Thursday, 18 August 2022

नयी कविता का भावबोध और शिल्प

 नयी कविता का भावबोध और शिल्प

दरअसल छायावादोत्तर हिंदी कविता में विकसित होने वाली काव्यधाराओं में प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के बाद नयी कविता का सूत्रपात हुआ। प्रामाणिक जीवन की अनुपस्थिति के कारण प्रगतिवाद एक नारे में तब्दील हो गयी थी तथा प्रयोगवादियों ने प्रयोग को ही कविता का साध्य मान लिया। नयी कविता स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विकसित होने वाली एक ऊर्जावान काव्यधारा है, जिसमें स्वातंत्र्योत्तर भारतीय जीवन और व्यक्ति की संश्लिष्ट जीवन परिस्थितियों का रचनात्मक साक्षात्कार किया है। डॉ. जगदीशचंद्र गुप्त ने नयी कविता को अपने युग की वास्तविकता के अनुरूप बताया है, जबकि धर्मवीर भारती ने इसे पुराने और नए मानव मूल्यों के टकराव से उत्पन्न तनाव की कविता माना है। मुक्तिबोध के अनुसार-नयी कविता मूलतः एक परिस्थिति के भीतर पलते हुए मानव हृदय के पर्सनल सिचुएशन की कविता है। नयी कविता रचनाकार एवं समाज के नए संबंधों को धारण करने वाली है।  इसके काव्यभूमि के निर्माण में समकालीन पत्रिकाएँ जैसे नए पत्ते, निकष, प्रतिमान, ,,, इत्यादि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 

 

नयी कविता के उदय में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उत्पन्न अस्तित्ववादी दर्शन, पश्चिमी संस्कृति, राजनीति से उत्पन्न मोहभंग एवं नगरीकरण की प्रक्रिया में मध्यवर्गीय जीवन के सपने एवं दु:स्वप्न की निर्णायक भूमिका रही है। नयी  कविता का विश्वास आधुनिकता में है। आधुनिक दृष्टिकोण का अर्थ नए मूल्यों के लिए विकलता और संवेदना से है। इसी दृष्टिकोण के तहत नया कवि आज के तनावों, सार्वभौम संकट, मनुष्य की पीड़ा एवं उसकी नगण्यता तथा गरिमा से जुड़ता है है और इस सम्पृक्ति के दबाव में अभिव्यक्ति एवं सम्प्रेषण के माध्यमों को पुनराविष्कृत करता है। जिस आधुनिकता को यह स्वीकारती है, उसमें वर्जनाओं और कुंठाओं के बदले अत्यंत मुक्त यथार्थ का समर्थन है। यह दृष्टिकोण अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, श्रीकांत वर्मा, धूमिल, कुंवर नारायण, राजकमल चौधरी, विजयदेव नारायण साही, लीलाधर जगूड़ी जैसे नए कवियों के पास थी।

नई कविता की दृष्टि मानवतावादी है, किंतु यह मानवतावाद मिथ्या-आदर्शों की परिकल्पनाओं पर आधारित नहीं है। नई कविता ने लोकजीवन की अनुभूति, सौंदर्यबोध, प्रकृति और उसके प्रश्नों को एक सहज और उदार मानवीय भूमि पर ग्रहण किया है | नई कविता की लोक संपृक्ति का वास्तविक प्रतिनिधि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को कह सकते हैं। प्रजातंत्र तथा व्यापक मानवतावाद, लोकसंपृक्ति तथा नई कविता आज एक दूसरे को अनिवार्य रूप से संबद्ध हैं। नई कविता स्वातंत्र्योतर भारतीय राजनीतिक जीवन से संबद्ध है। नई कविता की राजनीतिक चेतना रचनाकार के स्वतंत्र विवेक और मानवीय प्रतिबद्धता से प्रेरित है, जिसका प्रमुख स्वर गंदी राजनीति का पर्दाफ़ाश करना है।  

यथार्थ के प्रति उन्मुक्त दृष्टि नई कविता की आधारभूत विशेषता है। यथार्थ की तीखी चेतना, परिवेश से जुड़ाव, चिंतन एवं संवेदना के उलझे हुए अनेक स्तर उसके आधार हैं। नई कविता यह मानती है कि यथार्थ का कोई निर्दिष्ट ढाँचा नहीं है।इसी कारण नई कविता यथार्थ को उसकी संपूर्णता में ग्रहण करती है। मुक्तिबोध लिखते हैं :-

जिंदगी में जो कुछ, जो भी, है, सहर्ष स्वीकारा है,

 इसलिए की जो कुछ भी मेरा है, वह तुम्हें प्यारा है।

सच कहा जाए तो नई कविता रचनाकार एवं समाज के नए संबंधों को धारण करने वाली है।

नई कविता की जीवन में गहरी आस्था है। जीवन के प्रति आस्था का तात्पर्य हैजीवन के सम्पूर्ण उपभोग में विश्वास। यह लघुमानव की अवधारणा का सूत्रपात करती है और इस लघुता को लेकर उसके भीतर हीनता की कोई ग्रंथि नहीं है। धर्मवीर भारती लिखते है-

मैं रथ का टूटा पहिया, लेकिन मुझे फेंको मत

क्योंकि इतिहासों की सामूहिक गति सहसा झूठी पड़ जाने पर

क्या जाने, सच्चाई टूटे पहियों का आश्रय ले।

लघुमानव कोई क्षुद्र मानव नहीं है। वह तो प्रजातंत्र में शहरों के विकास और अंधाधुंध मशीनीकरण के कारण मानव के महत्व में कमी आने से पैदा हुआ है | यह साधारण मनुष्य है जो अपनी सारी संवेदना, भूख-प्यास और मानसिक गठन को लिए हुए उपेक्षित है। लघुमानव किसी राजनैतिक पार्टी या विचारधारा, किसी दर्शन, सम्प्रदाय के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है। वह केवल सहज मानवीय संवेदनाओं के प्रति प्रतिबद्ध है। लघुमानव द्वारा एक-एक क्षण को जीने और भोगने की मजबूरी ही उसके लिए द्वंद्व और तनाव का संसार रचती है। नई कविता द्वंद्व और तनाव को भी काव्य-मूल्य की तरह उपस्थित करती है। शमशेर की एक अटका हुआ आँसू’, ‘पतझड़ का अटका हुआ पत्ता’, उनकी काव्यानुभूति के तनाव का ही प्रतिफलन हैं। इस लिहाज से श्रीकांतवर्मा मायादर्पणमें और रघुवीर सहाय आत्महत्या के विरुद्धमें अपने इसी रचनात्मक और सामाजिक तनाव का उल्लेख करते है। माया दर्पणकी पंक्तियाँ हैं-

तुम जाओ अपने बहिश्त में

मैं जाता हूँ

अपने जहन्नुम में

नयी कविता अनुभूति की जटिलता और प्रमाणिकता की कविता है | अनुभूति की जटिलता का संबंध संदर्भ से उत्पन्न होने वाले भावबोध की प्रकृति से है। नई कविता का कवि उस अनुभव को कविता में पिरोता है, जिसे उसने जीने के दौरान प्राप्त किया है। क्षणयोग से उभरने वाला उसका निजी सुख-दुःख चाहे कितना ही लघु एवं उपेक्षणीय हो, किंतु प्रामाणिक तो है । ये कविताएँ आकार में छोटी होती हैं, किंतु अनुभव की प्रामाणिकता के कारण प्रभाव में बहुत ही तीव्र होती हैं।

आधुनिक भाव-बोध मूल्यों के संकट की बात बार-बार कहता है। आधुनिक जीवन संरचना में परंपरागत मूल्य निरर्थक हो गए हैं और नए मूल्यों की सृष्टि नहीं हो पायी है। अतः मनुष्य मूल्यहीनता और अनास्था के अँधकार में जीने के लिए अभिशप्त हैं। धर्मवीर भारती के अँधा युगमें मूल्यों के संकट की बात बार-बार कही गयी है। यथा

जिसको तुम कहते हो प्रभु

उसने जब जब चाहा

मर्यादा को अपने ही हित में बदल लिया

वंचक है वो

दरअसल नयी कविता ने धर्म, दर्शन, नीति, आचार सभी प्रकार के मूल्यों को चुनौती दी है| कुँवर नारायण के आत्मजयीका नचिकेता बाप द्वारा सौंपे हुए मूल्यों को अस्वीकारता हुआ यातनाएँ सहता है और उन यातनाओं से ही उसे सही जीवन-दृष्टि और शक्ति प्राप्त होती है। अतः आधुनिक भावबोध का महत्वपूर्ण तत्व वेदना है, जो स्वतंत्रता और दायित्वबोध के अकेलेपन की टकराहट से उत्पन्न मनुष्य को नियति के रूप में चित्रित करता है। जैसे

दुःख सबको माँजता

और चाहे स्वयं

सबको यह मुक्त करना न जाने,

किंतु जिन्हें यह माँजता है।

उन्हें यह सीख देता है कि

दूसरों को मुक्त रखे।

आधुनिक भावबोध की एक स्थिति निरर्थकताबोध भी है। यांत्रिक जीवन, अराजकतावादी राजनीति और पूँजीवादी संस्कृति के कारण उत्पन्न निरर्थकता का बोध नई कविता में बहुत गहरा है, जो अप्रमाणिकता की मानसिक चेतना के रूप में अभिव्यक्त होता है। केदारनाथ सिंह के शब्दों में-

तुमने जहाँ लिखा प्यार,

वहाँ लिख दो सड़क।

फर्क नहीं पड़ता

मेरे युग का मुहावरा है

फर्क नहीं पड़ता।

 

नयी कविता का शिल्प

नई कविता आधुनिक संवेदना के साथ मानवीय परिवेश के सम्पूर्ण वैविध्य को नए शिल्प में अभिव्यक्त करने वाली काव्यधारा है। नई कविता में परंपरागत कविता से आगे नए भावबोध की अभिव्यक्ति के साठ-साठ नए शिल्प-विधानों का भी अन्वेषण किया गया है। नयी कविता भाषा को परिवेश का बोधक मानती है। इसमें भाषा के बोलचाल रूप पर बल दिया गया है। नया कवि कविता में बातचीत नहीं बल्कि बातचीत में कविता की शैली में कविता करता है। जिस तरह हम बोलते है, उस तरह तू लिख/फिर भी हमसे बड़ा तू दीख। नयी कविता में तत्सम तद्भव के साथ-साथ अंग्रेजी, उर्दू और लोकभाषा के शब्दों का नि:संकोच प्रयोग किया गया है।

काव्य-शैली के स्तर पर नयी कविता लंबी कविता के विन्यास को स्वीकार करती है। यह इतिहास और पुराण को अपदस्थ कर स्वयं नए कथानक का विन्यास करती है। इस दृष्टि से मुक्तिबोध का अँधेरे में’, धूमिल की पटकथा’, राजकमल चौधरी का मुक्ति प्रसंगतथा अज्ञेय की असाध्य वीणाप्रमुख हैं। छोटी कविताएँ जहाँ प्रगीतात्मक हैं, वहीं लंबी कविताओं की संरचना नाटकीय है। लेकिन यह जरुरी नहीं कि हर लंबी नयी कविता की संरचना नाटकीय ही हो। मसलन, अज्ञेय की लंबी कविता असाध्य वीणाअपने आकार में लंबी है, इसके बावजूद यह कविता प्रगीतात्मक है और कहीं-कहीं उसमें नाटकोचित संवाद भी है। नयी कविता में छंद की समूची अवधारणा का निषेध करते हुए स्वाधीन लय पर जोर दिया गया और इसका संबंध अर्थ-लय की स्थापना से है।

नयी कविता में बिंब विधान का आधार अनुभूत जीवन की ठोस प्राकृतिक घटनाएं हैं, जिसमें प्रस्तुत-अप्रस्तुत का द्वैत ख़त्म हो गया है। जैसे

जिंदगी दो अँगुलियों में दबी,

सस्ती सिगरेट के जलते टुकड़े की तरह है

जिसे कुछ लम्हों में पीकर नाली में फेंक दूँगा।

 

 

3.6. प्रगतिवादी नयी कविता

नयी कविता आन्दोलन के अंतर्गत प्रगतिशील एवं जनवादी चेतना की धारा को प्रगतिवादी नयी कविता कहा गया है| नयी कविता वाद-मुक्ति की कविता है| लेकिन प्रगतिवादी नयी कविता अपने विचारधारात्मक आग्रह को छुपाती नहीं है | इस दौर में त्रिलोचन, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, यथार्थवादीजनवादी चेतना के प्रतिनिधि हैं। जबकि मुक्तिबोध, शमशेर, भवानीप्रसाद मिश्र, केदारनाथ सिंह और रघुवीर सहाय नयी कविता के भीतर से प्रगतिवादी चेतना का प्रतिनिधित्व कर रहे थे| इनके काव्य को ही प्रगतिवादी नयी कविता कहा गया है| यथार्थ का सकारात्मक साक्षात्कार प्रगतिवादी नयी कविता की प्रमुख प्रवृति है | यह जीवन की अनास्था, निराशा, व्यक्तिवादी कुंठा और मरणधर्मिता को महत्व नहीं देती है| प्रगतिवादी नयी कविता के कवियों की अनुभूतियाँ और संवेदना गाँव से जुडी हुई है | लोक-सम्पृक्ति कविता की एक खास विशेषता है। वह सहज लोक-जीवन के करीब पहुँचने का प्रयत्न कर रही है।

प्रगतिवादी नयी कविता का सामाजिक यथार्थ से गहरा संबंध है। कविता का स्वर अपने परिवेश की जीवनानुभूति से फूटा है। यह कविता जीवन का मूल्य, उसका सौंदर्य, उसका प्रकाश जीवन में ही खोजती है, उसे जीवन की सच्ची व्यथा के भीतर पाना चाहती है। इसलिए प्रगतिवादी नयी कविता ने धर्म, दर्शन, नीति, आचार सभी प्रकार के मूल्यों को पूरी तरह से नकारती नहीं बल्कि उसके प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण है | केदारनाथ अग्रवाल ने मानव के प्रति प्रकृत राग को नया अर्थ दिया है | उन्हें आँख मूंदपेट पर सिर टेके बैठा आदमी तकलीफ देता है | उनकी काव्यानुभूति में यथार्थ का नया संसार जन्म लेता है | प्रगतिशील धारा के सभी कवियों की काव्य संवेदना एक दूसरे के काफी निकट है और समय एवं समाज के जटिल यथार्थ को कविता में सामने लाती है | व्यापक अर्थ में प्रगतिवादी नयी कविता में जीवनधर्मी लगाव है | वह प्रेम करुणा, उत्साह,कर्म, सौन्दर्य, साहस, प्रकृति से लगाव, इतिहास बोध, वर्ग चेतना, प्रतिबद्धता के साथ विश्वास की कविता है |

प्रगतिवादी नयी कविता का कवि जीवन में कर्म-सौन्दर्य और संघर्ष-सौन्दर्य को महत्त्व देता है | परम्परा के स्तर पर यह कविता निराला की काव्य परंपरा का प्रकृत सौन्दर्य लिए हुए है | यहाँ कवि प्रार्थना की मुद्रा में आने के बावजूद यही कहता है कि उसे शक्ति और कर्म का सौन्दर्य चाहिए | इसलिए विजयदेव नारायण साही लिखते है-

परम गुरु

दो तो ऐसी विनम्रता दो

कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ

और यह अंतहीन सहानुभूति

पाखंड न लगे |

प्रगतिशील कवियों ने परंपरा की जड़ता का विरोध इसलिए किया है कि वह लोगों को शोषण का शिकार बनाती है | लेकिन प्रगतिशील नया कवि उसका विरोध इसलिए करता है कि उसके कारण लोगों को शोषण होता है साथ ही मानव-विवेक भी कुंठित हो जाता है|

प्रगतिवादी नयी कविता अपने समय-सन्दर्भों में मानवीय उपस्थिति और लगाव की कविता है। वह बहुआयामी जीवन की सच्चाईयों को बिना लाग-लपेट के रूपायित करती है। वह जीवन की बहुपक्षी अनुभूतियों को कलमबद्ध करने की एक जटिल यथार्थवादी प्रक्रिया है। इस कविता का सारा दृष्टिकोण आधुनिक है|

प्रगतिवादी नयी कविता में परिवेश के प्रति गहरे लगाव का भाव बढ़ा है | अपनी संवेदनात्मक ऐन्द्रियता में कवियों ने विचारों और उनके टकरावों को उनके मूल में पकड़ने की कोशिश की है | केदारनाथ सिंह अकाल में सारसऔर सर्वेश्वरदयाल खूंटियों पर टंगे लोगमें परिवेश को ही कविता बनाते नजर आते है|

 

3.7. स्वातंत्र्योतर हिंदी कविता की अन्य प्रवृतियाँ

स्वातंत्र्योतर परिवेश में हिंदी कविता के कथ्य और शिल्प में बहुआयामी बदलाव हुआ | नयी कविता स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विकसित होने वाली एक ऊर्जावान काव्यधारा है, जिसमें स्वातंत्र्योत्तर भारतीय जीवन और व्यक्ति की संश्लिष्ट जीवन परिस्थितियों का रचनात्मक साक्षात्कार किया है। लेकिन नयी कविता की यह धारा 60 के दशक के बाद हिंदी कविता धाराओं में बंटती गई और काव्यान्दोलनों का ज्वार सा आ गया | आलोचकों ने इन काव्यान्दोलनों को सामूहिक रूप से साठोतरी कविता नाम दिया है| साठोतरी कविता आन्दोलनों में अकविता, बीट कविता, युयुत्सावादी कविता, प्रतिबद्ध कविता, विचार कविता, नवगीत और समकालीन कविता आदि प्रमुख है| इनमें सा अधिकांश नारेबाजी के परिणाम है जिसे काव्यान्दोलन नहीं माना जा सकता है| अभिव्यंजना और संवेदना के स्तर पर केवल अकविता और नवगीत आन्दोलन ने मौलिक रचनात्मक आयाम प्रस्तुत किए हैं|

नवगीत आन्दोलन-नवगीत आन्दोलन नयी कविता के भीतर ही गीतों का आन्दोलन है जो 1958 में ‘गीतांगिनी’ संकलन के प्रकाशन के साथ प्रचलित हुआ | ‘गीतांगिनी’ की भूमिका में संपादक राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने नयी कविता के सामानांतर लिखे जा रहे गीतों को ‘नवगीत’ नाम दिया और नवगीत को नयी कविता के पार्श्व में रखकर व्याख्यायित किया| नवगीत नामकरण के पीछे किसी आन्दोलन का भाव नहीं था। बल्कि ऐतिहासिक और समकालीन रचनात्मकता के दबाव महत्वपूर्ण रहे हैं। परम्परावादी गीत जब नितान्त व्यक्तिगत आत्मरुदन की क्षयशीलता से ग्रस्त होकर असफल प्रेमी की एकान्तिक प्रलाप बना हुआ था, तब आने वाले गीत कवियों के लिए एक चुनौती थी कि वे गीत को इस एकान्तिकता की खोह से निकाल कर उसे अपने समय के मनुष्य एवं उसकी दैनन्दिनी से जोड़े | प्रगति और विकास की दृष्टि से इन रचनाओं का व्यापक महत्त्व है, जिनमें नयी कविता के प्रगीत का पूरक बनकर ‘नवगीत’ आन्दोलन विकसित हो रहा था | नवगीत आधुनिक काव्यबोध, जिसमें काव्यमूल्यों के साथ-साथ ज्ञानात्मक संवेदन भी है, का छंदोबद्ध अनुगायन है। यह बड़बोलेपन से मुक्त आत्मीय संवाद है। इसमें कविता की अपनी शर्तों के साथ जनपक्षधरता, आमजन के संघर्ष, उसके सौन्दर्यबोध आदि जीवन के विविध पक्षों को अभिव्यक्ति का विषय बनाया गया है । नयी कविता की सभी काव्य प्रवृतियाँ नवगीत में दृष्टिगत होती हैं| रचाव के क्षेत्र में भाषा, बिंब, प्रतीक तथा सोच की दृष्टि से यह नयी कविता और लोकगीतों से प्रभावित है | केदारनाथ सिंह, रवीन्द्र ‘भ्रमर’, रामदरश मिश्र, ठाकुर प्रसाद सिंह, रमानाथ अवस्थी, रमेश रंजक, परमानन्द श्रीवास्तव नवगीत आन्दोलन के प्रमुख कवि रहे है |

प्रतिबद्ध कविता

प्रतिबद्ध कविता आन्दोलन मार्क्सवादी चेतना से संपृक्त होकर (गुटनिरपेक्षता का दावा करते हुए)मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह, चंद्रकांत देवताले, पारसनाथ सिंह, राजीव सक्सेना आदि के माध्यम से आगे बढ़ा किन्तु संकीर्णता के कारण आगे चलकर नयी कविता की प्रगतिवादी धारा में विलीन हो गया |

अकविता आन्दोलन

अकविता का आंदोलन नई कविता के खिलाफ चला। ‘अकविता’ पत्रिका के माध्यम से इसके प्रवर्तन का प्रयास किया गया | अकविता आक्रोश की कविता तो थी लेकिन वह जनाक्रोश की कविता नहीं बन सकी फिर भी अकविता ने नयी कविता के प्रति मोहभंग को उभारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। अकविता की सकारात्मक भूमिका यह रही है कि उसने शिक्षित मध्य वर्ग को प्रतिक्रिया करने तथा विरोध जताने का साहस प्रदान किया| अकविता में कुत्सित, अश्लील, और वीभत्स कुछ भी वर्जित नहीं है | परिवेशजन्य प्रतिक्रियाओं को चलती भाषा में निरपेक्ष चित्रण अकविता का लक्ष्य रहा है | वस्तुत: अकविता ने माहौल में मौजूद प्रश्नाकुलता को उभारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। परंतु अकविता में मौजूद दिशाहीन विरोध एवं समस्त का नकार उसे ले डूबा। अकविता द्वारा उठाए गए प्रश्न मुख्यत: समाज संस्कृति एवं राजनीति के मूल प्रश्न थे जो निश्चित रूप से व्यवस्थाजन्य थे। सत्तर के दशक के कवियों ने इन प्रश्नों को सुसंगत राजनीतिक दृष्टिकोण के साथ एक बार फिर उठाने का प्रयत्न किया और बुर्जुआ माहौल में जनांदोलन को अनिवार्य माना। नागार्जुन की इस दौर की कविताओं में जो तीव्र जनाक्रोश दिखता है उसके मूल में सत्तर के दशक का माहौल था इस व्यापक जनाक्रोश का ज्वलंत दस्तावेज बना उनका काव्य खिचड़ी विप्लव देखा हमने | जगदीश चतुर्वेदी, चंद्रकांत देवताले, सौमित्र मोहन, सतीश जमाली, मुद्राराक्षस, राजकमल चौधरी और श्याम परमार अकविता आन्दोलन के उल्लेखनीय कवि हैं |

 

समकालीन कविता

1970 के बाद की कविता को समकालीन कविता के नाम से जाना जाता है। आरम्भ में इसमें अपने काल विशेष में होने वाली घटनाओं के खुलासे की प्रवृति निहित थी। डॉ.विश्वम्भर नाथ उपाध्याय ने इसी आधार पर उस काल के अनेक अलग-अलग आन्दोलनों के समर्थक रचनाकारों का समवेत संकलन भी प्रकाशित किया था। समकालीनता एक ही समय में एक साथ होने, जीने, काम करने की द्योतक है। अतः एक काव्य प्रवृति के रूप में समकालीनता बोध कों स्वीकार करना चाहें तो यह कह सकते हैं कि समकालीन कविता ऐसी कविता है जो अपने समय के साथ चलती है, होती है, जीती है। इसे आधुनिकता बोध का अगला चरण भी कहा जा सकता है। अंतर केवल इतना है कि आधुनिकता बोध के केंद्र में आधुनिक मनुष्य है और समकालीनता बोध के केंद्र में समकाल। इससे यह समझ में आ जाता है कि समकालीन कविता अपने समय की विसंगति, विडम्बना और तनाव से जुड़े सवालों से टकराती एक विशेष रूप और गुणधर्म वाली कविता है, जिसके लिए अपने समय में सटीक होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह, गगन गिल, अनामिका, ज्ञानेंद्रपति, राजेश जोशी, उदय प्रकाश, विवेक शुक्ल, मंगलेश डबराल, अरुण कमल, कात्यायनी, राजीव सबरवाल आदि समकालीन कवियों में इन मुद्दों के समाधान ढूँढने की बड़ी छटपटाहट देखी जा सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ये कवि केवल समकालीन कविता के प्रतिनिधि कवि ही नहीं बल्कि समकालीन कविता के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध कवि भी हैं।

विचार कविता

यह आन्दोलन भी नयी कविता की रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष के फलस्वरूप सन 70 के बाद अस्तित्व में आया | नरेंद्र मोहन, वेणुगोपाल, अलोकधन्वा, कुमार विमल, ज्ञानेंद्र पति, ऋतुराज और धूमिल आदि इस आन्दोलन के प्रमुख कवि रहे है | लेकिन रचाव और सोच के स्तर पर नयी कविता से भिन्न नहीं जान पड़ती है बल्कि उसी का एक आयाम प्रतीत होती है | 

Tuesday, 17 May 2022

हिंदी साहित्य में आत्मकथा

 जब कोई व्यक्ति अपने जीवन की घटनाओं का विवरण स्वयं लिखता है तो उसे आत्मकथा कहते हैं। वस्तुतः जब व्यक्ति राजनीति, साहित्य, विज्ञान, सामाजिक कार्य आदि में विशेष महत्व अर्जित करता है तब वह कलात्मक, साहित्यिक ढंग से अपनी जीवनी स्वयं लिखता है, जिसे आत्मकथा कहते हैं। लेखक अपने जीवन में घटित घटनाओं का क्रमिक ढंग से वर्णन कर, उन्हें सजीवता प्रदान करता है। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के शब्दों में–“आत्मकथा लेखक के अपने जीवन से सम्बद्ध वर्णन है, आत्मकथा के द्वारा अपने जीवन का सिंहावलोकन और एक व्यापक पृष्ठभूमि में अपने जीवन का महत्व दिखलाया जाना संभव है। साहित्य की इस विधा में लेखक वर्णनात्मक शैली में अपने जीवन का एक ऐसा क्रमिक ब्यौरा प्रस्तुत करता है जिससे कि न केवल उसके जीवन को संजीवनी प्रदान करने वाली मूल शक्ति का पता चलता है अपितु उसका अंतर्बाह्य व्यक्तित्व भी साकार हो उठता है। आत्मकथा लेखक के अतीत का लेखा-जोखा भर ही नहीं है, यह तो परिवेश विशेष में जिए गए क्षणों का पुनःसृजन है, इस कारण इसकी गणना सर्जनात्मक साहित्य के अंतर्गत की जाती है। चूँकि आत्मकथा में व्यक्ति अपने लम्बे जीवन-अनुभवों का निचोड़ प्रस्तुत करता है, अतः तत्कालीन समाज और परिवेश जीवंत हो उठता है।

प्राचीन साहित्य में आत्मकथा की परम्परा भले ही नहीं रही हो लेकिन ऐसा नहीं है कि कथाकारों ने आत्म वचन को नहीं अपनाया हो। हर्षचरित का वह आरम्भिक हिस्सा है, जिसमें रचयिता बाणभट्ट ने अपमान, वंचना और हताशा में भरे अपने बचपन, विद्यार्थी जीवन और शुरूआती युवावस्था की चर्चा की है। इसी तरह कुछ और नाम भी आते हैं जिनमें बिलहण (विक्रमांकदेव चरित), दण्डी (दशकुमारचरित) आदि प्रमुख हैं।

हिंदी साहित्य में आत्मकथा लेखन के तीन निश्चित चरण हैं

·         आरंभिक युग

·         स्वतंत्रता पूर्व युग

·         स्वातंत्र्योत्तर  युग 

आरंभिक युग

हिंदी साहित्य में आत्मकथा लेखन की शुरुआत सत्रहवीं शताब्दी में बनारसीदास जैनकी अर्द्धकथानक’  (1641ई.) से होती है, जो अपनी बेबाकी में चौंकाने वाली आत्मकथा से मानी जाती है। यह आत्मकथा पद्य में लिखी गयी है जिसमें बड़े ही तटस्थ भाव से अपने गुण और दोषों को बनारसीदास जी ने स्वीकार किया है । बनारसीदास की अर्द्धकथा के बाद एक लंबे कालखण्ड में आत्मकथा लेखन की दृष्टि से मौन मिलता है। इस लंबे मौन को स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सन् 1860 में अपने आत्मचरितसे तोड़ा है। दयानन्द सरस्वती जी का स्वकथित जीवन वृत्तान्त अत्यन्त संक्षेप में भी अपने वर्तमान तक पहुंचने की कथा का निर्वाह निजी विशिष्ट चेतना के साथ करता है।

भारतेंदु ने अपनी पत्रिकाओं के माध्यम से इस विधा का भी पल्लवन किया। उनकी स्वयं की आत्मकथा ‘एक कहानी: कुछ आपबीती कुछ जगबीतीका आरंभिक अंश प्रथम खेलशीर्षक से प्रकाशित हुआ था। उनकी संक्षिप्त-सी आत्मकथा की भाषा आम-बोलचाल के शब्दों से निर्मित हुई है, जो एक तरह से बाद की आत्मकथाओं के लिए आधार-दृष्टि का काम करती है। अपना परिचय देने के क्रम में आत्मकथाकार ने अपनी सहृदयता का यथेष्ट प्रमाण दिया है-

जमीन चमन गुल खिलाती है क्या-क्या?

बदलता है रंग आसमाँ कैसे-कैसे |

भारतेंदु के अतिरिक्त इस काल के आत्मकथाकारों में सुधाकर द्विवेदी कृत रामकहानीऔर अंबिकादत्त व्यासकृत निजवृतांतको महत्वपूर्ण माना जा सकता है। कलेवर की दृष्टि से इन आत्मकथाओं को भी संक्षिप्त कहा जा सकता है।

·     स्वतंत्रता पूर्व युग

सत्यानंद अग्निहोत्री कृत मुझमें देव जीवन का विकासका पहला खण्ड सन् 1909 में और दूसरा खण्ड सन् 1918 में प्रकाशित हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक ने आर्यसमाज के प्रचार की प्रतिस्पर्द्धा में देव-समाज के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने हेतु इस ग्रन्थ को रचा था। आस्तिकता और वैदिक विचारधारा का खण्डन इस आत्मकथा का प्रमुख हिस्सा है। सन् 1921 में भाई परमानंदकी आत्मकथा आपबीतीप्रकाशित हुई। इसे किसी क्रांतिकारी की प्रथम आत्मकथा माना जा सकता है। स्पष्टवादिता, सच्चाई के लिए प्रसिद्ध, वैदिक धर्म के सच्चे भक्त परमानन्द की आपबीती का अपनी तत्कालीन राजनीतिक स्थिति में एक विशेष राजनीतिक महत्त्व है। सन् 1924 में स्वामी श्रद्धानंद की आत्मकथा कल्याणमार्ग का पथिकप्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने अपने जीवन संघर्षों और आत्मोत्थान का वर्णन किया है। 

सन् 1932 में मुंशी प्रेमचंद ने हंसका एक विशेष आत्मकथा-अंक सम्पादित करके अपने यहाँ आत्मकथा विधा के विकास की एक बड़ी पहल की थी। 1941 में प्रकाशित आत्मकथा मेरी आत्म कहानीके आत्मकथाकार प्रसिद्ध साहित्यकार श्यामसुन्दर दास हैं। सम्पूर्ण कृति में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना, विकास, गति, तत्कालीन हिन्दी और हिन्दी की स्थिति की चर्चाएँ हैं। सन् 1942 ई. में बाबू गुलाबराय की आत्मकथा मेरी असफलताएँशीर्षक से प्रकाशित हुई। यह आत्मकथा अत्यन्त ही रोचक एवं व्यंग्य-विनोदपूर्ण है, साथ ही लेखक के व्यक्तित्व, चरित्र, कार्यक्षमता पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश डालती है।

20वीं शती के चौथे दशक में ही महात्मा गांधी ने आत्म-दर्शनकी अपनी जीवनव्यापी कोशिशों को आत्मकथा का रूप दिया, जिसे उन्होंने सत्य के प्रयोगकी संज्ञा दी। मूल रूप से यह आत्मकथा गुजराती में थी जो अनुदित होकर बाद में हिन्दी में भी प्रकाशित होती है। गांधीजी इस बात से सहमत थे कि आत्मकथा लिखने का पश्चिमी ढंग अनिवार्यतः आत्म-केन्द्रित और अहम्मन्यतापूर्ण है। परन्तु गांधी ने अपने व्यक्ति या मैंके बजाय आत्माको आत्मकथा के केन्द्र में लाकर इन पाश्चात्य विकृतियों का प्रतिकार किया। सही मायने में गाँधीजी ने आत्मकथा का भारतीयकरण किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भारतीय जनता उनके जीवन-विश्वास और जीवन व्यवहार का अन्धानुकरण न करे, क्योंकि उनकी बातें अन्तिम और सचनहीं है। सत्य को उन्होंने पाया नहीं है, बल्कि उसे पाने की निरन्तर अथक कोशिश की है|

हरिभाऊ उपाध्याय की आत्मकथा साधना के पथ पर1946 ई. में प्रकाशित हुई, जिसमें लेखक ने 1842 से 1945 तक के जीवनानुभवों को लिपिबद्ध किया है। राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा पांच खण्डों में मेरी जीवन यात्राशीर्षक से प्रकाशित हुई। आत्मकथा में राहुल सांकृत्यायन के जीवन के 62 सालों का चित्रण है तथा दक्षिण भारत की यात्रा, मठ का आश्रय, आर्य समाज से सम्पर्क, महात्मा गाँधी के प्रभाव, लंका, तिब्बत, जापान, रूस व यूरोप आदि की यात्रा, किसान सत्याग्रह, जेलयात्रा, बौद्ध धर्म व साम्यवाद से प्रभावित होने की कथा है। इस विशाल और व्यापक आत्मकथा में लेखक की साहित्यिक अभिरुचियों, वैयक्तिक गुण-दोषों, अनुभूतियों, भावनाओं, यात्राओं तथा विशिष्ट उपलब्धियों का विस्तृत वर्णन हुआ है। स्थान-स्थान पर उनकी रचनाधर्मिता, रचना-प्रक्रिया तथा लेखन स्रोतों का भी उल्लेख है।

स्वातंत्र्योत्तर  युग

स्वातंत्र्योत्तर  युग में आत्मकथा लेखन में काफी तेजी आई | 1947 में प्रकाशित बाबू राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथामें लेखक के बचपन के तत्कालीन सामाजिक रीति-रिवाजों का, संकुचित प्रथाओं से होने वाली हानियों का, तत्कालीन गँवई जीवन का, धार्मिक व्रतों, उत्सवों और त्यौहारों का, शिक्षा की स्थितियों का हू-ब-हू चित्र अंकित है। 1951 में प्रकाशित स्वामी सत्यदेव परिव्राजक की स्वतंत्रता की खोज में, अर्थात् मेरी आत्मकथाहिन्दी की अत्यन्त महत्वपूर्ण आत्मकथा है। स्वतंत्रता की खोज में भटकते पथिक की यह कथा मानवता से जुड़ी आत्मा की छटपटाहट एवं तत्कालीन भारतीय राजनीतिक स्थितियों से सम्बद्ध है। यशपाल की आत्मकथा सिंहावलोकनउनके उपन्यासों की भाँति रोचक और मर्मस्पर्शी है। सेठ गोविंददास की आत्मकथा के तीन भाग प्रयत्न, प्रत्याशा और नियतारितहै और चतुरसेन शास्त्री की दो आत्मकथाएं: यादों की परछाइयां’ (1956), तथा मेरी आत्म कहानी’ (1963) है | छठे दशक के प्रारम्भ में ही पाण्डेय बेचन शर्मा उग्रकी आत्मकथा अपनी खबरप्रकाशित हुई। पाण्डेय बेचन शर्मा उग्रने मुक्तिबोध के से आत्मीय और आकुल आवेग के साथ अपनी अजीब जिंदगी में आए कुछ प्रमुख व्यक्तियों के चरित्र की गहरी छानबीन की है।

लोकप्रियता में महात्मा गांधी और पण्डित नेहरू के बाद हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा आती है जिनकी क्या भूलूँ क्या याद करूँ(1969 ई.),नीड़ का निर्माण फिर(1970 ई.), बसेरे से दूर(1977ई.) और दशद्वार से सोपान तक(1985 ई.)  ने गद्य की इस विधा के लेखन में नवीन कीर्तिमान स्थापित किए हैं। अत्यंत विस्तृत होने के बावजूद बच्चन जी की आत्मकथा की विशेषता उसका सुव्यवस्थित होना है। उनके बाद प्रकाशित आत्मकथाओं में वृन्दावनलाल वर्मा की अपनी कहानी’ ( (सन् 1970), देवराज उपाध्याय की यौवन के द्वार पर’ (सन् 1970), शिवपूजन सहाय की मेरा जीवन’ (सन् 1985), प्रतिभा अग्रवाल की दस्तक ज़िंदगी की’ (सन् 1990) और भीष्म साहनी की आज के अतीत’ (सन् 2003) प्रकाशित हुई। देश विभाजन की त्रासदी को भीष्म साहनी ने जीवंत भाषा में चित्रित किया है। उनकी शैली मर्मस्पर्शी है।

समकालीन आत्मकथा साहित्य में दलित आत्मकथाओं का उल्लेखनीय योगदान है। ओमप्रकाश बाल्मीकि की जूठन’, मोहनदास नैमिशराय की अपने-अपने पिंजरेऔर कौशल्या बैसंत्री की दोहरा अभिशाप, तुलसीराम की मुर्दहियाऔर मणिकर्णिका’, श्यौराज सिंह बैचेनकी मेरा बचपन मेरे कंधों परआत्मकथाएँ इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण पहल है जो कहीं-न-कहीं इसके उज्जवल भविष्य की ओर इशारा करती है। दलित आत्मकथाओं के बारे में ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं, “किसी भी दलित द्वारा लिखी आत्मकथा सिर्फ उसकी जीवनगाथा नहीं होती, बल्कि उसके समाज की जीवनगाथा भी होती है। लेखक की आत्म अभिव्यक्ति होती है। उसके जीवन के दुःख, दर्द, अपमान, उपेक्षा, आत्मकथा उसकी जाति एवं समाज के दुःख-दर्द और अपमान-उपेक्षा इत्यादि को भी स्वर देता है।

वर्तमान समय में महिला रचनाकारों ने इस विधा को गहरे सामाजिक सरोकारों से जोड़ा है। इस संदर्भ में मैत्रेयी पुष्पा की कस्तूरी कुण्डल बसैका नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं| शिकंजे का दर्दसुशीला टाकभौरे की आत्मकथा नारी के शोषण के विरुद्ध संघर्ष की गाथा है।