Thursday, 8 August 2019

भारतीय राजनीति की सुषमा चली गई


जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक दर्जे में बदलाव को लेकर देश भर में ख़ुशी और उत्साह की लहर पूरे उफान पर थी तभी भारतीय राजनीति की सबसे लोकप्रिय और महिला नेताओं के लिए रोल मॉडल सुषमा स्वराज की असामयिक निधन की दुखद खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया | हृदयाघात से कुछ ही घंटे पहले किए अपने अंतिम ट्विट में कश्मीर के मुद्दे पर सुषमा जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रिया अदा करते हुए लिखा कि 'मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने का इंतजार कर रही थी|' इससे पता चलता है कि पूरे राजनीतिक कार्यकाल के दौरान कश्मीर उनके दिल के कितना करीब रहा| अटल बिहारी वाजपेयी के इस्तीफ़े के बाद नई सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर 11 जून 1996 को उन्होंने लोकसभा में कश्मीर मसले पर जो जोरदार भाषण दिया था, वह इतिहास में दर्ज है| सुषमा स्वराज ने अपने इस भाषण में धारा 370 की समाप्ति को लेकर बीजेपी के उस बड़े फैसले की नींव रखी थी, जिसे मौजूदा सरकार ने पूरा कर उनके सपने को उनकी आंखों के सामने ही पूरा किया |
मात्र 25 साल की उम्र में चौधरी देवीलाल के हरियाणा सरकार में मंत्री बनने से लेकर भारत की विदेश मंत्री बनने तक असीम गरिमा और शालीनता की प्रतिमूर्ति सुषमा स्वराज सच्चे अर्थों में भारतीय परंपरा और आधुनिकता की मिसाल थीं। सुषमा के व्यक्तित्व की खास पहचान थी अनुशासन और पाबंदी के साथ विलक्षण भाषण-शैली और अद्भुत ज्ञान, जिसके कारण वह संसद से लेकर सड़क तक बेहद लोकप्रिय थी | ट्विटर और सोशल मीडिया जैसे तकनीकी माध्यमों में दक्ष सुषमा स्वराज ने आजीवन परंपराओं का भी निर्वाह किया। साड़ी के साथ मंगलसूत्र, सिंदूर और गोल बिंदी उनकी पहचान थी। अपने राजनीतिक सफ़र में सात बार संसद सदस्य और तीन बार विधान सभा सदस्य रही| अटल सरकार में स्वराज ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में दूरसंचार, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण और संसदीय मामलों के विभागों की मंत्री रही जबकि 2014 में मोदी सरकार में विदेश मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने भारत-पाक और चीन-भारत संबंधों सहित कई रणनीतिक-संवेदनशील मुद्दों को संभाला। भारतीय और चीनी पक्षों के बीच सबसे चुनौती पूर्ण डोकलाम गतिरोध को सुलझाने में एक सख्त सेनानी की तरह अडिग रही |
उनकी तथ्यों और तर्कों के साथ वाक्पटुता और हाजिरजवाबी का ही कमाल रहा है कि उनके जीते जी सोशल मीडिया पर उनके ऐतिहासिक भाषणों और साक्षात्कारों का विडियो माननीय अटल जी के बाद सर्वाधिक शेयर किया जाता रहा है और आज जब वे नहीं तो भी उनके ऐतिहासिक भाषणों और साक्षात्कारों का विडियो शेयर कर भी लोग उन्हें याद कर रहे हैं| इन्हीं में से एक विडियो करगिल युद्ध के बाद का है, जिसमें सुषमा स्वराज पाक की धरती पर ही वहां के एक न्यूज चैनल के साथ इंटरव्यू में आतंकवाद, करगिल युद्ध और सीमा पर सीजफायर उल्लंघन सहित कई मुद्दों को लेकर पाकिस्तानी हुक्मरानों और उनके रवैये को लेकर मुंहतोड़ जवाब देती दिख रही हैं। इस इंटरव्यू को सोशल मीडिया पर खूब पसंद किया जा रहा है। इस वीडियो में भारत द्वारा परमाणु बम बनाने और  हथियार खरीदने के आरोप का जवाब देते हुए सुषमा स्वराज सुप्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता के माध्यम से भारत की विदेश नीति को भी बड़े ही रोचक और सरल अंदाज में स्पष्ट कर दिया है- क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो...उसको क्या जो दंतहीन,विषरहित, विनीत, सरल हो। इसका मतलब यह है कि अगर आप शक्तिशाली हैं तभी लोग आपका सम्मान करेंगे। इसलिए हम परमाणु बम भी बनाते हैं लेकिन शांति को लेकर हमारी निष्ठा पर कोई सवाल भी नहीं उठा सकता है।
11 जून 1996 को लोकसभा में सांप्रदायिकता के आरोपों का जवाब देते हुए सुषमा स्वराज ने धर्मनिरपेक्षता की छद्मता को पोलपट्टी खोल कर रख दी थी| उन्होंने कहा था, 'हम सांप्रदायिक हैं, क्योंकि हम आर्टिकल 370 को खत्म करना चाहते हैं| हम सांप्रदायिक हैं क्योंकि हम देश में जाति-पंथ के आधार पर भेदभाव को खत्म करना चाहते हैं | हम सांप्रदायिक हैं, क्योंकि हम कश्मीर रिफ्यूज़ी के आवाज़ को सुनना चाहते हैं| हम गोरक्षा की बात करते हैं इसलिए सांप्रदायिक हैं। इस देश में समान नागरिक संहिता की बात करते हैं इसलिए सांप्रदायिक हैं। लेकिन ये लोग जो इस सरकार पर आरोप लगा रहे हैं वो लोग दिल्ली की गलियों और सड़कों पर तीन हजार से ज्यादा सिखों के कत्लेआम के लिए जिम्मेदार हैं और वो धर्मनिरपेक्षता की वकालत करते हैं| अपनी मधुर लेकिन ओजस्विता पूर्ण आवाज में जब बोलतीं तो संसद भवन हो या संयुक्त राष्ट्र, हर जगह अपने शब्द एवं विचार प्रवाह में सुननेवालों को अपने साथ बहा ले जाती | कई मुद्दों पर वह आक्रामक जरूर होती थीं, उनके द्वारा शब्दों के चयन इतना मर्यादापूर्ण होता था कि जहाँ कचोट लगनी होती है वहाँ लग जाती थी और कडुवाहट भी नहीं होती थी | राष्ट्रवाद की प्रखर प्रवक्ता सुषमा जी ने 23 सितम्बर 2017 को संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक मंच से बोलते हुए पाकिस्तान की असलियत और दोमुंहेपन को जब विश्व के सामने उजागर किया तो उस समय संयुक्त राष्ट्र की सभा में उपस्थित अनेक देशों के प्रतिनिधियों ने खड़े होकर करतल ध्वनि के साथ सुषमा स्वराज के उस भाषण का स्वागत किया था।
इंदिरा गांधी के बाद विदेश मंत्रालय संभालने वाली केवल दूसरी महिला सुषमा स्वराज ने दुनिया के किसी भी कोने में संकट में फंसे भारतीयों की मदद के लिए व्यक्तिगत मुहिम छेड़ दिया- खाड़ी युद्ध की विभीषका रही हो या नेपाल में भूकम्प की प्रलयंकारी विनाशलीला हो, बांग्लादेश के शेल्टर होम से बच्चे सोनू को वापस लाना हो या यमन में फंसे भारतीयों की सुरक्षित घर वापसी, पाकिस्तान से लायी गई  मूक-बधिर गीता के परिवार की तलाश हो, हामिद निहाल अंसारी की पाकिस्तान से सुरक्षित रिहाई या नाइजीरिया के समुद्री डाकुओं से वाराणसी के संतोष छुड़ाकर सुषमा ने भारतीय परिवारों के जीवन में पैठ बनायी और केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सीमित रहने वाले विदेश मंत्रालय को उन्होंने आम आदमी के सरोकारों के बेहद करीब ला दिया |
पार्टी से लेकर सरकार तक जब भी कोई मुश्किल दौर आता था, संकटों के सामने एक दीवार की तरह अडिग रहने वाली स्वराज को ही याद किया जाता रहा है | 1999 के लोकसभा चुनावों में बेल्लारी में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने की चुनौती रही है, दिल्ली में भाजपा सरकार की गिरती लोकप्रियता हो या डोकलाम गतिरोध हो या दुनिया के किसी भी कोने में संकट में फंसे भारतीयों को उबारने का मुद्दा रहा है, सुषमा जी संकटमोचक के रूप में चुनौती स्वीकार करती रही है |
 


Tuesday, 23 July 2019

घुसपैठ पर सख्ती........ अभी नहीं तो कभी नहीं


गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी से संबंधित एक प्रश्न जवाब देते हुए को कहा कि देश की इंच -इंच जमीन पर जितने भी घुसपैठिए रह रहे हैं, उनकी पहचान कर कानून के तहत देश से निर्वासित किया जाएगा। शाह ने एनआरसी को असम समझौते, जिसके तहत 24 मार्च 1971 की आधी रात तक राज्‍य में प्रवेश करने वाले लोगों को भारतीय नागरिक माना जाएगा, का हिस्सा बताते हुए कहा कि यह भाजपा के घोषणापत्र का भी हिस्सा है। इस तरह शाह ने एनआरसी को असम से बाहर पूरे देश में लागू करने का एक तरह से संकेत कर दिया | दरअसल घुसपैठियों को देश से निर्वासित करने का काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था। लेकिन इस देश के अनेक सत्ता और वोट लोलुप नेताओं व दलों और उनके टुकड़ों पर पोषित बुद्धिजीवियों ने ऐसा होने नहीं दिया। नेताओं और दलों ने जहाँ घुसपैठियों को खुली सीमा के जरिए प्रवेश दिलवा कर उन्हें यहां जहां-तहां बसाया और उनके वोटर कार्ड बनवाए, वहीँ सुविधाभोगी और अर्थलोलुप बुद्धिजीवियों और मीडिया ने छद्म धर्मनिरपेक्षता और कथित मानवता के नाम पर अवैध घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का माहौल बनाया | इनकी एक दलील यह भी हुआ करती थी कि घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई करने या उन्हें सीमा पर ही रोक देने से पूरी दुनिया में भारत की छवि खराब हो जाएगी। ये घुसपैठिये एक धर्म विशेष के हैं। इसीकारण तुष्टिकरण के वशीभूत कुछ नेता और उनके दल सरकार के एनआरसी को पूरे देश में लागू करने के इस फैसले के विरोध में संसद से लेकर सड़क तक बयानबाजी कर रहे हैं | दुनिया के किसी अन्य देश में यह शायद ही ऐसा संभव हो कि वोट के लिए एक धर्म विशेष के करोड़ों घुसपैठियों, जो देश की सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक ढांचे के लिए खतरा बन रहे हों, को अपने देश में वहां के सत्ताधारी राजनीतिक दल ही बसने दे, जबकि इस देश के कश्मीरी पंडित अपने ही गृह राज्य से बाहर रहने को मजबूर कर दिये गये है | घुसपैठियों के समर्थन को लेकर संवैधानिक पद पर बैठे कुछ नेताओं का रवैया भी बेहद आपत्तिजनक है, वो इस मुद्दे पर गृहयुद्ध होने की धमकी दे रही है । ये नेता देश हित और संवैधानिक पद की गरिमा को नजन्दाज कर इस मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम रूप देकर अपनी छवि को मुस्लिमों के कथित मसीहा के रूप में पेश करते हैं जबकि यह मुद्दा हिन्दू-मुस्लिम का नहीं है |
इसका परिणाम यह हुआ है कि असम, पश्चिम बंगाल व पूर्वोत्तर के राज्यों में घुसे बांग्लादेशी देश के सामने बड़ी समस्या बन गए हैं। 2016 में केंद्र सरकार द्वारा दी जानकारी के अनुसार उस वक्त देश में दो करोड़ से अधिक बांग्लादेशी अवैध रूप से रह रहे थे| कुछ ही महीने पहले मिजोरम सरकार ने स्वीकार किया है कि बांग्लादेश से आए घुसपैठियों ने मिजोरम के दक्षिणी इलाके में स्थित लुंगलेई जिले में 16 गांव बसा लिए हैं। इन गांवों में बांग्लादेशी घुसपैठियों के साथ म्यांमार से आए रोहिंग्या भी रह रहे हैं। सबसे बड़ी विडंबना तो अब यह है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसा पीआईएल स्वीकार किया है जिसमें कहा गया है कि भारत में अवैध रूप से घुसे रोहिंग्याओं को निर्वासित नहीं किया जाय और उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया जाय | जाहिर है इसके पीछे कथित लिबरल और छद्म बुद्धिजीवी व मीडियाकर्मी गिरोह है जो देश की सुरक्षा, शांति और अखंडता को दांव पर लगाकर धर्म और मानवता की आड़ में अवैध घुसपैठियों का हमदर्द बन बैठा है | यह देश के लिए दुर्भाग्य है |
एनआरसी पर सारी कार्यवाही सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में हो रही है | गनीमत है कि मौजूदा सरकार प्राथमिकता देते हुए इसे लागू करने की पहल कर रही है अन्यथा पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गाँधी के काँग्रेस शासन में ही इसकी शुरूआत के बावजूद अपने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के तहत उसने इसे लागू नहीं किया । असम में इन अवैध घुसपैठियों के खिलाफ 1979-85 के बीच छह साल लंबा आंदोलन भी चला था| अभी भी बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ पूर्वोत्तर में कई छात्रों, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के लिए एक प्रमुख मुद्दा रहा है।
लब्बोलुआब यह है कि अब पानी सर से ऊपर बहने लगा है और विशेष रूप से म्यांमार और बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर आए अवैध प्रवासियों के कारण सीमावर्ती जिलों की जनसांख्यिकीय संरचना खतरे में पड़ गई है | बंगाल और असम के कुछ हिस्से मिनी पाकिस्तान बन गए है | कुछ घुसपैठी उस इलाके में गम्भीर गैर कानूनी गतिविधियों-गौतस्करी, देहव्यापार, नकली नोटों, नशीले पदार्थों और अवैध हथियारों के कारोबार और देश में कट्टरता एवं सांप्रदायिक हिंसा फैलाने में लगे हुए हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर भारतीय गृह मंत्रालय के पास अभी तक कोई प्रमाणित आंकड़ा नहीं है। इसके अलावा देश के कई हिस्सों में स्थापित होने के कारण इनकी पहचान बड़ी मुश्किल है । यह किसी भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंक भारत में नागरिकता की पहचान के जो प्रमाण होते हैं वह सभी इनके पास मौजूद हैं ।
मोदी सरकार ने प्रवासियों के राहत एवं पुनर्वास बजट में कटौती कर यह संकेत दिया है कि अब घुसपैठियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यही नहीं इस राशि में कटौती से यह संकेत भी मिलता है कि मोदी सरकार की पूरे देश में एनआरसी को लागू करने की मंशा है। हाल ही में सरकार ने राष्ट्रपति के अभिभाषण के माध्यम से असम के अलावा पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और पूर्वोत्तर के कुछ अन्य हिस्सों में चरणबद्ध रूप से एनआरसी लागू करने की प्रतिबद्धता जतायी है | एनआरसी की सबसे बड़ी सफलता यह है कि बांग्लादेश से अवैध प्रवेश 90 फीसद तक रुक गया है। उम्मीद की जानी चाहिए देश हित में सभी दल और उनके नेता वोट बैंक की क्षुद्र राजनीति से ऊपर उठकर मोदी सरकार की इस पहल में सहयोग करेंगे और सरकार जल्द से जल्द घुसपैठ के बढ़ते नासूर को समाप्त करने के शुभ कार्य में सफल होगी | अगर मौजूदा सरकार घुसपैठियों को निर्वासित करने का काम नहीं करती है, यह आगे की सरकारों के लिए यह नासूर कैंसर बन जायेगा और शायद ही कोई सरकार यह बीड़ा उठाने की कोशिश करेंगी |

Monday, 1 July 2019

देवकीनन्दन खत्री: हिन्दी के 'शिराज़ी'


औपनिवेशिक शासन के जिस दौर में प्रशासनिक कार्यों के लिए हिंदी भाषा और उसकी लिपि ‘देवनागरी’ को स्थापित करने के अभियान की शुरुआत हुई तो उस समय हिन्दी का महिमा-मंडन और उर्दू के विरोध के बजाय हिंदी के पक्ष को रचनाशीलता के माध्यम से सशक्त करने वालों में बाबू देवकीनन्दन खत्री का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। मुस्लिम शासन के समय से फ़ारसी ही कई रियासतों की राजभाषा बनी हुई थी। अंग्रेज़ों ने भी सशक्त अरबी-फ़ारसी में लिखी उर्दू को ही संपर्क भाषा के रूप में बनाये रखा था। तत्कालीन समय में हिन्दुस्तान में साक्षरों की संख्या महज़ छः प्रतिशत ही थी और नौकरियों आदि के लिए उर्दू और फ़ारसी के ज्ञान की अनिवार्यता के चलते देश का युवा-वर्ग हिन्दी और नागरी लिपि से दूर होता जा रहा था। ऐसे समय में खत्री जी अपने पठनीय और रोचक उपन्यासों, विशेषकर चन्द्रकान्ताऔर चन्द्रकान्ता संतति के द्वारा तिलिस्म और ऐयारी का ऐसा जादू बिखेरा कि लाखों युवा और पाठक सम्मोहित होकर हिन्दी भाषा और उसकी लिपि देवनागरीसीखने के लिए विवश हो गए | चन्द्रकान्ता मूलत: एक प्रेम कथा है। इस अभूतपूर्व लोकप्रियता से प्रेरित होकर उन्होंने इसी कथा को आगे बढ़ाते हुए चौबीस भागों वाला दूसरा उपन्यास चन्द्रकान्ता सन्तति (1894 1904) लिखा जो चन्द्रकान्ता की अपेक्षा कई गुणा अधिक रोचक और लोकप्रिय भी हुआ। यही नहीं इन कालजयी रचनाओं का रसास्वादन करने के लिए कई गैर-हिन्दी भाषियों ने हिन्दी भाषा सीखी। 'अंग्रेजी ढंग का नावेल' लिखने की आतुरता के बजाय पुरागाथाओं, मिथकों, किंवदन्तियों, लोककथाओं, स्‍मृतियों और पुराणों आदि के माध्यम से कथा की पुरानी परम्परा के आधार पर उन्होंने जिन कथाकृतियों की रचना की, उनका सारा रचना तंत्र बिलकुल मौलिक और स्वतंत्र है। उनका महत्त्व इस आधार पर समझा जा सकता है कि हिन्दी भाषा और उसकी लिपि देवनागरीसे सबसे अधिक संख्या में पाठकों को जोड़ने में बाबू देवकीनन्दन खत्री का योगदान अन्य किसी भी साहित्यकार से अधिक है | यही कारण है कि हिन्दी के सुप्रसिद्ध उपन्यास लेखक श्री वृंदावनलाल वर्मा ने उन्हें हिन्दी का 'शिराज़ी' कहा है। देवकीनन्दन खत्री द्वारा तैयार की गई इसी भूमि पर प्रेमचंद का औपन्यासिक भवन स्थापित होता है जिसे वे भाव और भाषा के संस्कार और परिमार्जन द्वारा स्थापित करते है| 

खत्री जी ने कालजयी उपन्यासों चन्द्रकान्ताऔर चन्द्रकान्ता संतति के अलावा ‘कुसुम कुमारी’, ‘नरेंद्र मोहिनी’, ‘भूतनाथ’, ‘वीरेंद्र वीर’, ‘गोदना’ और ‘काजल की कोठारी’ की भी रचना की | उनकी अधिकांश रचनाओं में तिलिस्म और ऐयारी का सम्मोहन है। 'ऐयारी' को उपन्यास का विषय बनाए जाने को लेकर चन्द्रकान्ता उपन्यास में देवकीनन्दन खत्री ने स्पष्ट किया है कि " आज तक हिन्दी उपन्यास में बहुत से साहित्य लिखे गये हैं जिनमें कई तरह की बातें व राजनीति भी लिखी गयी है, राजदरबार के तरीके एवं सामान भी जाहिर किये गये हैं, मगर राजदरबारों में ऐयार (चालाक) भी नौकर हुआ करते थे जो कि हरफनमौला, यानी सूरत बदलना, बहुत-सी दवाओं का जानना, गाना-बजाना, दौड़ना, अस्त्र चलाना, जासूसों का काम देना, वगैरह बहुत-सी बातें जाना करते थे। जब राजाओं में लड़ाई होती थी तो ये लोग अपनी चालाकी से बिना खून बहाये व पलटनों की जानें गंवाये लड़ाई खत्म करा देते थे। इन लोगों की बड़ी कदर की जाती थी। इसी ऐयारी पेशे से आजकल बहुरूपिये दिखाई देते हैं। वे सब गुण तो इन लोगों में रहे नहीं, सिर्फ शक्ल बदलना रह गया है, और वह भी किसी काम का नहीं। इन ऐयारों का बयान हिन्दी किताबों में अभी तक मेरी नजरों से नहीं गुजरा। अगर हिन्दी पढ़ने वाले इस आनन्द को देख लें तो कई बातों का फायदा हो। सबसे ज्यादा फायदा तो यह किऐसी किताबों को पढ़ने वाला जल्दी किसी के धोखे में न पड़ेगा। इन सब बातों का ख्याल करके मैंने यह चन्द्रकान्तानामक उपन्यास लिखा|"  
देवकीनन्दन खत्री जी की भाषा और शैली को लेकर आलोचकों के बीच काफी बहस हुई | उनकी भाषा-शैली को हिंदी भाषा की हत्या के रूप में भी देखा गया | उनका ध्यान कथाक्रम की तरफ अधिक रहा है, भावचित्रण की ओर कम । वे एक साथ अनेक समांतर घटनाक्रमों और पात्रों को लेकर चलते हैं। पात्रों और घटनाओं के इस अंतर्जाल में वे विभिन्न पात्रों के भावों को चित्रित करने का बहुत कम अवकाश पाते हैं। इसी कारण हिन्दी के विशाल पाठक समूह तैयार करने में खत्री जी के योगदानों की प्रशंसा करते हुए भी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इनकी रचनाओं को विशुद्ध साहित्य की श्रेणी में स्वीकार नहीं करते हैं। तिलिस्म और ऐयारी के अन्य रचनाकारों से या बहुचर्चित हैरी पौटरश्रृंखला की रचनाओं के विपरीत खत्री जी की रचनाओं में तिलिस्म और ऐयारी के चमत्कारों में भी किसी न किसी रूप में विज्ञान और तकनीकी कौशल का वर्णन अवश्य है | चन्द्रकान्ता संतति में तरह तरह के जिन यंत्रों की परिकल्पना की गई है, उन पर वैज्ञानिक अविष्कारों की छाया है और बहुत चीजें ऐसी भी है जो उनकी उर्वर कल्पना शक्ति का परिचायक है | उनकी रचनाओं में जब भी कोई पात्र किसी तिलिस्म को तोड़ता है तो उसे संचालित करने वाली मशीनों व कल-पुर्जों को भी देखता है। इस तरह तत्कालीन दौर में खत्री जी विज्ञान और फैंटेसी के अन्यतम रचनाकार थे | यह कहना अतिश्योक्ति पूर्ण नहीं होगा कि खत्री जी की रचनाशीलता तत्कालीन हिंदी भाषा और समाज की अनिवार्यता थी, जिसे खत्री जी अनन्य समर्पण के साथ निर्वाह किया |

Monday, 24 June 2019

एक देश-एक चुनाव : सार्थक लेकिन जटिल प्रक्रिया


हाल ही में देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय बैठक का कांग्रेस, तृणमूल, सपा, बसपा और आप समेत 16 दल शामिल नहीं हुए। बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा कि एक देश-एक चुनाव सरकार का नहीं बल्कि देश का एजेंडा है। प्रधानमंत्री ने जहाँ इस पर विचार के लिए समिति बनाने की घोषणा की है, जो निर्धारित समय में सभी पक्षों के साथ विचार कर अपने सुझाव देगी, वहीँ भाकपा व माकपा ने इसके क्रियान्वयन पर आशंकाएं जाहिर की हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि राजनीतिक दलों के बीच आपसी संवाद के जरिए इस मुद्दे पर एक समझौते का प्रयास किया जाना चाहिए, क्योंकि बार-बार चुनाव होने से विकास की रफ्तार बाधित होती है | इसके पहले मोदी सरकार ने अक्टूबर २०१७ में अपने वेबपोर्टल ‘My Gov’ पर इस मुद्दे पर जनता से अपने-अपने विचार भेजने की अपील की थी और बजट सत्र(2018-19) की शुरुआत में संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए रामनाथ कोविंद ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराये जाने की चर्चा की थी| पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार इस बात के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की कोशिश कर रही है | चुनाव आयोग ने भी अधिकारिक रूप से कहा है कि अगर राजनीतिक सहमति बनती है तो वह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए तैयार है| उसका कहना था कि इसके लिए संविधान में संशोधन की जरूरत भी होगी| नीति आयोग ने राष्ट्रीय हित में वर्ष 2024 से लोकसभा और विधानसभाओं के लिए दो चरणों में चुनाव करवाने का समर्थन किया है ताकि चुनाव के कारण प्रशासन और विकास प्रक्रिया में कम से कम व्यवधान सुनिश्चित हो सके। इस मसले पर तेलंगाना राष्ट्र समिति ने मोदी सरकार का समर्थन करते हुए कहा था कि इससे हम पांच साल विकास पर ध्यान दे सकेंगे| ओडिशा के सत्तारूढ़ बीजू जनता दल ने बल विचार का जोरदार समर्थन किया है। बीजू जनता दल का तो कहना है कि हमने 2004 से ही इसे अमल में कर लिया है- 2004 में जब हमारी विधानसभा के एक साल बचे हुए थे, तब हमने विधानसभा का चुनाव एक साल पहले करवाया था जिससे कि लोकसभा के साथ ये चुनाव भी हो सके। तब से 2009, 2014 और 2019 में ओडिशा में दोनों चुनाव साथ-साथ हुए। इससे ओडिशा को काफी फायदा हुआ।
आजादी के बाद तकरीबन 15 साल तक विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ चले लेकिन बाद में कुछ राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला और कुछ सरकारें अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले गिर गईं| यही नहीं केंद्र में भी कई बार सरकारें अपने 5 वर्ष की अवधि को पूरा करने में सक्षम नहीं हो सकीं | इसका परिणाम यह हुआ कि न केवल लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव करवाना संभव नहीं सका बल्कि केवल सभी राज्यों के चुनाव भी एक साथ नहीं होने की बाध्यता हो गई | लेकिन अब बार-बार होने वाले चुनावों में आर्थिक और मानवीय संसाधनों के बढ़ते व्यय एवं विकास की प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाली बाधाओं को देखते हुए लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है |
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क आर्थिक और मानव संसाधनों की बचत का है | सेंटर फॉर मीडिया स्टटडी (सीएमएस)  की स्टडी के अनुसार 1998 से लेकर 2019 के बीच लगभग 20 साल की अवधि में चुनाव खर्च में 6 से 7 गुना की बढ़ोतरी हुई| 1998 में चुनाव खर्च करीब 9 हजार करोड़ रुपये था जो अब बढ़कर 55 से 60 हजार करोड़ रुपये हो गया है| इसके साथ ही बड़ी संख्या में शिक्षकों सहित एक करोड़ से अधिक सरकारी कर्मचारियों के चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने से न केवल विकास और शिक्षा को अधिकतम नुकसान होता है बल्कि सुरक्षा बलों को भी बार-बार चुनाव कार्य में लगाए जाने देश की सुरक्षा के लिए भारी खतरा का सामना करना पड़ता है | एक साथ चुनाव होने से राजनीतिक दलों को भी दो अलग-अलग चुनावों की तुलना में हर स्तर पर दोहरे खर्च के बजाय कम पैसे खर्च करने होंगे| सबसे अहम यह कि चुनाव कार्य के लिए बार-बार सुरक्षा बलों की अनावश्यक तैनाती से बचा जा सकेगा, जिनका उपयोग बेहतर आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए किया जा सकेगा |
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के दूसरा सबसे प्रबल तर्क यह है कि इससे चुनावों में आम लोगों की भागीदारी बढ़ सकती है| देश में बहुत से लोग हैं जो रोजगार या अन्य वजहों से अपने वोटर कार्ड वाले पते पर नहीं रहते, वे अलग-अलग चुनाव होने की स्थिति में बार-बार मतदान करने नहीं जाते| एक साथ चुनाव होने पर पूरे देश में एक मतदाता सूची होगी जो लोकसभा और विधानसभा के लिए अलग-अलग होती हैं| चुनाव के दौरान आचार संहिता लागू रहने के दौरान विकास संबंधित कई निर्णय बाधित हो जाते है | इसके साथ ही प्रशासनिक मिशनरी के चुनाव कार्यों में व्यस्त होने और शासन तंत्र के प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाने से सामान्य और पहले से चले आ रहे विकास कार्य भी प्रभावित होते है| चुनावी रैलियों से यातायात के बाधित होने और सुरक्षा प्रतिबंधों के कारण आम जनजीवन को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है | लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग होने से व्यवधान की यह प्रक्रिया दोहरी हो जाती है, जिससे आम जन जीवन त्रासद बन जाता है | ऐसे में अगर एक बार में दोनों चुनाव होते हैं तो जन-धन की बचत के साथ ही आम जीवन में अपेक्षाकृत कम अवरोध होगा और चुनावों में मत प्रतिशत में इजाफा हो सकता है |  
लेकिन क्या वास्तव में देश को लोकसभा और विधानसभाओं के अलग-अलग होने वाले चुनाव से मुक्ति मिल सकेगी| अब मान लीजिए कि 2024 में केंद्र में किसी पार्टी या गठबंधन को बहुमत नहीं मिलता है या गठबंधन की सरकार बनने के बावजूद 2025, 2026, या 2027 में बहुमत खो बैठती है तो ऐसे में क्या होगा ? क्या अल्पमत वाली सरकार को 5 साल के कार्यकाल को पूरे करते दिया जाना संवैधानिक है ? ऐसी अल्पमत वाली सरकार न कानून पास करवा सकेगी और न ही बजट ही पास करवा सकेगी | यही समस्या राज्यों में खड़ी हो सकती है| बहुमत नहीं होने की स्थिति में क्या राज्य को अगले पांच साल तक विधानसभा चुनाव के लिए इंतजार करना उचित है ? यह एक गंभीर संवैधानिक संकट होगा जिसका एकमात्र समाधान चुनाव है जो फिर से लोकसभा और विधानसभाओं के अलग-अलग चुनाव की संभावना को बढ़ा देता है | सभी राज्य विधानसभाओं का चुनाव एक साथ कराने से भी अल्पमत वाली सरकार की समस्या का समाधान तबतक नहीं होता हैं जबतक कि सरकार की अस्थिरता से निपटने का कोई विकल्प नहीं खोजा जाता है | कार्यकाल का निश्चित किया जाना अल्पमत सरकार की समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। राज्यों में निर्वाचित सरकार के असफल होने या अल्पमत में आने पर चुनाव होने तक अवधि के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है | किन्तु केन्द्र में राष्ट्रपति शासन का प्रावधान नहीं है और इससे अधिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इस प्रकार लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से राजनीतिक स्थिरता का तर्क ख़ारिज हो जाता है | 
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अगर देशभर में एक साथ चुनाव हो, तो राज्यों के मुद्दों और हितों की अनदेखी हो सकती है| सारा ध्यान लोकसभा के चुनाव पर होगा | यही नहीं वोट देते समय ज्यादातर लोगों द्वारा एक ही पार्टी को वोट कर सकते हैं | कई बार मतदाता राज्य में किसी क्षेत्रीय पार्टी के मुद्दों के साथ जाता है जबकि केंद्र में किसी मजबूत राष्ट्रीय पार्टी के मुद्दों को तरजीह देते हुए उसके पक्ष में मतदान करते है | इससे मतदाताओं में भ्रम भी पैदा हो सकता है| इससे बड़े राजनीतिक दलों को ज्यादा फायदा होने की उम्मीद है और छोटे क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व खतरे में पद जायेगा| लेकिन 2019 में ओडिशा के मतदाताओं ने अनन्य जागरूकता का परिचय देते हुए क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों को अलगाते हुए मतदान किया | फिर भी एक साथ चुनाव होने से केंद्र के साथ ही राज्यों में एक ही पार्टी के बहुमत में आने की संभावना बढ़ सकती है, जो अप्रत्यक्ष रूप से सरकार या एक पार्टी की तानाशाही को बढ़ावा दे सकता है | यह लोकतंत्र के लिए हमेशा हितकर नही होता है |
लोकसभा और विधानसभा दोनों का चुनाव एक साथ कराना निःसंदेह राष्ट्रीय हित में होगा। अब तक का अनुभव यही रहा है कि सरकारें जातीय, सामुदायिक, धार्मिक, क्षेत्रीय समीकरणों को देखते हुए राष्ट्रीय हित में नीतियाँ बनाने और उनके कार्यान्वयन से बचती रही हैं। हो सकता है नई व्यवस्था से निजात मिले | लेकिन इसपर अमल करने से पूर्व संसद और संसद से बाहर गहन विचार विमर्श की जरुरत है | इसके लिए सांगठनिक और संवैधानिक बदलाव करने की भी जरुरत होगी जैसा कि दिसंबर, 2015 को संसद की स्थायी समिति की 79वीं रिपोर्ट में कहा है|


Monday, 29 April 2019

राष्ट्रवाद चुनावी मुद्दा क्यों नहीं

लोकसभा चुनाव 2019 की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ती जा रही है और सियासी गर्मी बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे सभी राजीनीतिक दल कई तरह मुद्दों के बहाने अपने तरकश से तरह-तरह के वादों और मुद्दों को निकालने लगे है | चुनाव में किसी मुद्दे का प्रभाव जितना असरदार होता है बाजी भी उसी के पक्ष में जाती है। इन विभिन्न मुद्दों और मसलों के बीच यह बहस जोर पकड़ती जा रही है कि देश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने जब अपने 5 वर्ष की विकास कार्य के साथ ही पुलवामा आतंकी हमले के बाद बालाकोट में की गई सर्जिकल स्ट्राइक और आतंकवाद से राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही तो विपक्षी दलों से लेकर कतिपय बुद्धिजीवियों और मीडिया द्वारा यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि राष्ट्रवाद को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जा सकता है | इसके पीछे विरोधी दलों की दलील है कि राष्ट्रवाद हिंदुत्व की भावना का उग्र रूप है | 

प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रवाद के मुद्दे को देश की सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि जो देश पिछले 40 वर्षों से आतंकवाद से जूझ रहा है और उस आतंकवाद से देश की जनता और जवान ही नहीं मारे जा रहे है, बल्कि देश की संप्रभुता को खतरा है तो क्या राष्ट्रवाद और सैनिकों का बलिदान भी उतने ही महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दे नहीं हैं जितना किसानों की मौत ? यदि कश्मीर में अलगाववादी करतूतें, भाषा और क्षेत्र के नाम पर अलग राज्य और राष्ट्र की मांग, नक्सलवाद यदि चुनावी मुद्दे हो सकते है, यदि किसानों की मौत और उनकी कर्जमाफी का झूठा आश्वासन चुनावी मुद्दा हो सकता है तो जो मुद्दा देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा है एवं जवानों की जिंदगी और मौत से जुड़ा है, वह चुनावी मुद्दा क्यों नहीं हो सकता है | जब किसान की मौत होती है तो वह चुनावी मुद्दा बन जाता है लेकिन जब एक सैनिक शहीद होता है तो वह चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता ?

मौजूदा चुनाव में राष्ट्रवाद का मुद्दा तब अधिक अहम हो गया है जब देश में लंबे समय तक सत्ता में रहने पार्टी अपने चुनावी मेनिफेस्टों में भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए को ख़त्म करने और सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून 1958 में संशोधन करने, जम्मू-कश्मीर जैसे आतंकवाद और अलगाववाद से ग्रस्त राज्य में सशस्त्र बलों की तैनाती की समीक्षा करने और उनकी संख्या में कमी लाने, जम्मू-कश्मीर को आत्मनिर्णय का अधिकार देने और राज्य की बागडोर पुलिस के हाथ में सौंपने का आश्वासन देती है| इस तरह मजहबी तुष्टिकरण की अपनी पारम्परिक राजनीति के वशीभूत होकर राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता को ही कमजोर करने वाला आश्वासन यदि किसी पार्टी का चुनावी घोषणापत्र हो सकता है तो देश की सुरक्षा और अखंडता का मुद्दा चुनावी मुद्दा क्यों नहीं हो सकता है | अगर कांग्रेस देशद्रोह कानून खत्म करने की बात करती है तो जनता को यह बताया जाना आवश्यक है कि अगर इस तरह के कानून खत्म कर दिए जाते हैं तो देश पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा | इसमें कोई शक नहीं कि देश वर्षों से आतंकवाद, अलगाववाद और नक्सलवाद से आहत हो रहा है और कोई सरकार इन गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई करके इनकी समाप्ति का दावा करती है तो यह उसकी एक बड़ी उपलब्धि है और अपनी इस उपलब्धि को जनता के बीच उसे ले जाने का अधिकार है | यदि देश को कमजोर करने और टुकड़े-टुकड़े करने का मुद्दा चुनावी मुद्दा हो सकता है तो देश की अखंडता को अक्षुण्ण रखने का मुद्दा भी चुनावी मुद्दा होना चाहिए |

लोकसभा का चुनाव देश के लिए एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए होता है जो देश की सुरक्षा, एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार होती है | इस चुनाव में मोहल्ले की नाली और सड़क के गड्ढों की तुलना में व्यापक राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दे अहम होते है | केंद्र के चुनाव में रक्षा-नीति, आर्थिक-नीति, विदेश-नीति, आतंकवाद, नक्सलवाद,  महंगाई, नेशनल हाईवे जैसे मुद्दे अहम होते है, जो सीधे तौर राष्ट्रीय महत्त्व के होते है | अगर लोकसभा में चुनाव में हम मोहल्ले की नाली, शहर के नाले, सफाई व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट, सड़क के गड्ढों पर वोट करेंगे, नगर निगम के चुनाव में क्या मुद्दा होना चाहिए | क्या पार्षदी के चुनाव में देश की रक्षा नीति और विदेश नीति पर मतदान किया जाता है ? देश की रक्षा नीति, आर्थिक नीति, विदेश नीति, आतंकवाद और नक्सलवाद को चुनावी मुद्दा होने के मतलब यह नहीं होता कि केंद्र की सरकार नगर निगम के मुद्दों के खिलाफ है | 

असल में राष्ट्रवाद को लेकर उन कथित सिक्यू-लिबरल बुद्धिजीवियों के पेट में ऐंठन हो रही है जो पश्चिमी मानसिकता से पोषित है जिसके अनुसार  राष्ट्रवाद एक खतरनाक, प्रतिगामी और विभाजनकारी विचार या भावना है | ये ऐसे लोग है जिन्होंने राष्ट्रवाद को भारतीयता के सन्दर्भ में देखने की कभी कोशिश नहीं की है | विडम्बना यह है कि जिस राष्ट्रवादी चेतना के बलबूते तह देश आजाद हुआ, आजादी के बाद से ही उदारवादी अभिजात वर्ग को वही राष्ट्रवाद शब्द अजीब लगता है। इनके भारत में राष्ट्रीयता जैसी अवधारणा कभी रही ही नहीं है | जाहिर है यह भी औपनिवेशिक मानसिकता की मान्यता है | इन सिक्यू-लिबरलों ने सदा ही देशभक्ति और राष्ट्रवाद के बीच अंतर किया है | वे मानते है कि देशभक्ति स्वभाव, दोनों सैन्य और सांस्कृतिक रूप, से रक्षात्मक होती है जबकि  राष्ट्रवाद सत्ता की इच्छा से प्रेरित होता है। प्रत्येक राष्ट्रवादी का उद्देश्य अधिक शक्ति और अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त करना है| मेरा मानना है कि देशभक्ति राष्ट्रवाद में ही निहित होती है। एक राष्ट्र के बिना देशभक्ति का अस्तित्व नहीं हो सकता है, और एक राष्ट्र बिना राष्ट्रवाद के जीवित नहीं रह सकता है। यह आधुनिक विश्व के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। राष्ट्रवाद ने आधुनिक राज्य प्रणाली को जन्म दिया और दुनिया भर में उपनिवेशवाद विरोधी स्वतंत्रता संघर्ष में राष्ट्रवाद ही मुक्ति का माध्यम बना था | आजादी के बाद सिक्यू-लिबरलों ने राष्ट्रवाद को नकारात्मकता, भाषावाद, धार्मिक और जातीय वर्चस्ववादियों के साथ जोड़ना शुरू कर दिया। ऐसा करते हुए, भारतीय राष्ट्रवाद की समृद्ध और समावेशी विरासत से खुद को काट लिया | यहाँ तक कि भारतीय राष्ट्रवाद को हिंदुत्व वर्चस्व की भावना से घालमेल करके सांप्रदायिक भी घोषित कर दिया | अब सवाल यह है कि यदि साम्प्रदायिकता चुनावी मुद्दा हो सकती है, यदि चुनावों में जाति और धर्म के समीकरणों के आधार पर गठबंधन किया जा सकता है तो राष्ट्र के नाम पर वोट मांगने का अधिकार किस आधार पर जायज नहीं है |
यदि राष्ट्र के ढांचे को मजबूत और सुरक्षित नींव पर खड़ा करना है तो अन्य कई पहलुओं की तरह राष्ट्रवाद का अहम स्थान होगा | यदि राष्ट्र मजबूत नहीं होगा तो जाति, धर्म, संप्रदाय, मजहब, भाषा, नस्ल, और क्षेत्र के सारे समीकरण धरे के धरे रह जायेंगे | जिन लोगों को भारत का राष्ट्रवाद हिन्दू राष्ट्रवाद का पर्याय प्रतीत होता है वे अभी भी आज़ादी से पहले की मजहबी राष्ट्रवाद की मानसिकता से ग्रस्त है और साथ ही कुछ ऐसे भी है जो अभी भी भारत को एक राष्ट्र मानने से परहेज करते है |