विश्व की आधी आबादी महिलाओं की है। कोई भी देश अपनी आधी जनसंख्या की
कार्यकुशलता, प्रतिभा एवं दक्षता की उपेक्षा नहीं कर सकता। किसी
भी देश की सर्वांगीण प्रगति के लिए उस देश की महिलाओं की भागीदारी आवश्यक एवं
महत्वपूर्ण है| राजनीति का संबंध प्रत्यक्ष रूप से शासन तथा समाज
के प्रबंधन से होता है। नीतियों, कानूनों एवं राज्य के आदेशों के क्रियान्वयन के
लिए राजनीतिक शक्ति अनिवार्य है। फिर भी विश्व भर में नीति-निर्माण प्रक्रिया एवं लोकतांत्रिक
संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्त्व अत्यंत कम है | भारत ही नहीं बल्कि विश्व
की आधी शक्ति एवं क्षमता होने के बावजूद राजनीतिक, सामाजिक,
आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका,
उनकी
कम भागीदारी तथा कमजोर स्थिति और सहभागिता पर प्रश्नचिन्ह यथावत लगा हुआ है। लोकतांत्रिक
देशों में भारत एक ऐसा देश है जिसने आज़ादी प्राप्त करने के साथ ही महिलाओं को पुरुषों
के समान मताधिकार और राजनीति में समान सहभागिता का अधिकार प्रदान किया। भारतीय
संविधान सरकार के संचालन की प्रक्रिया में पुरुषों एवं स्त्रियों की समान राजनीतिक
सहभागिता का प्रावधान करता है। आज़ादी के लगभग सात दशक के दौरान जीवन के
विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सरकार एवं
नागरिक समाज द्वारा असंख्य प्रयास किए गए। जिसका प्रभाव यह हुआ कि लगभग सभी
राज्यों में न सिर्फ महिलाओं के मतदान का प्रतिशत बढ़ा है बल्कि महत्वपूर्ण बात यह
कि कई राज्यों में मतदान के हिसाब से महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है|
चुनावी
राजनीति में महिलाएं अधिक सक्रिय दिखाई दे रही है| वर्तमान समय में
भी महिलाएं केन्द्रीय मंत्री, राज्य मंत्री, मुख्यमंत्री,
महापौर
और सांसद के पद पर आसीन हैं| ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतों में भी महिलाएं
विभिन्न पदों पर आसीन हैं|फिर भी पिछले 70 वर्षों के इतिहास में समाज,
अर्थव्यवस्था,
राजनीति
एवं शिक्षा के क्षेत्र में बढती भागीदारी के बावजूद उन्हें जनसंख्या के हिसाब से
पर्याप्त प्रतिनिधित्त्व हासिल नहीं हो पाया है | वैधानिक क्षेत्र और राष्ट्रीय
नीति के निर्माण में एकाध अपवादों को छोड़कर उनका प्रतिनिधित्त्व और योगदान तो और
भी नगण्य रहा है | लोकसभा और मंत्रिमंडल जैसे फ़ैसले लेने वाली जगहों में महिलाओं
का कम प्रतिनिधित्व सीधे-सीधे राजनीतिक ढांचे से उनको सुनियोजित ढंग से बाहर रखने
और मूलभूत लैंगिक भेदभाव को रेखांकित करता है| लोकसभा में 10 में से नौ सांसद
पुरुष हैं| 1952 में लोकसभा में महिलाओं की संख्या 4.4% थी जो 2014 में क़रीब 11%
है| लेकिन यह अब भी वैश्विक औसत 20% से कम है| सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि
लोकतान्त्रिक विकास की दृष्टि से भारत की तुलना में पिछड़े पड़ोसी देशों के संसद
में महिलाओं की भागीदारी अधिक है| पाकिस्तान में महिलाओं की भागीदारी तकरीबन 21
फीसदी है तो अफगानिस्तान में 28 फीसदी, नेपाल में 30
फीसदी और बांग्लादेश में 20 फीसदी है|
वर्तमान समय में भारत में महिलाओं के राजनीतिक विकास में अनेक बाधायें
हैं| आज का
प्रदूषित राजनीतिक वातावरण महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश को हतोत्साहित
करता है | महिलाओं में संकोच, भारतीय समाज का पितृसत्तात्मक
ढांचा, महिलाओं
की आर्थिक पराधीनता, महिलाओं में असुरक्षा का भय,
राजनीतिक
दलों में सत्ता लोलुपता की प्रवृत्ति, खर्चीली चुनाव
प्रणाली, यौन शोषण, लैंगिक पक्षपात,
चरित्र
हनन का भय, पारिवारिक प्रतिबंध के साथ महिला
स्वास्थ्य और पर्याप्त साक्षरता का अभाव, ऐसे असंख्य घरेलू एंव सार्वजनिक कारक महिलाओं
के राजनीतिक विकास में प्रमुख बाधायें हैं| विश्व आर्थिक
मंच द्वारा जारी की जाने वाली वार्षिक ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के मुताबिक 144
देशों की सूची में भारत का 87 वां स्थान है| इसमें महिलाओं की आर्थिक भागीदारी,
स्वास्थ्य,
शिक्षा
और राजनीतिक भागीदारी का आंकलन किया जाता है| इसका सीधा एवं साफ संकेत यह है कि संसदीय
राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की हिस्सेदारी का कम होना महज महिलाओं से जुड़ा
हुआ मसला नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक मुद्दा है | संयुक्त राष्ट्र महिला तथा
सेंटर फॉर सोशल रिसर्च (सीएसआर) द्वारा ‘राजनीति में
महिलाओं के खिलाफ हिंसा’ पर किए गए अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण
एशिया के देशों भारत, नेपाल और पाकिस्तान में पाया गया है कि 60
प्रतिशत से अधिक महिलाएँ हिंसा के डर से राजनीति में भाग नहीं लेती वहीं लगभग 90
प्रतिशत महिलाएँ हिंसा को उनके राजनीति में शामिल होने के संकल्प को तोड़ती हैं| भारत के
संदर्भ में महिलाएँ शारीरिक हिंसा, मौखिक और हिंसा
की धमकी से ग्रस्त हैं, जैसा की भारत में महिला उम्मीदवारों में से 45
प्रतिशत
शारीरिक हिंसा एवं धमकी का सामना करते हैं| विधियों का अपर्याप्त कार्यान्वयन,
पुलिस और न्यायपालिका से समर्थन की कमी,
राजनीति के बारे में कम जागरूकता और नैतिक
मूल्यों में समग्र गिरावट राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को बाधित करता है |
भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने के
कारणों में एक भारतीय समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे का होना है| यह न सिर्फ़
महिलाओं को राजनीति में आने से हतोत्साहित करता है बल्कि राजनीति में महिलाओं के
प्रवेश में अवरोध का काम करता है| पितृसत्तात्मक ढांचे को कतिपय हिन्दू
धर्मशास्त्र यह कहकर स्थापित करते है कि धर्मानुसार स्त्री को बाल्यावस्था में
पिता के संरक्षण में, युवावस्था में
पति के संरक्षण में और पति के देहांत हो जाने के बाद पुत्रों के अधीन रहना चाहिए।
भारत में नारी को जन्म लेते ही सिखा दिया जाता है की वो किसी और घर की है, किसी और की अमानत है। शायद इसी सोच के कारण आजादी मिलने के 70
वर्षों तक महिलाओं की संख्या राजनीति अपेक्षाकृत काफी कम रही है। पितृसत्तात्मक
ढांचे के कारण राजनीति में महिलाओ की भागीदारी को लेकर समाज का नजरिया न तो
सकारात्मक है और न ही राजनीतिक दल अपने तमाम प्रगतिशील और लोकतान्त्रिक नारों और
दावों के बीच भेदभावपूर्ण मानसिकता से ऊपर उठ पाए है | जिस तरह की परेशानी महिलाओं को आम जीवन में झेलनी पड़ती है ठीक
वैसा ही राजनीतिक दलों में होता है| पुरुषों के दबदबे वाले इन राजनीतिक दलों की
कार्य संस्कृति में साफ नजर आता है कि महिलाओं के लिए स्थिति सहज नहीं है| तात्पर्य
यह है कि महिलाओं के लिए लोकतंत्र के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा हमारी संस्कृति ही
रही है| फिर भी राजनीतिक दलों के भेदभावपूर्ण रवैये के बावजूद मतदाता के रूप में
महिलाओ की भागीदारी नब्बे के दशक के अंत से उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है| फिर भी राजनीतिक
दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है| पार्टियों को महिला
मतदाताओं की याद सिर्फ चुनाव के दौरान ही आती है और उनके घोषणापत्रों में किए गए
वादे शायद ही कभी पूरे होते हैं| महिलाओं के सशक्तीकरण तथा बराबरी की बात
करनेवाले दलों की असलियत टिकट वितरण के समय सामने आ जाती है | चुनावों में महिलाओं
को टिकट न देने की नीति का मुख्य कारण उनमें 'जीतने की क्षमता' कम होना माना जाता है, जो चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण है| जिन्हें
टिकट मिलता है, वे भी ज्यादातर
राजनीतिक पारिवारों से आती हैं, उनके पीछे पिता या पति का हाथ होता है| कुछ
राजनेताओं ने मजबूरी में अपनी पत्नी या बेटी को राजनीति में उतारा। किसी महिला को
किसी नेता की मृत्यु के बाद सहानुभूति वोट के लिए टिकट दिया गया। कुछ महिला
सिलेब्रिटीज को उसका ग्लैमर भुनाने के लिए राजनीति के मैदान में लाया गया । कुल
मिलाकर वंशवाद और वोट की राजनीति के हिसाब से महिलाओं को बढ़ावा मिला, किसी सरोकार के तहत नहीं। इससे जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर कार्य
करने वाली महिला कार्यकर्ता स्वयं को तिरष्कृत मानने लगते है | आज भी ज्यादातर
राजनीतिक दल सिर्फ एक रस्म अदायगी के तहत महिलाओं के मुद्दों पर बात करते हैं।
इसका कारण यह है कि भारतीय समाज में औरतों की कोई स्वतंत्र आवाज नहीं बन पाई है। राष्ट्रीय
पार्टियों के साथ-साथ क्षेत्रीय पार्टियां भी महिला उम्मीदवारों को खड़ा करने से
कतराती हैं। राज्यसभा में तो विधान सभा सदस्य वोट डालते हैं फिर राजनीतिक दल
महिलाओं को राज्यसभा चुनाव में खड़ा करते हैं| सच्चाई यह है
कि राजनीतिक दल महिलाओं को राजनीति में आगे बढाने की बात तो करते हैं लेकिन उनकी
इच्छाशक्ति नहीं है। साथ ही, वे पुरुष प्रधान
समाज की भूमिका को कम होने देना नहीं चाहते हैं। कई राजनीतिक दलों के नेता सोचते
हैं कि महिलाओं को टिकट देने से यदि वे निर्वाचित होंगी तो पुरुषों का राजनीति से
सफाया हो जाएगा। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर दूसरी चुनौती यह है कि
अगर कोई महिला अपने राजनीतिक कौशल के कारण किसी पार्टी के अंदरूनी ढांचे में
उपस्थित दर्ज करवाने में कामयाब भी होती हैं तो उसे नेतृत्व के दूसरे दर्जे पर
धकेल दिया गया है | वह राजनीतिक दलों में नीति और रणनीति के स्तर पर बमुश्किल ही
कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और अक्सर उन्हें महिला एवं बालविकास जैसे
मुद्दों पर निगाह रखने
का काम दे दिया जाता है, जिससे कि
चुनावों में पार्टी को फ़ायदा मिल सके | श्रमिकों, कामगारों, व्यापारियों, सरकारी सेवकों
एवं आम जनता के हितों एवं आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्त्व करने एवं उनकी सहमति हासिल
करने के संबंध में महिलाओं को असमर्थ समझा जाता है। आज भले ही राष्ट्रीय और
क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाये जाने पर जोर दिया
जाता है लेकिन इन राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है|
हालाँकि इस तर्क को स्व. जयललिता, ममता बनर्जी, वसुंधराराजे सिंधिया, महबूबा
मुफ़्ती, सुषमा स्वराज, उमा भारती, सुमित्रा महाजन,
गिरजा व्यास, मेनका गांधी, मारग्रेट अल्वा और मायावती जैसी राजनीतिक हस्तियों ने अपने
करिश्माई व्यक्तित्व और राजनीतिक कौशल के बल पर बेमानी सिद्ध किया है और न चुनावों
में न केवल स्वयं को अपराजेय सिद्ध किया है बल्कि कुछ ने अपने-अपने दलों को भारी
बहुमत से जीतकर सरकारें भी बनायीं हैं | इन महिलाओं ने यह भी सिद्ध किया है कि
सत्तारूढ़ महिलाएँ स्वयं को केवल स्त्री संबंधी विषयों तक ही परिसीमित नहीं करतीं।
वे राज्य और समाज के व्यापक मुद्दों का सफलतापूर्वक निर्वहन कर सकती है | यही नहीं
भारत के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की सफलता की दर भी पिछले तीन चुनावों
में बेहतर रही है| 2014 के आम चुनावों
में महिलाओं की सफलता 9% रही है जो
पुरुषों की 6% के मुक़ाबले 3%
ज़्यादा है| यह आंकड़ा राजनीतिक दलों के जिताऊ उम्मीदवार के आधार पर ज़्यादा टिकट देने
के तर्क को ख़ारिज कर देता है और साथ ही महिला उम्मीदवार न मिलने की बात को
निराधार ठहराता है| भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लगभग 16
वर्षीय प्रधानमंत्रित्व काल से ही यह सिद्ध हो चुका है कि भारत में राजनीतिक
स्वतंत्रता संविधान के अक्षरों के रूप में ही नहीं अपितु वास्तविक रूप में
क्रियान्वित है। श्रीमती प्रतिभा पाटिल भारत के राष्ट्रपति पद को भी सुशोभित कर
चुकी हैं। भारतीय संसद में वर्तमान लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन के अतिरिक्त
मीरा कुमार भी इस पद को सुशोभित कर चुकी हैं। भारतीय राज्यों में 1947 से आज तक
लगभग 23 महिलाएं राज्यपाल पद को भी सुशोभित कर चुकी हैं। सरोजिनी नायडू भारतीय
राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला और भारत के किसी राज्य
की पहली महिला राज्यपाल थीं|
राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को निर्धारित करने वाला एक प्रमुख
कारक उनमें साक्षरता का अभाव है | साक्षरता की समस्या कम से कम भारत जैसे विकासशील
देशों में महिलाओं की भागीदारी को हतोत्साहित करने में अहम भूमिका रही है |
संवैधानिक प्रावधानों के द्वारा महिलाओं को राजनीतिक अधिकार दिए जाने के बावजूद उन
अधिकारों के प्रयोग और निर्णय क्षमता को लेकर महिलाएं पुरुषों पर आश्रित है | भारतीय
संविधान द्वारा प्रदत्त विभिन्न अधिकारों तथा अधिनियमों के फलस्वरूप यद्यपि
महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न हुई है। 73 वे संविधानिक संशोधन के माध्यम
से देशभर में पंचायत स्तर पर निर्वाचन प्रक्रिया में 50 प्रतिशत महिलाओं की
भागीदारी सुनिश्चित किये जाने के बाद महिलाओं का एक बड़ा तबका राजनीति में आया है।
फिर भी ग्रामीण परिवेश की अधिकांश महिलाएँ अत्यधिक पिछड़ी हुर्इ एवं निरक्षर होने
के कारण सरकार के निर्वाचन में निर्णय लेने के लिए असमर्थ हैं। वे अपने चयन का
निर्णय अपने परिवार के पुरुष सदस्यों जैसे कि पति अथवा पुत्रों,
पिता
या भाइयों की सहमति से करती हैं। पंचायतों में महिलाएं चुन कर तो आ जाती हैं लेकिन
जब निर्णय लेने की बात आती है तब उनके पुरुष सहयोगी या परिवार वाले ज्यादातर
हस्तक्षेप करते हैं या बहुत से जगहों पर तो महिला सिर्फ नाम की प्रधान होती है
बाकी सारे काम तो उसके पति ही करते हैं | यहां तक की कागजों पर हस्ताक्षर भी वही
करते हैं और उसको समाज मान्यता भी दे देता है। अभी उनका वास्तविक सशक्तिकरण नहीं
हुआ है। महिलाओं में राजनीतिक सशक्तीकरण का अभाव उन्हें देश के राजनीतिक मामलों
में निर्णायक भूमिका निभाने में असमर्थ बना देती हैं।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार हर देश में लगभग आधी आबादी
के बावजूद कानूनन देश की कुल संपत्ति पर उनका अधिकार महज एक-तिहाई है जबकि वे
दो-तिहाई काम करती हैं | भारत जैसे विकासशील देशों में महिलाओ की आर्थिक पर
निर्भरता और भी खतरनाक स्तर पर है | ऐसी स्थिति में राजनीति की मौजूदा खर्चीली
प्रणाली में महिलाओं का पांव जमाना तो दूर, प्रवेश करना भी दुष्कर है | भारत जैसे
विकासशील देशों में महिलाओं के चुनाव प्रचार के लिए अलग से राजनीतिक कोष जैसे
प्रावधान की कल्पना करना भी बेमानी है | अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों में राजनीतिक
महिलाओं के लिए अलग से फंड एकत्र किया जाता है | भारत में महिलाएं धार्मिक
संस्थानों को दिल खोलकर दान दे सकती हैं लेकिन राजनीति में भाग ले रही या चुनाव लड़
रही किसी महिला उम्मीदवार की आर्थिक मदद करने की जरुरत महसूस नहीं करती |
आरक्षण किसी समस्या का अंतिम समाधान नहीं है। आरक्षण का अर्थ यह हुआ
कि संसद या विधायी प्रक्रिया में चुनी हुई
महिलाओं की संख्या को निर्धारित कर देना। यह राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को
सीमित कर देगा| राजनीतिक
प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करना आरक्षण का मसला नहीं है | यह
समाज की सोच और उसकी मानसिकता का मुद्दा है | समाज को अपना
दृष्टिकोण बदलना होगा और वो एक दो दिन की प्रक्रिया नहीं है उसमे समय लगेगा। यह
आधी दुनिया के प्रति समानता और सम्मान की भावना का मुद्दा है | महिलाओं मे यह
आत्मविश्वास जगाना होगा कि वो बिना किसी पारिवारिक मर्यादा को हताहत किये अपनी
राजनीतिक और सामाजिक भूमिका का निर्वहन कर सकती हैं। वर्तमान समय में भी बहुत सी
महिलाएं राजनीति में हैं फिर भी करोड़ो महिलाएं आज भी काफी कमजोर हैं। आरक्षण के
माध्यम से हम कितनी महिलाओं को राजनीति में लायेंगे। कुछ महिलाओं को लायेंगे। बाकी
असंख्य का क्या होगा?
क्या
एक तिहाई महिलाओं के राजनीति में आ जाने से राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पूरी
हो जाएगी, क्या महिलाओं का सशक्तिकरण संभव हो पायेगा ?
वास्तव में हम आरक्षण का नारा उछालकर महिला
विकास, महिला सशक्तिकरण, महिला उन्नयन
से पल्ला झाड़ लेते हैं|
जरूरत
पूरे परिवेश को सुधारने की है जिसमें हर महिला सशक्त हो,
शिक्षित
हो। भारतीय समाज में महिलाओं में राजनीतिक विकास जागृत कर उन्हें पुरूषों के समान
स्तर पर लाने के लिए भारतीय समाज एवं प्रशासन दोनेां को ही समान रूप से सहयोग करना
होगा। ऐसा परिवेश बनाने की कोशिश करनी चाहिए की महिला में यह आत्मविश्वास आयें कि वो
जो चाहे वो करे। राजनीति में पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं की समान भागीदारी की जो
बात हम करते हैं वो सिर्फ आरक्षण से नहीं आएगी।
संयुक्त
राष्ट्र महिला तथा सेंटर फॉर सोशल रिसर्च (सीएसआर) ने अपने अध्ययन में
निम्न प्रत्येक स्तर पर तत्काल कार्यवाही करने की संस्तुति करता हैं जिनमें
a) विधि निर्माण
b) राजनीतिक दल
c) कानून को लागू
करने वाली एजेंसी
d) कानून को
प्रभावित एजेंसी शामिल है |
अध्ययन में राजनीतिक दलों
की सभी समितियों में अधिक महिला सदस्यों को शामिल करने का सुझाव भी दिया गया है| चुनाव
आयोग को महिलाओं को पहचान, सुरक्षा, बढ़ावा देने एवं महिलाओं की भागीदारी को संस्थागत रूप देने के लिए
कदम उठाने की जरूरत हैं| कानून का सख्ती से कार्यान्वयन, पुलिस और न्यायपालिका द्वारा तेजी से कार्यवाही करने और न्याय
दिलाने पर जोर दिया गया है |
महिलाओं के
रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर कर उन्हें राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय
भागीदारी निभाने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। विधायी निकायों में महिलाओं के लिए सकारात्मक
दिशा में काम किया जाना वक्त की ज़रूरत है| इसके लिए महिलाओं की चुनावी प्रक्रिया
में बाधक बनने वाली चीज़ों को दूर किए जाने की ज़रूरत है और चुनावी राजनीति में
मौजूदा दूरियों को पाटने की आवश्यकता है| यही नहीं, समाज में महिलाओं पर हो रहे
अत्याचार को खत्म करने के लिए महिलाओं को राजनीति में आना चाहिए। राजनीति में आने
के बाद वे महिलाओं पर हो रहे कुरीतियों को दूर करने का काम कर सकती हैं। यह आवश्यक नहीं
कि सम्पूर्ण महिला समाज ही राजनीति के मैदान में उतर पड़े और सत्ता सुख का उपयोग
करें। वे सजग प्रहरी की भाँति राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश कर महिला समाज के
अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ देश और समाज के विकास में पुरूषों के बराबर अपना
यथाशक्ति योगदान कर सकें। वस्तुतः आवश्यकता इस बात की है कि महिलाओं को पुरूषों के
समान स्थान और सम्मान दिया जाये। भारतीय राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की बढती भागीदारी का ही
परिणाम है कि महिलाओं के लिए वर्जित धर्म और समाज के कुछ प्रतिष्ठानों में महिलाओं
के प्रवेश को लेकर व्यापक आन्दोलन होने लगे हैं| महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों के साथ ही मुंबई के
हाजी अली दरगाह पर हाल ही में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के संबंध में न्याय
प्रक्रिया ने कड़ा रुख अपनाते हुए महिलाओं को बराबरी का मूल अधिकार प्रदान किया
है।