Tuesday, 20 January 2026

अमेरिकी ट्रेजरी से दूरी: भारत की बदलती आर्थिक सोच

 भारत द्वारा अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में निवेश घटाना केवल एक वित्तीय आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन और बदलती आर्थिक प्राथमिकताओं के बीच भारत की परिपक्व होती रणनीतिक सोच का संकेत है। ऐसे समय में, जब अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ को लेकर तनाव बना हुआ है और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात लगातार अस्थिर हो रहे हैं, भारत का यह कदम उसकी दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को लेकर बढ़ती सतर्कता को दर्शाता है। 


डाइवर्सिफिकेशन की मजबूरी

पिछले एक साल में अमेरिकी ट्रेजरी में भारत की हिस्सेदारी में 21 प्रतिशत की गिरावट यह साफ़ करती है कि भारत अब “डॉलर-केन्द्रित” रिज़र्व रणनीति से धीरे-धीरे बाहर निकलना चाहता है। भले ही अमेरिकी बॉन्ड यील्ड आकर्षक बनी रही हों, लेकिन केवल रिटर्न के आधार पर निर्णय लेना आज के अनिश्चित वैश्विक माहौल में जोखिम भरा हो सकता है। डॉलर में संभावित कमजोरी, अमेरिकी फेड की भविष्य की नीतियाँ और घरेलू आर्थिक संकेतकों की अनिश्चितता—इन सबने मिलकर भारत को अपने रिज़र्व को फैलाने के लिए प्रेरित किया है।

डॉलर निर्भरता पर पुनर्विचार

अमेरिकी डॉलर दशकों से वैश्विक रिज़र्व मुद्रा रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में उस पर निर्भरता को लेकर सवाल बढ़े हैं। व्यापार प्रतिबंधों, आर्थिक दबावों और मुद्रा को भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने ने कई देशों को वैकल्पिक रास्तों पर सोचने को मजबूर किया है। भारत का ट्रेजरी निवेश कम करना इसी वैश्विक रुझान का हिस्सा है, जहाँ देश अपनी आर्थिक संप्रभुता को मज़बूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

सोने की ओर बढ़ता झुकाव

भारत के लिए सोना केवल एक पारंपरिक संपत्ति नहीं, बल्कि संकट के समय भरोसेमंद सुरक्षा कवच रहा है। वैश्विक महंगाई, युद्ध जैसे हालात और मुद्रा अस्थिरता के दौर में सोने की उपयोगिता फिर से बढ़ी है। यदि भारतीय रिज़र्व बैंक अपने गोल्ड रिज़र्व में बढ़ोतरी करता है, तो यह न केवल जोखिम प्रबंधन का साधन होगा, बल्कि वैश्विक केंद्रीय बैंकों के बढ़ते गोल्ड-रुझान के अनुरूप भी होगा।

संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती

हालाँकि अमेरिकी ट्रेजरी में निवेश घटाना एक साहसिक और दूरदर्शी कदम माना जा सकता है, लेकिन इसमें जोखिम भी निहित हैं। अमेरिकी बॉन्ड अभी भी तरलता और सुरक्षा के लिहाज़ से दुनिया के सबसे भरोसेमंद साधनों में गिने जाते हैं। इसलिए भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह विविधीकरण और स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखे—ताकि विदेशी मुद्रा भंडार न तो अत्यधिक जोखिम में पड़े और न ही अवसरों से वंचित रहे।

निष्कर्ष

अमेरिकी ट्रेजरी से भारत की आंशिक दूरी किसी तत्काल प्रतिक्रिया से अधिक, एक सोची-समझी और दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है। यह कदम बताता है कि भारत अब वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों का केवल अनुयायी नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर निर्णय लेने वाला देश बन रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस विविधीकरण को किस गति और किस दिशा में आगे बढ़ाता है—क्योंकि यही उसकी आर्थिक मजबूती और रणनीतिक स्वायत्तता का आधार बनेगा।

Monday, 12 January 2026

चीन-रूस और अमेरिका के क्लब में भारत की धमाकेदार एंट्री: DRDO ने किया ‘हाइपरसोनिक’ इंजन का सफल टेस्ट

 चीन-रूस और अमेरिका के क्लब में भारत की धमाकेदार एंट्री: DRDO ने किया ‘हाइपरसोनिक’ इंजन का सफल टेस्ट


भारत ने रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक छलांग लगाई है। देश के वैज्ञानिकों ने एक अत्याधुनिक हाइपरसोनिक स्क्रैमजेट इंजन विकसित कर लिया है, जो दुश्मन के रडार से बचे रहते हुए बेहद तेज़ गति से हमला करने में सक्षम है। हैदराबाद में हाल ही में हुए परीक्षण के दौरान इस इंजन ने लगातार 12 मिनट से अधिक समय तक सफल संचालन कर अपनी विश्वसनीयता साबित की। इस उपलब्धि के साथ भारत अब उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है, जिनके पास इतनी उन्नत रक्षा तकनीक मौजूद है।
क्या है स्क्रैमजेट तकनीक और क्यों है यह खास?
यह इंजन हाइपरसोनिक स्क्रैमजेट (Supersonic Combustion Ramjet) तकनीक पर आधारित है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी असाधारण रफ्तार है—यह ध्वनि की गति से पांच गुना से भी अधिक, यानी करीब 6,100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल कर सकता है। इतनी तेज़ गति के कारण दुश्मन को प्रतिक्रिया देने का लगभग कोई अवसर नहीं मिलता।
इसके अलावा, यह इंजन वातावरण से ही ऑक्सीजन लेकर ईंधन जलाता है। इससे मिसाइल को अलग से ऑक्सीजन ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती, वह हल्की बनती है और लंबी दूरी तक अत्यधिक सटीक वार करने में सक्षम होती है। यही वजह है कि यह तकनीक आधुनिक युद्धों में गेम-चेंजर मानी जा रही है।
DRDL की उपलब्धि और आत्मनिर्भर भारत की दिशा
हैदराबाद स्थित डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेटरी (DRDL) ने इस इंजन का डिज़ाइन और विकास किया है। यह सफल परीक्षण इस बात का संकेत है कि भारत अब अपनी खुद की हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल के विकास के बेहद करीब पहुंच चुका है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस सफलता को देश के लिए एक ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि न सिर्फ भविष्य के युद्धों में भारत की रणनीतिक क्षमता को मजबूत करेगी, बल्कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को भी सशक्त रूप से दुनिया के सामने रखेगी।

Wednesday, 24 December 2025

भारतीय स्मृति परंपरा और मनुस्मृति पर बहस

 भारतीय सामाजिक व्यवस्था और कानून–परंपरा को लेकर अक्सर एक ही ग्रंथ—मनुस्मृति—को केंद्र में रखकर बहस की जाती है, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक व्यापक, जटिल और बहुस्तरीय है। भारत की बौद्धिक परंपरा में सामाजिक, नैतिक और व्यवहारिक नियमों पर सैकड़ों चिंतकों ने अपने-अपने समय, समाज और परिस्थितियों के अनुसार विचार रखे। इन विचारों को स्मृतियों के रूप में संकलित किया गया, जो किसी एक व्यक्ति या सत्ता का आदेश नहीं, बल्कि विचार–परंपरा का संग्रह थीं।

स्मृतियों की बहुलता और प्रकृति

मनुस्मृति के अलावा भी अनेक महत्वपूर्ण स्मृतियाँ हैं—जैसे याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति, विष्णु स्मृति, नारद स्मृति, बृहस्पति स्मृति, कात्यायन स्मृति, देवल स्मृति, अंगिरस स्मृति, यम स्मृति, गौतम स्मृति, दक्ष स्मृति, हारीत स्मृति, शंख स्मृति, अत्रि स्मृति, संवर्त स्मृति, शातातप स्मृति आदि। ये सभी ग्रंथ अलग-अलग कालखंडों, सामाजिक संरचनाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप रचे गए थे। इनमें कानून, आचार, दंड, पारिवारिक संबंध, संपत्ति, न्याय और सामाजिक कर्तव्यों पर विचार मिलते हैं—पर ये एक-दूसरे से भिन्न भी हैं, कई जगह विरोधाभासी भी।

यही तथ्य स्पष्ट करता है कि स्मृतियाँ स्थिर कानून नहीं थीं, बल्कि विचारों का प्रवाह थीं। समय, स्थान और समाज के अनुसार इनमें चयन, संशोधन और व्याख्या की गुंजाइश हमेशा बनी रही।

औपनिवेशिक हस्तक्षेप और “डिवाइड एंड रूल”

औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने भारतीय समाज को समझने के बजाय उसे सरलीकृत और विकृत रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने अपनी डिवाइड एंड रूल नीति के तहत स्मृति–परंपरा की बहुलता को नजरअंदाज कर मनुस्मृति को प्रतीकात्मक रूप से चुन लिया। इसके बाद कुछ चयनित अंशों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया, भारतीय सहायकों के माध्यम से उनका प्रचार कराया गया और फिर उसी विकृत छवि के आधार पर विरोध और दहन जैसे नाटकीय प्रसंग खड़े किए गए। इसका उद्देश्य भारतीय समाज को भीतर से विभाजित करना था, न कि उसकी बौद्धिक परंपरा को समझना।

आज की बहस और अधूरा दृष्टिकोण

दुर्भाग्यवश, आज भी वही संकीर्ण दृष्टि जारी है। जब मनुस्मृति के अलावा अन्य स्मृतियों की बात की जाती है, तो अक्सर उत्तर मिलता है—“ये क्या हैं, हमने तो नाम ही नहीं सुना।” यह स्थिति हमारी ऐतिहासिक स्मृति और बौद्धिक आलस्य को उजागर करती है।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कहीं भी ऐसा प्रमाण नहीं मिलता कि भारत में किसी काल में शासन केवल और केवल किसी एक स्मृति के आधार पर चला हो। वास्तविक शासन व्यवस्था सदैव राजनीतिक परिस्थितियों, लोकाचार, परंपराओं और व्यवहारिक जरूरतों से संचालित रही।

स्मृतियाँ: कानून नहीं, विचार–संग्रह

स्मृतियों को आधुनिक अर्थों में कानून की किताब समझना एक बुनियादी भूल है। वे अधिकतर नैतिक–सामाजिक विमर्श हैं—ठीक वैसे ही जैसे आज कानून पर वकीलों और विद्वानों द्वारा लिखी गई अलग-अलग किताबें, टीकाएँ और व्याख्याएँ होती हैं। किसी एक पुस्तक को अंतिम और सार्वभौमिक सत्य मान लेना न तो भारतीय परंपरा के अनुरूप है, न ही बौद्धिक ईमानदारी के।

निष्कर्ष

भारतीय समाज को समझने के लिए स्मृतियों को एकांगी नहीं, समग्र दृष्टि से देखना आवश्यक है। मनुस्मृति हो या कोई अन्य स्मृति—सब अपने समय की उपज हैं, स्थायी शासनादेश नहीं। इन्हें लेकर की जाने वाली आज की बहसें यदि ऐतिहासिक संदर्भ, बहुलता और विचार–परंपरा को ध्यान में रखकर हों, तभी वे सार्थक और ज्ञानवर्धक बन सकती हैं।

Tuesday, 25 November 2025

अयोध्या में इतिहास का जीवंत क्षण: राम मंदिर के शिखर पर धर्मध्वजा

 

अयोध्या नगरी आज एक बार फिर इतिहास के सबसे भव्य और पवित्र पलों की साक्षी बनी। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर धर्मध्वजा फहराए जाने के बाद जो वातावरण बना, वह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं था—वह भारत की सांस्कृतिक आत्मा का पुनर्जागरण था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ध्वजारोहण के इस क्षण को पूरे विश्व के करोड़ों रामभक्तों के लिए “अद्वितीय, अलौकिक और युगांतकारी” बताया।
“सदियों के घाव भर रहे हैं” – प्रधानमंत्री मोदी
पीएम मोदी का भाषण गहराई, भावुकता और ऐतिहासिक चेतना से भरा हुआ था। उन्होंने कहा कि आज का दिन उन अनगिनत पीढ़ियों का सपना पूरा होने जैसा है, जिनके मन में राम मंदिर की एक झलक देखने की ललक थी।
उनके शब्द थे—“सदियों के घाव भर रहे हैं… सदियों की वेदना आज विराम पा रही है।” यह सिर्फ एक मंदिर का निर्माण नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के आत्मसम्मान की वापसी है।
धर्मध्वजा: पुनर्जागरण का प्रतीक
मंदिर के शिखर पर फहराती यह धर्मध्वजा केवल एक धार्मिक ध्वज नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान का ध्वज है। प्रधानमंत्री ने इसे “भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का प्रतीक” कहा।
यह ध्वज सदियों पुरानी आस्था का साकार रूप है, और आने वाली पीढ़ियों को श्रीराम के आदर्शों का संदेश देता रहेगा |
अयोध्या, जहाँ आदर्श आचरण बनते हैं, आज एक बार फिर पूरे विश्व का ध्यान—भक्ति और संस्कृति के माध्यम से—अपनी ओर खींच रही है।
“अपने भीतर के राम को जगाइए”
प्रधानमंत्री का संदेश सिर्फ मंदिर तक सीमित नहीं था। उन्होंने हर भारतीय को आत्मिक यात्रा पर चलने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा— “राम यानि जीवन का सर्वोच्च चरित्र। हमें अपने भीतर के राम की प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी।” उनका कहना था कि आज का यह पावन दिन स्वयं के भीतर राम के आदर्शों को जगाने का सर्वोत्तम अवसर है—
सत्य, करुणा, त्याग, मर्यादा और कर्तव्य।
मैकाले की मानसिकता पर प्रहार और आत्मगौरव का आह्वान
इस मौके पर पीएम मोदी ने उस मानसिकता पर भी जोरदार प्रहार किया, जो औपनिवेशिक काल में भारत पर थोपी गई थी। उन्होंने कहा—“मैकाले ने भारत के लोगों को मानसिक रूप से गुलाम बना दिया। विदेशी चीजें श्रेष्ठ लगने लगीं। हमें इस मानसिक दासता से मुक्त होना ही होगा।” मैकाले की शिक्षा पद्धति ने भारतीयों के भीतर हीनभावना पैदा की, विदेशी वस्तुओं और विचारों को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति विकसित की।
मोदी ने स्पष्ट कहा कि आने वाले 10 वर्षों, यानी 2027 तक भारत को इस मानसिकता से पूरी तरह बाहर निकलने का संकल्प लेना होगा। स्वदेशी, स्वाभिमान और सांस्कृतिक आत्मविश्वास—यही नए भारत की नींव हैं।
अयोध्या का संदेश: राममय भारत, राममय विश्व
आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया राममय दिखाई दी। सोशल मीडिया से लेकर सड़क-गली तक, हर जगह वही भावना—“जय श्रीराम”—गूंज उठी। अयोध्या का यह उत्सव केवल धार्मिक श्रद्धा नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक एकता, भावनात्मक शक्ति और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक बन गया है।

Monday, 27 October 2025

छठ पूजा : लोक आस्था, संयम और पर्यावरण संतुलन का पर्व

छठ भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक ऐसा पर्व हैं जो न केवल धार्मिक आस्था का  प्रतीक हैं, बल्कि सामाजिक एकता, पर्यावरणीय चेतना और मानव-प्रकृति के सामंजस्य को उजागर भी करता हैं। यह पर्व श्रद्धा, संयम, आत्मसंयम और सामूहिक एकता की ऐसी मिसाल प्रस्तुत करता है, जो भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक, सामाजिक और दार्शनिक मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति है।

छठ पूजा केवल पूजा या व्रत का अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह जीवन के प्रति कृतज्ञता, आत्मबल और प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व का उत्सव है। यह पर्व मूलतः सूर्य देवता की उपासना का पर्व है, जिन्हें जीवनदायिनी ऊर्जा, प्रकाश और स्वास्थ्य का स्रोत माना जाता है। सूर्य के प्रति यह श्रद्धा मानव जीवन की निरंतरता, कृषि की समृद्धि और पर्यावरणीय संतुलन की अभिव्यक्ति है।

आध्यात्मिक और दार्शनिक आयाम

आध्यात्मिक दृष्टि से छठ पूजा आत्मसाक्षात्कार और आत्मशुद्धि का पर्व है। व्रती इस अवसर पर अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हैं, जो आत्म-नियंत्रण और आत्मबल का प्रतीक है। व्रत के दौरान शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धता पर विशेष बल दिया जाता है। यह संयम न केवल भौतिक तपस्या है, बल्कि आत्मा की उन्नति का माध्यम भी है।

सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा हमें यह सिखाती है कि जीवन में जो भी प्राप्त है, उसके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। यह अर्घ्य केवल जल का नहीं, बल्कि श्रद्धा, आभार और विनम्रता का प्रतीक है। डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करने की परंपरा यह भी दर्शाती है कि जीवन में उतार-चढ़ाव दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए। दार्शनिक रूप से, यह कर्मयोग का संदेश देती है कि हर परिस्थिति में निरंतर कर्म ही जीवन का आधार है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

छठ पूजा की उत्पत्ति प्रारंभिक वैदिक काल से जुड़ी मानी जाती है। छठ पूजा की मूल भावना-सूर्योपासना और कृतज्ञता प्रकट करना-वैदिक परंपरा से जुड़ी है | ऋग्वेद में सूर्य और उषा की उपासना का उल्लेख मिलता है, जिसमें सूर्य को जीवनदायिनी ऊर्जा और समस्त सृष्टि के पोषक के रूप में वर्णित किया गया है। यह पर्व वैदिक आर्य संस्कृति की उस परंपरा को आगे बढ़ाता है, जिसमें प्रकृति और उसके तत्वों-सूर्य, जल, वायु और भूमि-की आराधना की जाती थी।

प्राचीन भारत में कृषि और गोपालन आर्थिक विकास के प्रमुख आधार थे। छठ पर्व इसी कृषि संस्कृति से जुड़ा है। यह किसानों का पर्व है, जो भूमि, जल और सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। सूर्योपासना इस बात का प्रतीक है कि सूर्य ही कृषि उत्पादन और जीवन का मूल स्रोत है | इस पूजा में प्रयुक्त होने वाला ईख(गन्ना), ऐसा कहा जाता है कि ईक्ष्वाकु वंश के समय में ईक्षु (गन्ना) से शक्कर उत्पादन आरंभ हुआ था। श्रीराम के शासनकाल में ईख की खेती और शक्कर उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे कृषि अर्थव्यवस्था को बल मिला। आज भी सरयू क्षेत्र में ईख की खेती उस प्राचीन परंपरा की याद दिलाती है, जो भारत के कृषि-आधारित आर्थिक विकास की जड़ में है।

सामाजिक और समतावादी स्वरूप

छठ पूजा की सबसे विशिष्ट विशेषता इसका लोकाभिमुख और समतावादी स्वरूप है। यह पर्व समाज के हर वर्ग को समान रूप से जोड़ता है। अन्य कई धार्मिक उत्सवों के विपरीत, इसमें पूजा का अनुष्ठान करने या कराने वाले पंडितों या पुरोहितों की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं होती। उपासक स्वयं ही अनुष्ठान करते हैं, जिससे यह पूजा आत्म-उपासनाका प्रतीक बन जाती है। यह अनुष्ठानिक लोकतंत्र का एक सुंदर उदाहरण है, जहाँ जाति, वर्ग, धर्म या आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता।

इस पर्व का सामुदायिक पहलू भी अत्यंत सशक्त है। परिवार के सदस्य और पड़ोसी मिलकर तैयारी करते हैं | घरों की सफाई, घाटों की सजावट और प्रसाद की तैयारी में सभी सहभागी होते हैं। इस सामूहिकता में सहयोग, समानता और एकता की भावना निहित है, इसलिए यह पर्व सामाजिक एकसूत्रता का पर्याय है।

पर्यावरणीय दृष्टिकोण

छठ पूजा को सबसे अधिक पर्यावरण-अनुकूल त्योहार माना जाता है। जहाँ अनेक आधुनिक त्योहारों पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने के आरोप लगते हैं, वहीं छठ पर्व पूर्णतः प्रकृति-संगत और सादगीपूर्ण है। इस त्योहार में प्लास्टिक, कृत्रिम सजावट या आतिशबाज़ी का प्रयोग नहीं होता। इसके स्थान पर प्राकृतिक वस्तुओं, जैसे बांस से बने सूप, दौरा, मिट्टी के चूल्हे और घर में बनी मिठाइयों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार, यह पर्व ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

छठ पूजा का पर्यावरणीय पहलू केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी संपूर्ण भावना में निहित है। यह पर्व पक्षियों के मौसमी प्रवास के समय के साथ मेल खाता है और प्रायः नदियों, तालाबों या प्राकृतिक जलस्रोतों के तट पर मनाया जाता है। इन अनुष्ठानों से मनुष्य और प्रकृति के बीच के सामंजस्यपूर्ण संबंध का प्रतीकात्मक प्रदर्शन होता है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ तालमेल में रहना ही स्थायी जीवन का आधार है।

छठ व्रत : संयम और आत्मशक्ति का उत्सव

छठ व्रत को सबसे कठोर और पवित्र व्रतों में से एक माना जाता है। इसमें व्रती तीन दिन तक कठोर नियमों का पालन करते हैं, जिसमें उपवास, निराहार रहना, पवित्रता बनाए रखना और प्रकृति के प्रति श्रद्धा प्रकट करना शामिल है। व्रती बिना किसी आडंबर या दिखावे के यह व्रत पूर्ण निष्ठा और समर्पण से करते हैं। यह आत्म-संयम का उत्सव है, जो व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है और आत्मबल की गहराई को अनुभव कराता है।

छठ पूजा : पर्यावरण से एकाकार का पर्व

छठ पूजा केवल धार्मिक आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि यह जीवन का एक गहन दर्शन है। यह आत्मसंयम के माध्यम से आत्म-शक्ति प्राप्त करने, श्रम की गरिमा का सम्मान करने, प्रकृति के प्रति सम्मान विकसित करने और समाज में समानता तथा सहयोग की भावना को सुदृढ़ करने का पर्व है। यह कृषि के आर्थिक चक्र का उत्सव है।

आस्था के साथ-साथ यह पर्व एक आर्थिक और पर्यावरणीय आंदोलन भी है, जो दर्शाता है कि परंपराएँ केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास का भी आधार बन सकती हैं। यह केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि यह जीवन के उस दर्शन का उत्सव है जो कहता है "प्रकृति ही जीवन है, और उसका सम्मान ही सच्ची उपासना।"

https://abnnews24.com/newsdetails.php?nid=28582&catid=17