Thursday, 24 August 2017

भगवान जगन्नाथ और रथयात्रा : आध्यात्म, संस्कृति और पर्यटन का महा संगम


पुरी के भगवान जगन्नाथ का मंदिर और उनकी रथयात्रा केवल ओड़िशा ही नहीं, बल्कि विश्व के सभी हिन्दू धर्मावलम्बियों के ज़ेहन में रची बसी धार्मिक-सांस्कृतिक शक्ति है | इसकी अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पुरी का जगन्नाथ मन्दिर धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय का अद्भुत उदाहरण है और उनकी रथयात्रा सांस्कृतिक एकता तथा सहज सौहार्द्र की एक महत्वपूर्ण कड़ी  है | इसका कारण भी अत्यंत रोचक है | लोक प्रचलित अनेक कथाओं, विश्वासों और अनुमानों से यह ज्ञात होता है कि भगवान जगन्नाथ विभिन्न धर्मो, मतों और विश्वासों का अद्भुत समन्वय है। जगन्नाथ मन्दिर में पूजा पाठ, दैनिक आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन यहाँ तक तांत्रिकों ने भी प्रभावित किया है। वैसे तो इसे वैष्णव परम्परा का मंदिर माना जाता है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। लेकिन एक कहानी के अनुसार जगन्नाथ की आराधना एक सबर आदिवासीविश्वबसुके द्वारानील माधवके रूप में की जाती रही है | सबर जनजाति के देवता होने की वजह से यहां भगवान जगन्नाथ का रूप कबीलाई देवताओं की तरह है | साक्ष्य स्वरुप आज भी जगन्नाथ पुरी के मंदिर में अनेकों सेवक हैं जो  “दैतपतिनाम से जाने जाते हैं| इन्हें आदिवासी मूल का ही माना जाता है| ऐसी परंपरा किसी अन्य वैष्णव मंदिर में नहीं है| बौद्ध साक्ष्यों में यह भी स्वीकार किया गया है कि पुरी के विश्व प्रसिद्द रथ यात्रा का आयोजन  भी एक बौद्ध परंपरा ही है| बौद्ध परंपरा में गौतम बुद्ध के दन्त अवशेषों को लेकर रथ यात्रा का आयोजन होता था | बौद्ध परंपरा के अनुसार पूर्वी भारत में पुरी बौद्धों की वज्रयान परंपरा का एक बड़ा केंद्र था, जहाँ  “इंद्रभूतिने बौद्ध धर्म केवज्रायनपरंपरा की नीवं डाली थी| इंद्रभूति ने बुद्ध स्वरुप जगन्नाथ की आराधना करते हुए  ही अपने प्रसिद्द ग्रन्थज्ञानसिद्धिकी रचना की थी जिसमें उन्होंने यत्र-तत्र जगन्नाथ का संबोधन गौतम बुद्ध के लिए ही है| भगवान जगन्नाथ के बुद्ध होने का एहसास जन मानस पर बहुत ही गहराई से उतरा  हुआ था| बौद्ध परंपरा के विद्वानों का मत  है कि जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा वास्तव में बौद्ध धर्म केबुद्ध”, “संघऔरधर्म” (धम्म) के परिचायक हैं| १५ से लेकर १७ वीं सदी के मध्य भी ओडिया साहित्य में इसकी अभिव्यक्ति हुई है|

इसलिए यह अकारण नहीं है कि जब आदि शंकराचार्य ने जब बौद्धों के विरुद्ध आध्यात्मिक विजय यात्रा के क्रम में उन्होंने पूरब में पुरी को केंद्र बनाया और बौद्धों की आध्यात्मिक सत्ता को चुनौती देते हुए सनातन धर्म की पुनर्स्थापना सुनिश्चित की और इसे हिन्दुओं के चार धामों में से एक धाम घोषित किया जिसका अन्य तीन धामों की तुलना में विशिष्ट स्थान है | संभवतः इस धार्मिक विजय के स्मरण में ही श्री शंकर एवं पद्मपाद की मूर्तियाँ जगन्नाथ जी के रत्न सिंहासन में स्थापित की गयीं थीं. मंदिर द्वारा  ओडिया में प्रकाशित अभिलेखमदलापंजीसे ज्ञात होता है कि पुरी के राजा दिव्य सिंह देव द्वितीय (१७९३१७९८) के शासन काल में उन दो मूर्तियों को हटा दिया गया था|

एक महत्वपूर्ण तीर्थ के रूप में पुरी (जगन्नाथ पुरी) का उल्लेख सर्वप्रथम महाभारत के वनपर्व में दृष्टिगोचर होता है और इस क्षेत्र की पवित्रता का बखान कूर्म पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, आदि में यथेष्ट रहा है| पुरी के सांस्कृतिक इतिहास के ठोस प्रमाण वीं सदी से ही उपलब्ध हैं| पुराणों में उल्लेख आता है कि अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन, जगन्नाथ पुरी ये सात नगर मोक्ष प्रदान करते हैं। इस सम्बन्ध में एक श्लोक मिलता है-
अयोध्या मथुरा माया काशी काची अवन्तिका,
पुरी द्वारावती चैव सप्तयन्ते मोक्षदायिनी।
इसे  शंखक्षेत्र भी कहा जाता है, क्योंकि इस क्षेत्र की आकृति शंख के समान है। शाक्त इसे उड्डियान पीठ कहते हैं। यह 51 शक्तिपीठों में से एक पीठ स्थल है, यहां सती की नाभि गिरी थी।

तात्पर्य यह है कि किसी अन्य मूर्ति को लेकर कभी भी इतने सारे सम्प्रदायों का दावा नहीं था,  कहीं भी कोई देवता इतने संप्रदायों की निष्ठा का पालन नहीं किया था| फिर भी यह आश्चर्यजनक है कि श्री जगन्नाथ के बीच या उन्हें लेकर कभी भी कोई सांप्रदायिक संघर्ष नहीं रहा। उन्हें सभी विचारों और आदर्शों के प्रकाश में देखा गया और भगवान जगन्नाथ ने चुपचाप अवशोषित उन सभी को अपने भीतर समावेशित कर लिया, जिस पर उन्हें अलग-अलग समय और अलग-अलग लोगों द्वारा देखा गया। प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय के भक्तों ने उन्हें अपनी भक्ति का उद्देश्य देखा था। दूसरे शब्दों में, देवता ने सर्वशक्तिमान के प्राथमिक गुणों में से एक को पूरी तरह से संतुष्ट किया है | शंकराचार्य से चैतन्य देव तक, महान रहस्यवादियों ने अपने अनुभव के प्रतीक देवता में देखा है, यह गैर द्वैतवाद की गहराई या द्वैतवाद की परमात्मा है।

इसलिए यह अनायास नहीं है कि रथयात्रा में जगन्नाथ जी को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है। इन अवतारों में विष्णु, कृष्ण और वामन और बुद्ध को भी शामिल किया जाता है। जगन्नाथ जी की रथयात्रा पुरी का प्रधान महोत्सव है जिसका आयोजन आषाढ़ शुक्ल की द्वितीया को किया जाता है। कहते हैं माता सुभद्रा को अपने मायके द्वारिका से अत्यंत प्रेम था इसलिए उनकी इस इच्छा को पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्राजी ने अलग रथों में बैठकर द्वारिका का भ्रमण किया था। तब से माता सुभद्रा की नगर भ्रमण की स्मृति में पुरी में हर वर्ष रथयात्रा निकाली जाती है। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और अहंकार से होती है। ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करता है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करती है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उस माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता बल्कि उसे खींचने के लिए लोक-शक्ति की आवश्यकता होती है।

रथ यात्रा के लिए तीन विशाल रथ सजाए जाते हैं। पहले रथ पर श्री बलराम जी, दूसरे पर सुभद्रा एवं सुदर्शन चक्र तथा तीसरे रथ पर श्री जगन्नाथ जी विराजमान रहते हैं। भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष है। देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन है और भाई बलभद्र का रक्ष तल ध्वज है। संध्या तक ये रथ गुंडीचा मंदिर (वृंदावन का प्रतीक) पहुंच जाते हैं। रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ के परम भक्त राजा इंद्रदयुम्न की पत्नी थी इसीलिए रानी को भगवान जगन्नाथ की मौसी कहा जाता है। दूसरे दिन भगवान से उतरकर मंदिर में पधारते हैं और सात दिन वहीं विराजमान रहते हैं। दशमी को वहां रथ से लौटते हैं। इन नौ दिनो में श्री जगन्नाथ जी के दर्शन को आड़पदर्शन कहते हैं। जगन्नाथ जी के इस रूप का विशेष माहात्म्य है।
तीनों रथों के निर्माण के लिए भी लकड़ियों का ही इस्तेमाल होता है। इसमें कोई भी कील या कांटा, किसी भी धातु का प्रयोग करना वर्जित माना गया है। यह रथ बनाने की प्राचीन भारतीय कला का उत्कृष्ट नमूना है । इसमें आकर्षक चित्रकारी और लकडी की अनेक मनमोहक नक्काशी की गई है ।

श्री जगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद माना जाता है जबकि अन्य तीर्थों के प्रसाद को सामान्यतः प्रसाद ही कहा जाता है। महाप्रसाद मानने के पीछे कई किंवदंतियाँ प्रचलित है | इनमें से एक यह माना जाता है कि यह प्रसाद भगवान जगन्नाथ से पहले देवी बिमला को चढ़ाया जाता है | कहा जाता है कि इस महाप्रसाद को बिना किसी संदेह एवं हिचकिचाहट के उपवास, पर्व आदि के दिन भी ग्रहण कर लेना चाहिए। एक अन्य मान्यता के अनुसार श्री जगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद नाम महाप्रभु बल्लभाचार्य जी के द्वारा मिला। महाप्रभु बल्लभाचार्य की निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए उनके एकादशी व्रत के दिन पुरी पहुँचने पर मन्दिर में ही किसी ने प्रसाद दे दिया। महाप्रभु ने प्रसाद हाथ में लेकर स्तवन करते हुए दिन के बाद रात्रि भी बिता दी। अगले दिन द्वादशी को स्तवन की समाप्ति पर उस प्रसाद को ग्रहण किया और उस प्रसाद को महाप्रसाद का गौरव प्राप्त हुआ| जिस श्रद्धा और भक्ति से पुरी के मन्दिर में सभी लोग बैठकर एक साथ श्री जगन्नाथ जी का महाप्रसाद प्राप्त करते हैं उससे वसुधैव कुटुंबकम का की भावना स्वत: परिलक्षित होती है। 

विश्व का सबसे बड़ा रसोईघर जगन्नाथ मंदिर में है जहां सैकड़ों बावर्ची और सेवक काम करते हैं। प्रतिदिन लाखों लोग भगवानजी का महाप्रसाद ग्रहण करते हैं। रसोई का इतना विशाल और व्यवस्थित प्रबंधन विश्व के किसी भी कोने में उपलब्ध नहीं है | प्रबंधन पढ़ने वालों को पांच सितारा होटलों के बजाय यहां आकर बहुत कुछ सीखना चाहिये कि पेशेवर प्रबंधन होता क्या है | सबसे अहम यह कि भोजन की सूची(मेन्यू) भी कोई साधारण नहीं होती है बल्कि 56 स्वादिष्ट व्यंजनों की होती है जो प्रतिदिन तैयार की जाती है |
षड रस व्यंजन नानाजाति, छप्पन भोग लगे दिन राति
भारतीय परम्परा के अनुसार भोजन में सभी छह रस- मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय-होने चाहिए। छह रस युक्त आहार से ही आयुष्य, तेज, उत्साह, स्मृति, ओज (जीवनीशक्ति) और जठराग्नि की वृद्धि होती है। ये छह रस ही शरीर के छह विकारों-ईर्ष्या, शोक, भय, क्रोध, अहंकार, द्वेष-को दूर करने के लिए आवश्यक है | तात्पर्य है कि जगन्नाथ के महाप्रसाद में स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की परिकल्पना निहित है |

कोई भी पांच सितारा होटल शायद ही हजारों लोगों के लिए 56 व्यंजन प्रतिदिन तैयार करता होगा | यह वह प्रबंधन है जिसका अध्ययन किसी भी बड़े से बड़े मैनेजमेंट कॉलेज में शायद ही पढाया जाना संभव होगा | यह शाकाहारी भोजन की ओड़िशा की उत्कृष्ट पाक संस्कृति की सदियों पुरानी परंपरा है जो सुविधाजनक तैयारी से युक्त, पोषक तत्वों से भरपूर, और कम खर्चीली है |




Monday, 19 June 2017

पर्व ओड़िशा : ओड़िया अस्मिता की सशक्त अभिव्यक्ति

पर्व ओड़िशा : ओड़िया  अस्मिता की सशक्त अभिव्यक्ति   
 “सभी प्राणियों के दुखों को देखना अत्यंत असहनीय है | भले ही मेरा जीवन नरक भोगता रहे लेकिन जगत का इन दुखों से उद्धार हो जाय | उन्नीसवी सदी के ओडिशा के महान संत कवि भीमा भोई का यह कथन भारत की उस गौरवपूर्ण परंपरा की कड़ी है जिसकी शुरुआत गौतम बुद्ध से होते हुए तुकाराम, कबीर, नानक, नरसी मेहता, दादू आदि तक चली आई है जो प्राणी-मात्र के कल्याण के लिए सर्वस्व त्याग करने के लिए तत्पर रही है | भीमा भोई का यह कथन ही ओडिशा की धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिता को विशिष्ट पहचान देता है | इसी कारण सुप्रसिद्ध साहित्यकार और आलोचक अशोक वाजपेयी यह स्वीकार करते है कि भारत की कोई भी कल्पना या विचार शताब्दियों से अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए गौरवमयी संघर्ष करते ओडिशा के बिना असंभव है | ओडिशा भारत का एक ऐसा राज्य है जिसकी अपनी प्राचीन सभ्यता, अद्वितीय संस्कृति, समृद्ध परंपरा और अपार प्राकृतिक संपदा एवं सुंदरता के कारण एक विशिष्ट पहचान है | इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि इस राज्य को 'भारत की आत्मा' कहा जाता है|
 “पर्व ओडिशा ओडिशा  राज्य की इसी अस्मिता को समग्रता में सहेजती है जिसका लोकार्पण केन्द्रीय वित्त मंत्री माननीय अरुण जेटली ने ओडिया समाज द्वारा 29 अप्रैल 2017 को आयोजित ओडिशा परब’ के दौरान किया | यह पुस्तक अपने विषय वस्तु में ओडिशा राज्य की उत्पति और गौरवपूर्ण इतिहास के साथ ही, उड़िया भाषा की अस्मिता, स्वाधीनता के अभिमान, प्राकृतिक सौन्दर्य, तीर्थस्थलों की ऐतिहासिकता, धार्मिक परंपराओं, सांस्कृतिक, नृजातीय विकासशीलता, नृत्य की अनूठी भंगिमाओं, पकवानों की खुशबू, परिधानों की विविधता और सामाजिक सरोकारों की इन्साइक्लोपीडिया है जो उन इतिहासकारों के समक्ष चुनौती खड़ी करती है जिन्होंने इतिहास लेखन में ओडिशा के सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-भाषिक-नृजातीय विकास एवं परंपरा को या तो पर्याप्त महत्व नहीं दिया है या हाशिए पर रखा है | समकालीन लेखकों के साथ ही गुजरे वक्त के देशी विदेशी लेखकों के आलेखों के द्वारा ओडिशा के कुछ अनजान एवं विस्मृत पहलुओं से लगभग 300 पृष्ठों के इस संकलन द्वारा अवगत कराने के लिए संपादकों-सुजीत कुमार प्रुसेठ और चारुदत्ता पाणिग्रही-का प्रयास सराहनीय है|
राष्ट्र के निर्माण में ओडिशा की भूमिका को रेखांकित करते हुए राष्ट्रपति माननीय प्रणव मुखर्जी ने पर्व ओडिशा को अपने बधाई सन्देश में माना है कि ओडिशा पूरब की देव स्थली है जो अदम्य मानवीय जिजीविषा के बल पर अपनी प्राचीन संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए हुए है | माननीय राष्ट्रपति के अनुसार पर्व ओडिशापुस्तक ओडिशा के जीवन और समाज के प्रत्येक पहलू को प्रतिबिंबित करने वाला बेशकीमती संकलन है | राष्ट्रपति मुखर्जी ने प्रवासी ओडिशा भाषण में गोपबंधु दास और मधुसूदन दास जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया जिन्होंने स्वतंत्रता के संघर्ष में गांधीजी के सहयोगी रहे और उड़िया गौरव को नयी ऊंचाई प्रदान की |
इस संकलन में सरदार बल्लभ भाई पटेल और सी. एफ. एंड्रयूज के मूल आलेख संकलित है | सरदार पटेल ने आजादी के बाद राष्ट्रीय एकीकरण के पीछे ओडिशा को प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया है जो न केवल भाषा के आधार पर गठित होने वाला पहला राज्य है बल्कि रियासतों को भारतीय गणतंत्र के साथ एकीकरण में सबसे अग्रणी राज्य रहा है | सी. एफ. एंड्रयूज ने ओडिशा के लोगों की अदम्य जिजीविषा को सैल्यूट किया है जिनकी प्राकृतिक एवं मानवीय आपदाओं की निरंतरता के बावजूद धर्म के प्रति गहन आस्था बरकरार है और यही आस्था उन्हें सहृदय बनती है | ओडिया भाषा की अस्मिता को लेकर सुप्रसिद्ध भाषाविद सुनीति बाबू के आलेख है, जिसमें तथ्यों के आधार पर प्रमाणित किया है है कि ओडिया भाषा का अन्य भारतीय भाषाओँ से गहरा जुडाव रहा है| ओडिया भाषा की प्राचीनता, साहित्यिक विशालता और देव-भाषा संस्कृत से गहरी संपृक्तता उसे शास्त्रीय(क्लासिकल) भाषा का गौरव प्रदान करती है | एक ओर जहाँ जॉन बीम्स ने ओडिया भाषा और अन्य आर्यन भाषाओँ के बीच अंतर्धारा को सूक्ष्मता से उदघाटित किया है, दूसरी ओर जॉन बोल्टन ने ओडिया भाषा में रचित महाभारत के माध्यम से ओडिशा की अखिल भारतीय सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित किया है | सुजीत प्रुसेठ ने जहाँ गंगाधर मेहर जैसे महान कवि-व्यक्तित्व की प्रतिभा के साथ न्याय किया है वही जॉन बोल्टन के आलेख में फ़क़ीर मोहन सेनापति जैसे महान कथा सम्राट को समझने की एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तावित है जिनका साहित्य तत्कालीन  ओडिया समाज का इन्साइक्लोपीडिया है|
ओडिशा की ऐतिहासिकता के संबंध में तथ्यपरक और प्रासंगिक आलेख हरमन कुल्के, ओ मल्ले, जी ट्वायन्बी, जॉन बोल्टन, एलिस बोनर, मुल्कराज आनंद और देबाला मित्रा के हैं, जिसमें प्राचीन राष्ट्र कलिंग से लेकर, खारवेल राज्य, उदयगिरी और खंडगिरी से गुजरते हुए आधुनिक राज्य ओड़िशा तक के विकास और घटनाक्रमों का सूक्ष्म विश्लेषण मौजूद है | स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान ओडिया स्वाभिमान उसी तरह से अडिग रहा जिस प्रकार अशोक के भयानक रक्तपात के बावजूद विचलित नहीं हुआ | रिसर्जेंट ओडिशा खंड में एंड्रयू स्टर्लिंग, एफ. जी. बेली, गोपाल कृष्ण दास के आलेख ओडिया समाज के इसी जुझारूपन को प्रदर्शित करते हैं | ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ पाईक विद्रोह को इतिहासकारों ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया है, लेकिन उस विद्रोह की प्रचंड शक्ति और विस्तार का उदघाटन सुभकंता बेहरा और कृष्ण चन्द्र भुइया ने किया है | बलभद्र घडई 1857 के विद्रोह के दौरान ओडिशा में विद्रोह का प्रतिनिधित्व करने वाले सुरेन्द्र साई के योगदान से रूबरू कराते है जिन्हें इतिहासकारों ने शायद ही चर्चा करने के योग्य माना है |
मनोज दास ने भगवान जगन्नाथ और उनकी रथयात्रा की पौराणिकता से परिचित कराया है, जिनके बिना ओड़िया जीवन और समाज, कला और संस्कृति के ताने-बाने की परिकल्पना ही अधूरी है | इसी परिप्रेक्ष्य में संपादकों ने 12 वर्षों में एक बार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला ‘नाबाकलेबारा’ उत्सव के सामाजिक और आर्थिक महत्त्व पर प्रकाश डाला है और उस नब्ज़ को पकड़ने की कोशिश की है जिसके कारण ओड़िशा के लोग कर्ज लेकर भी इस उत्सव में शामिल होते है | ओडिशी एक शास्त्रीय नृत्य तो है ही, साथ ही मलेशियाई डांसर रामली इब्राहिम ने ईव द्वारा एडम को सेव देकर रिझाने को ओडिशी के आकर्षक नृत्य का ही एक स्टाइल माना है | जगन्नाथ प्रसाद दास ने ताड़-पत्र चित्रकारी जैसी अनूठी कला की बारीकियों से अवगत कराया है, जिसके द्वारा ओडिशा की सम्पूर्ण संस्कृति को चित्रित किया गया है | मुल्कराज आनंद कोणार्क मंदिर के प्रति अपनी श्रद्धा भक्ति व्यक्त करते हुए उसके स्थापत्य और भीति चित्र को सर्वश्रेष्ठ कृति का दर्जा देते है, जबकि कोणार्क मंदिर की निर्माण संरचना के द्वारा प्राचीन भारत के वैज्ञानिक निर्माण की श्रेष्ठता को एलिस बोनर ने रेखाचित्रों के द्वारा प्रदर्शित किया है | नारायण प्रुसेठ नृसिंहनाथ मंदिर, जो चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार बौद्ध शिक्षण का केंद्र था, और केदारनाथ महापात्रा चौसठ योगिनी मंदिर की ऐतिहासिकता और पौराणिकता को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाते है | नृसिंहनाथ मंदिर के शिलालेखों पर ओड़िया भाषा के प्रारंभिक स्वरुप का पहला साक्ष्य है | राम प्रसाद चन्द्र ने सिद्ध किया है कि बौद्ध स्मारकों से युक्त ओडिशा बौद्ध सर्किट में भले ही शामिल नहीं है, लेकिन इसका स्वयं में बौद्ध सर्किट के समतुल्य महत्व है|
यह बड़ी विडंबना है कि अभी तक हमारे पर्यटनविद या पर्यटन मंत्रालय हिल स्टेशनों के अलावा ताजमहल, लालकिला, फतेहपुर सीकरी या मुस्लिम शासकों के बनवाए महलों किलों, मस्जिदों और मकबरों के बीच ही अधिकतर उलझा हुआ रहा है | सच तो यह है इन महलों और मकबरों से पहले और बाद में भी भारत के तीर्थस्थल पर्यटन के प्रमुख केंद्र रहे है | ओडिशा के स्वर्णिम त्रिभुज भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर, पुरी में जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क में सूर्य मंदिर पर्यटन के ऐसी केन्द्र है जो ने केवल लाखों श्रद्धालुओं को बल्कि देशी-विदेशी कलाविदों और पर्यटकों को आकर्षित करते है जो इस बात का साक्ष्य देते है कि यदि सही मायने में भारत प्राचीन मंदिरों, तीर्थस्थलों, स्तूपों, गुफाओं और प्राकृतिक झीलों, नदियों, जलप्रपातों को समुचित ढंग से विकसित किया गया होता तो आज देश की जीडीपी में सबसे अधिक योगदान पर्यटन का होता| समुद्र तटीय प्रदेश होने के कारण ओडिशा प्राचीन काल से ही विदेशों से व्यापार का प्रमुख केंद्र रहा है | देबी प्रसन्ना पटनायक, एल. एस. एस. ओ. मैली, पतित पावन मिश्र, ललित मानसिंह, समीर कुमार दास और आर बालाकृष्णन के आलेख प्राचीन काल से वर्तमान समय में विदेशों से होने वाले व्यापारों का विस्तृत विवरण उपलब्ध कराते है |   
पर्व ओडिशाकी यूएसपी ओडिशा की कला, संस्कृति और हस्तियों से जुड़े वे फोटोग्राफ, डाक टिकट, हस्तलिखित पत्रों के छायाचित्र, ताड़-पत्रों पर चित्रित संदेश, शिलालेखों, विलुप्त स्मारकों के चित्र है, जिसे प्राप्त करने के लिए संपादकीय टीम का दुष्कर प्रयास प्रशंसनीय है | इस पुस्तक के अंतिम खंड में ओडिशा की कुछ प्रमुख हस्तियों-जे. पी. दास, न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष रवि राय और संदीप महापात्रा-ने ओडिया जन मानस को अपनी अस्मिता, अपने गौरव और महान सांस्कृतिक विरासत को पहचानते हुए उसे आगे बढ़ाने एवं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की अपील की है |





धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनीति का वीभत्स चेहरा

धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनीति का वीभत्स चेहरा
केंद्र सरकार द्वारा पशुओं की खरीद-बिक्री के नए नियम तय करने के विरोध में केरल के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं द्वारा बछड़े को सार्वजनिक तौर पर काट कर उसका मांस बांटने जैसा वीभत्स कृत्य घोर क्रूरता है, जो एक अपराध है| सरकार ने पशुओ के प्रति होने वाले क्रूर व्यवहार से बचाने के लिए पशुओं की खरीद-बिक्री के जो नए नियम बनाये, उसकी व्यावहारिकता की जाँच-पड़ताल किए बिना क्रूर गो-हत्या का प्रदर्शन करने वाले धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सियासी पाप का ही चेहरा उजागर हुआ है | यह देश में गाय के नाम पर माहौल को बिगाड़ने की साज़िश है| यह देश के तथाकथित सेकुलर खेमे द्वारा गाय के नाम पर भारत को बांटने का कुचक्र है |
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार नए नियम राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के इस आदेश के तहत बनाये गए हैं कि देशी नस्ल के मवेशियों की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए कोई राष्ट्रीय नीति बने। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में कहा गया है कि सरकार गायों और बछड़ों और अन्य दुधारू एवं वाहक पशुओं के नस्लों को सुरक्षा प्रदान करे और उनके वध को निषिद्ध करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगा | जाहिर है यह देश में मीट कारोबार का नियमन करने के सरकारी कोशिश है | लेकिन अनेक राज्यों ने पूरे देश में पशु व्यापार पर रोक लगाने के केंद्र के फैसले पर नाराजगी जाहिर की है | नए नियम पशुओं की कालाबाजारी पर रोक लगाने और उनके ऊपर होने वाली क्रूरता को रोकने में कितने सक्षम है या नहीं, यह बहस और विमर्श का विषय अवश्य है| इस नियम से मीट और चमड़ा उद्योग और रोजगार को कितना नुकसान होगा, यह आंकलन का विषय अवश्य है| केंद्र सरकार स्वयं ही पशुओं की खरीद-बिक्री पर रोक की जटिलताओं को देखते हुए नियमों में बदलाव करने पर विचार कर रही है|  लेकिन कांग्रेस ने अपना राजनीतिक मकसद साधने के लिए सार्वजनिक तौर पर एक असहाय जानवर को काट दिया। पूरी घटना का विडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करना यह दर्शाता है कि देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं या आस्था के साथ खिलवाड़ करने में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का आचरण और मानसिकता कितनी असंवेदनशील और गैर जिम्मेदारना है| यदि कांग्रेस की यही धर्मनिरपेक्षता है और समरस समाज के लिए विरोध का यही तरीका है तो यह भारतीय समाज को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि कांग्रेस के लिए तुष्टिकरण ही धर्मनिरपेक्षता है और इसके लिए उसे देश विभाजन से लेकर नरसंहार करने से भी परहेज नहीं है और केरल का घृणित कार्य उसकी इसी नीति एक हिस्सा भर है| ऐसे कुकर्मों को न केवल मानवीय दृष्टि से अनुचित और न संवैधानिक दृष्टि से इसे जायज ठहराया जा सकता है | दूसरी ओर पेटा जैसे संगठन, जो जानवरों के प्रति अच्छे व्यवहार के पक्षधर है, और तथाकथित उदारवादी बुद्धिजीवियों, जिन्होंने एक घोड़े के पैर में चोट लगने और टूट जाने पर हाय-तौबा मचा दिया था, ने अचानक अनंत चुप्पी साध रखी है क्योंकि उनके लिए भी धर्मनिरपेक्षता और मानवीय व्यवहार महज सेलेक्टिव होती है, जो उनकी शातिर मानसिकता का ही परिचायक है |
गोवध से जुड़ा वीडियो सामने आने के बाद कांग्रेस भले ही चारों तरफ से घिरती हुई नजर आ रही हैं और शर्मसार महसूस कर रही है लेकिन गो हत्या निषेध को लेकर उसका ऐतिहासिक पक्ष की ही परिणति मौजूदा करतूत में हुई है | आजादी के बाद गो हत्या निषेध को लेकर अनेक प्रयास हुए | अल्पसंख्यकों को खुश रखने के लिए कांग्रेस ने हर प्रयास को विफल कर दिया | 2 अप्रैल 1955 को कांग्रेस सांसद सेठ गोविंद दास ने गोहत्या पर पाबंदी के लिए बिल लोकसभा में पेश किया था। तत्कालीन खाद्य मंत्री रफी अहमद किदवई ने इस बिल का समर्थन किया था । लेकिन प्रधानमंत्री नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता का हवाला देते हुए धमकी दी कि "अगर ये बिल पास हुआ तो मैं इस्तीफा दे दूंगा।"। 7 नवम्बर 1966 को गोपाष्टमी के दिन गौरक्षा से सम्बन्धित संस्थाओं ने संयुक्त रूप से संसद भवन के सामने एक विशाल प्रदर्शन में तत्कालीन सरकार से गौहत्या बन्दी का कानून बनाने की मांग की गई। गृहमंत्री गुलजारी लाल नन्दा ने देश की बहुसंख्यक जनता की गौहत्या बन्दी की मांग को स्वीकार करने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को परामर्श दिया | लेकिन इंदिरा गांधी ने कठोरता से कहा गौहत्या बन्दी का कानून बनाने से मुसलमान और ईसाई समाज कांग्रेस से नाराज हो जायेंगे । इंदिरा गांधी ने प्रदर्शन खत्म कराने के लिए निहत्थे अहिंसक गो रक्षा प्रदर्शनकारियों पर गोली चलवा दी जिसमें अनेकों साधुओं व गोरक्षकों की मृत्यु हो गई। 
पशु बाजार नियमन के विरोध के बहाने अराजकता और घोर संवेदनहीनता के प्रदर्शन को लेकर समाज के एक बड़े हिस्से ने जिस तरह से नाराजगी जाहिर की है, उससे राजनीतिक लाभ की आकांक्षा उलटी पड़ गयी है | कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति कुख्यात ही नहीं रही है बल्कि धर्मनिरपेक्षता की धारणा को विद्रूप करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है । इस नृशंस कृत्य में शामिल कार्यकर्ताओं को कांग्रेस ने भले ही पार्टी से निकाल दिया है और इस हत्या की निंदा कर रही है लेकिन इस गलती का खामियाजा कांग्रेस को चुकाना ही पड़ेगा |


Monday, 5 December 2016

चेम्मीन: रोमांटिकता और सामाजिक यथार्थ का द्वंद्व

चेम्मीन: रोमांटिकता और सामाजिक यथार्थ का द्वंद्व
मलयालम उपन्यासों में ‘चेम्मीन’ एकमात्र उपन्यास है जिसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि इस उपन्यास का दुनिया की 19 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और इस पर आधारित फिल्में 15 देशों में बनायी गयी हैं। भारत में इस पर बनी फिल्म को 1964 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है | ‘चेम्मीन’ के रचनाकार तकष़ी शिवशंकर पिल्लै ऐसे संक्रांति काल के साहित्यकार है, जब मलयाली समाज साहूकारी, सामंतवादी, जमींदारी व्यवस्था के साथ-साथ छुआछूत की गंभीर व्याधि से ग्रस्त था | तकषि की रचनाशीलता की खूबी यह है कि उन्होंने हमेशा समाज के बेहद सामान्य चरित्रों को ही अपनी रचनाओं के केंद्र में रखा और सामान्य लोगों के जीवन में व्याप्त विषमता के बीच उनके संघर्ष, उनकी जिजीविषा, उनकी पीड़ा और दुखों का बखूबी वर्णन किया | उल्लेखनीय यह कि उस दौर में दलितों को साहित्य में स्थान देने वाला कोई भी साहित्यकार केरल में नहीं था और तकष़ि जानवर से भी तुच्छ जीवन बिताने वाले लोगों के पक्षकार बनकर सामने आये| इसलिए उन्हें मलयालम उपन्यास का ‘प्रेमचंद कहा जाता है | हिन्दी भाषी उपन्यास सम्राट स्वर्गीय प्रेमचन्द को जितना आदर और पसन्द करते हैं, केरल की मलयालम भाषी जनता के बीच तकष़ी शिवशंकर पिल्लै को उतना ही सम्मान प्राप्त है|
मलयालम में आदिवासी केन्द्रित लेखन की शुरुआत का श्रेय तकषी शिवशंकर पिल्लै को है | चेम्मीन अर्थात मछुआरे को ज्यादातर जगह आदिवासियों में ही गिना जाता है। लेकिन केरल में मछुआरे अनुसूचित जातियों के अंतर्गत आते हैं। ‘चेम्मीन’ उन गरीब मछुआरों के जीवन पर ही केन्द्रित उपन्यास है जो अपने जीवन निर्वाह के लिए समुद्र पर ही आश्रित होते हैं | समुद्र तटीय मछुआरा समाज एक बंद समाज है जो परम्पराओं, रूढ़ियों, अंधविश्वासों और मान्यताओं से इस कदर जकड़ा हुआ है कि वह अपने सदस्यों को और खासतौर से समुदाय की महिलाओं को इसकी रत्ती भर भी छूट नहीं देता है | समुदाय के नियमों और मर्यादाओं का उल्लंघन करने वालों का तिरष्कार करता है| भारत के अन्य अधिकांश पुरुषवादी समुदायों की तरह ऐसे समुदाय निर्मित नियमों और मर्यादाओं का सबसे अधिक शिकार महिलाओं को ही होना पड़ता है| महिलाओं को तुरंत ही पथभ्रष्ट और अपवित्र घोषित कर दिया जाता है | सागर ही मछुआरों का जीवन है और उसी से उनकी जीवन शैली, धारणाएं, अचार-विचार, उम्मीदें और आकांक्षाएं सभी निर्धारित होती है | अनंत विस्तृत सागर की तरंगावर्तनों के साथ खेलते-सोते उनका व्यक्तित्व निर्मित होता है| ये मछुआरे सागर को अपनी माता मानते है क्योंकि उनकी सारी इच्छाओं की पूर्ति सागर करता है | सागर माता के कोप से उन्हें डर भी लगता है इसलिए वे ऐसा कोई कार्य नहीं कर सकते जो समुद्र को पसंद नहीं है |
‘चेम्मीन’ धर्मवीर भारती द्वारा रचित हिंदी उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ की तरह रोमैंटिक उपन्यास है | लेकिन ‘गुनाहों का देवता’ की रोमांटिकता जहाँ सामाजिक यथार्थ भूमि के संस्पर्शों से पूरी तरह अलग-थलग और वायवीय हो जाती है वहीँ ‘चेम्मीन’ में तकषी ने रोमांटिकता के बहाने मछुआरों के सामाजिक यथार्थ का जिस तरह से विशद चित्रण किया है कि मछुआरा समाज भी एक पात्र के रूप में उभर कर सामने आता है | ‘लरकाई के प्रेम’ से बंधे प्रेमी युगलों के माध्यम से मछुआरा समाज के नियमों, नैतिक मान्यताओं और बन्धनों को चुनौती भी देते है| यहीं चुनौती ‘चेम्मीन’ को ‘गुनाहों का देवता’ से अलग भूमि पर अवस्थित करती है | यहाँ तकषी की संवेदना ने केवल आदिवासी मछुआरा समाज व परिवार ही नहीं, पूरे भारतीय समाज और परिवार में औरत की स्थिति और उसकी अस्मिता जैसे सवाल पर व्यापक विमर्श के लिए प्रेरित किया है |
‘चेम्मीन’ के कथा एक रोमैंटिक करुण कथा है | लेकिन यह कथा मछुआरा समाज में प्रचलित कुछ मान्यताओं, विश्वासों और रीति-रिवाजों से होकर गतिमान होती है और साथ ही उन मान्यताओं, विश्वासों और रीति-रिवाजों के कारण अभिशप्त मछुआरा समाज के दारुण जीवन को अभिव्यक्त करती है | दूसरे शब्दों में तकषी ने प्रेम कथा के बहाने मछुआरा समाज में प्रचलित मान्यताओं, विश्वासों और रीति-रिवाजों को ही उपन्यास के विषय-वस्तु के रूप में अभिव्यक्त किया है | ‘चेम्मीन’ की कथा के तीन कोण है जिसकी शुरुआत केरल के समुद्र तटीय इलाके में रहने वाले एक मछुआरे की महत्वाकांक्षा से शुरू होती है जिसके लिए एक प्रेमी युगल के बीच बढ़ता आकर्षण और अंकुरित होता प्रेम संबंध माध्यम बनता है | इसी के साथ केरल के मछुआरा समाज में प्रचलित वे मान्यतायें और मिथक है जो मछुआरा समाज के जीवन को प्रभावित और नियमित करते है |
मछुआरा समाज में प्रचलित एक मिथक, जो पूरी कथा में आद्यंत एक दु:स्वप्न की तरह मौजूद है जिसके अनुसार सागर देवी उस मछुआरे का जीवन नष्ट कर देती है जिसकी पत्नी अपवित्र हो जाती है अर्थात समुद्र का किनारा पवित्र होना चाहिए और इसकी पवित्रता की नैतिक जिम्मेदारी किनारे पर रहनेवाली स्त्रियों की है|  दूसरी प्रचलित मान्यता सामाजिक है और जिससे भारत का एक बड़ा हिस्सा, खासतौर से ग्रामीण गरीब तबका, आज भी ढोये जा रहा है कि बेटी का विवाह जल्द से जल्द कर देना चाहिए | यह ऐसा नियम था जिसे समुद्र तटीय मछुआरे, जिन्हें घटवार कहा जाता है, उल्लंघन नहीं कर सकते थे | तीसरा नियम कि केवल धीवर (जालिया) समुदाय के मछुआरों को ही नाव और जाल खरीदने और उसका मालिक होने का अधिकार है जो समुदाय विशेष के सामाजिक आर्थिक वर्चस्व को स्थापित करता है | एक अन्य परम्परागत नियम यह था कि कोई भी नया काम करने से पहले समुदाय के मुखिया से औपचारिक अनुमति लेनी पड़ती है |
तकषी इन तीनों कोणों के बीच आपसी टकराव के द्वारा मछुआरा समाज ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय समाज के विश्वासों, मान्यताओं और मूल्यों के खोखलेपन को पर्त-दर-पर्त खोलते जाते है| तकषी ने प्रेम कथा के सापेक्ष मछुआरा समाज के जिस सच्चाई को उजागर करते है वह पूरे भारतीय समाज की सच्चाई है| ‘चेम्मीन’ में मछुआरों की आर्थिक और सामाजिक दुर्बलता, महाजनों द्वारा उनके शोषण, मछुआरा समुदाय के मुखियों द्वारा लोगों जीवन और व्यवसाय पर अनेकानेक प्रतिबंध, सूदखोरी का दुश्चक्र और बिचौलियों के आतंक के कारण मछुआरों के अभिशप्त जीवन का चित्रण ‘गोदान’ के त्रासद कृषक कथा से जुड़कर सम्पूर्ण भारतीय समाज के शोषित और सबसे निचले पायदान के लोगों की जीवन-गाथा बन जाता है| अपने समुदाय के रीति-नीतियों के बंधन से कोई भी व्यक्ति/मछुआरा ऐसे जकड़ा हुआ है कि वह तमाम क्रांतिकारिता के बावजूद अपने आसपास के दुश्चक्र से मुक्त नहीं हो पाता है |
चेम्बनकुंजु जैसे साहसी, चतुर, मेहनती और कुशल नाविक की सबसे बड़ी महत्वकांक्षा अपनी एक नाव और जाल खरीदना है जैसे ‘गोदान’ के होरी की तरह महज गाय पालने की लेकिन सामाजिक मान्यता उसके राह में रोड़ा बनती है | जैसे गाय पालने की लालसा कृषक समाज में प्रतिष्ठा की बात मानी जाती है वैसे ही नाव और जाल का मालिक होना मछुआरा समाज में गर्व और रुतबे की बात हुआ करती है | चेम्बन जिस अरय समुदाय का मछुआरा है उस जाति को नाव और जाल खरीदने और उसका मालिक होने का अधिकार नहीं है | केवल धीवर (जालिया) समुदाय के मछुआरों को ही नाव और जाल खरीदने और उसका मालिक होने का अधिकार था| लेकिन चेम्बन अपनी इस महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए ‘गोदान’ के होरी की तरह कर्ज लेता है, वादा-खिलाफी करता है, कोई भी नैतिक-अनैतिक तरीका अपनाने से परहेज नहीं करता है| ‘होरी’ के पास गाय खरीदने के पैसे नहीं तो चेम्बन के पास भी नाव और जाल खरीदने के पैसे नहीं है | लेकिन वह अपनी इस इच्छा को किसी भी तरह से पूरा करना चाहता है | वह अरय जाति द्वारा नाव और जाल नहीं खरीदने और उसका मालिक नहीं होने की सामाजिक मान्यता को चुनौती देता है | अरय समुदाय में नाव और जाल खरीदने के लिए सामाजिक योग्यता का निर्णय उस समुदाय का मुखिया करता है लेकिन चेम्बन नाव और जाल खरीदने के लिए अपने समुदाय के मुखिया से आज्ञा नहीं लेकर समुदाय के बेमानी नियमों को तोड़ देता है | लेकिन उसकी महत्वकांक्षा की कोई सीमा नहीं है| उसकी यही महत्वकांक्षा उससे सामाजिक रीति-नीतियों, अंधविश्वासों और प्रचलित दकियानूसी मान्यताओं का पालन कराती है| तत्कालीन समाज की विडम्बना कितनी त्रासद है इसका अनुमान हम इस वास्तविकता से लगा सकते है कि आधुनिक सूचना और ज्ञान क्रांति के समय में भी सामाजिक स्तर पर कुछ लोग प्रगतिशीलता और बौद्धिकता के बावजूद व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर ठेठ दकियानूसी आचरणों की अनवरत गुलामी से बंधे होते है | यहाँ चेम्बन कुंजु तो केवल महत्वाकांक्षी है, प्रगतिशील नहीं है | बिना बौद्धिक और तार्किक सजगता के महत्वाकांक्षा का कोई मूल्य नहीं है | चेम्बन लकीर का फ़क़ीर भी नहीं है लेकिन वह धन-लोलुपता में इस कदर जकड़ा हुआ है कि उसकी संवेदनशीलता नष्ट हो जाती है जिसकी अंतिम परिणति मानसिक विक्षिप्तता और आर्थिक दिवालिएपन में होती है | चेम्बन कुंजु की महत्वकांक्षा, धन-लोलुपता और सामाजिक रीति-नीतियों के समक्ष विवाह, परिवार और प्रेम के समस्त मूल्य दफ़न हो जाते है | अपनी बेटी करुतम्मा और अन्य धर्मी परीक्कुट्टी के प्रेम सबंधों में जो भी घटनाएँ घटित होती हैं वे सभी उसकी महत्वकांक्षा के कारण घटित होती हैं | सबसे पहले उसकी महत्वकांक्षा को समझते हुए ही उसकी बेटी करुतम्मा परीक्कुट्टी से आर्थिक मदद मांगती है| परीक्कुट्टी मुस्लिम युवक है जो करुतम्मा के साथ समुद्र तट पर घूमते-खेलते बड़ा हुआ है | अर्थात् दोनों के बीच एक-दूसरे के प्रति आकर्षण है, ‘लरकाई का प्रेम’ है | करुतम्मा के आग्रह पर परीक्कुट्टी नाव और जाल खरीदने के लिए चेम्बन की आर्थिक मदद करता है | यह आर्थिक मदद ही उन दोनों के प्रेम संबंधों की त्रासदी का कारण बन जाता है | चेम्बन शर्त के मुताबिक पैसे के बदले परीक्कुट्टी को न तो मछलियाँ देता है और न पैसे लौटाता है | परीक्कुट्टी पैसे-पैसे का मोहताज होकर दर-दर भटकने के लिए अभिशप्त होता है | मुसलमान होने के कारण कोई भी मछुआरा न तो मछलियाँ उधार देता है और न पैसे उधार देता है ताकि वह जीवन यापन कर सके | दूसरी ओर वह सामाजिक बहिष्कार के भय से और महत्वाकांक्षा के कारण करुतम्मा और परीक्कुट्टी के बीच वैवाहिक संबंध को स्वीकृति नहीं देता है | बड़े निर्लज्ज तरीके से अपनी बेटी करुतम्मा और उसके प्रेम को भी बलि देने के लिए मजबूर करता है|
एक सामान्य मछुआरे से एक सूदखोर महाजन में चेम्बन कुंजु की परिणति वस्तुतः एक वर्गीय परिवर्तन है जिसका तकषी ने अत्यंत तल्ख़ चित्रण किया है | दूसरों की मज़बूरी और कमजोरी का फायदा उठाना सूदखोर महाजनों का वर्गीय चरित्र होता है | चेम्बन कुंजु भी पूरी तरह से महाजन की तरह सोचता और आचरण करता है | पैसे की बढ़ती प्यास के कारण उसके स्वभाव एवं व्यवहार में अंतर आ जाता है, वह अपने बच्चों के प्रति भी निर्मम हो जाता है | वह एक ओर करुतम्मा से उम्मीद करता है कि वह बाप की मर्यादा का ख्याल रखने के लिए परिक्कुट्टी के साथ प्रेम संबंधों से दूर रहे जबकि वह स्वयं बाप की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है और दूसरी ओर करुतम्मा एवं परिक्कुट्टी के संबंधों का नाजायज तरीके से इस्तेमाल भी करता है | उसके भीतर एक मालिक की मानसिकता का संचार होने लगा | यह केवल चेम्बन कुंजु की समस्या नहीं है बल्कि पूरे मछुआरा समाज और सूक्ष्मता में देखें तो पूरे भारतीय समाज की संकीर्ण मानसिकता की समस्या है | एक ओर मछुआरे करुतम्मा और परिक्कुट्टी के संबंधों को लेकर करुतम्मा के पति पलनी पर ताने मारते हैं जबकि करुतम्मा और परिक्कुट्टी का प्रेम विशुद्ध रूप से अशरीरी है, शारीरिक स्तर पर कभी नहीं उतरता है | इस ताने से पलनी अपमानित होकर अवसादग्रस्त हो जाता है और करुतम्मा से दूर होता जाता है | मछुआरा समाज करुतम्मा को अपवित्र घोषित कर देता है और करुतम्मा एवं पलनी का वैवाहिक जीवन नष्ट हो जाता है | दूसरी ओर मछुआरा समाज चेम्बन कुंजु के निर्लज्जतापूर्ण आचरणों को स्वीकार करता जाता है जिसके संवेदनहीन एवं कठोर व्यवहार के कारण उसकी पत्नी चक्कि मर जाती है और वह एक विधवा से विवाह कर लेता है और अपनी दूसरी बेटी पंचमी को भी तरह तरह की यातनाएं सहने के लिए मजबूर कर देता है और संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त मछुआरा समाज यह सब देखता रह जाता है |
यहाँ उल्लेखनीय है कि तकषी ने ‘चेम्मीन’ में इतनी सतर्कता बरती है कि वे किसी भी पात्र को अपनी सोच या मानसिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करने देते हैं| वे अतार्किक और असंगत सामाजिक रीति-रिवाजों, मान्यताओं और विश्वासों पर प्रहार करने और उन्हें ख़ारिज करने के लिए लगभग सभी पात्रों का उपयोग करते है | ‘चेम्मीन’ विशुद्ध रूप से रोमैंटिक प्रेम कथा है जिसमें करुतम्मा के स्वयं के प्रेम का बलिदान और आत्मशोधन, परिक्कुट्टी का आदर्श प्रेम, समुद्र देवी की दंड प्रक्रिया और चेम्पन की विलेन भूमिका सब कुछ फ़िल्मी और यथार्थ से दूर लगता है| फिर भी तकषी ने इस प्रेम कथा को समाज में प्रचलित विश्वासों और रीति रिवाजों का छौंक देकर उसे जीवन की यथार्थ भूमि पर उतार दिया है | तकषी करुतम्मा और परीक्कुट्टी के बीच प्रेम सबंधों के बरक्स ही भारतीय मानस और समाज में प्रचलित ‘स्त्री की पवित्रता’ की संकल्पना को खड़ा करते है जिसे जायज ठहराने के लिए मछुआरा समाज में कई तरह की कहानियाँ गढ़ी गई है और उन्हें सती, सावित्री, दुर्गा और सीता के आदर्शों को उनके मानस में भर दिया जाता है| करुतम्मा की माँ चक्कि भी उसे बताती है कि मछुआरों का जीवन वास्तव में तट पर रहने वाली उनकी स्त्रियों के हाथ में होता है | हालाँकि मछुआरा समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने अपवित्र होनेवाली औरतों के पतियों को सागर देवी द्वारा दण्डित करने के मिथ को फर्जी करार दिया है लेकिन तकषी इस मान्यता की अतार्किकता के प्रति न तो रोष प्रकट करते है और न ही इसे ख़ारिज करते है | वे ‘चेम्मीन’ के अंत में इस मान्यता को घटित होता दिखाते है लेकिन इसके माध्यम से वे यह उजागर करते है कि किस प्रकार समाज की झूठी नैतिकता व्यक्ति, परिवार और समाज की जीवन व्यवस्था का छिन्न-भिन्न कर देती है और इनके गर्भ से दूसरी अनेक समस्याएँ पैदा होती है| ‘पवित्रता’ की इस संकल्पना के कारण न केवल मछुआरा समाज की बल्कि सम्पूर्ण भारतीय समाज की स्त्रियां भयानक त्रासद जीवन जीने को अभिशप्त होती है| उपन्यास के अंत में करुतम्मा के अपवित्र होने के अपराध के साथ ही समुद्र में पलनी की मौत से पहली नजर में ऐसा प्रतीत होता है कि तकषी इस अन्धविश्वास के साथ खड़े है और उसे बढ़ावा दे रहे है | लेकिन वे करुतम्मा, परिक्कुट्टी और पलनी के त्रासद अंत के द्वारा वे पाठक के भीतर इस मिथक के प्रति आक्रोश की सृष्टि कर देते है और साथ ही भारतीय समाज में स्त्री को वश में रखने की पुरुष वर्ग की सदियों पुरानी मानसिकता को भी उजागर कर देते है | मछुआरा समाज न तो करुतम्मा और परिक्कुट्टी के प्रेम को स्वीकार कर पा रहा था और न करुतम्मा एवं पलनी के दाम्पत्य जीवन का सम्मान कर रहा था | तकषी ने इन तीनों की त्रासद परिणति के द्वारा भारतीय समाज की विसंगतियों को उघाड़कर रख दिया है |
सामान्यतः कोई रचनाकार अपनी रचना में किसी मिथक का उपयोग अपनी जीवन दृष्टि, युगीन मूल्य-बोध एवं युगीन यथार्थ की आवश्यकता के अनुकूल करता है | भारत ही नहीं, दुनिया भर की अनेक कालजयी कृतियाँ, मसलन-होमर का ‘इलिएड’ एवं ‘ओडिसी’, दांते का ‘डिवाइन कामेडिया’, इलिएट का ‘वेस्ट लैंड’ इत्यादि-मिथकों के आधार पर ही लिखी गई हैं | भारत में भी रामायण, महाभारत, रामचरितमानस, कामायनी और राम की शक्ति पूजा जैसी कालजयी रचनाएँ मिथक प्रधान हैं | युगीन सन्दर्भों में मिथकों के उपयोग का मूल कारण यह होता है कि मिथकों के पात्र और कथ्य शताब्दियों से हमारे जातीय मानस में इस कदर आत्मीय हो चुके हैं कि उनके माध्यम से कही जाने वाली बात संस्कारी पाठक के मन को कई स्तरों पर अधिक गहराई से झंकृत करती है | ‘चेम्मीन’ में मिथक के उपयोग को लेकर तकषी का तरीका बिल्कुल अलग है | वे युगीन मूल्य-बोध के सन्दर्भ में मिथक की तार्किकता और प्रासंगिकता पर कोई सवाल खड़ा नहीं करते है बल्कि उसके माध्यम से तत्कालीन सामाजिक विसंगतियों को उजागर कर देते है |
‘चेम्मीन में तकषी का जीवन दृष्टिकोण स्पष्ट और सहज मानवीय भावनाओं के अनुकूल है | ‘आधुनिक मलयालम साहित्य का इतिहास’ के लेखक पी. के. परमेश्वरन नायर के अनुसारआज तक प्रकाशित तकषी के उपन्यासों में चेम्मीन प्रथम है | इस रचना में तकषी की यथातथ्य रीति चरम सीमा तक पहुँच गई है | लेकिन कहानी का आरम्भ और विकास एक रूमानी कथा के रूप में है | उनके अन्य उपन्यासों की तरह इसमें वर्ग-संघर्ष की प्रतिध्वनि नहीं है लेकिन जीवन के गहरे मनोभावों को लेखक ने अधिकाधिक रूप से व्यक्त किया है |