Tuesday, 15 October 2024

स्पेसएक्स की ऐतिहासिक उड़ान-अंतरिक्ष में नई क्रांति

एलन मस्क के स्टारशिप रॉकेट के ताज़ा परीक्षण की दुनियाभर में चर्चा हो रही है| यह अब तक का सबसे जोखिमभरा परीक्षण था। असल में इस परीक्षण के दौरान स्टारशिप रॉकेट को लॉन्च पैड पर वापस सुरक्षित उतारा गया और एलन मस्क की स्पेसएक्स कंपनी ऐसा कारनामा करने वाली दुनिया की पहली कंपनी बन गई है| इसमें कंपनी ने पहली बार बूस्टर को वापस लॉन्च पैड पर उतारा। यह अंतरिक्ष यात्रा के इतिहास में एक बड़ा कदम है |


इस परीक्षण के बाद तेज़ी से और दोबारा इस्तेमाल करने वाले रॉकेट बनाने की अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना में स्पेसएक्स अहम चरण में पहुंच गया है|

स्पेस एक्सप्लोरेशन के मिशन में सबसे बड़ी समस्या है- हर बार एक नये रॉकेट  या लॉन्च व्हीकल का इस्तेमाल करके सैटेलाइट को स्पेस में भेजना, जो बेहद ही खर्चीला काम है| हर बार का कई सौ या हजारों करोड़ का खर्च होता है| ऐसे में दोबारा उपयोग किए जाने वाले रॉकेट की समस्या अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और सरकारों के लिए सरदर्द बनी हुई थी, जिसे एलन मस्क और उनकी कंपनी ने इस साहसिक परिक्षण के माध्यम से समाधान कर लिया है | स्टारशिप रॉकेट की सबसे महत्वपूर्ण विशिष्टता उसका दोबारा उपयोग किया जाना है|

स्टारशिप दुनिया का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है। यह 121 मीटर लंबा है। इसमें 33 मीथेन इंजन लगे हैं। इस रॉकेट ने टेक्सास के दक्षिणी छोर से सुबह 7:25 बजे उड़ान भरी। उड़ान के लगभग ढाई मिनट बाद, सुपर हैवी बूस्टर स्टारशिप के ऊपरी हिस्से से अलग हो गया। बूस्टर सात मिनट बाद वापस आया। लॉन्च टॉवर पर बूस्टर को सुरक्षित लैंड कराया गया। केवल बूस्टर ही सटीक तरीक़े से नहीं उतरा बल्कि स्पेसएक्स ने यान के हार्डवेयर के कुछ हिस्सों को सुरक्षित बचाने में कामयाबी भी हासिल की, जिसकी उम्मीद नहीं की जा रही थी| इसका मतलब यह है कि यदि कोई रॉकेट पहली बार उड़ान में विफल हो जाता है, तो इसे दोबारा उड़ाया जा सकता है|

इस परीक्षण को स्पेसएक्स के सबसे साहसी और सफल अभियानों में से एक माना जा रहा है। इससे पहले, जून 2024 में स्पेसएक्स ने एक सफल उड़ान भरी थी, जिसमें रॉकेट ने बिना किसी विस्फोट के अपनी यात्रा पूरी की। यह स्टारशिप रॉकेट का पांचवा परीक्षण था, जिसमें कोई बड़ी तकनीकी खामी सामने नहीं आई और यह सफलतापूर्वक अपने मिशन को अंजाम दे सका।

यह रॉकेट 150 टन पेलोड ले जाने की क्षमता रखता है, जो इसे और भी प्रभावी बनाता है। इसके 33 रैप्टर इंजन इसे अब तक का सबसे शक्तिशाली और तेज गति वाला रॉकेट बनाते हैं, जिसकी गति 27,000 किमी/घंटा तक पहुंच सकती है।

बूस्टर के सुरक्षित रूप से वापस आने को स्पेस एक्स के इंजीनियरों ने ऐतिहासिक दिनक़रार दिया है | इस सफलता का अंतरिक्ष यात्रा के भविष्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि यह मिशन की लागत को काफी कम कर सकता है और लगातार लॉन्च की क्षमता को बढ़ा सकता है। लॉन्च पैड पर बूस्टर को सुरक्षित रूप से उतारने से मिशनों की जटिलता में कमी आएगी, जिससे अंतरिक्ष यानों को तेजी से मिशन पर भेजने में मदद मिलेगी। स्टारशिप कार्यक्रम का उद्देश्य चंद्रमा और मंगल ग्रह के मिशन सहित गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण को सुविधाजनक बनाना है, जिससे यह उपलब्धि उन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को साकार करने में एक महत्वपूर्ण कदम बन सके।

यह न केवल एलन मस्क के लिए एक व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक नई संभावनाओं का द्वार भी खोलता है। इस परीक्षण के माध्यम से अब एलन मस्क दुनिया के पहले ट्रिलियनॉयर भी बन जाएंगे| भविष्य में अंतरिक्ष यात्रा को और अधिक आम और सस्ता बनाने के लिए यह तकनीक एक महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। यह परीक्षण मंगल और अन्य ग्रहों पर भी मानव मिशनों की संभावनाओं को खोलता है। इससे विभिन्न सरकारों और कंपनियों के लिए अंतरिक्ष में अपने मिशनों को आयोजित करना आसान हो जाता है।

कुछ ही सालों में एलन मस्क की स्पेसएक्स दुनिया में सबसे ज्यादा सैटेलाइट  लॉन्च करने वाली कंपनी बन गई है| यह कई ट्रिलियन डॉलर का व्यवसाय है, जिसपर अभी एलन मस्क का एकाधिकार है| भारत का इसरो भी सैटेलाइट  लॉन्च करने की दिशा में काफी पहले ही कदम बढ़ा चुका है, लेकिन इसे काफी दूरी तय करनी है|

Friday, 11 October 2024

अमूल्य रतन ! बहुमूल्य रतन

 

देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में बहुत कारोबारी हुए हैं, और बहुत सारे आगे भी होते रहेंगे, लेकिन रतन टाटा एक ऐसा नाम है जिसने अपने बिजनेस कौशल और दूरदर्शी सोच से भारत के कॉरपोरेट लैंडस्केप को एक ऐसा आयाम दिया, जिसे हिंदुस्तान का कोई भी अन्य उद्योगपति उन्हें देखकर भी नहीं कर पाता है | भारत की वायुसेना ने जब पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक किया था, तब भारत के बिजनेस जगत के एकमात्र रतन टाटा ही थे जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय वायुसेना को बधाई दी और किसी भी सहयोग का वादा भी किया था |

टाटा समूह भरोसे लिए जाना जाता है, जिसके कारोबार का मकसद सिर्फ मुनाफा कमाना ही नहीं होता है, बल्कि लोगो बिश्वास हासिल करना होता है | टाटा ने ही बताया कि ब्रांड का मतलब भरोसा होता हो| भरोसा प्रोडक्ट की क्वालिटी का, जिसके सहारे बुलंदियों पर पहुंचा जा सकता है | आज भले रिलायंस समूह सबसे बड़ा बिजनेस समूह बन गया है लेकिन टाटा जैसा भरोसा हासिल करने के मामले में मीलों पीछे है | हाल ही जब बीएसएनएल में टाटा ने सिर्फ निवेश किया है, तो लोगों को ये लगा कि उसे टाटा ने अधिग्रहण कर लिया है | इसी आधार पूर्वांचल में बड़ी संख्या में लोगों ने अपना नंबर पोर्ट कर बीएसएनएल का सिम ले लिया | यह टाटा पर भरोसा नहीं तो क्या है? रतन टाटा ने टाटा के इस भरोसे को लोगों के प्रति सेवाभाव में बदल दिया | उनकी कोशिश यही रहती थी कि कोई निराश नहीं | उन्होंने व्यवसाय को, उद्योगों को जन-सेवा की भारतीय सनातन परंपरा से जोड़ने की मिसाल कायम की | 

जब भारत में कोविड महामारी फैली, रतन टाटा ने तुरंत 500 करोड़ रुपए टाटा न्यास से और 1000 करोड़ रुपए टाटा कंपनियों के माध्यम से महामारी और लॉकडाउन के आर्थिक परिणामों से निपटने के लिए दिए। इसके अलावा, उन्होंने डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के रहने के लिए अपने लक्ज़री होटलों का उपयोग करने की पेशकश करने वाले पहले व्यक्ति के रूप में भी सामने आए।

Wednesday, 2 October 2024

भारतीय राजनीति के वामनावतार..... लाल बहादुर शास्त्री

 भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री को अक्सर इसलिए याद किया जाता रहा है कि उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था और उनका निधन ताशकंद में हो गया था | लेकिन लाल बहादुर शास्त्री की कहानी एक ऐसे निष्काम कर्म योगी की जीवन गाथा है जो न केवल एक नेता है, बल्कि एक ऐसा व्यक्तित्व है जो आदर्शों, संघर्षों और सेवा की मिसाल प्रस्तुत करता है | वे राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर एक साधारण व्यक्तित्व के साथ प्रविष्ट हुए, किन्तु अपने अतुलनीय पुरुषार्थ से निरंतर निष्काम कर्म करते हुए असाधारण इतिहास के सदृश विशिष्ट हो गए। छोटे कद-काठी और अत्यंत सादगीपूर्ण पहनावे के साथ अपने निष्काम कर्म, अनवरत अध्यवसाय और अनन्य समर्पण से सिद्ध कर दिया कि कद की लघुता नहीं, कर्म की विशिष्टता और महानता महत्त्वपूर्ण है। यदि कद और पहनावे की भव्यता ही मूल्यांकन का आधार होता, तो केवल उन लोगों को महत्व मिलता जो भौतिक रूप से प्रभावशाली होते, और वास्तविक प्रतिभा और नेतृत्व की आवाज़ दब जाती। लेकिन उनकी ईमानदारी, निस्वार्थता, सेवा भाव, जनहित और विचार, उनके कद से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहे हैं, जिसके बल पर वे वामन से विराट हो गए थे| लाल बहादुर शास्त्री को भारतीय राजनीति का "वामनावतार" मानना काफी दिलचस्प है। वामन भगवान विष्णु के पांचवें अवतार हैं, जो छोटे और साधारण रूप में प्रकट होते हैं, लेकिन उनका प्रभाव अत्यधिक विशाल होता है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि संसाधनहीनता या परिस्थितियों के अभाव में भी एक व्यक्ति अपनी मेहनत और इच्छाशक्ति से महानता प्राप्त कर सकता है। उन्हें वामनावतार के रूप में देखना इस बात को दर्शाता है कि साधारणता और लघुता में भी एक गहरी शक्ति और प्रभाव निहित होता है।

लाल बहादुर शास्त्री राजनीति के दलदल में रहते हुए भी अपनी नैतिकता और विचारधारा को बनाए रखा | वे कठिनाइयों का सामना करते हुए भी राजनीति की कुटिलताओं और दुश्चक्रों से दूर रहे । उन पर बाहरी दबावों और सांसारिक महत्वाकांक्षाओं का कोई प्रभाव नहीं था, क्योंकि उन्होंने जीवन को एक गहरी आध्यात्मिक दृष्टि से देखा। उन्होंने हमेशा अपनी आंतरिक शक्ति और सिद्धांतों पर जोर दिया | इसी कारण वे संसार में रहते हुए भी सांसारिकता से अछूते थे। वे गीता के 'यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। शुभाशुभपरित्यागी…' आदर्श को अपनाते थे| उन्होंने अपनी आत्मशक्ति को इस प्रकार विकसित कर लिया था कि उन्हें हर जगह उसी परम सत्ता का दर्शन होता था, जिसके निर्देश पर सभी प्राणी अपने कार्यों में लगे रहते हैं। उनका जीवन-दर्शन झील के पानी की तरह साफ, स्वच्छ और स्पष्ट था|  उसकी गहराई में वे अपनी आत्मा की आवाज को आसानी से सुन सकते थे।

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण रहा है कि कांग्रेस पार्टी और उनकी सरकार ने शास्त्रीजी को मरणोपरांत समुचित सम्मान और कार्यों का श्रेय नहीं दिया। शास्त्री जी के द्वारा लिए गए निर्णय, जैसे कि खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादन के लिए किए गए प्रयास, आज भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके योगदान को सम्मानजनक मान्यता नहीं मिली। लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण प्रतीक थे। उनकी सादगी, ईमानदारी और नेतृत्व कौशल ने उन्हें जनता के बीच एक आदर्श नेता बना दिया। उन्होंने हमेशा भारतीय संस्कृति के मूल्यों को प्राथमिकता दी। उनका नारा "जय जवान, जय किसान" केवल उनके समय की आवश्यकता नहीं, बल्कि यह भारतीय समाज के दो प्रमुख स्तंभोंकिसानों और सैनिकोंकी महत्ता को भी उजागर करता है। देखन में छोटन लगे, घाव करे गम्भीर, पाँच फुट दो इंच के छोटे कद के भीतर एक ऐसा दृढ़-निश्चयी देशभक्त रहता है, जिसने 1965 के युद्ध में पकिस्तान घुटने टेकने के लिए न केवल विवश लिया था बल्कि दूसरी ओर अमेरिका द्वारा गेहूं नहीं देने की धमकी को दरकिनार करते हुए भारत को अन्न उत्पादन में भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए किसानों का आह्वान भी किया | यह कहना गलत नहीं होगा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शास्त्री जी द्वारा शुरु की गई उदार आर्थिक नीतियों, कृषि और खाद्यान्न उत्पादन में आत्म निर्भरता, पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक और चीन को उसी की भाषा में करारा जवाब देने की सुरक्षा व्यवस्था और राजनेताओं के भ्रष्टाचार को कठोरता से रोकने का प्रयास कर रहे हैं|    

प्रकृति ने शास्त्री जी को अटल ध्येय, गांधी के समान सत्य के प्रति आग्रह, चाणक्य जैसी राजनीतिक समझ और बुद्ध जैसी उदारता के उद्दात गुणों से संपन्न किया था। उनकी सरकार ने एकता और अखंडता को बढ़ावा दिया, जो भारतीय संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा है। शास्त्री जी ने यह सिद्ध किया कि नेतृत्व का अर्थ केवल सत्ता में रहना नहीं, बल्कि लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाना भी है। उनका जीवन और कार्य उन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है जो भारतीय संस्कृति में निहित हैं और आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। शास्त्री जी ने हमेशा समाज के निचले वर्गों के उत्थान के लिए काम किया और शिक्षा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार के लिए निरंतर प्रयास किए।

वास्तव में, शास्त्री जी को आज़ादी के बाद भारत का पहला आर्थिक सुधारक कहा जा सकता है। यह एक बहुत बड़ा भ्रम है कि 1966 में भारतीय रुपये के अवमूल्यन का निर्णय और क्रियान्वयन इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद किया था। यह सच है कि उनके प्रधानमंत्रित्व काल में ही रुपये का अवमूल्यन किया गया था, लेकिन भारत सरकार की फाइलों में यह दर्ज है कि मुद्रा के अवमूल्यन का निर्णय, जो एक आवश्यक कदम था, शास्त्री जी द्वारा लिया गया था। उन्होंने हमेशा बड़े मुद्दों पर विचार करने के लिए सरल और प्रभावी तरीके अपनाए।

लाल बहादुर शास्त्री के जीवन का हर पहलू एक पाठशाला है, जिसे आत्मसात करना आज के समय और नई पीढ़ी की आवश्यकता है। ईमानदारी एक सर्वोत्तम नीति है किन्तु इसका अनुसरण करते कितने लोगों को जानते हैं हम? लाल बहादुर शास्त्री वास्तव में ईमानदारी की प्रतिमूर्ति थे| शास्त्रीजी की मौत के समय उनकी ज़िंदगी की क़िताब पूरी तरह से साफ़ थी| न तो वो पैसा छोड़ कर गए थे, न ही कोई घर या ज़मीन, न उन्हें कभी सत्ता का लोभ रहा, ना कुर्सी का अभिमान।