Wednesday, 26 March 2025

स्वतंत्रता और समानता: सामाजिक मूल्यों का सामंजस्य

स्वतंत्रता, समानता और न्याय को सामाजिक-राजनीतिक मूल्यों के रूप में देखा जाता है, जिसकी प्राप्ति के लिए हमें प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि इसकी प्राप्ति से समाज में सुधार होता है अ इसलिए जब हम कहते है कि स्वतंत्रता, समानता और भातृत्व भावना सामाजिक मूल्य है तो इसका अर्थ है कि इनकी प्राप्ति के लिए समाज को प्रयत्नशील होना चाहिए |

स्वतंत्रता- स्वतंत्रता दो अतिवादी स्थितियों अतंत्रता और परतंत्रता के मध्य का मार्ग है | अतंत्रता वह स्थिति है जिसपर कोई नियंत्रण न हो | जो पूर्णतः अनियंत्रित होता है | किसी अन्य के द्वारा नियंत्रित स्थिति परतंत्रता है | इन दोनों के मध्य स्वतंत्रता वह स्थिति है जिस पर कुछ नियंत्रण होता है, किन्तु वह नियंत्रण स्वयं द्वारा स्थापित नियंत्रण है | इसलिए नियंत्रित होने के बाद भी इसे स्वतंत्रता कहा जाता है | परन्तु जब हम अपना नियंत्रण स्वयं कर रहे होते है तो उस नियंत्रण के स्वच्छंदता में परिवर्तित होने का भय बना रहता है |

निश्चित रूप से स्वतंत्रता व्यक्ति का एक नैतिक अधिकार है | लेकिन यह अधिकार नितांत साध्य नहीं है | वास्तव में इस अधिकार के साथ कुछ कर्त्तव्य भी जुड़े होते है | प्राचीन यूनानी विचारकों का कहना था कि व्यक्ति को स्वतंत्र इसलिए होना चाहिए, जिससे वह अपने अन्दर निहित समस्त संभावनाओं का विकास कर सके | इसप्रकार यहाँ पर स्वतंत्र होने का अर्थ स्वच्छंद होना नहीं है | यह किसी आदर्श के साथ बंधा हुआ होता है, इसलिए यह अतंत्रता से अलग है |

स्वतंत्रता की सबसे अच्छी परिभाषा जॉन लॉक के विचारों में दिखाई देती है जिसके अनुसार स्वतंत्रता मनुष्य का अधिकार है | क्या करें और क्या न करें? इस बात का निर्णय करने के लिए व्यक्ति का जो अधिकार है वहीँ स्वतंत्रता है, बशर्ते कि मनुष्य इसी प्रकार का अधिकार अन्य व्यक्तियों को भी प्रदान करने के लिए तैयार रहे | इस परिभाषा का प्रथम अंश स्वतंत्रता को और दूसरा अंश समता को परिभाषित करता है |

समता- समता का मूल्य केवल इस बात की मांग करता है कि प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों में समता होनी चाहिए | समता का संप्रत्यय आरंभिक यूनानी दर्शन में नहीं दिखाई देता है | तब समानता का एक सीमित अर्थ था | प्लेटो का कहना है कि समता की स्थिति में समान लोगों के अधिकार समान होने चाहिए | यद्यपि विभिन्न समुदायों के अधिकार में अन्तर हो सकता है, लेकिन एक ही समुदाय के विभिन्न व्यक्तियों के अधिकारों में अंतर नहीं होना चाहिए |

व्यापक अर्थ में समानता का संप्रत्यय आधुनिक युग की देन है | विशेष रूप से समाजवादी आन्दोलन के दौर में इसका पूर्ण विकास हुआ |

राजनीतिक विचारों का इतिहास दो युगों में विभाजित है-

1.       समाजवाद के उद्भव के पूर्व का युग- इसे व्यक्तिवादी युग कहा जाता है क्योंकि इस युग में व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता था | यद्यपि समानता के बिना स्वतंत्रता अर्थहीन है क्योंकि एक व्यक्ति की स्वतंत्रता अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता के सापेक्ष होती है | कोई व्यक्ति अकेले अपनी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर सकता है | इसलिए लॉक का मानना है कि ‘एक स्वतंत्र व्यक्ति का अधिकार तभी तक सुरक्षित रह सकता है, जब तक वह अन्य व्यक्तिओं को स्वतंत्रता का अधिकार देने के लिए तैयार रहे |

2.       लोकतंत्र में व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोत्तम मूल्य के रूप में स्वीकार किया गया है और इसलिए लोकतंत्र का विकास पूंजीवादी लोकतंत्र के रूप में हुआ | अतः जिनके अंदर बौद्धिक और शारीरिक क्षमता अधिक थी, उनका विकास अधिक हुआ और जिनमें ये क्षमता कम थी उनका विकास कम होने के कारण समाज में विषमता उत्पन्न हुई | इसका निराकरण करने के लिए लोकतंत्र में समानता की स्थापना का प्रयत्न किया गया | इसमें तीन मूल्य स्वीकार किए गए- स्वतंत्रता, समानता और भातृत्व भाव| फिर भी स्वतंत्रता को सर्वोच्च मूल्य के रूप स्वीकार किया जाता रहा है | इन तीन मूल्यों में से स्वतंत्रता और समानता को परस्पर विरोधी मूल्य माना जाता रहा है | इसप्रकार लोकतंत्र की अवधारणा ही विरोधाभासी हो गई | स्वतंत्रता को स्वीकार कर लेने पर समानता बाधित होती है और समानता को स्वीकार कर लेने पर स्वतंत्रता बाधित होती है|

इस विरोधाभास को दूर करने के लिए समाजवाद का संप्रत्यय विकसित हुआ, जिसमें स्वतंत्रता और समानता के संपूर्ण सामंजस्य का प्रयत्न किया गया, जो अलग-अलग दार्शनिक धारणाओं में अलग-अलग ढंग से व्यक्त हुआ|

जहाँ व्यक्तिवादी अवधारणा में स्वतंत्रता को अधिक महत्व है, वहीँ समाजवादी अवधारणा में समानता को सर्वोच्च महत्त्व दिया गया है | समाजवादी अवधारणा में वे सभी सिद्धांत सम्मिलित हैं जो व्यक्ति का साधन और समष्टि को साध्य मानते हैं और इसके व्यापक अर्थ में फासीवाद को भी समाजवादी विचारधारा के अंतर्गत शामिल किया जाता है क्योंकि वह समष्टिवाद का समर्थक है | वह व्यक्ति की स्वतंत्रता को निरर्थक मानता है | मुसोलिनी का मानना है कि स्वतंत्रता नाम का जो विशेषण है उसका प्रयोग केवल राज्य के साथ किया जा सकता है | स्वतंत्रता का अर्थ है राष्ट्र या समष्टि की स्वतंत्रता| व्यक्ति के साथ स्वतंत्रता का प्रयोग नहीं करना चाहिए | वे समानता को भी मूल्य नहीं मानते हैं | उनका मत है कि प्रकृति में विषमता है |  इसलिए समानता का भाव वास्तविक नहीं है | नीत्शे का कहना है कि कुछ लोग शासन करने के लिए और कुछ लोग शासित होने के लिए पैदा होते है | अतः समानता की बात करना निरर्थक है |

लेकिन जब हम खुले मष्तिष्क से विचार करते है तो पाते है कि दो व्यक्तियों के बीच समानता होनी चाहिए | यदि प्रकृति ने हमें विषम पैदा किया है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि जो कुछ भी प्राकृतिक है, उसका हम विरोध नहीं कर सकते | प्रकृति के उचित पक्ष को स्वीकार करके    तथा अनुचित पक्ष को अस्वीकार करके सुसंस्कृत समाज की स्थापना करते है | यह संभव है कि पूर्ण सामंजस्य की स्थापना केवल एक आदर्श हो किन्तु साम्य के अधिक निकट पहुंचना असंभव नहीं है और यह समाज व्यवस्था का दायित्व भी है |

क्या स्वतंत्रता और समानता के मूल्यों को कोई भी समाज एक साथ प्राप्त कर सकता है ? क्या इन दोनों में सामंजस्य हो सकता है ?

अनेक चिंतकों ने इसका सकारात्मक उत्तर दिया है क्योंकि जब भी हम स्वतंत्रता की बात करते है तो उसकी कुछ सीमाएँ अवश्य होती है और स्वतंत्रता की यहीं सीमा समता की स्थापना में सहायक होती है | एक प्रचलित उक्ति है कि ‘हमारी स्वतंत्रता वहीँ समाप्त हो जाती है, जहाँ से दूसरे की स्वतंत्रता आरम्भ होती है|’

स्वतंत्रता के संप्रत्यय में नियंत्रण का तत्व अपने आप जुड़ा हुआ है और जिसे हम परम स्वतंत्रता समझते है, वह वास्तविक स्वतंत्रता नहीं है | संकल्प की स्वतंत्रता का अर्थ स्वयं अपने नियंत्रण में होना है | अतः नैतिक और राजनीतिक दृष्टियों से स्वतंत्रता एक सीमित अधिकार है | लॉक ने स्वतंत्रता को सीमित माना है | एक उक्ति है कि ‘एक स्थान की गरीबी प्रत्येक अन्य स्थान की समृद्धि के लिए खतरा है | ठीक यही स्थिति स्वतंत्रता और समता के प्रत्यय के संबंध में भी सत्य है | अर्थात् यदि कहीं असमानता है तो वह व्यापक स्वतंत्रता के लिए खतरा है | अतः स्वतंत्रता की स्थापना के लिए समता की स्थापना आवश्यक है |

प्रश्न है कि स्वतंत्रता और समता में से कौन सा मूल्य मनुष्य के व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है ? स्वतंत्रता मनुष्य का स्वरुप लक्षण है, इसलिए सर्वाधिक प्रिय है | यह ने केवल सभ्य और सुसंस्कृत समाज की चीज है, बल्कि प्राकृतिक भी है, क्योंकि यदि कोई मूल्य केवल मनुष्य के लिए है तो उसे मानवकृत कह सकते है | लेकिन मानवेत्तर प्राणियों में भी स्वतंत्रता किसी न किसी रूप में दिखाई देती है | यद्यपि वहाँ यह स्वतंत्रता स्वच्छंदता के रूप में होती है | स्वच्छंद होना एक सहज प्रवृति है और इसी स्वच्छंदता के संप्रत्यय से स्वतंत्रता के संप्रत्यय को गढ़ा गया है | यह स्वतंत्रता एक ओर बाह्य बंधन के निषेध की बात करती है तो दूसरी ओर आत्मनियंत्रण की बात करती है और यहीं आत्मनियंत्रण समता की स्थापना करती है |     

Monday, 24 March 2025

शंकर का जीव विचार..... ' जीवो ब्रह्मैव नापरः’

शंकराचार्य के अनुसार पारमार्थिक दृष्टिकोण से 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः’ अर्थात् ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और जगत मिथ्या है | जीव ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं है | जब आत्मा का प्रतिबिम्ब अविद्या पर पड़ता है तो जीव की उत्पति होती है | जीव आत्मा या ब्रह्म का व्यावहारिक रूप है | जब आत्मा शरीर, मन, बुद्धि आदि उपाधियों से युक्त होता है, सीमित होता है, तब वह जीव के रूप में दृष्टिगोचर होता है|  

जीव और आत्मा

·         जीव अनेक है | आत्मा एक है

·         जीव शरीरधारी है | आत्मा अशरीरधारी है |

·         जीव बंधन युक्त है | आत्मा बंधन मुक्त है

·         जीव व्यावहारिक सत्ता है | आत्मा पारमार्थिक सत्ता है |

·         जीव ज्ञाता, कर्त्ता और भोक्ता है | आत्मा कर्त्ता और भोक्ता नहीं है

जीव भिन्न-भिन्न शरीरों में अलग-अलग रूप में रहता है | जीव भौतिक और अभौतिक तत्वों का संगठन है| इसका भौतिक तत्व शरीर है जबकि अभौतिक तत्व चैतन्य है | यह चेतन तत्व निष्क्रिय दृष्टा या साक्षी है | साक्षी स्वयंप्रकाश है, स्वयंसिद्ध है | यह बिना किसी उपकरण के स्वतः अभिव्यक्त होता है | जीव का भौतिक तत्व अंतःकरण है, जो शरीर के रूप में अभिव्यक्त होता है | यह अविद्या का परिणाम है | इसी संदर्भ में यहाँ जीव को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि अंतःकरण से व्याप्त चैतन्य ही जीव है-अंतःकरण विशिष्टो जीवः| यह जीव न तो आत्मा है और न आत्मा से पृथक कोई स्वतंत्र सत्ता है | इसकी सत्ता आभासी है | शंकराचार्य के दर्शन में जीव और ब्रह्म के संबंध को स्पष्ट करने के लिए तीन सिद्धांतों का उल्लेख है-

·         प्रतिबिम्बवाद

·         अवच्छेद्वाद

·         आभासवाद

प्रतिबिम्बवाद-इसके अनुसार जिसप्रकार एक ही चन्द्रमा विभिन्न जलाशयों में अलग-अलग रूप में दृष्टिगोचर होता है | उसीप्रकार आत्मा या ब्रह्म वस्तुतः एक ही है, किन्तु वह नाना प्रकार के जीवों के रूप में प्रतिबिंबित होता है | इसकी आलोचना में यह कहा गया है कि यदि ब्रह्म निर्गुण और निराकार है तो फिर जीव में उसके प्रतिबिम्ब की व्याख्या नही की जा सकती है क्योंकि कोई सगुण और साकार वस्तु ही अपना प्रतिबिम्ब उत्पन्न कर सकती है |

अवच्छेद्वाद-इसके अनुसार जिसप्रकार एक ही आकाश कई स्थानों में सीमित रूप में अवलोकित होता है, जैसे-घटाकाश आदि, उसीप्रकार यद्यपि ब्रह्म एक ही है, किन्तु वह अविद्या और उपाधि भेद के कारण विभिन्न जीवों में सीमित रूप में दिखाई देता है | इसकी आलोचना में यह कहा गया है कि सर्वव्यापक तत्व को किसी भी प्रकार से सीमित नहीं किया जा सकता है इस सिद्धांत को मानने पर जीव की स्थिति रामानुजाचार्य के सदृश्य अर्थात् ब्रह्म के अंश के रूप में हो जाती है |

आभासवाद(विवर्तवाद)-इसके अनुसार वास्तव में जीव न तो ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है और न ही अवच्छेदित रूप रूप है | जीव ब्रह्म का विवर्त रूप है | दोनों तत्वतः एक ही है | जीव की ब्रह्म से पृथक अपनी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है | अविद्या के समाप्त होने पर दोनों के मध्य तादात्म्य की स्थिति उत्पन्न हो जाती है | अहं ब्रह्मास्मि, तत्तत्वमसि जैसे महावाक्य जीव और ब्रह्म की एकता को ही प्रतिपादित करते है |

रामानुजाचार्य द्वारा शंकराचार्य के मायावाद की आलोचना

रामानुजाचार्य ने शंकराचार्य के मायावाद को तर्कसंगत नहीं माना है | रामानुज के अनुसार माया एक वास्तविक दैवीय शक्ति है | यह ईश्वरीय शक्ति है जिसका स्वरुप रहस्यमय है | ईश्वर अपनी जिस रहस्यमयी शक्ति से जगत की सृष्टि करता है, वह मनुष्य की समझ से परे है और इसलिए इस शक्ति को माया कहा गया है | चूकि यह शक्ति वास्तविक है, अतः यह जगत भी वास्तविक है |

 रामानुजाचार्य ने शंकराचार्य के मायावाद को सात प्रमुख दोषों से युक्त माना है | अर्थात् यह मायावाद सात प्रकार से असिद्ध है | इन्हें सप्त-अनुपपत्ति कहा गया है | ये सात आक्षेप इस प्रकार है:-

1.       आश्रयानुपपत्ति- रामानुज का प्रश्न है कि आखिर माया का आश्रय क्या है | यदि ब्रह्म को माया का आश्रय माना जाय तो फिर इससे ब्रह्म का शुद्ध ज्ञानस्वरूप होने और उसकी अद्वैतवादी अवधारणा का खंडन होगा |  ब्रह्म को माया का आश्रय मानने पर ब्रह्म के साथ-साथ माया की भी सत्ता माननी पड़ेगी | पुनः माया का आश्रय जीव भी नहीं हो सकता है क्योंकि जीव स्वयं अविद्याजन्य है |

इस आक्षेप के उत्तर में शंकर के अनुयायियों का कहना है कि यद्यपि ब्रह्म ही माया का आश्रय है लेकिन वह स्वयं माया से प्रभावित नहीं होता है | जिसप्रकार जादूगर अपनी जादुई शक्ति से स्वयं प्रभावित नहीं होता है, उसी प्रकार ब्रह्म भी अपनी इस माया शक्ति से प्रभावित नहीं होता है |

2.       तिरोधानुपपत्ति-यदि ब्रह्म शुद्ध स्वप्रकाश व ज्ञानस्वरूप है तो फिर माया उसे आच्छादित या तिरोहित नहीं कर सकती | अतः या तो ब्रह्म ज्ञानस्वरूप है या फिर अज्ञान या माया उसे आच्छादित नहीं कर सकती |

शंकर के अनुयायियों का कहना है कि जिसप्रकार मेघ कुछ देर के लिए सूर्य को आच्छादित कर लेता है | उसी प्रकार ब्रह्म भी अज्ञान से ढक जाता है लेकिन उससे ब्रह्म के वास्तविक स्वरुप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता |

3.       स्वरूपानुपपत्ति-रामानुज का प्रश्न है कि माया का स्वरुप क्या है ? माया के चार स्वरुप संभव है-सत्, असत्, सद्सत्(सत्-असत्), न सत् न असत् | यदि माया सत् स्वरुप है, तो फिर इसका खंडन नहीं हो सकता | यदि असत् है तो जगत प्रपंच का ब्रह्म पर आरोप नहीं हो सकता है | पुनः इसे सद्सत् भी नहीं माना जा सकता है क्योंकि ऐसा मानना आत्मव्यघाति दोष होगा | इसे सद्सत् से परे मानना चिंतन प्रक्रिया से विमुख होने के समान होगा | स्पष्ट है कि माया का स्वरुप नहीं बताया जा सकता है |

शंकर के अनुयायियों का कहना है कि माया भाव रूप है | यहाँ माया को भाव रूप कहने का तात्पर्य केवल इतना ही है कि वह अभाव मात्र नहीं है | माया भाव रूप होते हुए भी अपनी सत्ता के लिए ब्रह्म पर आश्रित है |

4.     अनिर्वचनीयानुपपत्ति-शंकर माया को अनिर्वचनीय मानते है | रामानुज के अनुसार माया को अनिर्वचनीय कहना भी उसके सन्दर्भ में व्यक्त करने के समान है | पुनः विश्व के सभी पदार्थ या तो सत् हैं या असत् है | इन दो कोटियों से परे अनिर्वचनीयता को मानना तर्कशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करना है ( मध्यम परिहार का दोष) |

इसके जवाब में शंकर के अनुयायियों का कहना है कि सत् और असत् से विलक्षण होने के कारण माया को अनिर्वचनीय मानने में कोई दोष नहीं है | माया सत् नहीं है क्योंकि उसका खंडन ब्रह्म के ज्ञान से हो जाता है | पुनः वह बंध्या-पुत्र की भांति असत् भी नहीं क्योंकि इसकी प्रतीति होती है |

5.      प्रमाणअनुपपत्ति- रामानुज के अनुसार माया की सिद्धि का कोई प्रमाण नहीं है | प्रत्यक्ष प्रमाण से इसकी सिद्धि नहीं हो सकती क्योंकि वह सत् और असत् से विलक्षण है | यह अनुमानगम्य भी नहीं है क्योंकि माया का कोई हेतु नहीं है | पुनः शब्द प्रमाण से भी इसकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि शास्त्र इसे केवल ब्रह्म की लीला कहते है | कहने का आशय यह है कि मायावाद अप्रमाणित है |

शंकर के अनुयायियों के अनुसार माया का ज्ञान अर्थापत्ति प्रमाण से होता है |

6.       निवृत्यानुपपत्ति- रामानुज का कहना है कि यदि माया भाव रूप है तो इसका विनाश तर्कतः संभव नहीं है | भावरूप सत्ता का नाश ज्ञान से नहीं हो सकता |

शंकर के अनुयायियों ने इसके जवाब में कहा कि माया को भाव रूप कहने का आशय सिर्फ इतना है कि वह असत् रूप नहीं है | ब्रह्म ज्ञान से इसका निराकरण हो जाता है |

7.       निवर्तकअनुपपत्ति- रामानुज के अनुसार माया का कोई निवर्तक( नष्ट करने वाला) नहीं है | अद्वैत वेदांती निर्गुण, निराकार, निर्निवेष ब्रह्म के ज्ञान को माया का निवर्तक मानते हैं | रामानुज के अनुसार निर्गुण, निराकार, निर्निवेष ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त ही नहीं किया जा सकता है |

अद्वैतवादियों के अनुसार ब्रह्म ज्ञान ही माया का निवर्तक है | निर्गुण, निराकार, निर्निवेष ब्रह्म के ज्ञान के लिए आत्मानुभूति आवश्यक है | यह ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय के भेद पर आधारित नही है | यह ज्ञान अपरोक्षानुभूतिगम्य है |

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि जिस अर्थ में शंकराचार्य ने माया का वर्णन किया है, उस अर्थ से भिन्न अर्थ में रामानुजाचार्य माया का खंडन करते है | वे भाव, सत् और असत् के अर्थ को शंकराचार्य दे द्वारा स्वीकृत अर्थ से भिन्न अर्थ लेकर मायावाद का खंडन करने का प्रयास करते है | अतः रामानुजाचार्य द्वारा शंकर के मायावाद पर किया गया आक्षेप तार्किक रूप से पूर्णतः संगत नहीं है |

मायावाद के द्वारा शंकराचार्य जहाँ एक ओर एकमात्र पारमार्थिक तत्व के रूप में ब्रह्म की सत्ता को स्थापित करते हैं तो दूसरी तरफ जगत की उत्पति, विनाश और विविधता की व्याख्या करते है | इसप्रकार नित्यता-अनित्यता, एकता-अनेकता, वास्तविकता-भ्रम इन सभी की व्याख्या मायावाद के आधार पर की गई है |

शंकराचार्य का मायावाद


मायावाद, अद्वैतवाद का एक महत्त्वपूर्ण एवं विशिष्ट सिद्धांत है | माया को अद्वैत वेदांत की तार्किक पूंजी कहा जाता है | माया ईश्वर की शक्ति है, जिसके द्वारा वह नाना रूपात्मक विश्व की रचना करता है |

माया की परिकल्पना क्यों की गई- ब्रह्म और जगत की सम्यक रूपेण व्याख्या करने के लिए और परम तत्व के एकत्व एवं जगत की विविधता की व्याख्या करने के लिए माया को लाया गया |  

शंकराचार्य के अनुसार पारमार्थिक दृष्टिकोण से ब्रह्म ही एकमात्र सत् है, ब्रह्म से भिन्न किसी की सत्ता नहीं है | दूसरी तरफ व्यावहारिक दृष्टिकोण से संसारी जीव है, जिसमें भेद है | ऐसी स्थिति में यह द्वंद्व उभरता है कि ब्रह्म के एकत्व और जीव-जगत की प्रपंचमय स्थिति के बीच किस प्रकार समन्वय स्थापित किया जाय ? शंकराचार्य इसकी व्याख्या और समाधान माया के माध्यम से करते है, जिसका ज्ञान अर्थापत्ति प्रमाण से होता है|

शंकर से दर्शन में माया और अविद्या दोनों एक ही है | लेकिन परवर्ती विचारकों ने इनके बीच भेद किया है | इनके अनुसार माया भाव रूप है जबकि अविद्या अभाव रूप है | माया ईश्वर से संबंधित है और अविद्या जीव से संबंधित है | भाव रूप का अर्थ है कि असत नहीं जबकि अभाव रूप का अर्थ बंध्या-पुत्र की तरह सदैव असत है |

माया के दो अर्थ किए गए हैं: आवरण और विक्षेप |

1.       माया ब्रहम के स्वरुप पर आवरण डाल देती है, उसे ढक देती है |

2.       माया ब्रह्म के ऊपर जगत को प्रक्षेपित कज उसे विक्षेपित कर देती है

माया की विशेषताएँ

1.       माया अचेतन है, जड़ रूप है |

2.       माया त्रिगुणात्मक है, अर्थात् वह सत्व, रज और तम से युक्त है किन्तु यह माया सांख्य दर्शन की त्रिगुणात्मक प्रकृति से भिन्न है | माया और प्रकृति में भिन्नता है :

क.      माया परतंत्र है, प्रकृति स्वतंत्र है |

ख.     माया मिथ्या है, प्रकृति सत् है|

ग.      माया द्वारा रचित विश्व भी मिथ्या है, जबकि प्रकृति का वास्तविक परिणाम विश्व है, अतः सत् है|

3.       माया सगुण ब्रह्म की शक्ति है | यद्यपि इसका संबंध ब्रह्म से है, परन्तु ब्रह्म इससे प्रभावित नहीं होता है, जैसे जादूगर अपनी जादू से प्रभावित नहीं होता |

4.       माया अनादि है परन्तु सांत है | ब्रह्म ज्ञान से इसका अंत होता है |

5.       माया अनिर्वचनीय है क्योंकि यह सत् और असत् से विलक्षण है |

6.       माया का आश्रय और विषय दोनों ब्रह्म है |

7.      माया भाव रूप है | यहाँ भावरूप का तात्त्पर्य सत् से नहीं है | भाव रूप कहने का आशय मात्र इतना ही है कि वह असत् नहीं है |

8.       माया अध्यास है | यह भ्रम मात्र है |

9.       माया ज्ञान निरस्या है | अधिष्ठान के ज्ञान से इसका बाध हो जाता है, जैसे रस्सी के ज्ञान से सर्प का बाध हो जाता है |

Sunday, 23 March 2025

'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’

 शंकर का जगत विचार..... 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’

शंकराचार्य के अनुसार पारमार्थिक दृष्टिकोण से 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः’ अर्थात् ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और जगत मिथ्या है |

 यहाँ जगत को मिथ्या कहा गया है क्योंकि इसके अनेक कारण है :-

  •   शंकर के अनुसार जो सत् और असत् से विलक्षण है, वह मिथ्या है | जगत इस रूप में मिथ्या है क्योंकि जगत सत् नहीं है क्योंकि परमार्थ के ज्ञान से इसका खंडन हो जाता है | जगत बंध्या-पुत्र की भांति असत् भी नहीं है क्योंकि इसकी प्रतीति होती है | अतः जगत मिथ्या है |
  •  परवर्ती ज्ञान से बाधित होता है वह मिथ्या है-ज्ञान निवत्तर्यत्व मिथ्यात्व| जगत भी ब्रह्म ज्ञान से बाधित हो जाता है | अतः जगत मिथ्या है |
  • जो सत् से भिन्न ज्ञान होता है वह मिथ्या होता है-सत् विविक्त्वं मिथ्यात्व  | सत् त्रिकालाबाधित नहीं होता है जबकि जगत त्रिकालाबाधित होता है| इसलिए जगत मिथ्या है | 
  •  शंकर अध्यासवाद के आधार पर भी जगत का मिथ्यात्व सिद्ध करते है | अध्यास अतत् में तत् की प्रतीति या अध्यारोप है, अर्थात् जो वस्तु जहाँ नहीं है, वहां उसका अनुभव होना अध्यास है | शंकर के अनुसार पारमार्थिक दृष्टिकोण से ब्रह्म की ही एकमात्र सत्ता है | परन्तु अज्ञान या माया के कारण ब्रह्म के स्थान पर जगत का ज्ञान होने लगता है | जिसप्रकार कोई रस्सी को भ्रमवश सर्प समझ लेता है| उसी प्रकार जीव अविद्या के कारण ब्रह्म के स्थान पर जगत का अनुभव करने लगता है जबकि जगत वस्तुतः मिथ्या है |
  •  शंकर का जगत विषयक विचार ब्रह्मविवर्तवाद भी कहलाता है | इसके जगत ब्रह्मा का वास्तविक परिणाम नहीं है, जैसा कि रामानुज मानते है | जगत ब्रह्म का विवर्त मात्र है | चूकि ब्रह्मा(सत्) अपरिवर्तनशील है | अतः जो कुछ भी कार्यभाव प्रतीत होता है, वह अविद्या स्वरूप है, वह मिथ्या है

शंकराचार्य के अनुसार सत् के तीन स्तर हैं :-

1.       प्रतिभाषिक

2.       व्यावहारिक

3.       पारमार्थिक 

इसमें जगत व्यावहारिक दृष्टिकोण से सत् है | वह बंध्या-पुत्र की भांति असत नहीं है |

इस जगत का अभिन्ननिमित्तोपादान कारक ईश्वर है | ईश्वर अपनी मायाशक्ति के द्वारा इसकी रचना करता है| शंकराचार्य ईश्वर से जगत उत्पत्ति की व्याख्या पंचीकरण विधि के द्वारा करते है | इसके अनुसार सबसे पहले पाँच सूक्ष्म तत्वों की उत्पत्ति होती है | तत्पश्चात इनके संयोग से पाँच स्थूल तत्वों का निर्माण होता है-आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी |

यह जगत ईश्वर की लीलामात्र है | इसकी रचना के पीछे कोई ईश्वरीय प्रयोजन या इच्छा निहित नहीं है | यदि जगत को ईश्वर का प्रयोजन माना जाय तो इससे ईश्वर का ईश्वरत्व खंडित होगा |

विद्यारण्य स्वामी अनुसार वस्तुतः यह जगत पारमार्थिक दृष्टि से मिथ्या है, व्यावहारिक दृष्टिकोण से सत् है और तार्किक दृष्टिकोण से अनिर्वचनीय है |  

Wednesday, 5 February 2025

पृथ्वी पर मानवता का अद्वितीय समागम है महाकुंभ

 


प्रयागराज महाकुंभ में अब तक 35 करोड़ से अधिक श्रद्धालु स्नान कर चुके है और मौनी अमावस्या के दिन हुई भगदड़ और कुछेक आगजनी की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को छोड़कर कुलमिलाकर मेला शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा है, जो प्रशासन की तैयारियों और सुरक्षा उपायों का अच्छा संकेत है। मौनी अमावस्या की रात को हुई दुखद घटना निश्चित रूप से सभी के लिए एक गहरी पीड़ा का कारण बनी| लेकिन ऐसे समय में श्रद्धालुओं की भक्ति और अध्यात्मिक शक्ति किसी भी विपरीत परिस्थिति से उबरने में मदद करती है। इस त्रासदी से उबरकर श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्ति के साथ अपने धार्मिक और अध्यात्मिक अनुष्ठानों को पूरा किया | जिस तरह से संतों, श्रद्धालुओं, प्रशासन और राज्य सरकार ने मिलकर स्थिति को संभाला, वह काबिलेतारीफ है। अखाड़ों ने अपने धार्मिक अनुष्ठान की प्राथमिकता को दरकिनार कर श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोपरि मानते हुए स्थिति सामान्य होने तक अमृत स्नान करने से इनकार कर दिया था | यह हमारी महान संत परंपरा की मानवीयता, संवेदनशीलता और सहनशीलता का उदाहरण है | यह कदम न सिर्फ एक परंपरा के प्रति सम्मान को दिखाता है, बल्कि समाज के प्रति उनकी ज़िम्मेदारी को भी उजागर करता है। संतों का धैर्य और संयम, श्रद्धालुओं द्वारा सहनशीलता, और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा तत्परता दिखाना एक आदर्श उदाहरण है कि कठिन परिस्थितियों में भी एकजुटता और समर्पण से समाधान निकाला जा सकता है। राज्य सरकार द्वारा की गई व्यवस्थाएँ, जैसे चिकित्सा सेवाएँ, सुरक्षा प्रबंध और यातायात सुविधाएँ, वास्तव में लोगों की सुविधा के लिए महत्वपूर्ण थीं।

प्रयागराज में महाकुंभ का अयोजन पृथ्वी पर मानवता का सबसे बड़ा और अद्वितीय समागम है, जिसका न केवल धार्मिक महत्व है, बल्कि यह विज्ञान, ज्योतिष, और आध्यात्मिकता का एक दुर्लभ संगम है। यह हमारे समाज की अस्मिता, संस्कृति और सनातन धर्म का भी महाकुंभ है। यह केवल नदियों का समागम नहीं, यह विविध संस्कृतियों, संस्कारों, विभिन्न आश्रमों, और अखाड़ों का समागम है, यह धर्म, अर्थ और मोक्ष का समागम है, देश और विदेश का समागम है। यह हमारे सांस्कृतिक धरोहर की गहरी जड़ों से जुड़ा हुआ है, जो सदियों से हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। कुम्भ मेला उस महान परंपरा का प्रतीक है, जिसमें हम अपने जीवन के उच्चतम आदर्शों, आध्यात्मिक जागरण और सामाजिक सद्भावना को अपनाते हैं।

महाकुंभ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना की यात्रा से लेकर यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ा एक विराट आयोजन है। यह तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि आत्मयात्रा है। यह याद दिलाता है कि हम केवल शरीर नहीं, बल्कि अनंत चेतना हैं। जो इस सत्य को समझ लेता है, वही सच्चे अर्थों में महाकुंभ के उद्देश्य को पूर्ण करता है। यहां साधु-संत, विद्वान और भक्त आत्मबोध, विचार-विमर्श और सत्संग के मंथन के लिए जुटते हैं। इस मंथन से जो भी निकले, वह सबके लिए होता है।

यह आयोजन एक समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है, जो भारतीय समाज की विविधता और एकता को दर्शाता है। लाखों लोग अपनी सारी असुविधाओं, कष्टों और थकान के बावजूद केवल एक लक्ष्य को लेकर आते हैंअपनी आस्था और विश्वास को जीवित रखना। हर किसी की यात्रा, उसकी आस्था और उसके संघर्ष में कुछ ऐसा होता है जो भारत के धर्मनिष्ठा के असली रूप को बयान करता है। यह वो भारतीय धर्म है जो मौन रूप से, बिना किसी दिखावे के, बिना किसी भव्यता के, निःस्वार्थ भाव से अपनी श्रद्धा व्यक्त करता है। महाकुंभ बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक यात्रा है। यदि व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ यहां आता है, तो यह एक यात्रा नहीं, बल्कि जीवन को बदलने वाली यात्रा हो सकती है।

इस कुम्भ में किसी भी तरह की ऊंच-नीच या भेदभाव से परे संतों और श्रद्धालुओं का जो सैलाब उमड़ पड़ा, वह सनातन का ऐसा महासागर है जो उनलोगों समाजद्रोहियों, जो जाति-जाति से लेकर जातिगत जनगणना तक गलाफाड़ रोदन करते है, के लिए एक मुखर संदेश है कि हमें अपनी पहचान को किसी संकीर्ण दायरे में नहीं बांधना चाहिए। कोई किसी से यह नहीं पूछता कि कौन किस प्रदेश या जाति से है। इस महाकुंभ में समूचे भारत की रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन और वेशभूषा मिलकर भारतीय संस्कृति का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं। महंगाई और आवागमन की चुनौतियों के बावजूद, श्रद्धालुओं का उत्साह बिल्कुल भी कम नहीं हुआ है।

यह किसी एक जगह पर भारत की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व करता है। महाकुंभ एक ऐसा अवसर है, जहां दुनियावी वैभव और आत्मिक वैराग्य दोनों का मिलन होता है। वैभव के साथ वैराग्य का यह संगम न केवल भारतीय संस्कृति की विशेषता है, बल्कि यह बताता है कि किसी भी जीवन में शांति और संतुलन को बनाए रखना जरूरी है। एक ओर जहां हमारे पास सांसारिक संपत्ति और सुख-सुविधाएं हो सकती हैं, वहीं दूसरी ओर हमें आत्मिक शांति और संतुलन की ओर भी ध्यान देना चाहिए। यह मेला सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन के गहरे अर्थ और उद्देश्य को खोजने की यात्रा भी है। यहां तक कि विदेशी लोग भी इस महान आयोजन का हिस्सा बनते हैं और भारतीय संस्कृति का अनुभव करते हैं।

यद्यपि उत्तर प्रदेश सरकार ने महाकुंभ मेले के आयोजन के लिए तमाम सुविधाजनक प्रबंधों और डिजिटल तैयारियों करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए महाकुंभ के अनुभव को यादगार बनाने की पुरजोर कोशिश की है | फिर भी जब किसी बड़े आयोजन में कोई त्रासदी होती है, तो यह केवल एक घटना नहीं होती, बल्कि पूरे आयोजन के दौरान की गई व्यवस्थाओं और निर्णयों की भी परख होती है और यह समझा जाए कि किस स्तर पर चूक हुई। महाकुंभ की सफलता या विफलता न केवल श्रद्धालुओं के अनुभव पर, बल्कि आयोजकों की योजना, प्रबंधन, और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी निर्भर करती है। महाकुंभ जैसे बड़े धार्मिक आयोजन में, जहां लाखों लोग आते हैं, वहां वीआईपी कल्चर एक बड़ी विसंगति बन जाती है। यह वीआईपी कल्चर आम लोगों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है | आम श्रद्धालुओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, क्योंकि वे ही आयोजन की असल ताकत होते हैं। संत-महंतों और अखाड़ों के महत्व को समझते हुए, आम श्रद्धालुओं के लिए भी सुलभता और सुरक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।

तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद यह महाकुंभ एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करता है जिसके तहत धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों को आर्थिक वृद्धि से जोड़कर समग्र विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है। महाकुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजन ने न केवल सनातन की जड़ों को मजबूत किया है, बल्कि यह एक शक्तिशाली आर्थिक इंजन बनकर पर्यटन, होटल व्यवसाय, परिवहन, स्थानीय विपणन, और कृषि जैसे क्षेत्रों में भी अर्थव्यवस्था को गति प्रदान किया है साथ ही वैश्विक स्तर पर हमारे देश की साख और पहचान को भी बढ़ा रहा है |