Thursday, 30 January 2025

कुंभ मेला त्रासदी: संवेदनशीलता का वक्त, राजनीति स्वार्थ का नहीं

 कुंभ मेला भारतीय संस्कृति और आस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सामूहिक एकता और मानवता के प्रतीक के रूप में भी प्रसिद्ध है। तीर्थराज प्रयाग के पवित्र संगम में लाखों श्रद्धालु पवित्र गंगा में स्नान कर अपने पापों से मुक्ति की कामना करते हैं। लेकिन इस वर्ष के कुंभ मेले में एक दुखद घटना घटित हुई, जिसमें लगभग 30 लोगों की मृत्यु और कई लोग घायल हो गए। उन परिवारों के लिए यह हृदयविदारक क्षण है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया। यह त्रासदी केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी गहरे घाव छोड़ जाती हैं, जो कभी नहीं भर सकते।

यह दुर्घटना वाकई बहुत ही दुःखद है, और इसने हम सभी को गहरे आघात पहुँचाया है। जिन श्रद्धालुओं ने अपनी जान गंवाई, उनके परिवारों के प्रति हमारी गहरी संवेदनाएँ और सहानुभूति हैं। इस कठिन समय में हमें उनके साथ खड़ा होना चाहिए और हर संभव मदद प्रदान करनी चाहिए। यह घटना अपूरणीय क्षति है, लेकिन हम उनकी आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनके परिजनों को इस दुख को सहने की शक्ति मिले। ईश्वर उन दिवंगत आत्माओं को शांति दे और उनके परिवारों को इस मुश्किल घड़ी में संबल प्रदान करें।

इस त्रासदी से कहीं अधिक दुखद और शर्मनाक यह है कि कुछ राजनीतिज्ञ इस दर्दनाक घटना का राजनीतिक लाभ उठाने में लगे हुए हैं। वे वीआईपी सुविधाओं का लाभ उठाकर कुंभ स्नान में भाग लेते हैं और उसके बाद अब इस दुर्घटना पर बयानबाजी कर रहे हैं, ताकि अपनी राजनीति चमका सकें। यह व्यवहार न केवल उनकी संवेदनहीनता को उजागर करता है, बल्कि उनके स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण को भी सामने लाता है। वे इस हादसे पर अपनी टिप्पणियाँ और बयान देकर यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वे ही सबसे बड़े हमदर्द हैं, लेकिन असल में उनका एकमात्र उद्देश्य अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस दुखद घटना को इस्तेमाल करना है। यह न केवल पीड़ित परिवारों के लिए पीड़ादायक है, बल्कि यह पूरे देश की संवेदनाओं का अपमान भी है।

 




इन नेताओं के लिए कुंभ मेला अब एक धार्मिक पर्व या जनसेवा का अवसर नहीं, बल्कि बस एक फोटो खिंचवाने का मंच बनकर रह गया है। उनके बयान न केवल पीड़ितों के परिवारों के लिए अत्यंत पीड़ादायक हैं, बल्कि ये पूरे देश की संवेदनाओं और मानवीय भावनाओं का घोर अपमान भी करते हैं। क्या इन नेताओं को यह नहीं समझ में आता कि उनके शब्दों से उन परिवारों का दर्द और बढ़ जाता है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया? क्या उन्हें यह अहसास नहीं कि इस समय हमें केवल वास्तविक मदद की जरूरत है, न कि दिखावे और राजनीति का? यह भी समझना चाहिए कि राजनीति को इस प्रकार के दुखद अवसरों पर अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना समाज के लिए खतरनाक हो सकता है।

इस समय, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम मानवता की रक्षा करें और एकजुट होकर उन लोगों की मदद करें जो संकट में हैं। राजनीति की जगह, हमें पीड़ितों के साथ खड़ा होना चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए। यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि एकजुट होकर पीड़ितों के साथ खड़े होने और उन्हें सहायता पहुंचाने का है।

कुंभ मेला हमारी सांस्कृतिक धरोहर और सामूहिकता का प्रतीक है, जो सदियों से एक साथ आने, तात्त्विक चिंतन और सामाजिक मेलजोल का अवसर रहा है। इसे धार्मिक विश्वासों से परे, एक संस्कृति और परंपरा के रूप में देखा जाता है। जब इसे राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाया जाता है, तो इससे न सिर्फ इसका आध्यात्मिक महत्व कम होता है, बल्कि समाज का विश्वास भी कमजोर पड़ता है। नेताओं को यह समझना चाहिए कि राजनीति की अपनी जगह है, लेकिन जब वह इस तरह के पवित्र और सांस्कृतिक आयोजनों को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते हैं, तो इससे उनके प्रति लोगों का विश्वास घटता है। ऐसे आयोजनों को अपने वास्तविक उद्देश्य के लिए ही संरक्षित और सम्मानित किया जाना चाहिए।

इस तरह की घटनाओं से हमें न केवल प्रशासनिक सुधारों की जरूरत है| यह बहुत दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोग ऐसे धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजनों को किसी नकारात्मक दृष्टिकोण से देखते हैं। जो लोग ऐसे समय में जहर फैलाने की कोशिश करते हैं, उनका काम सिर्फ नफरत और विभाजन फैलाना होता है। खासकर कुछ दलाल मीडिया कर्मी, छिछोरे रीलबाज और यूट्यूबर,  जो केवल सनसनी फैलाने और अपने फायदे के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं। इस तरह के लोग न केवल पीड़ितों और उनके परिवारों के दुख को नकारते हैं, बल्कि समाज की संवेदनाओं से भी खिलवाड़ करते हैं। यह समय न तो विवादों और झूठे आंकड़ों के लिए है, बल्कि यह समय संवेदनशीलता, सहानुभूति और मानवता के साथ खड़े होने का है। ऐसे लोग जो इस दुख की घड़ी में भी अपना स्वार्थ देख रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि उनके शब्द और क्रियाएं केवल समाज में और अधिक घबराहट और विभाजन पैदा करेंगी। ऐसे लोग समाज में आग में घी डालने का काम करते हैं, लेकिन हमें अपनी आस्था और विश्वास पर कायम रहना चाहिए और उनकी बातों से विचलित नहीं होना चाहिए। यही सबसे उपयुक्त और सच्ची श्रद्धांजलि होगी उन लोगों के प्रति जिन्होंने इस त्रासदी का सामना किया।

Wednesday, 27 November 2024

भारत की शास्त्रीय भाषाएँ


प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने को मंजूरी दे दी है। शास्त्रीय भाषाएँ भारत की गहन और प्राचीन सांस्कृतिक विरासत के संरक्षक के रूप में काम करती हैं, जो प्रत्येक समुदाय के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मील के पत्थर पत्थरों को संजोए रखती हैं। 

भारत उन अनूठे देशों में से एक है जहाँ भाषाओं की विविधता की समृद्ध विरासत है। बहुभाषावाद भारत में जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा है, क्योंकि देश के विभिन्न हिस्सों में लोग जन्म से ही एक से अधिक भाषाएँ बोलते हैं और अपने जीवनकाल में अतिरिक्त भाषाएँ भी सीखते हैं। यह विविधता न केवल सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि समाज में आपसी संवाद और समझ को भी बढ़ावा देती है।

 शास्त्रीय भाषाओं का महत्व

·         भारत की शास्त्रीय भाषाएँ न केवल देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, बल्कि वे प्राचीन बौद्धिक और साहित्यिक परंपराओं का भी परिचायक हैं।

·         भारत की शास्त्रीय भाषाएँ (Classical Languages in india in Hindi) भारत के प्राचीन अतीत के लिए एक खिड़की के रूप में काम करती हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करती हैं।

·         शास्त्रीय भाषाओं में लिखे गए ग्रंथों और धर्मग्रंथों के विशाल भंडार में अमूल्य ज्ञान, वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि और दार्शनिक विचार शामिल हैं। जो देश की ऐतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक परंपराओं के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।

·         वे क्षेत्रीय पहचान के अभिन्न अंग हैं, क्षेत्रीय गौरव और निरंतरता की भावना को बढ़ावा देते हैं।

·         इन शास्त्रीय भाषाओं का महत्व केवल संचार तक सीमित नहीं है; वे सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने, बौद्धिक विकास को बढ़ावा देने और सामाजिक एकता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनका अध्ययन और प्रचार भारत की विविध पहचान को समझने में मदद करता है और वैश्विक सभ्यता में इसकी सार्थक योगदान को बढ़ावा देता है।

 

भारत सरकार ने 12 अक्टूबर 2004 को तमिल को शास्त्रीय भाषा घोषित करते हुए "शास्त्रीय भाषाओं" के रूप में भाषाओं की एक नई श्रेणी बनाने का निर्णय लिया और शास्त्रीय भाषा की स्थिति के लिए कुछ मानदंड निर्धारित किए| इन मानदंडों के आधार पर शास्त्रीय भाषा की स्थिति के लिए प्रस्तावित भाषाओं की जांच करने के लिए नवंबर 2004 में साहित्य अकादमी के तहत संस्कृति मंत्रालय द्वारा एक भाषाई विशेषज्ञ समिति (एलईसी) का गठन किया गया ।

 I. 1500-2000 वर्षों की अवधि में इसके प्रारंभिक ग्रंथों/अभिलिखित इतिहास की उच्च प्राचीनता।

2. प्राचीन साहित्य/ग्रंथों का एक संग्रह, जिसे वक्ताओं की पीढ़ियों द्वारा एक मूल्यवान विरासत माना जाता है।

3. साहित्यिक परंपरा मौलिक होनी चाहिए और किसी अन्य भाषण समुदाय से उधार नहीं ली जानी चाहिए।

4. शास्त्रीय भाषा और साहित्य आधुनिक से भिन्न होने के कारण, शास्त्रीय भाषा और उसके बाद के रूपों या उसकी शाखाओं के बीच एक विसंगति से भी उत्पन्न हो सकता है।

इन मानदंडों के आधार पर तमिल के अलावा संस्कृत( 2005), तेलुगु( 2008), कन्नड़( 2008), मलयालम(2013 और ओड़िया( 2014)

इन भाषाओं को शास्त्रीय भाषाओं के रूप में मान्यता केवल मानद नहीं है; यह उन्हें उनके संरक्षण और संवर्धन के लिए एक विशेष दर्जा और समर्थन प्रदान करता है। यह भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत में उनके योगदान को स्वीकार करता है।

भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने से लाभ

·         भाषाओं को शास्त्रीय भाषा के रूप में शामिल करने से विशेष रूप से शैक्षणिक और अनुसंधान क्षेत्रों में रोजगार के महत्वपूर्ण अवसर पैदा होंगे।

·         इसके अतिरिक्त, इन भाषाओं के प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण, दस्तावेज़ीकरण और डिजिटलीकरण से संग्रह, अनुवाद, प्रकाशन और डिजिटल मीडिया में नौकरियां पैदा होंगी।

·         शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करने से कम ज्ञात भाषाओं और बोलियों को पुनर्जीवित करने और संरक्षित करने के प्रयासों का समर्थन किया जा सकता है

·         इन ग्रंथों का अध्ययन और व्याख्या करके, विद्वान और शोधकर्ता प्राचीन ज्ञान को खोल सकते हैं और चिकित्सा, खगोल विज्ञान, गणित और आध्यात्मिकता जैसे विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

·         शास्त्रीय भाषाओं को समझने से भाषाई विविधता और बहुभाषावाद को बढ़ावा मिलता है, जो भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए आवश्यक है। बहुभाषावाद न केवल संचार को बढ़ाता है बल्कि सामाजिक बंधनों को भी मजबूत करता है और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देता है।

·         यह लोगों के बीच भाषाई विविधता और सद्भाव की भावना को बढ़ावा देता है।

·         शास्त्रीय भाषाओं को संरक्षित करके, यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि इसकी समृद्ध विरासत भावी पीढ़ियों तक पहुंचे योग्य और समझी जाती रहे।

·         शास्त्रीय भाषाएँ सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करती हैं, क्योंकि दुनिया भर से विद्वान और उत्साही लोग इन भाषाओं का अध्ययन और अन्वेषण करने के लिए आकर्षित होते हैं।

शास्त्रीय भाषाएँ न केवल अपनी प्राचीनता के कारण अद्वितीय हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति के विभिन्न तत्वों पर उनके प्रभाव के कारण भी अद्वितीय हैं। साहित्य, दर्शन, धर्म, कला और विज्ञान पर उनका प्रभाव महत्वपूर्ण रहा है और उन्होंने देश के सांस्कृतिक वातावरण पर अपनी छाप छोड़ी है। प्राचीन ग्रंथों, धर्मग्रंथों और साहित्यिक कृतियों को इन भाषाओं के माध्यम से संरक्षित और प्रचारित किया गया है। उनकी मान्यता और संरक्षण से हमारी विरासत भावी पीढ़ियों तक पहुंचेगी।।

युनूस सरकार ने भारत से लिया पंगा

 बांग्लादेश में ISKCON के संत चिन्मय कृष्ण दास ब्रह्मचारी की गिरफ्तारी के बाद भारत समेत कई जगहों से आलोचना हो रही है। यह गिरफ्तारी बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ते हमलों के बीच हुई है। चिन्मय कृष्ण दास, बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहे थे। उन पर अक्टूबर में चट्टोग्राम में एक रैली में बांग्लादेशी झंडे का अपमान करने का आरोप है। भारत सरकार ने इस गिरफ्तारी पर नाराजगी व्यक्त की है और बांग्लादेश सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही है। विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन घटनाओं के अपराधी अब भी खुलेआम घूम रहे हैं, लेकिन शांतिपूर्ण सभाओं के माध्यम से वैध मांगें उठाने वाले एक धार्मिक नेता के खिलाफ आरोप लगाए गए हैं।

विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया कि अल्पसंख्यकों के घरों और दुकानों आगजनी और लूटपाट के साथ-साथ चोरी, तोड़फोड़ और देवी-देवताओं और मंदिरों को अपवित्र करने के कई मामले हुए हैं जो दर्ज हैं। बयान में कहा गया कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन घटनाओं के अपराधी अब भी खुलेआम घूम रहे हैं, लेकिन शांतिपूर्ण सभाओं के माध्यम से जायज मांगें उठाने वाले एक धार्मिक नेता के खिलाफ आरोप लगाए गए हैं। विदेश मंत्रालय ने दास की गिरफ्तारी के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों पर भी चिंता जतायी। वहीं दूसरी ओर भारतीय विदेश मंत्रालय के बयान पर बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने ढाका में कहा कि यह निराधार है और दोनों देशों के बीच मित्रता की भावना के विपरीत है।

विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने इस कदम को कायरतापूर्ण और अलोकतांत्रिक बताया है। ISKCON ने भारत से कृष्ण दास ब्रह्मचारी की रिहाई के लिए बांग्लादेश से बात करने की अपील की है। ISKCON ने कृष्ण दास के ऊपर लगे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। सद्गुरु और श्री श्री रविशंकर ने भी गिरफ्तारी की आलोचना की है। रविशंकर ने कहा, हम प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस से और अधिक उम्मीद करते हैं, जिन्हें लोगों के लिए शांति और सुरक्षा लाने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला है और इसीलिए उन्हें कार्यवाहक सरकार का मुखिया बनाया गया है। हम उनसे ऐसी कार्रवाई की उम्मीद नहीं करेंगे जिससे समुदायों के बीच और अधिक तनाव और भय पैदा हो।

Wednesday, 16 October 2024

स्पेसएक्स की ऐतिहासिक उड़ान-अंतरिक्ष में नई क्रांति

एलन मस्क के स्टारशिप रॉकेट के ताज़ा परीक्षण की दुनियाभर में चर्चा हो रही है| यह अब तक का सबसे जोखिमभरा परीक्षण था। असल में इस परीक्षण के दौरान स्टारशिप रॉकेट को लॉन्च पैड पर वापस सुरक्षित उतारा गया और एलन मस्क की स्पेसएक्स कंपनी ऐसा कारनामा करने वाली दुनिया की पहली कंपनी बन गई है| इसमें कंपनी ने पहली बार बूस्टर को वापस लॉन्च पैड पर उतारा। यह अंतरिक्ष यात्रा के इतिहास में एक बड़ा कदम है |


इस परीक्षण के बाद तेज़ी से और दोबारा इस्तेमाल करने वाले रॉकेट बनाने की अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना में स्पेसएक्स अहम चरण में पहुंच गया है|

स्पेस एक्सप्लोरेशन के मिशन में सबसे बड़ी समस्या है- हर बार एक नये रॉकेट  या लॉन्च व्हीकल का इस्तेमाल करके सैटेलाइट को स्पेस में भेजना, जो बेहद ही खर्चीला काम है| हर बार का कई सौ या हजारों करोड़ का खर्च होता है| ऐसे में दोबारा उपयोग किए जाने वाले रॉकेट की समस्या अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और सरकारों के लिए सरदर्द बनी हुई थी, जिसे एलन मस्क और उनकी कंपनी ने इस साहसिक परिक्षण के माध्यम से समाधान कर लिया है | स्टारशिप रॉकेट की सबसे महत्वपूर्ण विशिष्टता उसका दोबारा उपयोग किया जाना है|

स्टारशिप दुनिया का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है। यह 121 मीटर लंबा है। इसमें 33 मीथेन इंजन लगे हैं। इस रॉकेट ने टेक्सास के दक्षिणी छोर से सुबह 7:25 बजे उड़ान भरी। उड़ान के लगभग ढाई मिनट बाद, सुपर हैवी बूस्टर स्टारशिप के ऊपरी हिस्से से अलग हो गया। बूस्टर सात मिनट बाद वापस आया। लॉन्च टॉवर पर बूस्टर को सुरक्षित लैंड कराया गया। केवल बूस्टर ही सटीक तरीक़े से नहीं उतरा बल्कि स्पेसएक्स ने यान के हार्डवेयर के कुछ हिस्सों को सुरक्षित बचाने में कामयाबी भी हासिल की, जिसकी उम्मीद नहीं की जा रही थी| इसका मतलब यह है कि यदि कोई रॉकेट पहली बार उड़ान में विफल हो जाता है, तो इसे दोबारा उड़ाया जा सकता है|

इस परीक्षण को स्पेसएक्स के सबसे साहसी और सफल अभियानों में से एक माना जा रहा है। इससे पहले, जून 2024 में स्पेसएक्स ने एक सफल उड़ान भरी थी, जिसमें रॉकेट ने बिना किसी विस्फोट के अपनी यात्रा पूरी की। यह स्टारशिप रॉकेट का पांचवा परीक्षण था, जिसमें कोई बड़ी तकनीकी खामी सामने नहीं आई और यह सफलतापूर्वक अपने मिशन को अंजाम दे सका।

यह रॉकेट 150 टन पेलोड ले जाने की क्षमता रखता है, जो इसे और भी प्रभावी बनाता है। इसके 33 रैप्टर इंजन इसे अब तक का सबसे शक्तिशाली और तेज गति वाला रॉकेट बनाते हैं, जिसकी गति 27,000 किमी/घंटा तक पहुंच सकती है।

बूस्टर के सुरक्षित रूप से वापस आने को स्पेस एक्स के इंजीनियरों ने ऐतिहासिक दिनक़रार दिया है | इस सफलता का अंतरिक्ष यात्रा के भविष्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि यह मिशन की लागत को काफी कम कर सकता है और लगातार लॉन्च की क्षमता को बढ़ा सकता है। लॉन्च पैड पर बूस्टर को सुरक्षित रूप से उतारने से मिशनों की जटिलता में कमी आएगी, जिससे अंतरिक्ष यानों को तेजी से मिशन पर भेजने में मदद मिलेगी। स्टारशिप कार्यक्रम का उद्देश्य चंद्रमा और मंगल ग्रह के मिशन सहित गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण को सुविधाजनक बनाना है, जिससे यह उपलब्धि उन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को साकार करने में एक महत्वपूर्ण कदम बन सके।

यह न केवल एलन मस्क के लिए एक व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक नई संभावनाओं का द्वार भी खोलता है। इस परीक्षण के माध्यम से अब एलन मस्क दुनिया के पहले ट्रिलियनॉयर भी बन जाएंगे| भविष्य में अंतरिक्ष यात्रा को और अधिक आम और सस्ता बनाने के लिए यह तकनीक एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। यह परीक्षण मंगल और अन्य ग्रहों पर भी मानव मिशनों की संभावनाओं को खोलता है। इससे विभिन्न सरकारों और कंपनियों के लिए अंतरिक्ष में अपने मिशनों को आयोजित करना आसान हो जाता है।

कुछ ही सालों में एलन मस्क की स्पेसएक्स दुनिया में सबसे ज्यादा सैटेलाइट  लॉन्च करने वाली कंपनी बन गई है| यह कई ट्रिलियन डॉलर का व्यवसाय है, जिसपर अभी एलन मस्क का एकाधिकार है| भारत का इसरो भी सैटेलाइट  लॉन्च करने की दिशा में काफी पहले ही कदम बढ़ा चुका है, लेकिन इसे काफी दूरी तय करनी है|

Friday, 11 October 2024

अमूल्य रतन ! बहुमूल्य रतन

 

देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में बहुत कारोबारी हुए हैं, और बहुत सारे आगे भी होते रहेंगे, लेकिन रतन टाटा एक ऐसा नाम है जिसने अपने बिजनेस कौशल और दूरदर्शी सोच से भारत के कॉरपोरेट लैंडस्केप को एक ऐसा आयाम दिया, जिसे हिंदुस्तान का कोई भी अन्य उद्योगपति उन्हें देखकर भी नहीं कर पाता है | भारत की वायुसेना ने जब पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक किया था, तब भारत के बिजनेस जगत के एकमात्र रतन टाटा ही थे जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय वायुसेना को बधाई दी और किसी भी सहयोग का वादा भी किया था |

टाटा समूह भरोसे लिए जाना जाता है, जिसके कारोबार का मकसद सिर्फ मुनाफा कमाना ही नहीं होता है, बल्कि लोगो बिश्वास हासिल करना होता है | टाटा ने ही बताया कि ब्रांड का मतलब भरोसा होता हो| भरोसा प्रोडक्ट की क्वालिटी का, जिसके सहारे बुलंदियों पर पहुंचा जा सकता है | आज भले रिलायंस समूह सबसे बड़ा बिजनेस समूह बन गया है लेकिन टाटा जैसा भरोसा हासिल करने के मामले में मीलों पीछे है | हाल ही जब बीएसएनएल में टाटा ने सिर्फ निवेश किया है, तो लोगों को ये लगा कि उसे टाटा ने अधिग्रहण कर लिया है | इसी आधार पूर्वांचल में बड़ी संख्या में लोगों ने अपना नंबर पोर्ट कर बीएसएनएल का सिम ले लिया | यह टाटा पर भरोसा नहीं तो क्या है? रतन टाटा ने टाटा के इस भरोसे को लोगों के प्रति सेवाभाव में बदल दिया | उनकी कोशिश यही रहती थी कि कोई निराश नहीं | उन्होंने व्यवसाय को, उद्योगों को जन-सेवा की भारतीय सनातन परंपरा से जोड़ने की मिसाल कायम की | 

जब भारत में कोविड महामारी फैली, रतन टाटा ने तुरंत 500 करोड़ रुपए टाटा न्यास से और 1000 करोड़ रुपए टाटा कंपनियों के माध्यम से महामारी और लॉकडाउन के आर्थिक परिणामों से निपटने के लिए दिए। इसके अलावा, उन्होंने डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के रहने के लिए अपने लक्ज़री होटलों का उपयोग करने की पेशकश करने वाले पहले व्यक्ति के रूप में भी सामने आए।