Tuesday, 20 January 2026

अमेरिकी ट्रेजरी से दूरी: भारत की बदलती आर्थिक सोच

 भारत द्वारा अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में निवेश घटाना केवल एक वित्तीय आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन और बदलती आर्थिक प्राथमिकताओं के बीच भारत की परिपक्व होती रणनीतिक सोच का संकेत है। ऐसे समय में, जब अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ को लेकर तनाव बना हुआ है और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात लगातार अस्थिर हो रहे हैं, भारत का यह कदम उसकी दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को लेकर बढ़ती सतर्कता को दर्शाता है। 


डाइवर्सिफिकेशन की मजबूरी

पिछले एक साल में अमेरिकी ट्रेजरी में भारत की हिस्सेदारी में 21 प्रतिशत की गिरावट यह साफ़ करती है कि भारत अब “डॉलर-केन्द्रित” रिज़र्व रणनीति से धीरे-धीरे बाहर निकलना चाहता है। भले ही अमेरिकी बॉन्ड यील्ड आकर्षक बनी रही हों, लेकिन केवल रिटर्न के आधार पर निर्णय लेना आज के अनिश्चित वैश्विक माहौल में जोखिम भरा हो सकता है। डॉलर में संभावित कमजोरी, अमेरिकी फेड की भविष्य की नीतियाँ और घरेलू आर्थिक संकेतकों की अनिश्चितता—इन सबने मिलकर भारत को अपने रिज़र्व को फैलाने के लिए प्रेरित किया है।

डॉलर निर्भरता पर पुनर्विचार

अमेरिकी डॉलर दशकों से वैश्विक रिज़र्व मुद्रा रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में उस पर निर्भरता को लेकर सवाल बढ़े हैं। व्यापार प्रतिबंधों, आर्थिक दबावों और मुद्रा को भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने ने कई देशों को वैकल्पिक रास्तों पर सोचने को मजबूर किया है। भारत का ट्रेजरी निवेश कम करना इसी वैश्विक रुझान का हिस्सा है, जहाँ देश अपनी आर्थिक संप्रभुता को मज़बूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

सोने की ओर बढ़ता झुकाव

भारत के लिए सोना केवल एक पारंपरिक संपत्ति नहीं, बल्कि संकट के समय भरोसेमंद सुरक्षा कवच रहा है। वैश्विक महंगाई, युद्ध जैसे हालात और मुद्रा अस्थिरता के दौर में सोने की उपयोगिता फिर से बढ़ी है। यदि भारतीय रिज़र्व बैंक अपने गोल्ड रिज़र्व में बढ़ोतरी करता है, तो यह न केवल जोखिम प्रबंधन का साधन होगा, बल्कि वैश्विक केंद्रीय बैंकों के बढ़ते गोल्ड-रुझान के अनुरूप भी होगा।

संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती

हालाँकि अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश घटाना एक साहसिक और दूरदर्शी कदम माना जा सकता है, लेकिन इसमें जोखिम भी निहित हैं। अमेरिकी बॉन्ड अभी भी तरलता और सुरक्षा के लिहाज़ से दुनिया के सबसे भरोसेमंद साधनों में गिने जाते हैं। इसलिए भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह विविधीकरण और स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखे—ताकि विदेशी मुद्रा भंडार न तो अत्यधिक जोखिम में पड़े और न ही अवसरों से वंचित रहे।

निष्कर्ष

अमेरिकी ट्रेजरी से भारत की आंशिक दूरी किसी तत्काल प्रतिक्रिया से अधिक, एक सोची-समझी और दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है। यह कदम बताता है कि भारत अब वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों का केवल अनुयायी नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर निर्णय लेने वाला देश बन रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस विविधीकरण को किस गति और किस दिशा में आगे बढ़ाता है—क्योंकि यही उसकी आर्थिक मजबूती और रणनीतिक स्वायत्तता का आधार बनेगा।

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