Monday, 28 April 2014

हिन्दी में गज़ल: रूमानी बोध से सामाजिक बोध का सफ़र



हिन्दी में गज़ल लिखने की परम्परा काफी पुरानी है | अमीर खुसरो को यदि हिन्दी का पहला रचनाकार माना जाता हैं तो हिन्दी के पहले गजलकार भी अमीर खुसरो ही हैं। अमीर खुसरो ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी काव्य रचना की अंगभूत विधा के रूप में ग़ज़ल रचना का भी सूत्रपात किया| ख़ुसरो ने अपने समय की प्रचलित खड़ी बोली अर्थात् हिन्दवी में काव्य रचना की प्रक्रिया में फारसी साहित्य की इस प्रमुख विधा के कलेवर को अपनाकर नए प्रयोग के साथ उसे नया मुकाम देने की कोशिश की | ग़ज़ल का रदीफ़ फ़ारसी में है और क़ाफ़िया हिन्दवी में है| खुसरो के बाद कबीर और मीरा ने भी अपनी भक्ति भावना को व्यक्त करने के लिए इस विधा को अपनाया | इसलिए यह कहना कि हिंदी में ग़ज़ल लेखन की परम्परा नयी है, इन महान रचनाकारों के साथ न केवल अन्याय होगा, बल्कि एक अमूल्य निधि को झुठलाने का पापकर्म भी होगा |   
ग़ज़ल की पैदाइश भले ही हिंदी में न होकर फ़ारसी भाषा और साहित्य में रही हो लेकिन उसकी अभिव्यक्ति क्षमता की ताक़त को देखते हुये हिंदी के रचनाकारों ने भी उसे अपनाया और हिंदी की प्रकृति के अनुरूप उपमा-उपमानों, प्रतीकों और बिम्बों से युक्त करते हुए फारसी की आत्मा से मुक्त कर दिया | इसप्रकार हिंदी को एक नयी विधा मिली, वही ग़ज़ल को एक नयी भाषिक और सांस्कृतिक परम्परा की विशाल थाती | लेकिन विडम्बना यह रही है कि शुद्धतावादी हिंदी रचनाकारों और आलोचकों ने ग़ज़ल को एक घुसपैठिये विधा के रूप में देखा और हिंदी की  साहित्यिक विधा के रूप में स्वीकार नहीं किया | ग़ज़ल की अपनी पृष्ठभूमि और हिंदी साहित्य की सामंती एवं दरबारी मानसिकता विरोधी प्रकृति इसका प्रमुख कारण रहा है | फ़ारसी साहित्य में विलासी राजाओं के विलास और मनोरंजन के लिए गज़लकार आशिक और माशूका की रोमैंटिक कथाओं को अभिव्यक्त करते थे | इसमें आम जनता के दुःख दर्द या प्रगतिशील चेतना की अभिव्यक्ति की कोई संभावना नहीं थी | आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने हिंदी की साहित्य परंपरा में इसे सामंती एवं दरबारी चेतना मानते हुए ऐसे विषयों को साहित्य के लिए वर्जित घोषित किया है | यही कारण है कि जब शमशेर ने पारंपरिक रूमानी संस्कार के दायरे से बाहर आकर ग़ज़ल को लोक जीवन की सच्चाई और समग्रता से जोड़ने का ‘दुस्साहस’ किया तो डॉक्टर राम विलास शर्मा ने यह कहकर खारिज कर दिया कि" ग़ज़ल तो दरबारों से निकली हुई विधा है, जो प्रगतिशील मूल्यों को व्यक्त करने में अक्षम है !" फिर भी भारतीय कवियों में सबसे प्रखर अनुभूति के कवि अमीर खुसरो के ग़ज़ल हिंदी रचनाकारों के लिए इस विधा को आजमाने की संभावना के संकेत के रूप में अवश्य विद्यमान थे | गालिब ने भी अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिये गज़ल को ही माध्यम चुना| इसलिए हिंदी में ग़ज़ल रचना की चाह रखनेवाले रचनाकार ग़ज़ल को प्रेम और लौकिक प्रेम जैसी किसी विशिष्ट भावाभिव्यक्ति तक ही सीमित काव्यरूप मानने को तैयार नहीं थे, क्योंकि वे अपनी साहित्य परंपरा में देखते है कि रीतिकालीन साहित्य में दैहिक सौन्दर्य और लौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति किसी एक या खास काव्यरूप में न होकर अनेक काव्यरूपों में हुई है और उन काव्यरूपों में अन्य कई भावों की भी अभिव्यक्ति हुई है | इसप्रकार किसी खास काव्यरूप में अनेक भावों को अभिव्यक्त करने की साहित्यिक पृष्ठभूमि ने हिंदी रचनाकारों को गजल रूप में काव्य रचना के लिए प्रेरित किया | भले ही यह शुरुआत थोड़ी हिचकिचाहट और थोड़े विरोधों के साये में हुई, लेकिन हिंदी रचनाकारों ने ग़ज़ल में केवल रोमैंटिक भावों या जीवन के एकांगी रूप को अभिव्यक्त करने की अपेक्षा जीवन की अनेक छोटी-बड़ी और युगीन पर्तों को उघाड़कर देखा | हिंदी ग़ज़लकारों ने उर्दू या फारसी गज़लकारी इस धारणा को अव्यावहारिक साबित कर दिया कि अच्छी ग़ज़ल वही हो सकती है, जिसमें केवल प्रेम भावनाओ का चित्रण हो और जिसके कोई सामाजिक सरोकार नहीं होते | यहाँ तक कि हिंदी की जनवादी प्रकृति को लक्षित करते हुए मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ ने इतना तक कह डाला कि "ग़ज़ल को अब हिन्दी वाले ही जिन्दा रखेंगे, उर्दू वालों ने तो इसका गला घोंट दिया है !" इसकी वजह यह है कि हिंदी की प्रत्येक ग़ज़ल में आम जीवन उसी तरह से अभिव्यक्त होता है जिस तरह से भारतेंदु, निराला, अज्ञेय, नागार्जुन, शमशेर और हिंदी के अन्य कवियों की कविताओं में अभिव्यक्त हुआ है |
हिन्दी में गज़ल लिखने की परम्परा के विभिन्न आयाम और पड़ाव हैं। हिन्दी में गजल रचना करने में सूफी कवियों और amiamiiअमीर खुसरो rrकी प्रारंभिक लेकिन महत्त्वपूर्ण भूमिका के बाद हिंदी ग़ज़ल की परंपरा को  भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, श्रीधर पाठक , राम नरेश त्रिपाठी, अयोध्या सिंह उपाध्याय, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद और निराला ने उसे सिंचित किया तो शमशेर और त्रिलोचन ने हाशिये पर पड़ी इस विधा को गति और नयी दिशा प्रदान की | यहाँ उल्लेख करना आवश्यक होगा कि फ़िराक गोरखपुरी इस कड़ी में अन्यतम थे, जो हिंदी और उर्दू के विभेद से परे जाकर ग़ज़लों की दुनिया रच रहे थे, जिनके यहाँ अतीत की गूंज और वर्तमान की बेचैनी दोनों मौजूद है | ‘फॉर्म’ के स्तर पर वे समकालीनों के बीच सम्पूर्ण गज़लकार थे | फिर भी उनका झुकाव उर्दू साहित्य की ओर की ओर अधिक था|
भले ही हिन्दी में गजल को अलग पहचान देने का श्रेय दुष्यंत कुमार को दिया जाता है | लेकिन इसके पहले शमशेर ने गजल की विषयगत संकीर्णता से बाहर आकर उसे व्यापक भावभूमि देने की कोशिश कर चुके थे | दुष्यंत कुमार ने हिंदी में ग़ज़ल लेखन के विरोधों और आलोचनाओ के खिलाफ़ बागी तेवर अपनाया, जो लोगों को काफी पसंद आया और उनके पीछे एक पूरी पीढ़ी ग़ज़ल लेखन में उतर आई | उन्होंने ग़ज़ल को हिन्दी कविता की स्वतन्त्र विधा के रूप में स्थापित भी किया |
यहाँ यह स्वीकार करना पड़ेगा कि हिंदी के रचनाकारों ने ग़ज़ल को अगर उर्दू साहित्य से अपनाया तो उसकी मुख्य विशिष्टता प्रभावोत्पादकता, मौलिकता और अन्दाजे-बयां के साथ अपनाया और आम आदमी की तकलीफों और युगीन हलचलों को बड़ी संजीदगी और साहित्यिक मुद्रा के साथ ग़ज़लों में अभिव्यक्त किया | हिंदी गज़लकारों ने प्रेम भावनाओं को भी नहीं नकारा बल्कि उसे काल्पनिक दुनिया से निकालकर एक व्यापक सामाजिक भावभूमि प्रदान की | हिन्दी में गज़लकारी को सम्प्रेषण के एक ऐसे सशक्त माध्यम के रूप में स्वीकार किया गया, जो बिल्कुल सहज, सरल होते हुए भी प्रभावोत्पादक और आम आदमी की चेतना को झकझोरती है| इसके लिए रचनाकारों ने उस भाषा को अपनाया,  जो आम-आदमी की भाषा है और जिसे आम-आदमी समझता है, बोलता है, सुनता है,  पढ़ता है, जीता है और पसंद भी करता है । दुष्यन्त कुमार स्पष्ट शब्दों में कहते है कि
"जिसको मैं ओढ़ता बिछाता हूँ
वह गज़ल आपको सुनाता हूँ।"
तो बदलती परिस्थितियों में, जब हिंदी कविता अभिव्यक्ति की समस्या से जूझ रही थी, तब ग़ज़ल की जरुरत को हरेराम ‘समीप’ इन शब्दों में व्यक्त करते है-
‘बदलते हालात बतलाना ज़रूरी हो गया।
इसलिए मुझको ग़ज़ल गाना ज़रूरी हो गया|’
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता हैं । मुक्त चेतना वाले भारतेन्दु ने हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं का सूत्रपात करने के साथ ही ग़ज़ल को भी हिंदी काव्य रचना के लिए एक काव्य रूप में केवल स्वीकार किया बल्कि आगामी रचनाकारों के मार्गदर्शन और उन्हें बेहिचक ग़ज़ल रचना को प्रेरित करने के उद्देश्य से स्वयं भी गज़ल लिखी । गज़ल  गायक के रूप में अपना उपनाम  उन्होंने ' रसा ' , रखा था । उनकी  गज़ल  के कुछ शेर देखिए --
‘दिल मेरा  ले  गया दगा करके
बेवफा  हो  गया वफा  करके ।
क्यूं  न दावा करे मसीहा का
मुर्दे  ठोकर  से  वो जिला  करके ।
क्या हुआ यार छिप गया किस तर्फ
इक  झलक  सी  मुझे दिखा करके ।
दोस्तों कौन मेरी तुरबत पर
रो  रहा है  ' रसा'  ' रसा करके |’

आगे चलकर अयोध्या सिंह उपाध्याय “हरिऔध” जयशंकर प्रसाद, निराला, देवी प्रसाद पूर्ण, राम नरेश त्रिपाठी आदि कवियों ने भी ग़ज़ल की रचना की | सूर्यकान्त त्रिपाठी  ' निराला ' में सामाजिक और राजनीतिक चेतना गहरी थी, जो उनकी कविताओं के साथ-साथ उनकी गजलों में दृष्टगत होता है --
किनारा वो हमसे किए जा रहे हैं
दिखाने को दर्शन  दिए जा रहे हैं ।
खुला  भेद  विजयी कहाए  हुए जो
लहू  दूसरों  का  पिए  जा रहे  हैं |’
भारत की स्वतंत्रता संग्राम की चेतना से हिन्दी गज़ल भला अछूती कैसे रह सकती है ?  जगदम्बा प्रसाद मिश्र  ' हितैषी ' की गज़ल में देशभक्ति का तेवर है--
‘शहीदों  की  चिताओं  पर लगेंगे हर  बरस  मेले
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी  निशां होगा ।
कभी वह दिन भी आएगा जब अपना  राज्य  देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आसमां होगा |’
इनकी गज़लों में जिस खूबसूरती के साथ युगीन संवेदना और समाज का दुःखदर्द मौजूद है, उससे यह कहना गैर मुनासिब होगा कि इन रचनाकारों ने केवल प्रयोग के लिए ग़ज़ल की रचना की | किन्तु ये रचनाकर उर्दू की परंपरागत ग़ज़ल की रूढ़ शैली, शब्दावली, संवेदना, लय, प्रतीक, छंद आदि को तोड़ नहीं पाए | दूसरी बात यह है कि ग़ज़ल के लिए जिस धारदार एवं प्रभावोत्पादक कंटेंट की जरुरत थी, वह ये रचनाकार रच नहीं पाए | इसकारण उनकी गजलों को जनमानस में महत्त्वपूर्ण स्थान नही मिला और ग़ज़ल हिंदी काव्य धारा के हाशिए पर या ‘फुटकल रचनाओं’ के खाते में भी स्थान नहीं पा सकी | 
शमशेर बहादुर सिंह ने संभवत: इस दिशा में पहल की जब उन्होंने उर्दू ग़ज़ल के परंपरागत ढाँचे को तोड़े बिना ही उससे बाहर निकलने का साहस दिखाया और ग़ज़ल की आवश्यकताओं को भी सफलतापूर्वक पूरा किया | शमशेर को अच्छी तरह से एहसास था कि हर नयी परम्परा अपनी पूर्व स्थापित परम्परा की नीव पर खड़ी होती है और उससे जीवन रस ग्रहण करती है, फिर भी रचनाकार की अनुभव सम्पन्नता और युगीन बोध उसे नवीन रूप ग्रहण करने को प्रेरित करती है ताकि जीवन सत्य की सार्थक अभिव्यक्ति संभव हो सके | शमशेर ने 'गज़ल' जैसी रोमेंटिक विधा को यथार्थ के धरातल पर प्रतिष्ठित किया। उन्होंने ग़ज़ल को सामंती 'फार्म' मानने वाले डॉ रामविलास शर्मा का प्रतिवाद करते हुए 'फार्म' के सामन्तीपन से बचने को महत्वपूर्ण माना और स्पष्ट किया कि अगर कोई रचनाकार प्रगतिशील है तो वह कुछ भी लिखेगा तो वह सामंती नहीं होगा | निःसंदेह शमशेर के यहाँ ग़ज़ल सामाजिक सरोकारों के व्यापक कैनवास से जुड़कर जीवन के कमाए हुए सत्य को अभिव्यक्त करने लगती है |
‘जमाने भर का कोई इस कदर अपना न हो जाये
कि अपनी ज़िन्दगी खुद आपको बेगाना हो जाये।
सहर होगी ये रात बीतेगी और ऐसी सहर होगी
कि बेहोशी हमारे देश का पैमाना हो जाये|’ 
गज़ल के विकास और तेवर का प्रमाण त्रिलोचन के ग़ज़ल संग्रह 'गुलाब और बुलबुल'  में भी मिलता है जहाँ तत्कालीन समाज का जद्दोजहद मुस्तैदी से मौजूद मिलता है-
‘ठोकरें दरदर की थीं हम थें
कम नहीं हमने मुँह की खाई हैं|’
यदि शमशेर ने हिंदी में गज़लकारी को अपनी स्वतंत्र अस्मिता से पहचान कराया तो दुष्यंत कुमार ने ग़ज़ल को अंगद पाँव की तरह पैर जमाने और वामन की तरह पैर फ़ैलाने की ताकत प्रदान की | गज़लकारी की दुनिया में दुष्यंत कुमार के पाँव रखते ही हिंदी में ग़ज़ल की क्षमता में अभूतपूर्व बदलाव हुआ | दुष्यंत कुमार ने ग़ज़लों के रूप-शिल्प और कथ्य से जुड़े सारे सवालों और आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए उसकी ऐसा पुख़्ता और विराट रचना संसार निर्मित किया की कि ग़ज़ल को सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्त करने और कहने में असमर्थ और हिंदी से इत्तर और बाहरी घोषित करने का सवाल ही बेमानी हो गया | दुष्यंत कुमार ने हिंदी की विशाल शब्द-संपदा के साथ ही भारतीय सामाजिक और साहित्यिक परम्परा के मिथकों, प्रतीकों, ऐतिहासिक तथ्यों और नए बिम्बों को साधते हुए ग़ज़ल का एक नया सौन्दर्य शास्त्र निर्मित कर दिया | आगे चलकर हंसराज रहवर, अदम गोंडवी, जानकी बल्लभ शास्त्री, जहीर कुरैसी, मधुर नज्मी, मुनव्वर राणा, प्रियदर्शी ठाकुर, शहाय अशरफ आदि ग़ज़लकारों ने इस नए सौन्दर्य शास्त्र का ही अनुसरण किया | दुष्यंत के साहस की दाद देनी होगी कि परंपरावादी ग़ज़लकारों की तमाम आलोचनाओ और विरोधों के बावजूद आम बोलचाल के शब्दों का धड़ल्ले से एवं प्रभावी इस्तेमाल कर ग़ज़ल की पारंपरिक भाषा की रूढ़ियों को नकार दिया और जनमानस में गहरी पैठ बना ली|
दुष्यंत कुमार का स्वर सड़क से संसद तक गूंजता है | 'लोक की चिंता और देश की चिंता' उनkikiiकी गजलों का केंद्रबिंदु है जो आज की खोखली राजनीति की दुनिया में बस दिखावे की चीज़ रह गई है। आम आदमी की तकलीफ की नुमाइश अब जलसों-जुलूसों में केवल खोखले नारों के रूप व्यक्त की जाती है। आम जनता के प्रति अन्याय और उनकी पीड़ा का प्रतिकार उन्ही की भाषा में करने की बेचैनी के कारण ही वे ग़ज़ल कहने की ओर अग्रसर हुए | ‘साये में धूप’ में वे लिखते है कि “अगर गज़ल के माध्यम से गालिब अपनी निजी तकलीफ को इतना सार्वजनिक बना सकते हैं तो मेरी दुहरी तकलीफ (जो व्यक्तिगत भी है और सार्वजनिक भी) इस माध्यम के सहारे एक अपेक्षाकृत व्यापक पाठक वर्ग तक क्यों नहीं पहुँच सकती?
दुष्यंत कुमार सियासती पैतरेबाजी और व्यवस्था की जड़ता के कारण  आजादी के सपनों एवं उम्मीदों के टूट जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते है-
‘कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए|’
क्योंकि राजनीतिक सत्ता पर आदर्शहीन, भष्ट, सामन्ती और अवसरवादी प्रवृति वाले लोग कुंडली मारकर बैठ गए थे, जिनके पास केवल आश्वासनों के सब्जबाग थे, उन्हें पूरा करने और जनता के जीवन में रोशनी फ़ैलाने की नियति कभी नहीं रही| वे मोहभंग की स्थिति को इन शब्दों व्यक्त करते है-
‘खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को,
सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए|’
आजादी के बाद से जिस तरह से मूल्यों का पतन हुआ है, चाहे वे राजनीतिक मूल्य हों या नैतिक धार्मिक या सामाजिक, उससे आम आदमी का जीवन काफी त्रासद हो गया है | आजादी के बाद हमने अपने सर्वागीण विकास के लिए जिस लोकतंsarvangiinaत्र को बड़ी उम्मीद के साथ स्वीकार किया, वह हमारे राजनेताओं के सियासती फरेब के साए में लोभ, अहंकार, भ्रष्टाचार और बेईमानी का पर्याय बनता गया है और आम आदमी का जीवन दुश्वार होता गया है-
‘अब नयी तहजीब के पेशे-नज़र हम
आदमी को भूनकर खाने लगे हैं ।‘
‘भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेरे बहस ये मुद्दा’
दुष्यंत अपने समय और समाज को, उसकी चुनौतियों को बहुत खुली और पैनी नज़र से देखते हैं। उनका स्वर सदा मानवताविरोधी ताकतों के खिलाफ़ रहा है| राजनीति की आदर्शहीन, भष्ट और अवसरवादी प्रवृत्तियों को लेकर वे अपने मन में उत्पन्न होने वाले क्षोभ, निराशा, हताशा और विवशता को ग़ज़लों में कह जाते है-
‘जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में
हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं|’
लेकिन लोकतंत्र को लेकर वे निराश नहीं नहीं है| उनकी शायरी में निराशा से निकलकर उम्मीद और उमंग का भाव मौजूद है | वे अपने भरोसे को इन पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त करते हैं-
‘जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए,’
वे जीवन, समाज और देश को पतन के गर्त में ले जाने वाली ताकतों के खिलाफ़ आम जनता के सीने में आग जलने की बात भी करते है और पत्थरों को भी पिघला देनेवाली आवाज भी देते है-
‘मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए|’
‘वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए |’
लेकिन उनका इरादा नेक है, वे अराजकतावाद के पक्षधर नहीं है | वे जनता के प्रति होने वाले अन्याय और उनके बीच असमानता और सांप्रदायिक भेदभाव वाली व्यवस्था से मुक्ति मात्र चाहते है | इसलिए कहते है कि
‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए’
ग़ज़ल कहने वाले हिंदी के अधिकांश रचनाकारों की नजर युगीन विषम और त्रासद परिस्थितियों के खिलाफ़ गुस्से और नाराजगी से बनी है, जो अन्याय और राजनीति छलों के खिलाफ नए तेवरों की आवाज थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमाइंदगी करती है |

दुष्यंत कुमार मध्यवर्गीय दुःख-दर्दों से अधिक जुड़े हुए थे तो  समकालीन हिन्दी ग़ज़लों के सशक्त हस्ताक्षर अदम गोंडवी की गज़लें सत्ता के शोषण से दबी कुचली निम्नवर्गीय जनता, गरीब किसान, जिनके हाथों में छाले और पैरों में फटी विवाई है, और भूख की पीड़ा से संतप्त लोगों का महाख्यान है| वे ग्रामीण जीवन के ताने-बाने के प्रति संवेदनशील रचनाकार है | इसलिए वे ग़ज़ल को गाँवों के बीच ले जाकर वहां की हक़ीकत को ग़ज़ल का विषय बनाना चाहते थे और बनाया भी | वे स्पष्ट शब्दों में आग्रह कहते है –
‘ग़ज़ल को ले चलो अब गाँवों के दिलकश नज़ारों में’
और गाँवों की ‘धरती की सतह’ परा खड़े होकर मानवता का दुःख-दर्द लिखते है और माटी की खुशबू को अभिव्यक्त करते है-
‘मानवता का दर्द लिखेंगे, माटी की बू-बास लिखेंगे ।
हम अपने इस कालखण्ड का एक नया इतिहास लिखेंगे |’
और उनकी पीड़ा या भावनाओं को ग़ज़ल के जरिए कह जाते है-
‘शबनमी होठों की गर्मी दे ना पायेगी sukuसुकून,
पेट के भूगोल में उलझे हुए इन्सान को”
“घर में ठण्डे चूल्हे पर अगर ख़ाली पतीली है ।
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है|”’
उनकी गज़लों में जन प्रतिरोध का स्वर दुष्यंत कुमार की तुलना में काफी सशक्त है, जिसके निशाने पर संसदीय सियासत के साथ साथ, दलाली को प्रश्रय देती व्यवस्था, अफसरशाही और साम्प्रदायिक फरेब है |
अदम गोंड़वी ने अपनी एक गज़ल में एक ऐसे ही सत्य को उजागर किया है, जिसका आमनासामना हम निरंतर करते हैं-
‘काजू की भुनी प्लेट, व्हिस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में|’
एक ओर महंगाई से त्रस्त आम जनता और दूसरी ओर दिल्ली की तथाकथित आधुनिकता की बहसों और बयारों को आमने सामने रखकर तल्ख़ व्यंग्य भी करते है जो आज की कड़वी सच्चाई को अभिव्यक्त करती है-
‘हीरामन बेज़ार है उफ़्! किस कदर महँगाई से
आपकी दिल्ली में उत्तर-आधुनिकता आई है |’
शहरों की चकाचौंध से आकर्षित होकर या रोजगार की तलाश में गांवों से शहरों की पलायन करने वाले लोगों के जीवन की त्रासदी को कुंअर बेचैन इसप्रकार व्यक्त करते है –
‘हम इतनी करके मेहनत शहर में फुटपाथ पर सोये
ये मेहनत गाँव में करते तो अपना घर बना लेते’
ज्ञान प्रकाश विवेक उनके वजूद को महज इश्तहार से अधिक नहीं मानते हैं
‘सियासी शहर में तू आ गया है तो सुन ले
वजूद तेरा यहाँ इश्तहारसा होगा।’
हिन्दी गज़ल की विकास की धारा जैसे जैसे सूक्ष्म होती जा रही है वैसे वैसे ग़ज़ल के नूतन स्वर उभर रहे हैं जिसके कई रंग हैं और कई मिज़ाज़ हैं और कई तासीरें हैं। इससे पता चलता है कि गज़ल अब हमारे ज़माने और समय के साथ हैं |
आम जनता के वोटों से चुने गए राजनीतिक प्रतिनिधियों के छल और भरोसा तोड़ने की करतूतों को ज्ञान प्रकाश विवेक कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं
‘सूरज से हम बचे तो जुगनू से जल गये हैं
जिन पर किया भरोसा वो लोग छल गये हैं’
सम्प्रदाय आधारित घिनौने चक्रव्यूह में एक दूसरे कि खून के प्यासे बने आम आदमी की बेज़ार होती जिंदगी के कड़वे सच को नरेंद्र कुमार व्यक्त करते हुए लिखते है कि
‘एक ने मंदिर उछाला एक ने मस्ज़िद का नाम
खूब खायी पत्थरों की मार अपनी ज़िन्दगी|’
वर्तमान समय में उटपटांग ख़बरों को परोसने की आज की भारतीय मीडिया की कारगुजारियों पर मुनव्वर राणा इस तरह से व्यंग्य करते है-
“’दुनिया क्या ख़बर इसे कहते हैं शायरी
मैंने शकर के दाने को चींटी पे रख दिया”’

आज हिंदी में गजल कहने की भाषा और शिल्प के हर धरातल पर बहुत ही सहजता और स्वतःस्फूर्तता है। उनका अंदाजे बयाँ बिल्कुल स्पष्ट और सीधा है। अभिव्यक्ति की यह सहजता जिन्दगी के गहन और सहज बोध से आती है और यही हिंदी में ग़ज़ल की वास्तविक पहचान बन जाती है | सबसे बड़ी बात जो ग़ज़ल विधा की क्षमता और व्यापक स्वीकार्यता की पहचान बनती है कि इसने हिंदी और उर्दू के भाषाई फ़र्क को समाप्त कर दिया है जो गज़ल की विधा को शमशेर और दुष्यंत और उसके बाद के हिंदी रचनाकारों के अपनाने से पहले हुआ करता था | जो गज़लकार उर्दू और फ़ारसी के जबरन ठूस कर भरे गए शब्दों से रचित या कही गयी गजलों को ही श्रेष्ठ ग़ज़ल की कोटि में रखते थे, जिसके कारण ग़ज़ल आम जनता से दूर हो गयी थी, उनके इस पूर्वाग्रह को स्वयं ग़ज़ल विधा ने ही झूठा साबित कर दिया| इस पूरी विकास परम्परा में भाव-भंगिमा और अंदाजे-बयां पहले की तुलना में बहुत सशक्त और प्रखर हुआ है | आज अपनी व्यापक समावेशी क्षमता के कारण हिन्दी ग़ज़ल रूमानी परम्परा से निकलकर युगीन भाव बोध के साथ जुड़ती गयी है और इसकी प्रवृति विकासोन्मुख है| फॉर्म या शिल्प विन्यास के स्तर पर अपनी तमाम कमियों के बावजूद हिन्दी साहित्य की विकास परंपरा को एक नया मुकाम देने की दिशा में अग्रसर हैं| 

Thursday, 13 September 2012

सरकारी फिजूलखर्ची भी है राजकोषीय घाटे के किए जिम्मेदार


वित्त मंत्री पी चिदम्बरम और भारतीय प्रधानमंत्री और उनके आर्थिक सलाहकार बढ़ती महंगाई के लिए जिस तरह से आधारहीन तर्क दे रहे है और झूठ पर झूठ बोले जा रहे है उससे यही लगता है कि उन्हे आर्थिक विकास और महंगाई के संबंधों को जानते हुए भी वे मानते है कि आम आदमी को महंगाई के कारणों की समझ हो ही नहीं सकती है । बढ़ती महंगाई के दौरान आर्थिक सुधार की प्रक्रिया काफी जटिल और मुश्किल हो जाती है । पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि करने से बढ़ती महंगाई की समस्या और गहरी हो जाती है । देश के आर्थिक विशेषज्ञों के अलावा मीडिया भी आर्थिक सुधारों के लिए पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि कर सब्सिडी कम या समाप्त करने की वकालत करती है । देश के इन तथाकथित आर्थिक विशेषज्ञों और गला फाड़ कर चीख मचाने मीडिया ने कभी यह सुझाव क्यों नहीं देती कि पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में वृद्धि करने के बजाय या उससे पहले सरकार अपने अमले पर किए जाने वाले खर्च में कटौती करे। राजकोषीय घाटे का एक बड़ा कारण सरकारी फिजूलखर्ची है जिसे देश की अर्थव्यवस्था की चिंता करने वाली र्आर्थिक विशेषज्ञों की टीम और मीडिया ढ़क कर रखती है क्योंकि वे भी सरकारी खर्चों में साझेदार है । 

Wednesday, 1 August 2012

पानी : सहज सुलभ प्राकृतिक संसाधन से दुर्लभ कमोडिटी की ओर


जल : सहज सुलभ प्राकृतिक संसाधन से दुर्लभ कमोडिटी की ओर

जल जीवन के लिए केवल अनिवार्यता ही नहीं है बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था को विकास की पटरी पर गतिमान रखने के लिए प्रमुख सहायक भी है । यह महज संयोग नहीं है कि विश्व की बड़ी और प्राचीन सभ्यताओं का विकास नदी घाटियों के आस-पास ही हु था हम सभी को पीने, नहाने, खाना बनाने और अन्य कामों के लिए पानी की जरूरत होती है । लेकिन जलवायु और मौसम के बदलते पैटर्न के कारण जल का प्राकृतिक पैटर्न भी बदल रहा है । इसके साथ ही बढ़ते जल प्रदूषण के कारण जल एक दुर्लभ कमोडिटी में तब्दील हो रहा है । 2010 में विश्व स्तर पर पानी से लगभग 500 करोड़ डॉलर से अधिक का कारोबार हुआ है ।

पानी की मांग का मुख्य कारक : जनसंख्या का विस्फोट

निःसन्देह पानी का मार्केट काफी लोकप्रिय है । संयुक्त राज्य का अनुमान है कि 2050 तक विश्व की आबादी वर्तमान के 7 अरब से बढ़कर 10 अरब हो जाएगी । ऐसी स्थिति में थोड़ी देर के लिए कल्पना कीजिए । आप सप्ताह में कितना लीटर पानी पीते हैं ? नहाने के लिए कितना पानी इस्तेमाल करते हैं ? खाना बनाने, शौचालय में फ्लस करने के लिए, कार की सफाई करने के लिए आप कितना पानी बहाते हो ? अब आप स्वयं से पूछिए कि अगले 38 वर्षों में जब विश्व की आबादी 3 अरब और बढ़ जाएगी तब क्या होगा ? कल्पना कीजिए कि ये सभी पीने, नहाने, खाना बनाने और अन्य कामों के लिए पानी की मांग कर रहे हैं । ऐसी स्थिति में सीमित उपलब्धता के कारण पानी की कीमत सोने की कीमत से प्रतिस्पर्धा करे तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए । संयुक्त राज्य का अनुमान है कि 2050 तक विश्व की लगभग 1 अरब आबादी स्वच्छ पेय जल से वंचित रहेगी ।
  
2011 तक 12 वर्षों के काफी कम समय में विश्व की आबादी 1 अरब बढ़ी है । चीन की आबादी इस समय 1.3 अरब है जबकि भारत की आबादी लगभग 1.2 अरब है। इतनी बड़ी आबादी के लिए पानी की मांग को पूरा करना एक बड़ी चुनौती है । चीन बढ़ती जनसंख्या को बसाने के लिए पहले ही लगभग 500 नए नगर स्थापित करने की योजना बना रहा है। कल्पना कीजिए कि प्रत्येक 500 नए नगरों में 100000 या अधिक लोग रहते हैं । सभी के लिए पानी की कितनी जरूरत होगी ?

आज एक अमेरिकी प्रतिदिन 150 गैलन पानी का इस्तेमाल करते हैं जबकि चीन में 23  गैलन पानी का इस्तेमाल होता है। लेकिन उनके यहाँ भी तेजी से पानी का इस्तेमाल बढ़ रहा है । कुछ दशक पहले चीन विकासशील देश था । लेकिन बदलाव काफी तेजी से हो रहा है । चीन की विकास दर मौजूदा धीमेपन के बावजूद अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक है । भारत का अनुमान है कि अगले एक दशक में पानी की मांग मौजूदा स्तर से दो गुनी हो जाएगी । जबकि बढ़ती आबादी के कारण 2030 तक कृषि कार्यों के लिए पानी की मांग में 42 फीसदी की बढ़ोतरी होगी । इसलिए पानी के मार्केट में पानी की सप्लाई की तुलना में माँग सुरसा राक्षसी के मुख की तरह विकराल और काफी भयावह है लेकिन निवेश करने वालों के लिए एक बेहतरीन अवसर है जो सुनिश्चित करेगा कि पानी की सप्लाई को कैसे बरकरार रखा जाय ।

फॉर्चून का कहना है किआप शायद यह सोच रहे है कि लोग अधिक पानी का इस्तेमाल करेंगे । लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है । विश्व जल परिषद के अनुसार विश्व में इस्तेमाल होने वाले कुल 86 प्रतिशत जल का 70 प्रतिशत कृषि में और 16 प्रतिशत उद्योगों में और केवल 10 फीसदी ही घरेलू कार्यों में इस्तेमाल होता है । इसलिए यह सोचना कि आबादी बढ़ने से पानी के घरेलू खपत में वृद्धि होगी, गलत है । वास्तव में इतनी बड़ी आबादी को खाद्यान्न उपलब्ध करने और औद्योगिक वस्तुओं की मांग को पूरा करने के लिए कृषि और औद्योगिक उत्पादन के लिए पानी की मांग में वृद्धि होगी । केवल पीने के लिए पानी की मांग में वृद्धि की बात होती तो यह बहुत बड़ी समस्या नहीं होती । बोतल का पानी पीने वाले लोग ही विश्व में पानी का सबसे अधिक उपभोग नहीं करते हैं । यह तो हमारी लाइफ़स्टाइल और पानी खर्च करने की आदतों का नतीजा है जो जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव को बढ़ा दे रही है ।

हम जो कुछ भी खाते हैं, पहनते हैं और इस्तेमाल करते हैं, उसमें काफी अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। उस स्थिति पर विचार कीजिए जब विकासशील देशों के लोग भी पश्चिम के देशों की लाइफ़स्टाइल की तरह रहना शुरू कर देते हैं तब पानी की सप्लाई पर क्या असर पड़ेगा । एक अध्ययन के अनुसार अधिकांशतः कपास के बने एक डिज़ाइनर जींस के निर्माण में 2906 गैलन पानी की आवश्यकता होती है ।क कप कॉफी के उत्पादन के लिए 71 गैलन पानी की आवश्यकता होती है । एक पौंड गेहूं के लिए 160 गैलन पानी की आवश्यकता होती है। एक पौंड चावल में 407 गैलन पानी की आवश्यकता होती है। एक पौंड स्टील में 31 गैलन पानी की आवश्यकता होती है तो कार के लिए 104000 गैलन पानी की आवश्यकता होती है।

वर्तमान समय में आर्थिक मुनाफे के कारण कृषि क्षेत्र की तुलना में उद्योगों में पानी की प्राथमिकता और आवश्यकता बढ़ती जा रही है । 1 टन गेंहू के उत्पादन के लिए 1000 टन पानी की आवश्यकता होती है, जिसकी कीमत लगभग 12500 रू होगी । जबकि उद्योगों में 1000 टन पानी से 700000 रू के वस्तुओं का उत्पादन संभव होगा । उद्योगों में पानी के इस्तेमाल से अधिक आर्थिक लाभ के कारण जहाँ उद्योगों में पानी के इस्तेमाल में बढ़ोतरी हुई है वहीं उद्योगों में इस्तेमाल के बाद निकले पानी से प्रदूषण भी काफी खतरनाक रूप धारण कर चुका है । संयुक्त राज्य पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार “विकासशील देशों में बड़े नगरों से गुजरने वाली नदियाँ सीवरों के तुलना में थोड़ी ही साफ रह गई हैं।” अमेरिका में 40 फीसदी नदियाँ और झील इतनी प्रदूषित हैं कि उनमें सामान्य क्रियाकलाप संभव नहीं है । चीन में 80 फीसदी नदियाँ इतनी प्रदूषित हैं कि उनमें मछलियों का जीवित रहना संभव नहीं है । जापान में 30 भूमिगत जल औद्योगिक प्रदूषणों से विषाक्त हो गया है ।

फॉर्चून के अनुसार 2010 में पानी का विश्व बाजार 508 बिलियन डॉलर का था जिसमें से बोतल वाले पानी का बाजार 58 बिलियन डॉलर का था और यह काफी तेजी से बढ़ रहा है । उद्योगों को जल उपकरणों और अन्य सेवाओं के लिए 28 बिलियन डॉलर की आवश्यकता होती है । कृषि कार्यों के लिए पानी का कारोबार 10 बिलियन डॉलर का है । 15 बिलियन डॉलर की आवश्यकता फिल्टर और अनेक तरह के गर्म एवं ठंडा करने वाले उपकरणों के लिए होती है और 170 बिलियन डॉलर का इस्तेमाल गंदे पानी, सीवेज़ व्यवस्था, गंदे पानी के शुद्धिकरण और पानी की रिसायक्लिंग के लिए किया जाता है । 226 बिलियन डॉलर शुद्धिकरप्लांटों और वितरण व्यवस्था पर खर्च होता है। संक्षेप में कहा जाय तो नया सोना अर्थात पानी को शुद्ध करना महँगा है और लागत में बढ़ोतरी होती जाएगी । जनसंख्या में वृद्धि के साथ भूमिगत जल स्तर के घटते जाने से विश्व स्तर पर स्वच्छ पानी की उपलब्धता को लेकर बढ़े हुए खतरे के कारण पानी के कारोबार में इजाफा होने की उम्मीद है ।

निःसन्देह पानी 21 सदी का नया सोना है और पानी की लगातार कम होती उपलब्धता इस बात की गारंटी है कि पहले से ही सीमित इस कमोडिटी की कीमतों में वृद्धि होगी । सबसे अहम है कि विश्व के किसी भी देश के पास सूरसा के मुँह की तरह इस विकराल समस्या को लेकर कोई लंबी अवधि की योजना नहीं है । समस्या की जड़ हमारी आर्थिक विकास की आत्मघाती प्रक्रिया में है जिसके कारण इस धरती के वासियों के इस्तेमाल के लिए जल स्रोत समाप्त होते जा रहे हैं । विश्व में पानी के उत्पादों का कारोबार करने वाली सबसे बड़ी कंपनी पेप्सी ने स्वीकार किया है कि पानी की कम होती उपलब्धता अनेक क्षेत्रों में कारोबार के समक्ष जोखिम बढ़ता जा रहा है । मॉर्गन स्टैनले ने नवंबर 2011 की रिपोर्ट में कहा है कि पानी 21 वी सदी की सबसे बड़ी कमोडिटी हो सकती है क्योंकि घटती सप्लाई और बढ़ती मांग के कारण एक अच्छा व्यवसाय ही नहीं है बल्कि इसका प्रबंधन एवं समुचित उपयोग करने वाली कंपनियां पानी की कमी की स्थिति में भी अपनी उत्पादन गतिविधियों का जारी रखते हुए अन्य कंपनियों के मुक़ाबले लाभ की स्थिति में रह सकती हैं ।

जैसे-जैसे अभाव बढ़ता जा रहा है और पानी की कमी होती जा रही है, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर पानी के विभिन्न उपभोक्ताओं के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है । लगभग 260 नदी बेसिने दो या दो से अधिक देशों से होकर गुजरती है लेकिन किसी मजबूत संस्था या ठोस समझौते के अभाव में बेसिनों में बदलाव को लेकर कभी-कभी देशों के तनाव उभर आता है । जब वगैर किसी क्षेत्रीय समझौते या सहयोग के कोई प्रोजेक्ट शुरू किया जाता है तो तनाव और संघर्ष का कारण बन जाता है और क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ावा मिलता है । अरब और इज़रायल के बीच पानी हमेशा से ही विवाद का मुद्दा रहा है । इज़रायली नेता एरियल शेरोन ने एकबार कहा था कि 1964 में सीरिया द्वारा जॉर्डन नदी की दिशा को बदलने पर इज़रायल द्वारा रोक दिए जाने के कारण ही छह दिनों तक युद्ध हुआ था । इसप्रकार विश्व जल संकट में अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों को भंग करने की क्षमता है लेकिन यदि सकारात्मक स्तर पर इस संकट के समाधान के लिए काम किया जाय तो विश्व समुदाय को आपस में सहयोग करने पर भी बाध्य करने की क्षमता है ।

आगामी दिनों में विश्व स्तर पर पानी की कमी को दूर करने के उपाय :
अच्छी बात यह है कि विश्व स्तर पर पानी के संकट के समाधान के लिए दीर्घावधि के उपाय किए जा रहे हैं । सिंगापुर में 20 फीसदी पेय जल गंदे नालों के पानी को नवीनतम अतिसूक्ष्म फिल्टरों द्वारा शुद्ध बनाकर प्राप्त किया जाता है। चीन कृषि और औद्योगिक कार्यों के लिए नए सोनेके उत्पादन और सरंक्षण को लेकर काफी गंभीर है।  चीन देश के दक्षिणी भाग की नदियों से सूखे उत्तर-पूर्व की ओर पानी ले जाने के लिए 1816 मील लम्बी नहर का निर्माण कर रहा है। इसके साथ ही वेओलिया, स्वेज़ और आईटीटी जैसी विश्व की पानी कंपनियाँ जल प्रबंधन के लिए म्युनिसिपालिटी से साझेदारी कर रही हैं। कई सरकारें और उद्योग भी निकट भविष्य में पानी के संकट पर विजय पाने के लिए भी सहयोग कर रहें हैं । अमेरिका में 700 मिलियन डॉलर का एक विलवणीकरण (desalination) प्रोजेक्ट प्रगति पर है जिससे 2014 तक सान डियागो काउन्टी के लिए 8 फीसदी पेय जल की सप्लाई की जाएगी, जबकि इस काउन्टी की आबादी पिछले शक में लगभग 17 फीसदी की दर से बढ़ी है। 

पिछले एक दशक मे अमेरिकी मोटर कं फोर्ड मोटर्स ने जीवन-शक्ति पानी के इस्तेमाल को कम करने के लिए वर्ष के प्रत्येक दिन को जल दिवस घोषित कर दिया है । आज कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें प्रतिदिन प्रमुख खबरों में रहती है क्योंकि इस वेशकीमती संसाधन का भंडार दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है । लेकिन फोर्ड एवं अन्य कंपनियाँ दशकों से निःशुल्क उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन पानी के मूल्य और प्रभाव का मूल्यांकन कर रही है क्योंकि कच्चे तेल के साथ ही पानी की समुचित सप्लाई का अभाव भी उनके व्यवसाय को प्रभावित कर सकता है ।

टेक्नोलॉजी स्ट्रेटेजिक ग्रुप के प्रबंध निदेशक स्टीवन मैक्सवेल ने अपनी पुस्तक द फ्यूचर आफ वाटर में लिखा है कि आमतौर पर लोगों की यह धारणा है कि पानी मुफ्त में उपलब्ध है । लेकिन आगामी दशकों में इस धारणा में बदलाव आना अवश्यंभावी है क्योंकि इस सीमित संसाधन का अभाव एक ऐसी समस्या बन जाएगी कि आर्थिक और वित्तीय फैसलों के साथ ही लोगों के व्यक्तिगत फैसले भी इससे निर्धारित होंगे । इसलिए विश्व बाजार और अर्थव्यवस्था में पानी की निर्णायक भूमिका को ध्यान में रखते हुए फोर्ड, कोका कोला, आईबीएम और इंटेल जैसी कुछ कंपनियों ने पानी के सरंक्षण या प्रबंधन को अपनी कंपनी की प्रोफ़ाइल में शामिल कर लिया है । आईबीएम ने अपने बरलिंगटन स्थित सेमीकंडक्टर फैक्ट्री में पानी के इस्तेमाल में 29 फीसदी की कटौती की है।

2009 में मिशिगन झील के तट पर बसे मिल्वौकी नगर में बढ़ते जल व्यवसाय के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक मिल्वौकी जल परिषद का गठन किया गया है । यह नगर अब अपने को जल हब एवं जल कारोबार के ब्रांड के रूप विकसित भी कर रहा है । इसके पीछे धारणा यह है कि पानी का कारोबार अधिक निवेश के साथ ही रोजगार के नए  की समुचित सप्लाई सुनिश्चित करने वाले नगर ही कंपनियों को निवेश के लिए आकर्षित कर सकते हैं और रोजगार के नए अवसरों के प्रमुख केंद्र बन सकते हैं ।