Thursday, 30 January 2020

वसंत पंचमी......... अवरुद्ध मानसिकता को खोलने का उत्सव


वसंत पंचमी नाम सुनते ही पर सबसे पहले वर दे वीणा वादिनी पंक्ति स्मृति में कौंधती है। हमारे स्कूली दिनों में स्कूलों में धूमधाम से बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा होती थी, जिसकी तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थी | पूजा के बाद बेर, गाजर और लड्डू के प्रसाद का वितरण किया जाता था| आज भी पूजा होती होगी| लेकिन जबसे प्राइवेट स्कूलों का जोर पकड़ा, दिल्ली जैसे बड़े नगरों को तो छोड़ ही दीजिए, छोटे शहरों में भी सरस्वती पूजा कम होती गई | लेकिन ये सभी स्कूल महिना दिन पहले से क्रिसमस ट्री लगाना और सजावट शुरू कर देते है | वजह मात्र इनके संचालकों की कुत्सित और मैकाले मानसिकता है जो यह मानकर चलती है कि क्रिसमस मानाना आधुनिकता है, प्रगतिशीलता है, धर्मनिरपेक्षता है और सरस्वती पूजा करना पोंगापंथिता, कट्टरता और साम्प्रदायिकता है | ऐसे स्कूलों से हम किस तरह से यह अपेक्षा कर सकते है कि देश की सभ्यता, संस्कृति, धर्म दर्शन और इतिहास से बच्चों को अवगत कराते होंगे |
माँ सरस्वती के अनन्य उपासक सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने जब 'वर दे वीणा-वादिनी वर दे' की रचना की थी तब देश गुलाम था । निराला महज अज्ञान अंधकार से मुक्ति को लेकर चिंतित नहीं थे बल्कि वे तत्कालीन मनुष्य की चेतना को, उसकी चिंतन शक्ति को या आत्मा को ग्रसित करने वाली गुलामी से मुक्ति भी चाहते थे | इसलिए उन्होंने अपनी वंदना में ज्ञान रूपी आलोक पूरे देश में फ़ैलाने के साथ ही पूरे विश्व को जगमग करने की आकांक्षा रखते है | वे माँ सरस्वती से स्वयं के लिए ज्ञान के वरदान की कामना नहीं करते है बल्कि वे पूरे देश में स्वतंत्रता के अमृत मंत्र को गुंजित होने का वरदान मांगते है | वे जानते थे कि स्वतंत्रता रूपी अमृत मंत्र तभी गुंजायमान हो सकता है जब अज्ञान रूपी अंधकार, क्लेश और भेदभाव के बंधन समाप्त हो जाय | यह "तमसो मा ज्योतिर्गमय" अर्थात् 'अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की कामना' है| मनुष्य की महायात्रा महज भौतिक अंधकार को दूर करने की यात्रा नहीं है, यह मनुष्य की विषमताओं से जूझने की दृढ़ इच्छा शक्ति और अदम्य जिजीविषा का भी परिचायक है | इस तरह देश को पराधीनता से मुक्त कराने के लिए शक्ति की मौलिक कल्पना करने वाले निराला माँ सरस्वती से नयी गति, नयी वाणी, नया स्वर और नया आकाश देने की कामना करते है ताकि देश एक नयी ऊर्जा के साथ सृजन और विश्व कल्याण के पथ पर अग्रसर हो सके| आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि जिसे अपने देश से प्रेम है, उसे देश की प्रकृति और संस्कृति से भी प्रेम होगा | अन्यथा देश प्रेम महज दिखावटी होगा या आज के परिप्रेक्ष्य में कहें तो संविधान और तिरंगे की आड़ में किसी अन्य मंशा से प्रेरित होगा | निराला को अपने देश से प्रेम था इसलिए वे सरस्वती को धार्मिक और पौराणिक प्रतीकों से निकालकर पूरे देश में प्रतिष्ठित करते हैं| आज जब छायावादी आन्दोलन के प्रारंभ होने के 100 वर्ष बाद देश पर बाहरी और भीतरी विध्वंशक शक्तियों द्वारा आघात किया जा रहा है, देश को टुकड़े-टुकड़े करने के षड्यंत्र रचे जा रहे है, वसंतपंचमी के अवसर पर हम 'वर दे वीणा-वादिनी वर दे' के आह्वान द्वारा कुपढों, कुपाठियों और कुमार्गियों को सांस्कृतिक चेतना के साथ साथ भारतीयता की अनन्य चेतना से जोड़ने की उम्मीद कर सकते है |
ऋग्वैदिक काल में सरस्वती एक नदी के रूप में प्रवाहमान थी | तत्कालीन आर्य-सभ्यता के सारे गढ़ और नगर, शिक्षण संस्थाएं, ऋषियों की तपोभूमि और आश्रम सरस्वती नदी के तट पर बसे थे। वेदों और उपनिषदों की रचना इन्हीं आश्रमों में हुई थी। कालान्तर में ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों ने सरस्वती नदी को देवी का दर्जा दिया और तभी से सरस्वती सृजनात्मकता की प्रतीक हैं। ऋग्वेद में सरस्वती के प्रति श्रद्धा में कहा गया है कि ये परम चेतना हैं, ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। वसंतपंचमी के दिन सरस्वती की अर्चना वस्तुतः आर्य सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र में सरस्वती नदी की भूमिका के प्रति हमारी कृतज्ञता की भी अभिव्यक्ति है और हमारी अवरुद्ध मानसिकता के द्वारों को खोलने का उत्सव है।
भारत की सनातन परंपरा में किसी भी पर्व, त्यौहार या उत्सव का प्रकृति से अनन्य रूप से जुड़ा है | आज की जरूरतों के हिसाब से कहें तो सनातन परम्परा में पर्यावरण संरक्षण का एक दीर्घकालिक और प्रभावी प्रबंध किए गए हैं | समस्त भारतीय समाज आदिकाल से भी प्रकृति के साथ रस-भाव या सम-भाव से सराबोर रहा है | वसन्त पंचमी का उत्सव भी प्रकृति से जुड़ा हुआ है | वसंत को ऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है क्योंकि इस समय ठण्ड का मौसम उतार पर होता है और गर्मी का मौसम अभी शुरू नहीं हुआ होता है | इस कारण ऐसा माना जाता है कि पंचतत्त्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। पंचतत्त्व-जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपने मोहक रूप में होते हैं। यह अनायास नहीं है कि कवियों और कलाकारों को वसन्त ऋतु सहज ही आकर्षित करती है | केदार नाथ अग्रवाल की कविता बसंती हवाएक साथ महुआ और आम से लेकर अरहर, अलसी और सरसों की फसलों के मिले-जुले नैसर्गिक सौन्दर्य को अभिव्यक्त करती है| इसलिए पंचमी में वसंत पंचमी को सर्वश्रेष्ठ पंचमी माना जाता है और इसे श्री पंचमी भी कहा जाता है | यह उस विदेशी संस्कृति से बिल्कुल अलग है जिसमें वलेन्टाइन डे से लेकर बर्थ डे, वाथ डे तक  न जाने क्या क्या डे मनाया जाता है जहाँ प्रकृति के सरंक्षण के बजाय उसका उपभोग और दोहन होता है जबकि भारतीय सनातन परंपरा में मनुष्य और पर्यावरण में उपभोक्ता और उपभोग का संबंध नहीं है |

Friday, 24 January 2020

जेपी नड्डा की चुनौतियाँ........पार्टी के जोश को हाई रखना


भाजपा ने अपने संगठनात्मक चुनाव में जेपी नड्डा को निर्विरोध अध्यक्ष चुनकर पार्टी के भीतर न केवल लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्दता का स्पष्ट सन्देश दे दिया है बल्कि कम से कम अपनी उस धारणा को भी प्रदर्शित भी किया है कि वह उन राजनीतिक दलों जैसे नहीं है जिसकी नाभिनाल या तो परिवारवाद है या जहाँ परिवार की गुलामी की संस्कृति पार्टी का संविधान है | यह भारतीय राजनीति की विडंबना ही है कि जहां एक ओर देश की सबसे पुरानी पार्टी परिवारवाद से इस कदर चिपकी हुई है कि परिवार से इतर बुजुर्ग नेता सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से हटाने के लिए पार्टी कार्यालय से फेंकवाने में संकोच नहीं करती है तो नरसिम्हा राव जैसे कद्दावर नेता, पूर्व अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के शव को कार्यकर्ताओं के अंतिम दर्शन के पार्टी कार्यालय में रखे जाने से भी रोक दिया जाता है वही दूसरी ओर भाजपा पार्टी के एक आम कार्यकर्ता भी अध्यक्ष पद पर विधिवत ताजपोशी कर रही है | एक ओर पिछले दो दशक में जहां भाजपा में लगभग दस ऐसे लोगों ने अध्यक्ष पद की कमान संभाली कभी पार्टी के आम कार्यकर्ता थे, वहीं कांग्रेस पार्टी एक परिवार के अलावा अन्य किसी को इस लायक नहीं समझ सकी कि उसे पार्टी की कमान सौंपी जा सके। इस तरह पार्टी के भीतर वंशवाद और लोकतंत्र के विमर्श या संघर्ष में भाजपा देश की सबसे पुरानी पार्टी के ऊपर अपनी लोकतान्त्रिकता को स्थापित किया है | क्षेत्रीय दलों की तो भाजपा से तुलना ही नहीं की जा सकती है क्योंकि उनका तो जन्म ही परिवारवाद की कोख से हुआ है जिनसे लोकतांत्रिक तौर-तरीकों के पालन की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है |

पार्टी की यही लोकतांत्रिकता नए अध्यक्ष जेपी नड्डा की सबसे बड़ी चुनौती है | भले ही पार्टी ने शीर्ष पदों पर वंशवाद को हावी नहीं होने दिया है, लेकिन पार्टी नेताओं के पारिवारिक सदस्यों की पहुँच से परे बिल्कुल नहीं है | पार्टी में पारिवारिक सदस्यों का स्थान लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के तहत तय करना होगा | 

भाजपा अध्यक्ष के सामने दो व्यापक चुनौतियां हैं-उतराधिकार में प्राप्त संगठनात्मक मजबूती को बरकरार रखना और आगामी चुनावों के संगठन एवं कार्यकर्ताओं के बीच जोश को बनाए रखना |  अमित शाह ने अपने साढ़े पांच कार्यकाल में दोनों जिम्मेदारियों को केवल बखूबी निभाया | जेपी नड्डा को भी इस सिलसिले को कायम रखना होगा| इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उम्मीदों पर खरा उतरने की अतिरिक्त चुनौती है और यह तभी कायम हो सकता है कि जब आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा उल्लेखनीय सफलता हासिल करेगी | उनके कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद से हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी को अभी तक निराशा ही हाथ लगी लेकिन उन्होंने संगठनात्मक मजबूती और कार्यकर्ताओं के जोश को कमजोर होने नहीं दिया है और इसी का इनाम उन्हें मिला है |
नड्डा के लिए तात्कालिक चुनौती भाजपा को दिल्ली में सत्ता में वापस लाना है, जहाँ वह पिछली बार 1998 में सरकार में थी। भाजपा को दिल्ली के मुख्यमंत्री आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल की सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। केजरीवाल सरकार को अपनी लोकलुभावन नीतियों पर भरोसा है, जिससे भाजपा को पार पाना असंभव तो नहीं, लेकिन मुश्किल अवश्य हो रहा है। दिल्ली में भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद के लिए अभी तक कोई सशक्त चेहरा नहीं है|
लेकिन जेपी नड्डा की असली अग्निपरीक्षा इस साल के अंत में बिहार विधानसभा चुनाव में होगी, जहाँ से उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत पटना विश्वविद्यालय में एक छात्र नेता के रूप में की थी| बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू अध्यक्ष, चतुर राजनेता नीतीश कुमार बिहार में एक वरिष्ठ की भूमिका का दावा छोड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे | नड्डा के सामने नीतीश कुमार के साथ ही लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के साथ अपने मोलभाव के कौशल का इस्तेमाल करते हुए बिहार में भाजपा के आधार को आक्रामक तरीके से बढ़ाना एक अहम चुनौती है |
2021 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के किले को तोड़ना नड्डा के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक पश्चिम बंगाल चुनाव को भाजपा के लिए अंतिम मोर्चा कहते हैं | इसके साथ उसी वर्ष असम में सत्ता विरोधी लहर को मात देने का कठिन कार्य भी होगा। पिछले साल दिसंबर में संसद द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पारित किए जाने के बाद से असम विरोध प्रदर्शन की चपेट में है। नड्डा के पास उन सभी राज्यों में पार्टी के कैडरों को पुनर्जीवित करने का एक कठिन कार्य है, और यह सुनिश्चित भी करना है कि पार्टी उन राज्यों में सत्ता नहीं खोये जहां वह सरकार चला रही है।
इस प्रक्रिया में दूरगामी दृष्टिकोण रखते हुए सहयोगी दलों के बीच भरोसा बनाए रखना भी होगा | भाजपा नेतृत्व द्वारा सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने की बात बार-बार दोहराए जाने के बावजूद भाजपा के "बड़े भाई दृष्टिकोण" से सहयोगी अधिक असहज हो गए हैं। हाल ही महाराष्ट्र में शिवसेना के अलग होने बीजेपी को तगड़ा झटका लगा है जिसकी भरपायी भाजपा ने पहले की है लेकिन अब उसे नए सिरे से करना है | भाजपा ने पुराने सहयोगी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) के बिना अकेले ही झारखंड विधानसभा चुनाव लड़ा। जिससे भयानक हार का सामना करना पड़ा।
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद लंबे समय से गठबंधन के सहयोगी, जेडीयू और शिरोमणि अकाली दल भाजपा के साथ असहज महसूस कर रहे हैं। कई सहयोगियों ने खुले तौर पर भाजपा के प्रमुख प्रोजेक्ट, पैन-इंडिया नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) के प्रति असहमति व्यक्त कि है| भाजपा अध्यक्ष होने के नाते एनआरसी को लेकर सहयोगी दलों की आशंकाओं को दूर करना और उन्हें साथ बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है | खासकर तब जब विपक्षी खेमा राज्य-विशेष स्तर पर भाजपा-विरोधी (मोदी विरोधी पढ़ें) गठबंधन को एकजुट करने की कोशिश कर रहा है।
अमित शाह ने अपने साढ़े पांच वर्षों के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी के लोकप्रिय व्यक्तित्व को बरकरार रखा | सरकार और उसकी योजनाओं के साथ पार्टी का तालमेल स्थापित करते हुए 2019 के लोकसभा चुनाव में 303 से अधिक सीटो पर जीत दर्ज करने में अहम भूमिका निभायी थी | 2019 से पहले कई राज्यों में जहां भाजपा ने विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था वहाँ भी लोकसभा चुनाव में पार्टी को 50 प्रतिशत से अधिक वोट मिले। इसमें कोई संशय नहीं कि नड्डा ने 2014 और 2019 के संसदीय चुनावों में रणनीतिकार के रूप में अपनी भूमिका निभाई थी लेकिन अब नड्डा स्वयं सूत्रधार की भूमिका में हैं | इसलिए, नड्डा की सबसे बड़ी चुनौती मोदी लहर को बरकरार रखना है।


Tuesday, 29 October 2019

तमसो मा ज्योतिर्गमय....... चेतना की अंधकारग्रस्तता से मुक्ति का पर्व


प्रकाश भारतीय वांग्मय और विज्ञान की समस्त ज्ञान और ऊर्जा परंपरा का अभिन्न अंग है | छांदोग्य उपनिषद के अनुसार प्रतिपल परिवर्तित प्रकृति का समस्त सर्वोत्तम रूप प्रकाश है। वृहदारण्यक उपनिषद में "तमसो मा ज्योतिर्गमय" अर्थात् 'अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की कामना' है | गीता में अर्जुन ने श्री कृष्ण के विराट रूप देखकर कहा कि दिव्य सूर्य सहस्त्राणि यानी सहस्त्रो सूर्यों का प्रकाश देख रहा हूं। दीपावली भारत की इसी सनातन ज्योतिर्गमय आकांक्षा का सांस्कृतिक पर्व है। भारत की सनातन संस्कृति में दीपावली का धार्मिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से व्यापक महत्व है |
दीप प्रकाश का आदिम एवं लघु स्रोत है जिसके द्वारा मानव ने चिरकाल से अंधकार से लड़ते-जूझते हुए आधुनिक विद्युत् प्रकाश तक सभ्यता की महायात्रा पूरी की है | लेकिन यह महायात्रा महज भौतिक अंधकार को दूर करने की यात्रा नहीं है, यह मनुष्य की विषमताओं (अंधकार) से जूझने की दृढ़ इच्छा शक्ति और अदम्य जिजीविषा का भी परिचायक है | आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, ‘‘दीवाली आकर कह जाती है कि अंधकार से जूझने का संकल्प ही सही यथार्थ है। उससे जूझना ही मनुष्य का मनुष्यत्व है। जूझने का संकल्प ही महादेवता है। उसी को प्रत्यक्ष करने की क्रिया को लक्ष्मी-पूजा कहते हैं।’’
हमारे हर अच्छे-शुभ कार्यों में, निजी या सामाजिक, दीप जलाने की परंपरा है। दीपावली की ऐतिहासिक-पौराणिक पृष्ठभूमि में कई घटनाएँ और मान्यतायें है जिनके उपलक्ष्य में इस दिन राजमहल और अट्टालिकाओं से लेकर गरीब की झोपड़ी तक को दीपों से सजाने की परंपरा है। पूरे भारतवर्ष में अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने-अपने क्षेत्र की मान्यता, संस्कृति, शास्त्र विधि और महत्व के अनुसार दिवाली मनाते हैं | दीया जलाने का एक अहम पहलू यह है कि एक दीये से दूसरा, दूसरे से तीसरा, चौथा या इस तरह अनेक दीये जलाये जाते है | एक विद्युत् बल्ब से दूसरा बल्ब नहीं जलाया जा सकता है लेकिन दीये द्वारा यह संभव है | इस तरह दीये जलाने की प्रक्रिया एक सामाजिकता का सन्देश देती है कि एक प्रकाशवान या चेतना संपन्न व्यक्ति अन्य प्रकाशरहित दीयों अर्थात् निर्धन या अक्षम लोगों को प्रकाशवान या सबल बना सकता है | यह दीपावली की यही सामाजिकता "सर्वे भवंतु सुखिन:" की भावना को चरितार्थ करती है |
वैदिक ऋषियों ने दैवीय सत्ता से "तमसो मा ज्योतिर्गमय" अर्थात् 'अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की कामना' की है। इस कामना का अर्थ यह नहीं है कि वैदिक ऋषियों और मनीषियों ने महज भौतिक अंधकार, जो रात्रि में या प्रकाश की उपलब्धता नहीं होने से होती है, से बाहर निकालने की इच्छा व्यक्त की है | प्रकृति में पूर्णिमा की ज्योत्स्ना और अमावस्या की कालिमा दोनों हैं। अंधकार से प्रकाश और प्रकाश से अन्धकार की ओर जाना अर्थात् निशा के बाद उषा और उषा के बाद निशा का आना प्राकृतिक परिघटना है | लेकिन वैदिक ऋषि की अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की कामना के साथ "असतो मा सद्गमय" और "मृत्योर्मा अमृतं गमय" अर्थात् 'असत्य से सत्य की ओर' और 'मृत्यु से अमरता की ओर' ले चलने की प्रार्थना को भी देखें तो उनकी कामना का मंतव्य समझा जा सकता है| असल में वैदिक ऋषि प्रकृति में सहज रूप से घटित होने वाले अंधकार को लेकर चिंतित नहीं थे, बल्कि वे उस अंधकार से मुक्ति को लेकर चिंतित थे जो मनुष्य की चेतना को, उसकी चिंतन शक्ति को या आत्मा को ग्रसित करता है| भारतीय दर्शन का सम्पूर्ण चिंतन चेतन तत्व को अज्ञान और अविद्या से मुक्ति को लेकर है जो सम्यक ज्ञान और विवेक शक्ति के द्वारा ही संभव होता है | दीपावली में मिट्टी के दीये जलाये जाते है| आध्यात्मिकों के अनुसार हमारा यह शरीर भी मिट्टी से बना है, जो मिट्टी के दीये का प्रतीक है जिसमें आत्मा रूपी लौ जल रही है| लेकिन हमारी आत्मा या चेतना अहंकार, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, मद जैसे नाना प्रकार के व्यामोह से ग्रस्त होती है| जिसके कारण वह सत्य-असत्य, अच्छाई-बुराई, उपकार-अपकार और नाश-निर्माण का भेद नहीं कर पाता है| हमारे वैदिक ऋषियों ने इसी अज्ञान, अविवेक और अविद्या के अन्धकार से मनुष्य की चेतना को बाहर निकालने या आत्मा रूपी लौ को प्रज्जवलित करने की कामना की है | यह सतत चलने वाली प्रक्रिया है क्योंकि हमारी चेतना का अंधकार से प्रकाश की ओर गमन प्रकृति की तरह सहज या स्वाभाविक नहीं है इसलिए प्रकाश की साधना होती रहनी चाहिए| मनुष्य की चेतना के अंधकार ग्रस्त होने के कारण ही समाज में मानव-मूल्यों का ह्रास होता है, समाज में अराजकता होती है, परिवार बिखरने लगता है, नैतिक मूल्य नष्ट हो जाते है, संस्कारविहीनता और भ्रष्ट-आचरण को बढ़ावा मिलता है, रक्तपात, अपराधिक और हिंसक गतिविधियाँ बढ़ती है| ऐसी ही विषम परिस्थितियों, जो सम्पूर्ण मानवता, मानव गरिमा के साथ-साथ पारिस्थितिकी के सम्पूर्ण तंत्र के अस्तित्व के लिए खतरा बन जाती है, के सन्दर्भ में ही वैदिक ऋषियों और मनीषियों ने "तमसो मा ज्योतिर्गमय" की प्रार्थना की है| यह कामना प्रत्येक मनुष्य के भीतर से होनी चाहिए तभी वह प्रकाश की ओर जाने के लिए अग्रसर होगा| गौतम बुद्ध ने जब कहा था कि अप्प दीपो भवः तो उसका तात्पर्य यही था कि अपना दीपक स्वयं बनो| कोई भी किसी के पथ के लिए सदैव मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकता केवल आत्मज्ञान के प्रकाश से ही हम अपने भीतर के अंधियारे को दूर कर सकते है और सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर के अर्थात् के अँधियारेपन के कारणों को स्वयं पहचानना और स्वयं दूर करना पड़ेगा| यही दीपावली के प्रकाश पर्व का सन्देश है कि अंत:करण को शुद्ध एवं पवित्र रखते हुए और अपनी चेतना, अपनी आत्मा में प्रकाश का संचार करते हुए ज्ञान का, धर्म का और कर्म का दीप जलाओ।
जहाँ तक मानव मूल्यों की बात है तो ये सदियों से निरंतर विकसित, परिवर्तित और परिवर्धित होते रहते है लेकिन सबसे बड़ा और शाश्वत मानव मूल्य है परहित अर्थात् दूसरों के कल्याण में रत रहना क्योंकि यह एक ऐसा मानव मूल्य है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है और मानवीय गरिमा और मानवता को उच्चता प्रदान करता है| इस महान मूल्य से भटक जाना या भूल जाना ही हमारी चेतना की अंधकारग्रस्तता है जिससे मुक्ति की कामना हमारी सनातन परंपरा में बार-बार दोहरायी गई है | चेतना की अंधकारग्रस्तता के कारण मनुष्य की विवेक शक्ति कुंद हो जाती है| अपने अहंकार में वह भूल जाता है कि वह जो कदम उठाने जा रहा है वह उसके लिए या स्वयं उसकी संततियों के लिए या परिवार और समाज के लिए कितना कल्याणकारी है | तात्पर्य यह है कि मनुष्य का अहंकार शाश्वत मानव मूल्य 'परहित' के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन जाता है | इस अहंकार से मुक्त होना ही अपनी चेतना को प्रकाश की ओर ले जाना है | मनुष्य अपनी ज्ञान-शक्ति और विवेक-शक्ति से जब तक दूसरों के कल्याण या दूसरों के लिए जीने का सत्य का साक्षात्कार नहीं करता है तबतक वह मानव-अस्तित्व और सदियों से संजोयी मानवीय संस्कृति को खोखला करता रहेगा |
भारत में पर्वों और उत्सवों का खास संबंध ऋतुओं की विविधता से होता है | दीपावली का संबंध शरद ऋतु से है जिसके बारे में कहा गया है कि 'जीवेम शरदः शतम्' और इस ऋतु के दौरान प्रकृति के अनुपम सौंदर्य का वर्णन कालिदास के साहित्य में मिलता है | शरद यानी जागृति, वैभव, उल्लास और आनंद का मौसम। गंदेपन से मुक्ति का मौसम। 'रामचरितमानस' में तुलसीदास भी शरद ऋतु के सौन्दर्य पर मोहित हैं-"बरषा बिगत सरद रितु आई, लछिमन देखहु परम सुहाई। फूलें कास सकल महि छाई, जनु बरषा कृत प्रगट बुढ़ाई।" (हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा ऋतु बीत गई और परम सुंदर शरद् ऋतु आ गई है। फूले हुए कास से सारी पृथ्वी आच्छादित है। जैसे वर्षा ऋतु अपना बुढ़ापा प्रकट कर रही हो)। वह आगे लिखते हैं- "रस-रस सूख सरित सर पानी, ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी। जानि सरद रितु खंजन आए, पाई समय जिमि सुकृत सुहाए।" (नदी और तालाबों का जल धीरे-धीरे सूख रहा है, उसी तरह जैसे विवेकी पुरुष ममता का त्याग करते हैं। शरद ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गए, जैसे समय पाकर सुंदर सुकृत आ जाते हैं यानी पुण्य प्रकट हो जाते हैं)। दीपावली इसी शरद् ऋतु के अनुपम सौंदर्य और समृद्धि के प्रति मनुष्य के आंतरिक उल्लास की अभिव्यक्ति है|


Wednesday, 25 September 2019

स्त्री-सुरक्षा की त्रासदी और नवरात्रि का संकल्प


नवरात्रि में नारी शक्ति की उपासना होती है, जो नारी को स्वयं की एवं शेष समाज को उसकी शक्ति की याद दिलाता है, शक्ति को अनुभूत कराता है| शक्ति प्राणी मात्र की सृष्टि और उर्जा की इकलौती स्त्रोत है जिसके बिना प्राणी शव के समान होता है | सृष्टि, रक्षा तथा संहार ये तीनों क्रियाएं शक्ति द्वारा ही संपन्न होती हैं। इसीलिए देवी को त्रिगुणात्मक कहा गया है। नवरात्रि में भारत में कन्याओं को देवी तुल्य मानकर पूजा जाता है| यह सिर्फ मिथकीय पूजा नहीं, यह स्त्री के सम्मान, सामर्थ्य और उसके स्वाभिमान की पूजा है| भारतीय संस्कृति में ईश्वर के रूप की प्रथम कल्पना मातृरूप में की गई है जिसमें कोई दूषित भावना और छल-कपट नहीं रहता| लेकिन त्रासदी यह है कि जिस कन्या को समाज में देवी का रूप माना जाता है, उसके साथ तरह-तरह के जघन्य अपराधों को अंजाम दिया जाता है। नारी शक्ति की मान्यता तथा वास्तविक जीवन में नारी के प्रति आचरण में अंतर की खाई चौड़ी हो गई है, क्योंकि स्त्री के सम्मान के प्रति सामाजिक और राजनीतिक के साथ-साथ मानसिक-आत्मिक संवेदनशीलता कम हो गई है। शर्मनाक तो यह है कि पुरुषों का एक बड़ा वर्ग इसे सामान्य व्यवहार मानता है| कुछ अर्थलोलुप भस्मासुरों ने स्त्रियों के साथ घिनौने कर्मों को अपना व्यवसाय बना लिया है | एक तरफ जहां नवरात्र में देवी मां की बड़ी तन्मयता के साथ पूजा की जाती है, भगवती जागरण होते हैं, वहीं नवरात्र के ठीक बाद से ये लोग उसी देवी के रूप कन्याओं और महिलाओं का शोषण और उनका अपमान करने से थोड़ा भी नहीं हिचकते|

स्वामी विवेकानन्द का कथन है- ''किसी भी राष्ट्र की प्रगति का सर्वोत्तम थर्मामीटर है, वहाँ की महिलाओं की स्थिति| जिस समाज में स्त्री का स्थान सम्मान और गौरव का होता है, वही समाज सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होता है। कड़वा सत्य है  कि 21वीं सदी के बदलते भारत में ना तो समाज की सोच बदली है और ना ही हमारे देश की बेटियों के प्रति समाज की दूषित मानसिकता में सुधार आया है। समय बदल रहा है, परंपराएं बदल रही हैं, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य भी बदल रहे हैं। भूमंडलीकरण के प्रभाव से नए दृष्टिकोण और नए मूल्य स्थापित हो रहे हैं, लेकिन महिलाओं की स्थिति में खास बदलाव नहीं आया| सरकारें और प्रशासन महिलाओं की सुरक्षा के लिए अत्यंत ही गैर जिम्मेदार रवैया अपनाती है | हमारे देश में महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर बहुत सी फिल्में बनती हैं। इस विषय पर सेमिनार होते हैं, अनगिनत सम्मेंलन होते हैं लेकिन समाज की सोच में कोई बदलाव नहीं आता| लोग फिल्म देखने के बाद उसके टिकट फाड़ देते हैं, सेमिनार और सम्मेलनों में आंखें बंद करके दूसरे विचारों में खो जाते हैं और कन्याओं और महिलाओं के साथ ऐसे ही अमानवीय व्यवहार होता रहता है| ना तो ज़मीनी हकीकत बदलती है और ना ही महिलाओं की स्थिति में सुधार आता है।

कहा जाता है कि जब-जब आसुरी शक्तियों के अत्याचार से जीवन, मानवता, समाज और संस्कृति तबाह होती है। तब-तब शक्ति का अवतरण होता है| आधुनिक परिवेश में शाब्दिक अर्थों में अवतरण संभव नहीं बल्कि शक्ति का संधान संभव है | हिंदुस्तान जब गुलाम था तब भारतेंदु से लेकर मैथिलीशरण गुप्त और निराला एवं प्रसाद ने देश की जनता को अपनी शक्तियों को साधने, आराधन करने और समन्वय करने का बार-बार आह्वान किया है | उनका यह आह्वान व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर है, जो इस बात का प्रतीक है कि हमें अपने से बाहर के असुर भाव को नष्ट करना आवश्यक नहीं है बल्कि भीतर के असुर को भी नष्ट करना होगा, तभी महिलाओं और अन्यों के प्रति दूषित मानसिकता से मुक्त हुआ जा सकता है | निराला के राम द्वारा अनन्य समर्पण के साथ शक्ति पूजा के बाद ही शक्ति होगी जय होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन का आश्वासन देती है| वस्तुतः शक्ति मनुष्य में समाहित वह शक्ति है जिसे यदि पहचाना जाय, जगाया जाय तो मनुष्य हर पल और हर क्षण अपने भीतर के दुर्गुणों के ऊपर जीत हासिल कर सकता है | स्त्री शक्ति का आदर एवं सम्मान हमारे स्वभाव में समाहित होना चाहिए | नवरात्र और उसमें शक्ति की आराधना और उपासना से हमें व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर अपने भीतर के आसुरी भाव या दूषित मानसिकता को नष्ट करना होगा | यह सुनिश्चित करना होगा कि देवियों और कन्याओं का पूजन नवरात्र तक ही सीमित न रहे। इसके लिए आवश्यक है कि समाज में स्त्रियों के सम्मान के प्रति एक सकरात्मक वातावरण तैयार हो | इसके बिना समाज में घूम रहे महिषासुरों का वध करना संभव नहीं होगा | महिलाओं के प्रति अपराधों को रोकना अकेले पुलिस, प्रशासन और राजव्यवस्था की ज़िम्मेदारी नहीं है। ये तंत्र हर जगह मौजूद नहीं हो सकते लेकिन समाज हर जगह मौजूद है और समाज को कन्याओं और महिलाओं के प्रति अपनी सोच बदलनी पड़ेगी| कन्याओं और महिलाओं को समाज में गरिमामयी और सुरक्षित स्थान प्रदान किये बिना एक सभ्य समाज और बेहतर मानवीय संस्कृति की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती | यह तभी संभव जब आज की परिस्थितियों में नवरात्र के उपवास और उपासना के बहाने हम अपनी दुष्प्रवृतियों को नष्ट कर आत्मिक शुद्धि कर सकें और अपनी जीवनशैली में सुधार ला सकें | नवरात्रि की उपासना शरीर और आत्मा के बीच एक रागात्मक संबंध स्थापित करती है। दूसरे शब्दों में कहें, यह केवल ईश्वर के प्रति समर्पण नहीं बल्कि स्वयं को अनुशासित करने का संधान भी है।


Monday, 16 September 2019

भारतीय भाषाओँ की अस्मिता की समग्रता है हिन्दी

नई शिक्षा नीति के ड्राफ्ट में हिंदी को प्रमुखता देने की खबर के बाद मैकाले मानस-पुत्रों को अन्य भाषाओँ का गला घोंटने और रोजी रोटी छीनने के षड्यंत्र का एहसास होने लगा । इस हाय-तौबा में उन लोगों की आवाज सबसे अधिक ऊँची थी, जिनका भारतीय भाषाओँ से संबंध मात्र उतना ही है जितना वह भाषा उनकी सियासी जरूरतों एवं आकांक्षाओं को पूरा करने का माध्यम भर है या उन लोगों की थी जो अंग्रेजी को काबिलियत की एकमात्र कसौटी मानते है| दक्षिण भारतीय नेताओं, लोगों और पार्टियों ने बेसुरा राग अलापते हुए हिंदी विरोधी गैर जिम्मेदाराना बयान दिया भी दिया था |
आजादी के बाद से ही गैर हिंदी विशेषकर दक्षिण भारतीय नेताओं और पार्टियों को जब भी हिंदी के विरोध से सियासी रोटी के पकने की संभावना दिखी, तब-तब उन्हें कथित भाषाई अस्मिता को हिंदी से खतरा नजर आने लगता है। आजादी के आंदोलन में और आजादी के पूर्व भी गैर-हिंदी भाषी लोगों ने हिंदी को अपनाया। माधवराव सप्रे, विनोबा भावे, बाबूराव विष्णु पराड़कर, वी. कृष्णस्वामी अय्यर, शारदाचरण मित्र, सुनीतिकुमार, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, केशवचंद्र सेन ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं कि गैर हिंदी प्रदेशों के विद्वानों और नेताओं ने हिंदी को लेकर पूरे देश को एकजुट करने का उपक्रम किया था। शंकरराव कप्पीकेरी ने तो यहाँ तक माना है कि हिन्दी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है| अनंत गोपाल शेवड़े ने स्वीकार किया है कि राष्ट्रभाषा हिन्दी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ एक दूसरे की हमजोली हैं | लेकिन कालांतर में इस तथ्य की उपेक्षा कर भाषा को राजनीति के औजार के तौर पर उपयोग किया गया। वास्तव में राजनीतिक, प्रशासनिक और व्यावसायिक हितों को बनाए रखने के लिए दक्षिण भारतीय राजनीतिज्ञों ने हिंदी का विरोध किया और अपनी मातृभाषाओँ के बजाय अंग्रेजी को प्रश्रय दिया | इसकी परिणति आज यह हुई है कि हिंदी के प्रभाव से नहीं बल्कि अंग्रेजी के वर्चस्व से दक्षिण भारतीय भाषाएँ हाशिए पर सिमटने को विवश है। अंग्रेजी का वर्चस्व इतना है कि उसके सामने सभी भारतीय भाषाओं की सामूहिक शक्ति भी लाचार सी हो गई है।
सच्चाई यह है कि जब भी अंग्रेजी के प्रभाव से मुक्त होने की बात या कोशिश होती हैकुछ लोगों और क्षेत्रों को हिंदी थोपे जाने का डर सताने लगता है। इसका कारण यह है कि मैकाले मानस-पुत्रों ने सम्पूर्ण प्रशासनिक या राजनीतिक मशीनरी को इस तरह से अपने शिकंजे में जकड़ रखा है कि हमारे नेता उनके जाल में उलझ गये है तात्पर्य है कि अंग्रेजीदां लोगों ने बड़े ही धूर्ततापूर्ण तरीके से एक ओर भाषा के प्रश्न को सियासत का प्रश्न बना दिया है और विकल्प के रूप में अंग्रेजी से चिपकने के लिए विवश किया है। दरअसल ये पूरे तौर पर एक षड्यंत्र है, और षड्यंत्रकारियों को पता है कि अंग्रेजी को विस्थापित करने का काम भारतीय भाषाओं की एकजुटता के बगैर संभव ही नहीं है, इसलिए वे हिंदी के वर्चस्व का भ्रम फैलाते है| ऐसी स्थिति में भारतीय भाषाओं के बीच ये विश्वास पैदा करने का काम हिंदी का है कि हिंदी किसी भी अन्य भारतीय भाषा के विकास में बाधक नहीं, बल्कि साधक है| भारतीय भाषाओं और हिंदी के ऐतिहासिक संबंधों की पड़ताल करें तो यह पाते हैं कि हिंदी ने किसी भी अन्य भारतीय भाषा का कभी कोई अहित नहीं किया। न ही उनके अस्तित्व को कभी चुनौती दी। हिंदी समावेशी भाषा है। हिंदी अन्य देशी-विदेशी भाषाओँ के नवीन प्रचलित शब्दों को तेजी से अपने भाषा भंडार या भाषा चेतना में शामिल कर लेती है, लेकिन उस भाषा विशेष के अस्तित्व के लिए कभी खतरा नहीं बनती।
अँगरेजी मानसिकता से पोषित तथाकथित विद्वानों और नेताओं का तर्क है कि आधुनिक ज्ञान विज्ञान और संचार प्रौद्योगिकी का विकास अंग्रेजी बोले जाने वाले देशों में ही हुआ है जिसके कारण यह भाषा आधुनिक ज्ञान विज्ञान और संचार प्रौद्योगिकी के विकास की सहगामिनी है । लेकिन यह कपटी तर्क है। जापान, जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों ने विकास के लिए कभी भी अंग्रेजी को माध्यम नहीं बनाया । फिर भी ये देश आधुनिक ज्ञान विज्ञान और उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकसित देशों की क़तार में खड़े है और आर्थिक विकास की दौड़ में तो भारत से काफ़ी आगे है जहाँ अंग्रेजी के पीछे अंधी दौड़ बच्चे के जन्म लेने के साथ ही शुरू हो जाती है। भाषा और भावना साथ-साथ चलती है| अपनी भावना को व्यक्त करने के लिए भाषा बहुत जरूरी है और यह मातृभाषा में ही संभव है| वर्तमान समय भारतीय समाज में जो मूल्यहीनता है वह इसी जमीन से कटे होने का परिणाम है। ये अच्छा नहीं है, देशहित में नहीं है|
हिंदी या कोई भारतीय भाषा यदि इस क्रांति के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल रही है तो यह उस भाषा की कमी नही है बल्कि उस समाज की कमी है जो उस भाषा में अपने को संप्रेषित या अभिव्यक्त करता है और अपनी भाषा को पिछड़ा हुआ मानकर सूचना, संचार और आधुनिक नवीन प्रौद्योगिकी से जुड़ने की चाहत में इस कपटी तर्क को सत्य मान लेता है कि अंग्रेजी भाषा के माध्यम से ही विकास के शीर्ष स्तर पर पहुंचा जा सकता है। भारतीय भाषाएँ अतीत काल से ही समृद्ध रही है। इतिहास गवाह है कि मानव सभ्यता के प्रारंभिक चरण हडप्पा काल से ही भारत ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अन्यों से काफी आगे रहा है और भारतीय भाषाएँ इसकी वाहक रही है । पुरातात्विक खुदाइयों से प्राप्त शिलालेखों और मृदभांडों से लेकर प्राचीन ग्रंथों में जिस तरह से राजनीति, अर्थनीति, सैन्य नीति, सामाजिक रीति-रिवाजों, नैतिक मान्यताओं, रहन-सहन, खान-पान और वेश-भूषा की अभिव्यक्ति हुई है वह न केवल भारतीय भाषाओँ के ऐतिहासिक विकास का साक्ष्य है बल्कि इन भाषाओँ की अभिव्यक्ति क्षमता का निदर्शन भी है । भारतीय भाषाओँ की यह समृद्धि उस मानसिकता पर सवालिया निशान खड़ा करती है जो हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओँ को आधुनिक ज्ञान विज्ञान और संचार प्रौद्योगिकी के विकास को अभिव्यक्त करने में सक्षम नहीं मानते है।