और बताते हैं कि यह मानसिकता किस तरह पूरे समाज के लिए घातक है। माता विमाता मातृभूमि के विभाजन के बहाने माँओं के भी बंट जाने की मर्मस्पर्शी कहानी है |
आज फिर हमारे समाज में सांप्रदायिक ताकते बहुत तेजी से सक्रिय हो गर्इ हैं। सांप्रदायिक सोच हमारे सामने एक विकराल रूप में आज भी है। असहिष्णुता, असंवेदनशीलता और संकीर्णता हमारे समय और समाज में फिर से व्याप्त हो रहे हैं। वर्तमान समय में तमाम मीडिया समूह जिस तरह से घटनाओं और ख़बरों को जाति, धर्म, संप्रदाय और मजहब के खांचों में बांटकर परोसते है, लगातार परोसते है उससे आम आदमी की मानसिकता का प्रभावित होना स्वाभाविक है | कुछ मीडिया समूह ही नहीं बल्कि कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और महत्वाकांक्षी मुसलमान नेता तो किसी संप्रदाय विशेष की घटनाओं को लेकर इतने सेलेक्टिव हो जाते है कि संप्रदाय विशेष के किसी भी सदस्य के साथ होने वाली मारपीट को भी वे सांप्रदायिक फसाद के रूप में परोस देते है जो मनुष्यता के प्रति जघन्य अपराध है | यही नहीं, आज सोशल मीडिया की भूमिका कम खतरनाक नहीं है, जहाँ एक सोची समझी साज़िश के तहत साम्प्रदायिक विचारों का प्रसार किया जा रहा है | भीष्म साहनी की यह रचनाएँ हमें ताकीद करती है कि मौजूदा समय में देश की सामासिक संस्कृति को बचाए रखने के लिए ऐसी साम्प्रदायिक मानसिकता के प्रवाह को रोकने की जरुरत है |
समग्रता में देखें तो भीष्म साहनी एक जिम्मेदार रचनाकार रहे हैं | इसलिए मानव की समस्त श्रेष्ठ और उज्जवल संस्कृति को धूमिल करने वाली धार्मिक कट्टरताओं, संकीर्ण धार्मिक दृष्टियों, क्रूर साम्प्रदायिकता और विकृत परम्पराओं एवं रुढियों जैसे समाज और देश प्रतिरोधी तत्वों का पर्दाफाश करना अपना कर्तव्य मानते रहे है | साम्प्रदायिकता जिस तरह से आज हमारे समाज और राजनीति ही नहीं बल्कि मानसिकता में घुसपैठ कर गई है और आज हमारे आसपास जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं वे भीष्म साहनी जैसे रचनाकार को और प्रासंगिक बना देती हैं|