Tuesday, 8 September 2026

आंदोलन थम गया, लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा हैं

 सीजेपी के नेतृत्व में चला आंदोलन फिलहाल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ समाप्त हो गया है। डेढ़ महीने तक नारे, पोस्टर, भाषण, बहस, पुलिस बैरिकेड और मीडिया कैमरों से भरा रहने वाला जंतर-मंतर अब सामान्य हो गया है | समर्थक इसे अपनी जीत बता रहे हैं। विपक्ष इसे सरकार के झुकने का प्रमाण मान रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की मिसाल बता रहा है। सच शायद इन तीनों के बीच कहीं है।

 यदि शांतिपूर्ण जनदबाव किसी सरकार को निर्णय बदलने के लिए प्रेरित करता है, तो इसे लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत माना जाना चाहिए। लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि वही संविधान सरकार को संसद तक पहुँचाता है और वही संविधान नागरिकों को सड़क पर खड़े होकर सरकार से जवाब मांगने का अधिकार देता है। संसद और सड़क दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था के वैध मंच हैं।

 लेकिन इस आंदोलन ने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी छोड़े हैं।

पहला प्रश्न यह है कि क्या मंत्री के इस्तीफे के साथ कहानी समाप्त हो जाती है? क्या इससे शिक्षा व्यवस्था की समस्याएँ खत्म हो गईं? क्या परीक्षा प्रणाली पर छात्रों का भरोसा पूरी तरह लौट आया? क्या युवाओं का आक्रोश समाप्त हो गया? यदि इन प्रश्नों का उत्तर "नहीं" है, तो स्पष्ट है कि आंदोलन का केवल पहला अध्याय पूरा हुआ है।

 दूसरा प्रश्न लोकतांत्रिक सहिष्णुता का है। हर आंदोलन सरकार से असहमति के सम्मान की अपेक्षा करता है, लेकिन क्या वही सम्मान आंदोलन के भीतर भी दिखाई दिया? क्या हर विचार और हर प्रतीक के लिए समान स्थान था, या केवल कुछ विचारों को ही स्वीकार्यता मिली? लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब हम अपने विरोधी के अभिव्यक्ति के अधिकार का भी सम्मान कर सकें।

 तीसरा प्रश्न यह है कि क्या विरोध की भी कोई मर्यादा होती है? सरकार की आलोचना लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन क्या सार्वजनिक जीवन में अश्लील भाषा, व्यक्तिगत अपमान और गाली-गलौज भी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का स्वीकार्य रूप है? किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसका नैतिक बल होता है। यदि उसकी भाषा ही हिंसक और अपमानजनक हो जाए, तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। आंदोलन की ऊर्जा और अभद्रता एक-दूसरे का पर्याय नहीं हो सकतीं।

 चौथा प्रश्न मीडिया से जुड़ा है। आंदोलन के दौरान कुछ पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ सामने आईं। मीडिया की आलोचना पूरी तरह वैध है, लेकिन किसी रिपोर्टर को केवल उसकी माइक-आईडी देखकर अपमानित करना या उसके साथ धक्का-मुक्की करना लोकतांत्रिक विरोध नहीं कहा जा सकता। मैदान में मौजूद अधिकांश रिपोर्टर केवल अपना पेशेवर दायित्व निभा रहे होते हैं; वे अपने संस्थान की नीतियाँ तय नहीं करते। यदि मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्न हैं, तो उनका उत्तर आलोचना और बेहतर पत्रकारिता है, हिंसा नहीं।

 सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सरकार से है। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की सबसे बड़ी शक्ति संवाद होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान भी जनता से उनका सीधा संवाद रही है। कठिन परिस्थितियों में उन्होंने कई बार सीधे देशवासियों से बात कर भरोसा कायम करने का प्रयास किया है। लेकिन हाल के वर्षों में यह महसूस किया गया है कि कुछ ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर, जहाँ तत्काल मानवीय प्रतिक्रिया की अपेक्षा होती है, सरकार का संवाद अपेक्षाकृत देर से सामने आता है।

 नीट विवाद इसका प्रमुख उदाहरण है। दोबारा परीक्षा शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होने के बाद पेपर लीक का प्रशासनिक विवाद काफी हद तक पीछे छूट गया था। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के दौरान जिन छात्रों ने आत्महत्या की या जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया, उनके प्रति प्रधानमंत्री की ओर से एक संवेदनशील संदेश की अपेक्षा स्वाभाविक थी। कई बार कुछ शब्दों की सहानुभूति भी पीड़ित परिवारों को यह भरोसा देती है कि देश का नेतृत्व उनके दर्द को समझता है।

 इसी दौरान शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को जन्मदिन की शुभकामनाएँ दिए जाने को छात्रों और अभिभावकों के एक वर्ग ने असंवेदनशील संदेश के रूप में देखा। शुभकामना देना राजनीतिक शिष्टाचार हो सकता है, लेकिन राजनीति में समय और संदर्भ भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे क्षणों में प्राथमिकता संवाद, संवेदना और भरोसा कायम करने को मिलनी चाहिए।

 नेतृत्व की वास्तविक पहचान केवल बड़े भाषणों से नहीं होती, बल्कि संकट की घड़ी में समय पर दी गई मानवीय प्रतिक्रिया से भी होती है। लोकतांत्रिक शासन की परिपक्वता इसी में है कि संवाद तब शुरू हो, जब असंतोष जन्म ले रहा हो, न कि तब, जब वह आंदोलन का रूप ले चुका हो।

इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को भी आईना दिखाया है। यदि युवाओं में इतना व्यापक असंतोष था, तो विपक्ष ऐसा भरोसेमंद मंच क्यों नहीं बना पाया, जहाँ सामान्य छात्र स्वतः जुड़ते? कई दल आंदोलन की दिशा समझने में देर करते रहे। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि केवल सरकार का विरोध करना पर्याप्त नहीं है; जनता के असंतोष को रचनात्मक दिशा देना भी विपक्ष की जिम्मेदारी है।

 अंततः इस आंदोलन ने सभी पक्षों को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। सरकार को समय पर संवाद करना सीखना होगा। विपक्ष को समय रहते नेतृत्व देना होगा। आंदोलनकारियों को अपनी भाषा और आचरण की मर्यादा बनाए रखनी होगी। मीडिया को अपनी विश्वसनीयता मजबूत करनी होगी और पुलिस को कानून के साथ संवेदनशीलता का भी परिचय देना होगा।

 किसी मंत्री का इस्तीफा लोकतंत्र की अंतिम उपलब्धि नहीं हो सकता। वास्तविक सफलता तब होगी जब इस पूरे घटनाक्रम से व्यवस्था बेहतर बने, परीक्षा प्रणाली अधिक विश्वसनीय हो, युवाओं का विश्वास लौटे और सार्वजनिक विमर्श की भाषा अधिक जिम्मेदार बने।

 क्योंकि सरकारें बदलती रहती हैं, मंत्री भी बदलते रहते हैं। लेकिन यदि समाज की भाषा, राजनीतिक संस्कृति और संस्थाओं पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ जाए, तो उसका असर केवल एक सरकार पर नहीं, पूरे लोकतंत्र पर पड़ता है। इसलिए इस आंदोलन का सबसे बड़ा सबक यही है कि व्यवस्था परिवर्तन केवल चेहरों के बदलने से नहीं, बल्कि संवाद, जवाबदेही और सामाजिक मर्यादा की पुनर्स्थापना से आता है।

Monday, 7 September 2026

आरक्षण पर बहस को दबाने के बजाय, संवाद और सुधार का रास्ता क्यों नहीं?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण व्यवस्था के विरोध में प्रदर्शन ने एक बार फिर उस सवाल को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है, जिसे राजनीतिक दल लंबे समय से छूने से बचते रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि आरक्षण चाहिए या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा, उसके प्रभावों का मूल्यांकन और उसमें सुधार की मांग करना लोकतंत्र में अपराध माना जाना चाहिए?

आरक्षण भारत की सामाजिक वास्तविकताओं से निकली व्यवस्था है। सदियों की सामाजिक असमानता, भेदभाव और अवसरों की कमी को देखते हुए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों की संवैधानिक व्यवस्था की गई। इसलिए सामाजिक न्याय की आवश्यकता को नकारना उचित नहीं होगा। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी व्यवस्था की समीक्षा की मांग को केवल आरक्षण-विरोधी मानसिकता कहकर खारिज कर देना भी लोकतांत्रिक बहस के अनुकूल नहीं है।

आज सवाल उठ रहे हैं कि आरक्षण का आधार केवल जाति होना चाहिए या आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन भी इसका महत्वपूर्ण आधार बने? क्या आरक्षण का लाभ वास्तव में उन परिवारों तक पर्याप्त रूप से पहुंच रहा है जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है? क्या आरक्षित वर्गों के भीतर भी कुछ अपेक्षाकृत मजबूत और प्रभावशाली परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका लाभ लेते जा रहे हैं? क्या अत्यंत पिछड़े परिवारों तक अवसर पर्याप्त रूप से पहुंच रहे हैं? इन सवालों पर भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए।

आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण, क्रीमी लेयर, क्षेत्रीय असमानता और वास्तविक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे भी इसी बहस का हिस्सा हैं। यदि किसी व्यवस्था का उद्देश्य सामाजिक रूप से सबसे पिछड़े लोगों को आगे लाना है, तो यह देखना जरूरी है कि उसका लाभ वास्तव में सबसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं।

प्रदर्शनकारियों की कुछ मांगें इसी दिशा में हैं। इनमें आरक्षण में आर्थिक स्थिति को अधिक महत्व देना, एक ही परिवार को बार-बार आरक्षण का लाभ न मिलने देना और आरक्षण का लाभ लेकर उच्च संवैधानिक या सरकारी पदों तक पहुंच चुके परिवारों की अगली पीढ़ी के लिए व्यवस्था की समीक्षा जैसी मांगें शामिल हैं। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने OBC आरक्षण और क्रीमी लेयर पर सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया थाअगर किसी व्यक्ति के दोनों माता-पिता IAS अधिकारी हैं, तो उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए? अदालत की इस टिप्पणी ने आरक्षण के लाभ को अपेक्षाकृत संपन्न और प्रभावशाली परिवारों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचने से रोकने तथा वास्तविक रूप से वंचित लोगों तक उसका लाभ पहुंचाने की बहस को फिर सामने ला दिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आरक्षण का लाभ किसी परिवार या समूह को आखिर कितनी पीढ़ियों तक मिलता रहेगा? दस वर्ष, पचास वर्ष, सौ वर्ष या अनिश्चितकाल तक? क्या भविष्य में आर्थिक और सामाजिक स्थिति को भी आरक्षण की कसौटी बनाया जा सकता है?

इन मांगों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन इन्हें सुनना लोकतंत्र की जिम्मेदारी है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रदर्शनकारियों की ये मांगें कहीं न कहीं पिछड़े वर्गों के व्यापक हित से भी जुड़ी हुई हैं। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के भीतर भी सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। यदि किसी गरीब और अत्यंत पिछड़े परिवार को लगता है कि उसके हिस्से का अवसर अपेक्षाकृत संपन्न और प्रभावशाली समूह लगातार ले जा रहा है, तो उसकी इस शिकायत को भी गंभीरता से सुना जाना चाहिए। इसलिए आरक्षण का सवाल केवल सामान्य वर्ग का सवाल नहीं है। आरक्षण का मूल उद्देश्य उन लोगों तक अवसर पहुंचाना है, जो वास्तव में सामाजिक और आर्थिक रूप से पीछे हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे जरूरतमंद और वंचित तबके तक प्रभावी रूप से पहुंचे।

इसीलिए आरक्षण की बहस को केवल मेरिट बनाम आरक्षणकी लड़ाई बना देना उचित नहीं होगा। प्रतियोगी परीक्षाओं में अंक क्षमता का एक पैमाना हैं, लेकिन सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक परिस्थितियां भी अवसरों को प्रभावित करती हैं। दूसरी ओर चिकित्सा, अनुसंधान, इंजीनियरिंग और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में गुणवत्ता और दक्षता के मानकों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संविधान का अनुच्छेद 335 स्वयं एससी और एसटी के दावों पर विचार करते समय प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने की बात करता है। इसलिए सामाजिक न्याय और प्रशासनिक दक्षता को एक-दूसरे का दुश्मन बनाने के बजाय दोनों के बीच संतुलन तलाशना जरूरी है।

आरक्षण पर राजनीतिक दलों की दुविधा भी समझी जा सकती है। कोई भी दल करोड़ों लोगों की सामाजिक सुरक्षा और प्रतिनिधित्व की आकांक्षाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता। लेकिन क्या चुनावी गणित के कारण नीति की समीक्षा पर चर्चा ही बंद कर दी जाए? 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण की समीक्षा को लेकर मोहन भागवत के बयान ने इसी भय को राजनीतिक रूप से उजागर किया था। समीक्षा की बात को आरक्षण खत्म करने की मांग के रूप में प्रचारित किया गया और भाजपा को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद शायद अधिकांश दलों के मन में यह डर और मजबूत हो गया कि आरक्षण पर सुधार की बात करना चुनावी आत्मघाती कदम हो सकता है।

लेकिन लोकतंत्र में किसी मुद्दे पर चर्चा इसलिए बंद नहीं की जा सकती कि उससे किसी वर्ग के नाराज होने का डर है। आरक्षण समर्थकों को भी हर आलोचना को दलित-पिछड़ा विरोधी षड्यंत्र मानने से बचना होगा और आरक्षण की आलोचना करने वालों को भी किसी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने से बचना होगा। नीति की आलोचना और किसी समुदाय का विरोधदो अलग बातें हैं।

आज आवश्यकता आरक्षण खत्म करने या अनिश्चितकाल तक उसी रूप में जारी रखने की घोषणा से अधिक एक व्यापक राष्ट्रीय संवाद की है। जातिवार सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों, शिक्षा, रोजगार और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए। हर दस या पंद्रह वर्ष में स्वतंत्र आयोग के माध्यम से समीक्षा की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती? आरक्षण के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, छात्रवृत्ति, कोचिंग और रोजगार के अवसरों पर भी समान जोर क्यों नहीं दिया जा सकता?

जंतर-मंतर का आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने एक कठिन सवाल को फिर सार्वजनिक बहस में ला दिया है। इस बहस को जातीय संघर्ष बनने से रोकना होगा। सरकार और सभी राजनीतिक दलों को आंदोलनकारियों की बात सुननी चाहिए और आरक्षण व्यवस्था के भविष्य पर व्यापक संवाद शुरू करना चाहिए। भारत के संसाधनों और अवसरों पर सभी नागरिकों का अधिकार है। लक्ष्य किसी वर्ग को हराना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें सामाजिक न्याय भी सुरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए अवसर भी अधिक पारदर्शी और न्यायपूर्ण हों।

Friday, 14 August 2026

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस

 विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस केवल कैलेंडर पर अंकित एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास के उस अमिट अध्याय की स्मृति है, जिसकी पीड़ा समय की धूल से कभी पूरी तरह ढकी नहीं जा सकती। वर्ष 1947 का विभाजन केवल भूगोल की रेखाओं के बदलने की घटना नहीं था; वह लाखों सपनों के बिखरने, असंख्य परिवारों के उजड़ने, रिश्तों के टूटने और सभ्यता की साझा विरासत पर पड़े गहरे घाव की कहानी भी था।

ज़रा उस दौर की कल्पना कीजिए—एक ही रात में अपनी जन्मभूमि छोड़ने को विवश लोग, सिर पर घर का अंतिम सामान, गोद में मासूम बच्चों को समेटे माताएँ, भविष्य की अनिश्चितता से भरी आँखों वाले पिता, और वे बुज़ुर्ग, जिनकी स्मृतियों में अपनी मिट्टी की सुगंध जीवन भर बस गई। यह केवल पलायन नहीं था; यह अपनी पहचान, अपनी जड़ों और पीढ़ियों से संजोई गई सांस्कृतिक विरासत से अचानक बिछड़ जाने की असहनीय वेदना थी।
किन्तु इतिहास का यह अध्याय केवल त्रासदी का आख्यान नहीं है; यह अदम्य साहस, धैर्य और पुनर्निर्माण की अनुपम गाथा भी है। जिन्होंने अपने घर, खेत, दुकानें और स्मृतियाँ पीछे छोड़ दीं, उन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बीच भी हार नहीं मानी। किसी ने एक छोटे-से ठेले से नई शुरुआत की, किसी ने श्रम को अपना संबल बनाया, तो किसी ने ज्ञान, कौशल और उद्यमिता के बल पर नया भविष्य गढ़ा। संघर्ष की उन्हीं कहानियों ने आधुनिक भारत की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा को नई दिशा दी।
इस स्मृति दिवस का उद्देश्य अतीत की पीड़ा को जीवित रखना नहीं, बल्कि उससे मिली सीख को संजोना है। यह हमें याद दिलाता है कि विभाजन की विभीषिका हमें परस्पर अविश्वास की ओर नहीं, बल्कि अधिक संवेदनशील, अधिक मानवीय और अधिक एकजुट बनने की प्रेरणा देती है। जब हम दूसरों के दुःख को अपना दुःख मानते हैं, तभी राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और भाईचारे की नींव और अधिक सुदृढ़ होती है।
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि इतिहास की त्रासदियाँ हमें प्रतिशोध नहीं, बल्कि विवेक का मार्ग दिखाएँ। घृणा की अग्नि ने जिस पीड़ा को जन्म दिया, उसका उत्तर केवल प्रेम, विश्वास, संवाद और पारस्परिक सम्मान में ही निहित है। हमारा लक्ष्य ऐसा भारत होना चाहिए, जहाँ किसी भी व्यक्ति को अपनी पहचान, अपने विश्वास या अपनी मातृभूमि से बिछड़ने की विवशता कभी न झेलनी पड़े।
हालाँकि, यह भी उतना ही आवश्यक है कि इतिहास की इन स्मृतियों को ईमानदारी से समझा और संरक्षित किया जाए। किसी भी समाज के लिए यह शुभ संकेत नहीं होता जब राजनीतिक, वैचारिक या अन्य स्वार्थों के कारण उसकी सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने वाले प्रयास किए जाएँ। विचारों में मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, किंतु यदि वे समाज में वैमनस्य, अविश्वास या विभाजन को बढ़ावा दें, तो उनके दूरगामी परिणाम पूरे राष्ट्र को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि इतिहास की पीड़ा से सीख लेकर एकता, सद्भाव, संवैधानिक मूल्यों और मानवता को सर्वोच्च स्थान दें, क्योंकि यही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है और यही उसके उज्ज्वल भविष्य की सबसे मजबूत आधारशिला

Wednesday, 5 August 2026

बांकीपुर का संदेश: क्या भाजपा जन समाज की बेचैनी को सुन रही है?

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यहाँ मतदाता समय-समय पर ऐसे जनादेश देता है, जो स्थापित राजनीतिक धारणाओं को चुनौती देते हैं। कई बार किसी एक विधानसभा क्षेत्र का परिणाम केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत छोड़ जाता है। बांकीपुर विधानसभा का परिणाम भी ऐसा ही एक राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।

इस चुनाव ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक दल किसी सामाजिक वर्ग, क्षेत्र या समर्थक समूह को स्थायी वोट बैंक मानकर नहीं चल सकता। मतदाता किसी का बंधुआ नहीं होता। वह हर चुनाव में अपने अनुभव, अपेक्षाओं और परिस्थितियों के आधार पर नया निर्णय लेता है। जिस दिन कोई दल यह मान ले कि उसका पारंपरिक मतदाता कहीं नहीं जाएगा, उसी दिन राजनीतिक जोखिम शुरू हो जाता है।

पिछले एक दशक में भाजपा ने स्वयं को एक व्यापक सामाजिक आधार वाली पार्टी के रूप में स्थापित किया है। उसने पारंपरिक जातीय सीमाओं से आगे बढ़कर विभिन्न वर्गों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास किया। लेकिन किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी परीक्षा तब होती है, जब उसका अपना कोर वोटर स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे। यदि किसी वर्ग के बीच यह धारणा बनने लगे कि उसकी चिंताओं को गंभीरता से नहीं सुना जा रहा, तो यह केवल चुनावी चुनौती नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वास के संकट का संकेत भी है।

सामान्य वर्ग के एक हिस्से में यूजीसी से जुड़े विवाद, आरक्षण की बहस, कानून-व्यवस्था तथा भरत तिवारी, बंटी यादव और मुकेश श्रीवास्तव जैसे मामलों को लेकर असंतोष की चर्चा रही है। इन मुद्दों पर मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन राजनीति में केवल तथ्य ही नहीं, बल्कि जनधारणा भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करती है। जब समर्थकों को यह महसूस होने लगे कि उनकी आवाज़ सत्ता तक नहीं पहुँच रही, तब असंतोष धीरे-धीरे मतदान में भी दिखाई देने लगता है।

भाजपा को यह भी समझना होगा कि चुनाव केवल पार्टी के चुनाव चिह्न या प्रधानमंत्री की लोकप्रियता के सहारे नहीं जीते जा सकते। हर क्षेत्र में स्थानीय नेतृत्व, समर्पित कार्यकर्ताओं की वर्षों की मेहनत और जनता से उनका व्यक्तिगत जुड़ाव भी निर्णायक भूमिका निभाता है। यदि संगठन के भीतर कार्यकर्ताओं की राय और जनता से मिलने वाले फीडबैक को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, तो उसका प्रभाव अंततः चुनावी परिणामों में दिखाई देता है।

चुनाव केवल सामाजिक समीकरणों का गणित नहीं होते, बल्कि भरोसे, संवाद और राजनीतिक संवेदनशीलता की भी परीक्षा होते हैं। यह सही है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय किसी भी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन सामान्य वर्ग के मतदाता भी भाजपा के पारंपरिक समर्थन आधार का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं। यदि यह वर्ग स्वयं को लगातार उपेक्षित महसूस करने लगे, तो उसका असर अपेक्षा से कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।

भाजपा के आलोचकों का आरोप है कि पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष नहीं, बल्कि अपने समर्थकों की बढ़ती अपेक्षाएँ हैं। उनका कहना है कि जिस दल ने कभी स्वयं को 'पार्टी विद अ डिफरेंस' कहा था, वह अब कई मामलों में अन्य दलों से अलग दिखाई नहीं देता। यदि समर्थकों को यह लगे कि संगठन में संवाद कम हो गया है, योग्य कार्यकर्ताओं की जगह केवल शीर्ष नेतृत्व की पसंद को प्राथमिकता मिल रही है और जनता की प्रतिक्रिया को महत्व नहीं दिया जा रहा, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।

आलोचक यह भी कहते हैं कि राजनीतिक नेतृत्व की संवेदनशीलता केवल नीतियों से नहीं, बल्कि सार्वजनिक प्रतिक्रिया से भी आँकी जाती है। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शबाना आज़मी के पैर में चोट लगने जैसी घटनाओं पर तुरंत संवेदना व्यक्त करते हैं, लेकिन भरत तिवारी प्रकरण, नीट पेपर लीक से जुड़ी घटनाओं के बाद छात्रों की आत्महत्या, अथवा यूजीसी से जुड़े विवादों जैसे मुद्दों पर अपेक्षित सार्वजनिक प्रतिक्रिया न आने से समर्थकों के एक वर्ग में यह धारणा बनी है कि उनकी पीड़ा को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। यह आलोचना सही है या नहीं, यह राजनीतिक बहस का विषय हो सकता है, लेकिन ऐसी धारणाएँ यदि व्यापक होती हैं, तो उनका चुनावी प्रभाव भी पड़ सकता है।

बांकीपुर का परिणाम इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि उसने यह संकेत दिया है कि राजनीतिक रूप से सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्र भी चुनौतीपूर्ण बन सकते हैं। जन सुराज की राजनीति से कोई सहमत हो या असहमत, लेकिन यदि मतदाता विकल्प तलाशने लगें, तो सबसे मजबूत गढ़ भी प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं। लोकतंत्र में कोई भी सीट स्थायी नहीं होती और कोई भी समर्थन हमेशा के लिए सुनिश्चित नहीं होता।

राजनीतिक इतिहास बताता है कि चुनाव अक्सर बहुत छोटे अंतर से तय होते हैं। पाँच प्रतिशत मतों का झुकाव सत्ता बदल सकता है। इसलिए किसी भी सामाजिक वर्ग, संगठनात्मक कार्यकर्ता या पारंपरिक समर्थक की उपेक्षा रणनीतिक रूप से महँगी पड़ सकती है। जो दल अपने समर्थकों को केवल सुनिश्चित वोट मानने लगता है, वह धीरे-धीरे उनके विश्वास से भी हाथ धो सकता है।

दतिया और बांकीपुर जैसे परिणाम किसी एक दल की हार या जीत से अधिक एक व्यापक लोकतांत्रिक संदेश हैं। वे बताते हैं कि जनता केवल वादों से नहीं, बल्कि संवाद, संवेदनशीलता और जवाबदेही से प्रभावित होती है। लोकतंत्र में नेतृत्व की सबसे बड़ी पूंजी केवल उसकी लोकप्रियता नहीं, बल्कि जनता का विश्वास होता है। और जब विश्वास डगमगाने लगता है, तब सबसे मजबूत राजनीतिक दुर्ग भी चुनौती के घेरे में आ जाते हैं।

Thursday, 16 July 2026

चीन-अमेरिका नहीं कर पाए, भारत ने कर दिखाया! बिना चुंबक चलेगी EV मोटर

 वर्चुअल मैग्नेट मोटर ऐसी इलेक्ट्रिक मोटर है जिसमें परमानेंट मैग्नेट मोटर का उपयोग नहीं किया जाता। इसके बजाय, मोटर सॉफ्टवेयर, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और अत्यंत सटीक करंट कंट्रोल की मदद से ऐसा चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) बनाती है, जो व्यवहार में स्थायी चुंबक जैसा काम करता है। इसलिए इसे "वर्चुअल मैग्नेट " कहा जाता है—यानी चुंबक वास्तव में मौजूद नहीं होता, लेकिन उसका प्रभाव इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण से उत्पन्न किया जाता है।

यह कैसे काम करती है?

पारंपरिक EV मोटर में:

  • रोटर पर शक्तिशाली रेयर अर्थ मैग्नेट लगे होते हैं।
  • स्टेटर में बिजली प्रवाहित होने पर चुंबकीय क्षेत्र बनता है।
  • स्टेटर और रोटर के चुंबकीय आकर्षण/प्रतिकर्षण से मोटर घूमती है।

वर्चुअल मैग्नेट मोटर  में:

  • रोटर पर स्थायी मैग्नेट नहीं होते।

  • सेंसर लगातार रोटर की स्थिति मापते हैं।
  • कंट्रोलर (इन्वर्टर) हर मिलीसेकंड में तीन-फेज करंट को सटीक रूप से नियंत्रित करता है।
  • इससे ऐसा गतिशील चुंबकीय क्षेत्र बनता है कि रोटर स्थायी चुंबक वाली मोटर की तरह सिंक्रोनाइज़ होकर घूमता है।

यानी मैग्नेट की जगह "स्मार्ट सॉफ्टवेयर + पावर इलेक्ट्रॉनिक्स" चुंबक का काम करते हैं।

इसके संभावित फायदे

  • रेयर अर्थ मैग्नेट  की आवश्यकता समाप्त हो सकती है।
  • चीन पर निर्भरता कम हो सकती है, क्योंकि रेयर अर्थ मैग्नेट के प्रसंस्करण और निर्माण में चीन का वैश्विक प्रभुत्व है।
  • मोटर हल्की और पर्यावरण की दृष्टि से अधिक टिकाऊ बन सकती है।
  • रेयर अर्थ धातुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर कम होगा।
  • यदि दक्षता समान या बेहतर रही, तो EV निर्माण लागत भी घट सकती है।

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती

यही वह चरण है जहां अधिकांश नई मोटर तकनीकें कठिनाई का सामना करती हैं।

लैब में सफल होना और लाखों मोटरों का व्यावसायिक उत्पादन करना अलग बात है। कंपनी को यह साबित करना होगा कि:

  • मोटर 10–15 वर्षों तक विश्वसनीय रहे।
  • उच्च तापमान और कठिन परिस्थितियों में भी समान प्रदर्शन करे।
  • लागत मौजूदा परमानेंट मैग्नेट मोटर के बराबर या कम हो।
  • दक्षता (Efficiency), टॉर्क और रेंज में प्रतिस्पर्धी बनी रहे।

क्या यह दुनिया बदल सकती है?

संभावना है, लेकिन अभी कहना जल्दबाज़ी होगी।

यदि Vimag Labs:

  • बड़े पैमाने पर उत्पादन कर लेती है,
  • प्रमुख ऑटो कंपनियां इसे अपनाती हैं,
  • और यह तकनीक लागत व प्रदर्शन में सफल साबित होती है,

तो यह EV उद्योग में परमानेंट मैग्नेट मोटर के लिए वैसा ही बदलाव ला सकती है जैसा LED ने पारंपरिक बल्बों के लिए लाया था।

इससे:

  • भारत की तकनीकी क्षमता को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
  • चीन के रेयर अर्थ मैग्नेट पर एकाधिकार को चुनौती मिलेगी।
  • वैश्विक EV सप्लाई चेन अधिक विविध और सुरक्षित बन सकती है।

हालांकि, फिलहाल उपलब्ध जानकारी मुख्यतः कंपनी के दावों और पेटेंट पर आधारित है। इसकी वास्तविक क्षमता का आकलन तब होगा जब स्वतंत्र परीक्षण, बड़े ऑटो निर्माताओं द्वारा अपनाना और व्यावसायिक उत्पादन के परिणाम सामने आएंगे।

Wednesday, 8 July 2026

मोदी सरकार के 12 साल: नीतिगत विफलताएँ

लोकतंत्र में सरकारों का मूल्यांकन केवल उनकी सफलताओं से नहीं, बल्कि उनके नीतिगत फैसलों के बाद समाज में पैदा हुए असंतोष और चुनौतियों से भी होता है। पिछले 12 वर्षों (2014 से 2026 तक) के सफर में जहां एक ओर सरकार ने बुनियादी ढांचे और डिजिटल गवर्नेंस में बड़े बदलावों का दावा किया है, वहीं दूसरी ओर कई ऐसे मोर्चे रहे हैं जहां सरकार के फैसले गंभीर विवादों, जन-आक्रोश और नीतिगत विफलताओं के घेरे में आए हैं।

कृषि से लेकर शिक्षा और रोजगार तक, समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा उठाए जा रहे ये कुछ ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जो सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

कृषि कानून: दृढ़ता और वापसी के बीच का नीतिगत भटकाव

मोदी सरकार के सबसे विवादित फैसलों में 'तीन कृषि कानून' शीर्ष पर रहे। आलोचकों और कृषि विशेषज्ञों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि इन कानूनों को बिना व्यापक आम सहमति और राज्यों को भरोसे में लिए जल्दबाजी में लाया गया। इसके बाद जब देशव्यापी किसान आंदोलन शुरू हुआ, तो सरकार ने सख्त रुख अपनाया। लेकिन अंततः, कानून वापस ले लिए गए। यदि कानून वाकई सुधारवादी थे, तो सरकार उन्हें सुचारू रूप से समझाने और सख्त इरादे के साथ लागू करने में नाकाम रही। वहीं दूसरी ओर, इसके पीछे हट जाने को सरकार की 'नीतिगत कमजोरी' के रूप में देखा गया, जिससे सुधारों की प्रक्रिया अधर में लटक गई।

सरकारी नौकरियां और रोजगार संकट: युवाओं की अधूरी उम्मीदें

हर वर्ष करोड़ों नौकरियों का वादा करने वाली सरकार के लिए सरकारी भर्तियों की सुस्त रफ्तार एक बड़ा सिरदर्द रही है। संसद में समय-समय पर सरकार ने भी स्वीकार किया है कि रेलवे, रक्षा, गृह मंत्रालय, डाक विभाग और अन्य केंद्रीय विभागों में लाखों स्वीकृत पद खाली हैं। इन पदों पर भर्ती की प्रक्रिया अक्सर वर्षों तक चलती रही, जिससे लाखों अभ्यर्थियों को लंबा इंतजार करना पड़ा। इसके साथ ही, भर्ती परीक्षाओं में देरी और कई राज्यों में पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं की निराशा को और बढ़ाया। कई अभ्यर्थियों को एक ही परीक्षा के लिए वर्षों तक तैयारी करनी पड़ी, जबकि कुछ भर्तियाँ न्यायालयी विवादों या प्रशासनिक कारणों से लंबे समय तक अटकी रहीं।

नियमित सरकारी नौकरियों की जगह 'ठेका प्रथा' (Contractual jobs) लागू करने से युवाओं में सुरक्षा की भावना कम हुई है, जिसे युवा वर्ग सरकार के सबसे निराशाजनक फैसलों में से एक मानता है। सरकार का कहना है कि उसने भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाई, डिजिटल चयन प्रणाली लागू की और कौशल आधारित रोजगार को प्रोत्साहित किया, व्यावहारिक स्तर पर तार्किक नहीं प्रतीत होता है | यदि व्यवस्था इतनी प्रभावी हुई है, तो लाखों स्वीकृत सरकारी पद वर्षों तक खाली क्यों रहे? यदि भर्ती प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और तेज़ हुई है, तो परीक्षाओं और नियुक्तियों में बार-बार देरी क्यों देखने को मिली? और यदि रोजगार के अवसर वास्तव में बढ़े हैं, तो बड़ी संख्या में युवा अब भी नियमित सरकारी नौकरियों के लिए वर्षों तक तैयारी करने को मजबूर क्यों हैं?"

पेपर लीक और परीक्षा प्रणालियों की विफलता: छात्रों के भविष्य पर कुठाराघात

हाल के वर्षों में NEET, UGC-NET और विभिन्न राज्यों की कई भर्ती एवं प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं ने देश की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कई परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं, दोबारा आयोजित हुईं या उनकी जाँच शुरू हुई, जिससे लाखों छात्रों का समय, धन और वर्षों की मेहनत प्रभावित हुई। इन घटनाओं के बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) सहित परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर व्यापक बहस हुई। आलोचकों का कहना है कि संगठित पेपर लीक गिरोहों और कथित शिक्षा माफिया के खिलाफ समय पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रही। जब बार-बार पेपर लीक हों, परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ें और लाखों युवाओं का भविष्य अधर में लटक जाए, तब पारदर्शिता, डिजिटलीकरण, प्रशासनिक कुशलता और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन के दावे स्वतः कठघरे में खड़े हो जाते हैं। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा उसकी नीतियाँ नहीं, बल्कि उनका ईमानदार और प्रभावी क्रियान्वयन होता है।

भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और राजनीतिक अवसरवाद का विरोधाभास

2014 में 'ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा' का नारा भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का प्रतीक बनकर उभरा था। केंद्रीय एजेंसियों (ED, CBI) द्वारा विपक्षी नेताओं पर ताबड़तोड़ कार्रवाइयां की गईं। हालांकि, जनता और आलोचकों के बीच इस बात को लेकर भारी असंतोष है कि जिन नेताओं पर खुद सरकार या उसकी पार्टी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाती है, वे जैसे ही पाला बदलकर सत्ताधारी दल (BJP) में शामिल होते हैं, उनके खिलाफ जांच ठंडी पड़ जाती है या उन्हें क्लीन चिट मिल जाती है। भारतीय राजनीति के गलियारों में इस वक़्त एक मुहावरा सबसे ज़्यादा मशहूर है"बीजेपी की वॉशिंग मशीन"। यह महज़ आरोप नहीं, बल्कि आम जनता के बीच गहरा चुका वह सच है जिसने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दावों को एक मज़ाक बना कर रख दिया है। 'ट्रायल चलाकर जेल भेजने' के बजाय राजनीतिक समझौते करने की इस नीति ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की लड़ाई की साख को कमजोर किया है। ED (प्रवर्तन निदेशालय) और CBI जैसी देश की प्रीमियर जांच एजेंसियों का कनविक्शन रेट बेहद कम है, जिसका सीधा मतलब है कि इनका मकसद न्याय दिलाना नहीं, बल्कि सिर्फ 'प्रताड़ित करना' और 'डराना' है ताकि राजनीतिक सौदेबाजी की जा सके। उस आम नागरिक और टैक्सपेयर के साथ इससे बड़ा भद्दा मज़ाक क्या होगा, जो ईमानदारी से टैक्स भरता है और सोचता है कि देश से भ्रष्टाचार खत्म हो रहा है। लेकिन भ्रष्टाचारी जेल जाने के बजाय सत्ता के शीर्ष पर बैठकर देश की नीतियां तय करने लगता है |

एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और कानूनी यू-टर्न

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने का फैसला दिया था। इसके बाद देश भर में दलित संगठनों द्वारा भारी विरोध प्रदर्शन हुए। चुनावी और सामाजिक दबाव के चलते सरकार ने संसद में कानून पारित कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट (Overrule) दिया। यह कदम न्यायिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप और राजनीतिक तुष्टीकरण था न कि सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए उठाया गया कदम ।

चिकित्सा और शिक्षा का बाजारीकरण: आम जनता की जेब पर डाका

पिछले एक दशक में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी तरह से 'माफिया और कॉर्पोरेट' के नियंत्रण में चली गई हैं। निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर खुली लूट, दवाओं और मेडिकल उपकरणों के मनमाने दाम तय होने पर सरकार का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं दिख रहा है। सरकार ने कुछ जीवन रक्षक दवाओं की अधिकतम सीमा तय तो की , लेकिन मेडिकल माफिया ने 'कंसल्टेशन फीस' और 'सर्विस चार्ज' बढ़ाकर उसकी भी भरपाई जनता की जेब से कर ली। आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं कुछ हद तक राहत देती हैं, लेकिन वे निजीकरण की इस बड़ी समस्या का स्थायी इलाज नहीं बन पाई हैं। यह योजना सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के बजाय अंततः सरकारी खजाने का पैसा निजी अस्पतालों की जेब में ही डाल रही है। यह व्यवस्थागत निजीकरण का 'स्थायी इलाज' नहीं, बल्कि एक 'अस्थायी पेनकिलर' है।

निजी स्कूलों और कोचिंग संस्थानों की बेलगाम फीस और व्यावसायिकता ने शिक्षा को एक आम भारतीय परिवार की पहुंच से दूर कर दिया है। एडमिशन फीस, डेवलपमेंट चार्ज, कस्टमाइज्ड ड्रेस और किताबों के नाम पर जो सिंडिकेट (माफिया) स्कूलों के भीतर चलता है, उस पर लगाम लगाने की हिम्मत किसी सरकार में नहीं दिखती। कोटा से लेकर देश के हर कोने में फैले कोचिंग संस्थानों ने समानांतर शिक्षा व्यवस्था खड़ी कर दी है। रेगुलेशन के नाम पर सरकारें केवल तब जागती हैं जब अवसाद के कारण किसी छात्र की आत्महत्या की खबर आती है या किसी बेसमेंट में पानी भरने से बच्चे मर जाते हैं। सरकारों ने जानबूझकर सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की हालत को बदतर होने दिया, ताकि निजी हाथों के लिए बाजार तैयार किया जा सके। यह जन-कल्याणकारी राज्य के विचार पर सबसे बड़ा तमाचा है।

सवर्ण/मध्यम वर्ग: "टैक्सपेयर" बनाम "मजबूर वोटर" का संकट

इस वर्ग की यह शिकायत काफी हद तक धरातलीय हकीकत पर आधारित है। इस देश का मिडिल क्लास और सवर्ण समाज आज खुद को भारत का सबसे असहाय नागरिक महसूस करता है। वह सरकार के लिए महज एक 'दुधारू गाय' है, जिसे बिना चारा दिए सिर्फ दुहा जाता है। एक मिडिल क्लास आदमी सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक सरकार को टैक्स देता है। वह अपनी गाढ़ी कमाई पर 30% तक इनकम टैक्स देता है। इसके बाद जो पैसा बचता है, उससे गाड़ी खरीदे तो 28% GST + रोड टैक्स देता है। पेट्रोल डलवाए तो आधे से ज्यादा टैक्स देता है। इस टैक्सपेयर वर्ग को लगता है कि उनके पैसे से मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, और तमाम कल्याणकारी योजनाएं (Welfare Schemes) चलाई जा रही हैं, लेकिन बदले में उन्हें न तो अच्छी सरकारी शिक्षा मिलती है, न स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा (Social Security)। उन्हें सब कुछ अपनी जेब से निजी क्षेत्र से खरीदना पड़ता है। इतनी बड़ी आहुति देने के बाद उसके बच्चे सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ सकते क्योंकि वहां की बदहाली जगजाहिर है, इसलिए वह लाखों की फीस देकर प्राइवेट स्कूल भेजता है। बीमार पड़ने पर वह सरकारी अस्पताल जाने की हिम्मत नहीं कर सकता, क्योंकि वहां स्ट्रेचर तक के लिए धक्के खाने पड़ते हैं, इसलिए वह प्राइवेट हॉस्पिटल को लाखों लुटाता है।

राजनीतिक रूप से भी इस वर्ग को लगता है कि 'विकल्पहीनता' के कारण वे एक निश्चित दल को वोट देने के लिए मजबूर हैं क्योंकि दूसरी तरफ जब वह देखता है, तो वहां 'खटाखट' मुफ्त पैसे बांटने की रेस लगी है या घोर जातिवादी तुष्टिकरण का कुआं है। वह कुएं और खाई के बीच फंसा ऐसा बंधुआ मजदूर है, जिसकी मजबूरी का फायदा मौजूदा सरकार बखूबी उठा रही है।

आरक्षण और योग्यता बनाम सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस

मोदी सरकार ने खुद को 'मजबूत और कड़े फैसले लेने वाली सरकार' के रूप में विज्ञापित किया है, लेकिन जब बात वोट बैंक और आरक्षण की आती है, तो यह सरकार भी उतनी ही रीढ़विहीन नजर आती है जितनी पिछली सरकारें थीं।  आरक्षण के कारण सेवाओं की गुणवत्ता और विकास पर पड़ने वाले नकारात्मक असर को लेकर मोदी सरकार ने पूरी तरह से अनदेखा किया है। वोट बैंक के नाराज होने के डर से मोदी सरकार आरक्षण प्राप्त उम्मीदवारों के लिए एक न्यूनतम मानक तय नहीं कर पाई है | परिणाम बहुत ही भयावह है, गैर आरक्षण  प्राप्त उम्मीदवार 90-95% अंक लाने के बाद भी सीटों से वंचित रह जाते हैं, जबकि कम अंकों वाले उम्मीदवारों का चयन हो जाता है। विशेष रूप से चिकित्सा (Medical), अनुसंधान (Research), और तकनीकी सेवाओं जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में केवल और केवल 'मेरिट' को ही एकमात्र आधार होना चाहिए। संविधान निर्माताओं ने जब आरक्षण लागू किया था, तो अनुच्छेद 335 (Article 335) में साफ लिखा था कि आरक्षण देते समय 'प्रशासनिक दक्षता और कार्यकुशलता' (Administrative Efficiency) से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। लेकिन आज की राजनीति ने इस अनुच्छेद को कचरे के डिब्बे में डाल दिया है। जब आप चिकित्सा, अनुसंधान और इंजीनियरिंग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में मेरिट को लात मारकर केवल जातिगत पर्चियों के आधार पर चयन करेंगे, तो देश का विकास बाधित होना तय है।

आज का युवा और टैक्सपेयर वर्ग इस बात की वकालत कर रहा है कि अब आरक्षण का आधार 'जाति' के बजाय 'आर्थिक स्थिति' (Economic Status) होना चाहिए, ताकि सवर्ण वर्ग के गरीब बच्चों को भी आगे बढ़ने का मौका मिले और संपन्न हो चुके लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर (Creamy Layer का सख्ती से पालन) किया जा सके। इसके साथ ही, सरकार को टैक्स देने वाले वर्ग को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनके टैक्स के पैसे का इस्तेमाल केवल राजनीतिक लाभ के लिए मुफ्तखोरी में नहीं, बल्कि देश के बुनियादी ढांचे, विश्वस्तरीय सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को बनाने में हो रहा है, ताकि हर वर्ग को उसका हक मिल सके।

मोदी सरकार के 12 वर्षों का यह दौर जहां बड़े नीतिगत बदलावों और कड़े फैसलों के लिए जाना जाता है, वहीं रोजगार, पारदर्शिता, सामाजिक संतुलन और बुनियादी जन-सुविधाओं (स्वास्थ्य-शिक्षा) पर नियंत्रण के मोर्चे पर इसके फैसलों की तीखी आलोचना स्वाभाविक है। एक मजबूत लोकतंत्र में इन कमियों पर चर्चा होना और जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है, ताकि विकास का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सही मायने में पहुंच सके।