Thursday, 3 November 2016

प्रेमचंद और उनकी लोकवादिता

प्रेमचंद और उनकी लोकवादिता  
हिंदी भाषी समाज में कबीर और तुलसी के बाद सबसे अधिक लोक स्वीकृति प्रेमचंद को ही प्राप्त है। वे सच्चे अर्थों में ‘लोकवादी’ रचनाकार हैं | लोकवादिता उनकी रचनाओं का अभिन्न अंग है | अपने कथा साहित्य में प्रेमचंद ने भारतीय समाज के यथार्थवादी चित्रण के लिए जिस कला को विकसित किया वह लोक जीवन के प्रति सूक्ष्म और व्यापक अनुभूति का परिणाम है |  भारतीय जन जीवन के जितने रूपों, वर्गों और मनुष्य के जितने पक्षों का उन्होंने वस्तुपरक चित्रण किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है | प्रेमचंद के कथा साहित्य का ऐतिहासिक संदर्भ है | इसलिए उनकी रचनाओं में जो लीक जीवन या मनुष्य विद्यमान है वह अपनी पूरी ऐतिहासिकता के साथ मौजूद है |
प्रेमचंद जिस ऐतिहासिक परिवेश में रचना कर रहे थे, वह विभिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओँ और क्षेत्रीयता के आधार पर बंटा ही नहीं था बल्कि अज्ञान, अशिक्षा, अंधविश्वास और रुढियों के बीच जकडा भी हुआ था | इसके ऊपर शोषण चक्र की अनंत श्रृंखला थी जो औपनिवेशिक ब्रिटिश सत्ता के साथ देशी सामंतवाद और पूंजीवाद के तिहरे गठजोड़ का परिणाम थी| औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक व्यापक स्वाधीनता आंदोलन को जन्म देने के लिए एक व्यापक तैयारी के बतौर न केवल समस्त धार्मिक और सामाजिक रुढियों से मुक्त होने की आवश्यकता थी, बल्कि समस्त भारतीयों को आपस में संगठित करने की आवश्यकता थी| इसी आवश्यकता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में प्रेमचंद का कथा साहित्य अपना रूपाकार ग्रहण करता है | उनके निश्चित सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्य थे-साहित्य केवल विलासिता की वस्तु नहीं है | हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है”(साहित्य का उद्देश्य- ले. प्रेमचंद पृष्ठ सं. १६ )| यह उदघोषणा उनके सामाजिक दृष्टि बोध और आधुनिक भाव बोध का प्रमाण है | उनके उपन्यासों-प्रेमाश्रम, कर्मभूमि, निर्मला, गोदान आदि और कहानियों में तत्कालीन यथार्थ बोध-वर्ग वैषम्य, किसानों और मजदूरों का शोषण, सामाजिक असमानता, वेश्या जीवन, अनमेल विवाह, पूंजीवादी संस्कृति की अभिव्यक्ति ही नहीं हुई बल्कि जनता की साम्राज्य विरोधी भावना भी अभिव्यक्त हुई| इसलिए प्रेमचंद के कथा साहित्य का मूल स्वर सामंतवाद विरोधी, पूंजीवाद विरोधी और साम्राज्यवाद विरोधी है | यही नहीं वे साहित्य में रीतिवादी और व्यक्तिवादी-कलावादी मूल्यों के भी विरोधी है | राम स्वरुप चतुर्वेदी का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि साहित्यिक क्षेत्र में प्रेमचंद ने वही काम किया जो राजनीतिक क्षेत्र में गाँधी ने किया | (हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास-ले. राम स्वरुप चतुर्वेदी, पृष्ठ सं. १४० ) महात्मा गाँधी यह अच्छी तरह से समझते थे कि औपनिवेशिक सत्ता को व्यापक जन समाज, खासतौर से किसानों और मजदूरों, की भागीदारी के बिना उखाड़ फेंका नहीं जा सकता है | गाँधी ने लक्षित किया कि किसानों और मजदूरों की समस्याओं, उनकी जरूरतों और आकांक्षाओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाकर ही उन्हें जनांदोलन के लिए प्रेरित किया जा सकता है और इसप्रकार उन्हें स्वाधीनता आंदोलन की मुख्य धारा में शामिल किया जा सकता है | गाँधी द्वारा चम्पारण, अहमदाबाद और खेडा का सत्याग्रह किसानों और मजदूरों की इसी भागीदारी को सुनिश्चित करता है | गाँधी की तरह प्रेमचंद भी जानते थे कि किसान आंदोलन ही स्वाधीनता आन्दोलन का रीढ़ साबित हो सकता है | स्वाधीनता आन्दोलन की इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रेमचंद रचनात्मक स्तर पर किसान जीवन को केन्द्र में रखकर अपनी भूमिका निभा रहे थे | प्रेमचंद को किसानों से गहरा लगाव था | उन्हें यह एहसास था कि इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है और किसान ही इसे मजबूती प्रदान कर सकते हैं जबकि किसानों की हालत अत्यंत दयनीय है | वे महाजनों, सूदखोरों, सामंतों और पंडे-पुरोहितों के चौतरफा शोषण के शिकार है | वे किसानों की त्रासद समस्याओं और शोषण की अनंत श्रृंखला की वास्तविकता की पहचान करते है और सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और नैतिक पाखंडों का पर्दाफाश करते है| किसानों और मजदूरों के प्रति इस अनन्य लगाव को देखकर ही राम विलास शर्मा लिखते है कि प्रेमचंद की कला इस बात में है कि वे हिंदुस्तान के बदले हुए किसान का चित्र खींच सके हैं|”  लोक जीवन के प्रति प्रेमचंद की अनन्य पक्षधरता से साहित्य जगत के एक बड़े और विवादित सवाल का उत्तर मिल जाता है कि कला, कला के लिए होनी चाहिए या जनता के लिए ? प्रेमचंद का सम्पूर्ण कथा साहित्य इसका प्रमाण है |
प्रेमचंद लोक जीवन की अनुभूति के लिए प्रगतिवादी नारेबाजी या क्रांतिकारी लफ्फाजी को भी अनावश्यक ठहराते हैं| वे जब भी तत्कालीन औपनिवेशिक, सामन्तवादी और पूंजीवादी तंत्र की आलोचना करते है तो एक बुद्धिजीवी या स्कॉलर की तरह या नहीं बल्कि किसानों और मजदूरों सहित पूरी शोषित जनता की दृष्टि से आलोचना करते हैं| वे स्वाधीनता आंदोलन को शोषित-उत्पीड़ित किसानों और मजदूरों की व्यापक सामाजिक और आर्थिक मुक्ति के साथ जोड़कर देखते थे, जिनकी मुक्ति के बिना स्वाधीनता बेमानी हो जाती है | ‘गबन’ का देवीदीन खटिक के माध्यम से प्रेमचंद ने तथाकथित बड़े बड़े देश भक्तों की कथनी और करनी तथा देशी पूंजीपतियों एवं कांग्रेस के उच्च शिक्षित मध्य वर्ग की मिलीभगत की आलोचना की है | देवीदीन खटिक कटाक्ष करता है-उनके घर जाकर देखो-एक भी देसी चीज नहीं मिलेगी......अरे तुम क्या देश का उद्धार करोगे | पहले अपना उद्धार कर लो | इसप्रकार सामंतवादी-पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ताकतों के गठजोड़ की भर्त्सना करते हुए कांग्रेस के वर्ग चरित्र के प्रति लोगों को सावधान करते हैं | यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि आज के राजनीतिक नेतृत्व वर्ग में और सामाजिक जीवन में जिस तरह से कथनी और करनी का अंतर सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता जा रहा है, उससे समग्र मुक्ति को लेकर प्रेमचंद की आशंका और गहरी होती गयी है | आजादी के बाद स्वतंत्रता, समानता और भातृत्व के आदर्शों की घोषणा के बावजूद जीवन में चरितार्थ करने के लिए आवश्यक साधनों को जिस तरह से अवरुद्ध करने का प्रयास किया गया, वह तत्कालीन कांग्रेस में घुस आये देसी पूंजीपति वर्ग के कारनामों का ही परिणाम है, जिसकी पहचान प्रेमचंद ने अपने कथा साहित्य में आजादी से काफ़ी पहले किया था |  ‘जागरणके 16 अप्रैल, 1934 के ठेलमठेलाशीर्षक संपादकीय में प्रेमचंद ने सत्याग्रह सिद्धांत को गलत रूप में जनता तक पहुंचाने को लेकर गांधीजी द्वारा कांग्रेस के नेताओं पर इल्जाम को व्यर्थ मानते हुए कांग्रेस के वर्ग चरित्र को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया- महात्माजी को खुद आज से तेरह साल पहले सोच लेना चाहिए था, कि जिन लोगों के हाथ में हम यह अमोघ अस्त्र दे रहे हैं, वे इसे चला भी सकते हैं या नहीं।... क्या महात्माजी ने उस वक्त यह समझा था कि ये सभी देवता हैं? अगर वह मानव स्वभाव से इतने बेखबर हैं, तो उनका कसूर है जो एक राष्ट्र के नेता में बहुत बड़ा कसूर है।...भविष्य में राजनीति को राष्ट्रहित की दृष्टि से देखना होगा।’’ प्रेमचंद का यह राष्ट्रहित लोकहित की चिंताओं से संवलित है |
प्रेमचंद के पूर्ववर्ती रचनाकारों ने उपन्यास लेखन को धर्म और नैतिक उपदेश के साथ ही मनोरंजन का माध्यम बनाया | लेकिन यह उनकी सीमा नहीं, धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलनों की पृष्ठभूमि में समय की माँग थी | इसके साथ ही हिंदी भाषा और साहित्य की ओर जनसमाज, खासतौर से शिक्षित समुदाय, को आकर्षित करने के लिए मनोरंजन का माध्यम बनाना भी जरुरी था | लेकिन प्रेमचंद ने उपन्यास की पठनीयता को बरकरार रखते हुए उसे न केवल उन्नत कला रूप में प्रतिष्ठापित किया बल्कि उपन्यास को सामाजिक और राष्ट्रीय सवालों से जोड़कर उसे मुक्तिकामी चेतना का माध्यम भी बना दिया | उन्होंने हिंदी उपन्यास को पौराणिक कथाओं, तिलिस्मी, जासूसी और काल्पनिक गल्प कथाओं की दुनिया से निकालकर लोक जीवन के धरातल पर ला खड़ा किया और उनके जीवन संघर्ष के महाकाव्य के रूप में स्थापित किया | प्रो. मैनेजर पाण्डेय के शब्दों में, इसप्रकार प्रेमचंद के हाथों हिंदी उपन्यास की ‘कर्मभूमि’ ही नहीं बदली, उसका ‘कायाकल्प’ भी हुआ |
यूरोप में उपन्यास को मध्य वर्ग का महाकाव्य माना जाता रहा है, लेकिन प्रेमचंद ने किसानों, दलितों, स्त्रियों, मजदूरों और दूसरे शोषित जन समुदायों के जीवन संघर्षों का समग्रता से चित्रण कर उपन्यास के महाकाव्यात्मक सौंदर्य को ही बदल दिया | भारत में उपन्यास मध्य वर्ग के जीवनानुभवों का महाकाव्य नहीं रहा | इनके उपन्यासों में भारतीय समाज की संरचनाओं, संस्थाओं और जीवन मूल्यों के संदर्भ में भारतीय मनुष्य के अपराजेय जीवन संघर्ष को देखा जा सकता है | वे उपन्यास को ‘मानव चरित्र के अध्ययन’ से जोड़ने के लक्ष्य के प्रति हमेशा सजग रहे | इसीलिए उनके पात्र मानसिक तनावों और अंतर्द्वंद के बावजूद सहज और स्वाभाविक ही लगते बल्कि हमारे बहुत ही निकट लगते हैं |
प्रेमचंद का जीवन और साहित्य इस बात का प्रमाण है कि लोकजीवन में रचने-बसने वाले और इस देश की मिट्टी की सुगंध की पहचान करने वाले महान रचनाकार थे | इसके अतिरिक्त उनकी कोई विशिष्टता नहीं थी| वे आम जनों की तरह ही थे, पूरी तरह से सहज, जीवन संघर्षों से जूझते हुए | प्रेमचंद के बेटे अमृत राय ने लिखा है कि  अपने साथ वो ऐसा एक भी चिन्ह नहीं रखना चाहते थे, जिससे पता चले कि वो दूसरे साधारण जनों से जरा भी अलग है। कोई त्रिपुण्ड-तिलक से अपनी विशेषता की घोषणा करता है, कोई रेशम के कुर्ते और उत्तरीय के बीच से झांकने वाले अपने ऐश्वर्य से, कोई अपनी साज-सज्जा के अनोखेपन से, कोई अपने किसी खास अदा या ढंग से|’ लेकिन उनमें गहरी जीवन दृष्टि थी | इसलिए समाज और राजनीति की उन्हें गहरी समझ थी | लोक जीवन के प्रति गहरी संवेदना के कारण ही वे सूदखोरों, महाजनों, जमींदारों और पंडे पुरोहितों से सीधी टक्कर लेते हैं |
प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने प्रेमचंद की तुलना पश्चिम के महान उपन्यासकारों से करते हुए लिखा है कि प्रेमचंद के कथा साहित्य की दुनिया पश्चिम के आलोचनात्मक यथार्थवाद के रचनाकारों की दुनिया से भिन्न किस्म की है | यूरोप के उपन्यासकारों की दुनिया के केन्द्र में या तो पतनशील सामंत वर्ग है या उत्थानशील बुर्जुआ वर्ग या दोनों और इन दोनों का संघर्ष है | जबकि प्रेमचंद के कथा साहित्य में ‘ किसानों का जीवन संघर्ष ही केंद्रीय विषय है | जीवन में किसान जिस शोषण के शिकार थे, उस शोषण के पेचीदे तंत्र, उसकी जटिल प्रक्रिया और उसकी भयानक परिणति का चित्रण प्रेमचंद ने किया है| इसका मतलब यह नहीं है कि उनके कथा साहित्य में मध्य वर्ग हाशिए पर है | समाज का प्रत्येक वर्ग या समुदाय अपनी पूरी वास्तविकता के साथ विद्यमान है | अमृत राय लिखते है कि वे अपनी जनता को अच्छी  तरह से जानते थे, वे उसे बहुत प्यार करते थे और उन्होंने अपनी कलम का इस्तेमाल जनता के हित में लड़ने वाली चमकदार तलवार के रूप में किया | सभी मामलों में, चाहे वे राजनीतिक हों, चाहे आर्थिक, चाहे सामाजिक, किसी बात के अच्छे-बुरे की उनकी एक और अकेली कसौटी यह थी की उससे जनता को फ़ायदा पहुँचता है या चोट लगती है | व्यापक जनसमाज के प्रति उनकी यही पक्षधरता उन्हें लोकवादी कथाकार बनाती है |
‘सेवासदन’ में प्रेमचंद वेश्यावृति की सामाजिक समस्या को अशिक्षा, दहेज और स्त्री की व्यापक पराधीनता जैसी समस्याओं से जोड़कर देखते हैं वहाँ वे ‘पराधीन सपनेहू सुख नाहीं  कहने वाले महाकवि तुलसीदास के साथ खड़े होकर इस मानवता विरोधी प्रवृति पर कठोर प्रहार करते है | इसके साथ ही स्त्री की शिक्षा, बाल विवाह का विरोध और विधवाओं के पुनर्विवाह की समस्या उनके मुख्य एजेंडे पर थे| ‘प्रेमाश्रम’ में प्रेमचंद औपनिवेशिक और सामंती व्यवस्था के अंतर्गत ग्रामीण जीवन की त्रासदी का अंकन के साथ ही किसानों के जीवन में आती हुई संघर्ष चेतना का यथार्थवादी चित्रण करते हैं| सरकारी दमन और क्रूरता के बावजूद गांधीजी का ‘चम्पारण’ और ‘खेडा’ सत्याग्रह जिस तरह से सफल होता है, उसी प्रकार ‘प्रेमाश्रम’ में प्रेमशंकर के नेतृत्व में चलने वाला लखनपुर गांव का किसान सत्याग्रह भी सफल होता है | ‘रंगभूमि’ में नवविकसित पूंजीवाद और भारतीय परंपरा के द्वन्द के संदर्भ में अंग्रेज रेजिडेंट के माध्यम से देसी रियासतों में प्रजा पर किए जाने वाले अत्याचारों का मार्मिक अंकन किया है | ‘कर्मभूमि’ अछूतों के प्रति अत्याचार और शोषण का चित्र है | ‘निर्मला’ अनमेल विवाह से उपजी समस्याओं के बीच घुटते और परिवार की त्रासदी है | ‘कायाकल्प’ में जागीरदारों के वैभव विलास और इसके लिए किसानों के शोषण का चित्रण है | अंत में ‘गोदान’ शोषण के दुष्चक्र के बीच किसान के मजदूर होते जाने की दारुण दशा की महागाथा है | लोक जीवन के इतने विविध स्तरों की चिंता और उनका व्यापक ज्ञान संसार उनकी प्रखर सामाजिक चेतना का ही परिणाम है | वे लोक जीवन में व्याप्त धार्मिक पाखंडों, नारी जाति की सामाजिक-आर्थिक पराधीनता, सड़ी-गली पारंपरिक मान्यताओं, रीतिरिवाजों, अंधविश्वासों और दलितों के सामाजिक-आर्थिक शोषण को बिना किसी लागलपेट के निर्मम तरीके से उभारते है| लोक जीवन के प्रति उनकी चिंता धर्म, वर्ण, संप्रदाय और जाति से परे है | उनका विरोध मानवीय क्षुद्रता, अमीरी-गरीबी के बढ़ते फर्क, दलाली, परजीवीपन, बेईमानी और फरेब से है | इसके विपरीत प्रेमचंद अपनी रचनाओं के माध्यम से जिन मानवीय गुणों की स्थापना करते है, वो हमारी आत्मा को रचती हैं। अमानवीय समय में हमें मानवीय बनाती हैं और आज भी हमारे समाज का मनोबल बढ़ा रही हैं। वे जाति, धर्म, स्त्री-पुरुष के नाम पर होने वाले विभेद की दृढ़तापूर्वक आलोचना करते हैं। वे जनसाधारण की ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, शूरता, त्याग, बलिदान, न्याय-निष्ठा और धैर्य के सदगुणों का चित्रण करते हिंदी साहित्य को लोक जीवन के बीच से ऐसे हीरो दिए जो आज भी हमारे मन-मष्तिष्क को संवेदित करते है | वे ‘ईदगाह’ के हामिद की संवेदना, प्रेमाश्रम के कादिर मियां की मानवीय छवि और पंच-परमेश्वर के जुम्मन शेख की न्याय दृष्टि को जिस तरह से उभारते है उसका आधार केवल मानवता के प्रति आदमी विश्वास है | उनके विचारों या मान्यताओं से हम मतभेद रख सकते है, उनमें अंतर्विरोध हो सकता है परन्तु लोक जीवन की अनुभूति के प्रति ईमानदारी और सचाई निर्विवाद है | रामविलास शर्मा प्रेमचंद में निहित कलाकार की सचाई को लक्षित करते हुए लिखा है कि  “उन्होंने परिस्थितियों को घटा-बढ़ाकर चित्रित नहीं किया, अपने युग की निर्धनता, दासता और पीडितों की आर्त वेदना को जैसा उन्होंने अनुभव किया, वैसा दूसरों ने नहीं | (प्रेमचंद; पृष्ठ सं. १० )

लोक जीवन के प्रति गहरी पक्षधरता से प्रेमचंद ने साबित किया है कि लोक और समाज से अलग रहकर महान साहित्य की रचना नहीं की जा सकती है और महान रचनाएं किसी वैचारिक संगठन या किसी वाद के प्रति पक्षधरता का मोहताज नहीं होती | स्वयं प्रेमचंद के विचारों में बदलाव होता रहा है परन्तु लोक और समाज की गहरी अनुभूति उनके कलाकार को श्रेष्ठतम स्वरुप प्रदान करती है |

मुक्तिबोध

जीवन-विवेक से साहित्य-विवेक तक : मुक्तिबोध
समीक्षक का प्रथम कर्तव्य यह है कि वह किसी भी कलाकृति के अंतर्तत्वों को-उसके प्राण तत्वों को-भावना-कल्पना को हृदयंगम करे, और एक विशेष दशा की ओर प्रवाहित अंतर्धारा की गति को, और उसकी अंतिम परिणति को सहानुभूतिपूर्वक अच्छी तरह से समझे और तदुपरान्त उसका विश्लेषण करे | 
किसी आलोचक के दायित्व का बोध कराने के साथ ही यह मुक्तिबोध का किसी भी कलाकृति को उसकी समग्रता के साथ समझने-समझाने, उसके स्वरुप का विश्लेषण करने और कलाकार के व्यक्तित्व और उसकी जीवन भूमि तक पहुँचने का महत्त्वपूर्ण सूत्र है | रचना और आलोचना दोनों स्तरों पर किसी भी कृति का समग्रता में कलात्मक मूल्यांकन को महत्त्व देने वाले मुक्तिबोध एक जीनियस लेखक ही नहीं थे, अपने समय के बड़े आलोचक भी हैं, जिन्होंने रचना-प्रक्रिया के अन्‍तसूत्रों को समझने के लिए तीसरा क्षण नाम से एक नया सिद्धांत और रचनात्‍मक आलोचना का एक नया स्‍वरूप प्रस्‍तुत किया, जो समस्‍त भारतीय काव्‍य-शास्‍त्र और पश्चिमी आलोचना सिद्धान्‍त के लिए एक चुनौती है | मुक्तिबोध से पहले रचना-प्रक्रिया विश्लेषण को लेकर आलोचना की कोई परम्परा नहीं है। उन्होंने उस समय तक हिन्दी आलोचना की जो परम्परा और मॉडल सुलभ थे,  उसका अनुगमन नहीं लिया और अपनी आलोचना के लिए बिल्कुल एक नया मुहावरा गढ़ा। निर्मला जैन ने मुक्तिबोध के प्रखर आलोचना कर्म की पहचान करते हुए टिप्पणी की है कि “नये प्रगतिशील कवि आलोचकों में वे सबसे प्रखर और गंभीर आलोचक थे | किसी कवि में आलोचना की ऐसी चिंतन शक्ति दुर्लभ ही है |” उनकी आलोचना दृष्टि समकालीन प्रगतिशील आलोचकों से सर्वथा भिन्न थी | मुक्तिबोध की समीक्षा पद्धति साहित्य बोध के नए स्तर को उदघाटित करती है | तत्कालीन साहित्य के मूल्यांकन में जो गुणात्मक परिवर्तन होता है उसमें मुक्तिबोध की समीक्षा पद्धति की अहम भूमिका है |
मुक्तिबोध के रचनाकाल के दौरान तत्कालीन हिंदी साहित्य ‘व्यक्तिपरकता’ और ‘सामाजिकता’ की दो परस्पर विरोधी आलोचनात्मक ध्रुवों के बीच बंटा हुआ था| एक पक्ष जहाँ साहित्य में व्यक्ति के आन्तरिक सत्य या अनुभूतियों की अवहेलना कर रहा था और सामाजिक संदर्भो को अंतिम सत्य के रूप देखने का हिमायती था | वहीं दूसरी ओर कुछ आलोचक ‘व्यक्ति स्वातंत्र्य’ की अभिव्यक्ति के उत्साह में सामाजिक संदर्भो की उपेक्षा कर संवेदना की मूल आधार भूमि से ही दूर हो जा रहे थे | मुक्तिबोध के अनुसार कुछ आलोचकों की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे मुक्ति-संघर्ष, राष्ट्र प्रेम, प्राकृतिक सौन्दर्य, नारी सौन्दर्य, यथार्थ आलोचन भावना, आशा, उत्साह तथा और तत्समान भावों को ही प्रगतिशील समझते है|जबकि अपने समकालीन प्रगतिशील आलोचना से उनकी शिकायत थी कि वह केवल बह्यपक्ष के चित्रण को महत्त्व देती है| दूसरी ओर ‘व्यक्ति स्वातंत्र्य’ को अंतिम मानव सत्य मानने वाले रचनाकार अहंग्रस्त और कुंठाग्रस्त महत्वाकांक्षाओं के शिकार हो जाते है | मुक्तिबोध ने इस परस्पर-विरोधी ध्रुवों में समन्वय स्थापित करने की कोशिश नहीं की बल्कि किसी भी रचना को समग्रता के साथ देखने का प्रस्ताव किया | इसप्रकार उनका दृष्टिकोण समग्रतावादी है| मुक्तिबोध के अनुसार यदि स्वयं की अनुभूतियों या मनोभावों का सन्दर्भ सामाजिक है तो वे जनविरोधी नहीं हो सकती है | जो आलोचक अपने जड़ीभूत और यांत्रिक सिद्धांतों के सांचे में केवल क्रांतिकारी नारों की खोज में लिप्त होते है वे अपनी तमाम जन-पक्षधरता के बावजूद संवेदना की सामाजिक आधार-भूमि से कट जाते है | इसप्रकार मुक्तिबोध एक ओर जड़ मार्क्सवादी और यांत्रिक आलोचना प्रवृति के विरोध में खड़े होते हैं तो दूसरी ओर नयी कविता में ‘व्यक्ति स्वातंत्र्य’ का नारा उछालने वाली कुंठाग्रस्त और जनविरोधी प्रवृतियों का भी विरोध करते है | वे पसंद-नापसंद के आधार पर प्रतिक्रियावादी और प्रगतिवादी जैसे योजनाबद्ध विभाजन का विरोध करते हुए स्पष्ट करते है कि कोई भी भावना न अपने-आप में प्रतिक्रियावादी होती है, प्रगतिशील | वह वास्तविक जीवन संबंधों से युक्त होकर ही उचित या अनुचित, संगत या असंगत, सिद्ध हो सकती हैं|.......घृणा यदि उचित के प्रति है तो वह स्वयं घृन्य है, यदि वह अनुचित के प्रति है तो वह प्रशंसनीय है | अतः कविता के किसी खास किस्म के ढाँचे में ही बंधी होने की मांग करने वाली प्रवृति का मुक्तिबोध विरोध करते है |

मुक्तिबोध ऐसे समीक्षक है जो व्यावहारिक आलोचना से शुरुआत करके साहित्य के सौन्दर्य-शास्त्र की ओर बढ़ते है | इसका कारण यह है कि वे काव्यानुभूति या सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति से अलग नहीं मानते है | अपनी आलोचना दृष्टि को स्पष्ट करते हुए वे ‘नये साहित्य का सौन्दर्य-शास्त्र’ में लिखते है कि साहित्य-विवेक मूलत: जीवन-विवेक है। इसलिए जीवन से दूर अपनी आराम कुर्सी पर बैठा हुआ समीक्षक, बड़ा विद्वान ही क्यों न हो, जीवन का वैज्ञानिक विवेचन नहीं कर सकता, फिर उसकी साहित्यिक अभिव्यक्ति से विश्लेषण की बात ही क्या! बगैर जीवन को जाने, बगैर जिंदगी को पहचाने, जो आलोचक केवल जीवन की गूँजों (साहित्यिक अभिव्यक्ति) का विश्लेषण करता है, उसको किसी-न-किसी हद तक यांत्रिकता का सहारा लेना ही पड़ता है|” क्योंकि साहित्य-समीक्षा  के मूल बीज वास्तविक जीवन में तजुर्बे के बतौर उपलब्ध होनेवाले ज्ञान-संवेदन तथा संवेदन-ज्ञान में ही है। इस ज्ञान-संवेदन और संवेदन-ज्ञान के परे जानेवाली समीक्षामें न ईक्षायानी देखना या दृष्टि है, न सम्यकता | आचार्य शुक्ल ने भी ‘रसात्मक बोध के विविध स्वरुप’ में काव्यानुभूति या सौन्दर्यानुभूति को जीवनानुभूति का उदात्त रूप माना है |

मुक्तिबोध साहित्य के अध्ययन को अंततः मानव-अस्तित्व के अध्ययन के रूप में स्वीकार करते है और व्यापक मानव समाज की मुक्ति से ही कविता की मुक्ति को संभव मानते है | अपने समग्रतावादी दृष्टिकोण के कारण मुक्तिबोध नयी कविता के सन्दर्भ में ‘सम्पूर्ण मनुष्य’ की प्रतिष्ठा की चिंता करते है-जब तक हम सम्पूर्ण मनुष्य को लेकर न चलेंगें, तब तक उसके किसी एक अंश को सर्वप्रधान बनाकर हम सम्पूर्ण को खंडित कर देंगे| जब तक हम आज के युग के पीड़ित मनुष्य की सम्पूर्ण सत्ता का चित्रण नहीं करते.............तब तक नयी कविता का कार्य अधूरा है | यह कार्य सामाजिक सन्दर्भों में आलोचनात्मक मानदंडों को विकसित करके ही किया जा सकता है |
मुक्तिबोध की आलोचना ही नहीं, सम्पूर्ण सर्जनात्मकता की केन्द्रीय संवेदना मानवता के प्रति गहरी प्रतिबद्धता है| इसलिए वे कृतियों की आलोचना के लिए केवल साहित्यिक मूल्यों और मानदंडों पर ही निर्भर नहीं रहते थे बल्कि मानव जीवन के मूल्यों की भी अपेक्षा रखते थे | वे रचनात्मक स्तर पर साहित्य में जनपक्षधरता पर जोर देते है और कविता या रचना को ‘व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करते है जबकि आलोचनात्मक स्तर पर रचना में मानवीय वास्तविकता के मार्मिक पक्षों के उदघाटन को महत्त्व देते है | आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी लोक जीवन के मार्मिक पक्षों के उदघाटन को किसी भी रचना की उत्कृष्टता का आधार माना है |
हिंदी आलोचना को मुक्तिबोध की सबसे महत्वपूर्ण देन रचना प्रक्रिया का विश्लेषण रहा है | मुक्तिबोध से पहले आलोचना में रचना प्रक्रिया का विश्लेषण उपेक्षित था लेकिन उन्होंने रचना प्रक्रिया के विश्लेषण के द्वारा एक नवीन सैंद्वांतिक पक्ष रखा। वे मानते है कि रचनाकार की रचना प्रक्रिया खोज और ग्रहण पर आधारित एक साहसिक कृत्य है | ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में उन्होने काव्य की रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए सृजन के तीन क्षणों की बात की है। वे लिखते है कि कला का पहला क्षण है जीवन का उत्कट तीव्र अनुभव क्षण। दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते-दुःखते हुए मूलों से पृथक हो जाना  और एक ऐसी फैंटेसी का रूप धारण कर लेना मानो वह फैंटेसी अपनी आँखों के सामने ही खड़ी हो। तीसरा और अन्तिम क्षण है इस फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरंभ और उस प्रक्रिया की परिपूर्णावस्था तक की गतिमानता| इसलिए कदम-कदम पर सजगता अनिवार्य है अन्यथा रचना-प्रक्रिया के भटकाव से इंकार नहीं किया जा सकता है| इसप्रकार मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि रचना-केंद्रित और विश्लेषणवादी है | इसी क्रम में उन्होंने कलाकार की ईमानदारी का प्रश्न बार-बार उठाया है-‘भले ही काव्य-रचना हाथ में कलम लेकर टेबल पर की जाती रही हो, किन्तु रचना की सच्ची मनो भूमिका काव्य रचना के क्षणों के बाहर निरंतर तैयार होती रहती है|’
मुक्तिबोध के अनुसार रचना-प्रक्रिया रचनाकार के प्रयोजन, दृष्टि, संवेदन और काव्य की अंतर्वस्तु से प्रभावित होती है| रचनाकार की रचना-प्रक्रिया के विश्लेषण के आधार पर ही मुक्तिबोध ने पहली बार ‘कामायनी’ को एक विशाल ‘फैंटेसी’ या ‘स्वप्न कथा’ के रूप में देखने का प्रस्ताव किया है-जो कलाकार की विधायक कल्पना द्वारा जीवन की पुनर्रचना है| फैंटेसी के निर्माण के पीछे प्रसाद द्वारा कामायनी के पात्रों को प्रतीकात्मक चरित्र के रूप में देखे जाने की मंशा और संकेत को स्पष्ट करते है-इस फैंटेसी के रूपाकार में सामंतवाद के ध्वंस से लगाकर नये व्यक्तिवाद के जन्म और पूंजीवाद के रुग्ण बालक के बाधाग्रस्त विकास की अवस्थाओं, चिंताओं, विषमताओं और विभेद तथा पूंजीवाद की सम्पूर्ण ह्रासगत अवस्था तक को प्रतीकात्मक पद्धति से गूँथ दिया है | अर्थात् फैंटेसी के द्वारा समकालीन जीवन की समस्याओं को ही अभिव्यक्त किया गया है | कामायनी का ‘मनु’ वैदिक मनु नहीं है बल्कि तत्कालीन वर्ग का ही प्रतीक-पुरुष है | मुक्तिबोध कामायनी के मनु को सामंती मूल्यों का मूर्तिमान रूप मानते हैं | इसलिए मुक्तिबोध के अनुसार मनु की समस्या प्रकारांतर से प्रसाद की विचारधारा में निहित सामंती संस्कारों की समस्या है | ‘कामायनी:एक पुनर्विचार’ में कामायनी पर मुक्तिबोध का दृष्टिकोण अपने समकालीन या पूर्ववर्ती आलोचकों से सर्वथा भिन्न है|  
रचना प्रक्रिया के विश्लेषण को महत्व देने के कारण मुक्तिबोध की व्यावहारिक आलोचना में एकांगिता का कोई स्थान नहीं है | वे किसी भी रचना के सकारात्मक पक्ष की पहचान करते है जो उनकी आलोचना की विश्वसनीयता का सबसे बड़ा प्रमाण है | मुक्तिबोध अपनी व्यावहारिक आलोचना में रचनाओं या रचनाकारों के पक्ष या विपक्ष में खड़े नहीं होते | जिस आलोचनात्मक विवेक और सदाशयता से वे कामायनी पर विचार करते है वैसे ही ‘उर्वशी’ पर भी विचार करते हैं और उतनी ही सजगता से ‘अँधा युग’ पर भी | लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि आलोचना प्रक्रिया में मुक्तिबोध अपने वैचारिक आग्रहों से मुक्त होते है| जब वे ‘कामायनी’ पर पुनर्विचार करते है तो प्रसाद की फैंटेसी निर्माण की दक्षता, प्रसाद के कल्पना के विस्तार, अभिव्यंजना शक्ति और मिथकों एवं ऐतिहासिक तथ्यों को काव्यरूप में प्रस्तुत करने की प्रसाद की क्षमता से प्रभावित हैं। लेकिन मुक्तिबोध प्रसाद की उस विश्वदृष्टि से सहमत नहीं होते है जो छायावादी कविता के आभिजात्यवादी और दार्शनिक मिजाज का प्रतिनिधित्व करती है और मानते है कि अपने मर्यादावादी दृष्टिकोण के द्वारा प्रसाद जी वर्ग-विभाजित समाज में जो स्थायित्व प्रदान करना चाहते है वह नितान्त प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण है | ‘अँधा युग’ की रचना प्रक्रिया का विश्लेषण भी मुक्तिबोध फैंटेसी के आधार पर करते है और आजादी के बाद की परिस्थितियों में हुए मूल्य विघटन या सभ्यता के संकट को महाभारत की कथा के माध्यम से प्रस्तुत करने का श्रेय धर्मवीर भारती को देते है | लेकिन समाजशास्त्रीय जिज्ञासा के अभाव के कारण धर्मवीर भारती द्वारा मूल्य विघटन या सभ्यता के संकट के कारणों और लक्षणों में घालमेल कर देने के कारण मुक्तिबोध ‘अँधा युग’ को ‘उत्पीड़ित विवेक का विस्फोट’ घोषित करते हैं | 
कामायनी की प्रतीकात्मकता में निहित फैंटेसी के माध्यम से प्रसाद जिस यूटोपिया लोक का सृजन करते है, उसका विश्लेषण करते हुए मुक्तिबोध इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि कामायनी बुद्धिवाद के विरुद्ध आस्थावाद और आत्मावाद का रूप धारण कर लेता है जो इस काव्य की त्रासदी है | मुक्तिबोध के अनुसार कामायनी की सफलता या सार्थकता इस बात में निहित है कि प्रसाद जी समाज के मूलभूत संघर्ष की पहचान की है| लेकिन उनका मर्यादावाद उस संघर्ष का वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकता है | यह ‘कामायनी’ के कोरे भावुकतावाद या हृदयवाद की सीमा है | कामायनी में प्रसाद की मर्यादावादी और भावुकतावादी दृष्टि का प्रतिनिधित्व श्रद्धा करती है | लेकिन मुक्तिबोध के शब्दों में श्रद्धावाद घनघोर व्यक्तिवाद है | ह्रासगत  पूंजीवाद का जनता को बरगलाने का एक जबरदस्त साधन है|  यहाँ मुक्तिबोध आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की मान्यता के साथ खड़े होते है | आचार्य शुक्ल ने भी ‘कामायनी’ में श्रद्धा और इड़ा में श्रद्धा को अधिक महत्त्व देने के प्रति निराशा प्रकट की है और इड़ा के प्रति श्रद्धा की उक्ति सिर चढ़ी रही पाया न ह्रदय का प्रत्युत्तर देते हुए लिखा है कि श्रद्धा के लिए यह बात भी कही जा सकती है कि रस पगी रही पाई न बुद्धि| शुक्लजी की तरह मुक्तिबोध भी इड़ा का समर्थन करते हुए उसके चरित्र को कामायनी का सबसे उज्जवल चरित्र कहा है-इड़ा का व्यक्तित्व चरित्र बहिर्मुख, सकर्मक, विज्ञानवादी और वैयक्तिक स्वार्थ से नितांत रहित है | इड़ा स्वप्न-द्रष्टा भी है –ऐसी स्वप्न-द्रष्टा जो अपनी विधायक बुद्धि और रचनात्मक कार्य द्वारा उस स्वप्न को वास्तविकता में परिणत कर देती है |  यही नहीं आधुनिक विषमता पूर्ण समाज को प्रत्यक्ष करने में मुक्तिबोध इड़ा के चरित्र से काफी प्रभावित है-इड़ा वैविध्यमय जीवन के उच्चतर विकास और प्रसार में विचरण करती हुई आधुनिक सभ्यता की विषमताओं पर खेद प्रकट करती है, आत्मालोचन करती है | इड़ा की आत्मालोचना में आत्म-भर्त्सना का विष नहीं है...........मानव समाज की वर्तमान अवस्था पर खेद और उसके भविष्य के संबंध में उसके ह्रदय में चिंता है | आधुनिक विषमता पूर्ण समाज के सापेक्ष मुक्तिबोध की इस मूल्यपरक दृष्टि के महत्व को समझा जा सकता है|

लेकिन मुक्तिबोध द्वारा मार्क्सवादी धारणा के अनुकूल भौतिकवादी सामाजिक संघर्ष और द्वंदों के बीच कामायनी को फैंटेसी रूप में देखने और प्राप्त निष्कर्ष को दोनों के युग बोध के सन्दर्भ में देखने की जरुरत है| वास्तव में प्रसाद के सृजनात्मक बोध और मुक्तिबोध के आलोचनात्मक बोध के पीछे उन दोनों का अलग-अलग युगबोध है | जहाँ प्रसाद ऐतिहासिक-पौराणिक परम्परा के सापेक्ष एक पराधीन समाज में यूटोपिया लोक का सृजन करते है जबकि मुक्तिबोध स्वतंत्र लेकिन जटिल होती सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों के सापेक्ष सभ्यता समीक्षा करते है | यदि वे कामायनी में श्रद्धा के चरित्र की तुलना में इड़ा के चरित्र को अधिक महनीय देखते है तो इसका मूल कारण भी आजादी के बाद तेजी से ज्ञान-विज्ञान और टेक्नोलॉजी के साथ ही आधुनिकता की तेज होती बयार के बीच वह विषमता पूर्ण समाज है जो किसी भी रचनाकार या आलोचक को आलोचना और आत्मालोचना के लिए विवश करता है | मुक्तिबोध  की आलोचना दृष्टि मूल्यपरक है | अपने समकालीनों से वे इस अर्थ में भी अलग है कि उनकी दृष्टि के केंद्र में मूल्य महत्वपूर्ण रहा है | नामवर सिंह मुक्तिबोध की इस समीक्षा दृष्टि के संदर्भ में टिप्पणी करते है-एक नए सृजनशील कवि के नाते मुक्तिबोध काव्य और जीवन दोनों ही क्षेत्रों में छायावाद के प्रतिक्रियावादी मूल्यों के खिलाफ संघर्ष करना अपना कर्तव्य समझते थे, इसलिए उन्होंने विशेष रूप से कामायनी के भीतर घुसकर उन ‘सामाजिक-ऐतिहासिक शक्तियों’ का उदघाटन किया |
आचार्य शुक्ल की तरह छायावादी कवियों में सुमित्रानंदन पन्त ही मुक्तिबोध के भी प्रिय कवि रहे है | प्रसाद के विपरीत वे पन्त की दृष्टि के कायल है क्योंकि वे दार्शनिकता की कुंठा से मुक्त है | यही नहीं, पन्त का काव्य महादेवी के अमूर्त दुःखवादी दर्शन से भी अलग है | पन्त की प्रशंसा के पीछे भी मुक्तिबोध का वही वैचारिक आग्रह है जिसके आधार पर वे प्रसाद की विश्वदृष्टि को ख़ारिज करते हैं | प्रसाद के विपरीत पन्त के बारे में वे लिखते है कि पन्त का मार्क्सवाद जनगण के प्रति उनकी सहज सहानुभूति ही का वास्तववादी विस्तार है|”  यहाँ मुक्तिबोध एक बार फिर अर्थभूमियों के संकोच को लेकर छायावाद के प्रति आचार्य शुक्ल की नाराजगी से सहमत दिखाई देते है | वे छायावादी काव्य में अतिशय दार्शनिकता और अमूर्तता को लक्षित करते हुए माना कि छायावाद में मानव जीवन के बहुत ही अल्प और अमहत्वपूर्ण विषयों की ओर ध्यान दिया गया है |

मुक्तिबोध के यहाँ ‘ज्ञान’ और ‘संवेदना’ दोनों परस्पर संबंधित अवधारणाएं हैं। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में उन्होंने स्पष्ट किया है कि ज्ञान और संवेदना दोनों का संबंध हमारे चारों ओर व्याप्त वास्तविक जीवन से है| मनुष्य अपने जीवन में विभिन्न परिस्थितियों व क्षणों को झेलता है। इस अर्थ में वह उनका भोक्ता है। अनुभव की इस प्रक्रिया में वह अत्यंत मूल्यवान संवेदनाएँ अर्जित करता है किंतु जब तक ये संवेदनाएं एकांगी हैं इनका कोई महत्व नहीं। परिस्थिति के ज्ञान, जीवन में प्राप्त शिक्षा-दीक्षा, विभिन्न प्रभावों और संस्कारों के संचित ज्ञान के अभाव में ये संवेदनाएँ हमारी दृष्टि को धुंधला कर सकती हैं। मुक्तिबोध मानते हैं कि संवेदना का ज्ञानात्मक होना ज़रूरी है अर्थात् संवेदना का ज्ञान द्वारा संयत और निर्दिष्ट होना आवश्यक है जो एक तरह से आचार्य शुक्ल ज्ञान प्रसार के भीतर ही भाव प्रसार होता है, का ही भावांतरण है | इसी प्रकार, एकांगी ज्ञान भी जब तक कोरा, शुष्क, नीरस, और जीवन के प्रत्यक्ष अनुभवों की संवेदना से वंचित रहेगा तब तक मूल्यवान या उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकेगा। संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना को भीतर संजोने से ही कविता पूर्णता की ओर अग्रसर होती है। उनकी दृढ मान्यता थी कि जीवन-जगत के संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना में समाई हुई मार्मिक आलोचना दृष्टि के बिना कवि कर्म अधूरा है |आज सामाजिक स्तर, सर्जनात्मक स्तर या आलोचना के स्तर पर जिस तरह से असंवेदनशीलता बढ़ी है, वह ज्ञान रहित संवेदना और संवेदना रहित ज्ञान का ही प्रतिफल है जिसके बरक्स मुक्तिबोध संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना को स्थापित करते है |  
जनता का साहित्य के सवाल पर भी भी मुक्तिबोध विचार करते हैं | ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में जनता के साहित्य को स्पष्ट को करते हुए वे लिखते है कि "साहित्य का संबंध आपकी भूख-प्यास से है, मानसिक और सामाजिक| किसी भी प्रकार का आदर्शात्मक साहित्य जनता से असबंद्ध नहीं है| दरअसल जनता का साहित्य का अर्थ, जनता को तुरंत ही समझ में आने वाले साहित्य से हरगिज़ नहीं| ऐसा होता तो क़िस्सा, तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य के प्रधान रूप होते|" तो फिर जनता का साहित्य का अर्थ क्या है? वे लिखते है कि इसका अर्थ है ऐसा साहित्य जो जनता के जीवन मूल्यों को, जनता के जीवन आदर्शों को प्रतिस्थापित करता हो, उसे अपने मुक्तिपथ पर अग्रसर करता हो. इस मुक्तिपथ का अर्थ राजनीतिक मुक्ति से लेकर अज्ञान से मुक्ति तक है|"

इसप्रकार मुक्तिबोध ने समकालीन आलोचना और सृजनशीलता में न केवल परम्परा के मूल्यों और मानों को तर्कसंगत ढंग से मूल्यांकन किया बल्कि प्रगतिशील रचनाशीलता और आलोचना को मार्क्सवादी सिद्धांतों के यांत्रिक अंधानुकरण से मुक्त करते हुए और व्यापक जनवादी भूमि पर स्थापित करते हुए स्वस्थ और सृजनात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी | उन्होंने विशुद्ध कलावादी प्रवृति और यांत्रिक व नारावादी मार्क्सवादी प्रवृति को अस्वीकार करते हुए भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक चिन्तन व सृजन के सन्दर्भ में एक नयी आलोचना पद्धति की परिकल्पना की | 

मध्ययुगीन संत काव्य और सार्वभौमिक मानव मूल्य



मध्ययुगीन संत काव्य तत्कालीन सामंतवादी और रुढ़िवादी परिवेश में मानवतावादी चेतना की प्रखर अभिव्यक्ति है। यह उस सांस्कृतिक जागरण की सशक्त अभिव्यक्ति हैजो गहरे मानवीय सरोकारों से उपजी है औरसार्वभौमिक मानव मूल्यों को प्रतिष्ठापित करता है|सार्वभौमिक मूल्य से तात्पर्य उन मूल्यों से है जिनकी प्रासंगिकता प्रत्येक भौगोलिक परिवेश और अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के कालखंड में भी है| लेकिन यहाँ प्रासंगिकता से मतलब मात्र इतना नहीं है कि वह मूल्य वर्तमान या परिवेश विशेष की परिस्थितियों के अनुकूल होया हमारे विचारों को समर्थन करता हो, बल्कि प्रासंगिकता तब भी होती है जब वह मूल्य वर्तमान या परिवेश विशेष की परिस्थितियों को चुनौती भी देता है और उन्हें नवीन सन्दर्भों में परिष्कृत भी करता है|
मध्ययुगीन संत काव्य में सार्वभौमिक मानव मूल्यों कीअभिव्यक्ति निम्न रूपों में हुई है:-
  •  मानव प्रेम के रूप में,
  • लोकधर्म के रूप में,
  • मानव कल्याण के रूप में,
  • सामाजिक विषमता और धार्मिक आडम्बरों के खंडन के रूप मे,
  • अखंड प्राकृतिक सत्ता के प्रति गहरे लगाव के रूप में |

महान और कालजयी कविता वही होती है जहाँ मनुष्य, उसके अस्तित्व और अस्मिता के समक्ष संकट और मानवता के अपमान करने वाले तत्वों के समक्ष प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है | यही नहीं महान कविता मानवीय एकता और सामाजिक समरसता और समन्वयता की भावना को विस्तार देती हैलोक जागरण की पक्षधरता के स्वर को मुखर करती है| इसमें कोई संशय नहीं कि मध्युगीन भक्त कवियों की वाणीअखिल मानवता के प्रति इस दायित्व का बखूबी निर्वहन करती हैं

मध्ययुगीन संतकवि चाहे वेअसम के शंकरदेव हों या गुजराती के नरसी मेहता हों, या कर्नाटक के अलम्मा प्रभु, या हिन्दी के कबीरजायसी, नानक, तुलसी, दादू, मलूक दास और सूरदास हो, सभी के अपने- अपने निजी विश्वासों, इन संत कवियों की कमियों और उस काल की सीमाओं के बावजूदऐसे अनेक सूत्र है जो ऐसे मानव मूल्य को प्रतिष्ठापित करते है जो सार्वदेशिक और सर्वकालिक है|

कबीर दास जब कहते है-कबीरा सोई पीर है जो जाने पर पीर’- वो संत है जो दूसरे की पीड़ा जानता है, जब गुजराती के नरसी मेहता कहते हैं कि वैष्णव जन तो तैने कहिएपीर पराई जाने रे’-वही वैष्णव है जो दूसरे के दुख जानता है, तुलसीदास जब कहते हैं कि परहित सरिस धर्म नहीं भाईपर पीरा सम नहिं अधमाई’-दूसरे को दुख देने के समान कोई पाप नहीं है और दूसरे को सुख पहुँचाने के समान कोई पुण्य नहीं है तो मध्यकालीन संत कवि एक ऐसे मानव धर्म की एक नई व्याख्या कर रहे होते है, एक ऐसे मानव मूल्य की प्रस्तावना लिख रहे होते हैजिसका आधार यह परम विश्वास था कि घट-घट में तेरा सांई बसता| इसलिए संत कवि दुखी जन की पीड़ा को जानने और मानव धर्म को जोड़ने वाले एकता का सूत्र स्थापित कर रहे थे | यह मानव धर्म हिन्दू और इस्लाम से परे हैं।
धर्म-अधर्म की यह नयी परिभाषा संत कवियों ने लोकहित या मानव कल्याण के सिद्धांत पर ही निर्मित किया है | दुनिया के अधिकतर देशों में जब धर्म का प्रभाव बढ़ता है तो पूरे माहौल में एक ही धर्म रहता है। कोई अन्य धर्म नहीं होता और जब धर्म का बंधन टूटता है तो उसके तोड़नेवाले उसी धर्म से उपजते हैंविधर्मी नहीं होते। मध्ययुगीन भक्तिकाल का माहौल मानव धर्मी है | आज के धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदारों के लिए कबीर और जायसी और उनका मानव धर्म एक चुनौती की तरह है | इस मानव धर्म का आधार वह वह मानवीय प्रेम हैं जो मनुष्य को मुट्ठी भर धूल से उठाकर 'वैकुंठी'बनाता है। जिस व्यक्ति के अन्तः में प्रेम रस व्याप्त नहीं है, वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है | तुलसीदास ने प्रेम को ही सबसे बड़ा जीवन मूल्य माना है-सब नर करहिं परस्पर प्रीति, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति | यहाँ उन्होंने स्वधर्मके द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता का और श्रुति नीतिके द्वारा धर्म के मूल तत्वों का पक्ष लिया है, जो विकृत एवं संकीर्ण धार्मिक आडम्बरों से भिन्न है |

कबीरनानकशंकरदेवतुलसीसूर, नरसी मेहताआदि सभी संत कवियों की वाणी जीवन के प्रति आस्था से निकली हुई हैमानवीय सरोकारों से गहरे जुडी हुई है इसलिए वह हृदय की अतल गहराइयों से निकली हुई है। वह अनभै सांचा है अर्थात् अनुभव सत्य और अनभय सत्य से युक्त | इस अनभै सांचा के आधार पर संत-काव्य परंपरागत मानदण्डों को तिलांजलि देते हुए उन नए मानदण्डों की प्रतिष्ठापना करता है जिसमें व्यक्ति की सामाजिक प्रास्थिति के बजाय उसकी स्वयं की अस्मिता और व्यक्तित्व को सर्वोच्च मूल्य माना गया है। संत-काव्य हमारी संवेदनाओं को मानवीयता से जोड़ता हैमनुष्यता की नयी परिभाषा करता है तथा नया धर्म रचता है। यह नया धर्म ही "लोकधर्म" है और इसी लोकधर्म के प्रति समूचा संत-काव्य समर्पित है।

संत कवियों ने जन-जीवन का सीधा साक्षात्कर किया और जीवन में वैसी ही वाणी से फूट पड़ी वे आँखिन देखी पर विश्वास करते थे।इसलिए उनके जीवन अनुभवों और कथनों के बीच अद्वैतताहै जो सिर्फ भारतवर्ष ने दुनिया को दिया है। संत कवि अपनी सरलता और सादगी और प्रेमसिक्त ह्रदय के कारण ही संत थे डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं – "संत-साहित्य भारतीय जनता के प्रेमघृणाआशाओं और वेदना का दर्पण है। वह उसके हृदय की सबसे कोमलसबसे सबल भावनाओं का प्रतिबिम्ब है। उसकी मानवीय सहजता लौकिक जीवन में आस्था और उज्ज्वल भविष्य की कामना का प्रतीक है।"

संत कवियों का मूल्य-बोध सामजिक यथार्थ से उपजा है। जिस परिवेश में संत कवियों ने अपनी पीयूषवर्षिणी वाणी से जन सामान्य को चेतना प्रदान की वह समाज क्षयशील प्रवृतियों से ग्रस्त समाज था | वह अज्ञानअशिक्षा और अनैतिकता का युग था। जीवन के आदर्शों का पतन होने लगाथा,मानवता की भावना का लोप हो चला था मानवीय सद्वृतियाँ– प्रेमक्षमाकरुणाशीलसेवात्याग एवं अहिंसा जैसे चिरंतन मूल्य लुप्त प्राय होने लगे थे | मानव-धर्म जातिवर्गसंप्रदाय आदि में विभक्त हो चला था और जन समुदाय भावनात्मक रूप से विखरता जा रहा था | ऐसे परिवेश में अंधकार से प्रकाश की ओरअसत्य से सत्य की ओरअधर्म से धर्म की ओरपशुता से मानवता की ओरविनाश से सृजन की ओरऔर अंत में असीम से ससीम की ओर ले जाने का श्रेयसंत कवियों को है | इस प्रकार संत काव्य में सांसारिक जीवन के व्यापक क्षेत्र को दृष्टि में रखकर मानवीय मूल्यों का निरूपण किया है |

संत कवियों ने धर्म को उत्तुंग शिखर से उतारकर ठोस ज़मीन पर लोक जीवन से जोड़ दिया और इसके साथ ही धर्म को मनुष्यता से जोड़कर उच्चतर धरातल पर प्रतिष्ठित किया। इस प्रकारजिस नूतन मानव धर्म की प्रतिष्ठा की वह लोकधर्म ही नहीं अपितु विश्वधर्म में परिणत हो गया और निराशा. वासनाप्रतिशोध और प्रतिहिंसा के अन्धकार में भटकते हुए जन-सामान्य का पथ प्रदर्शित करने लगा और भविष्य में भी मार्ग प्रदर्शित करता रहेगा |धर्म तथा भक्ति का स्वर प्रधान होने के साथ ही मनुष्य के भौतिक तथा लौकिक जीवन को स्वीकृति प्रदान करने के कारण संत-काव्य लोक-जीवन का काव्य हो गया है | अर्थात् संत-काव्य की बुनियाद लोक जीवन है। यह मनुष्य की सहजता तथाजन-सामान्य की आशा-आकांक्षा एवं उसकी स्वाभाविक भावनाओं का काव्य है। इसी उनके काव्य में लोक संस्कृति का सौंदर्य है |

विचार और संवेदना दोनों स्तर परसंत कवि सामाजिक अन्याय का दो-टूक प्रतिरोध करते हैं| संत-काव्य ने राजदरबार-मंदिर-मस्जिद के दायरे को तोड़कर जो लोकधारा प्रवाहित की उसका मूल स्त्रोत लोक जीवन ही है। वस्तुतः यह लोक जागरण का साहित्य है क्योंकि इसने शोषित-पीड़ित तथा वंचित जन-समुदाय के बीच आत्म-सम्मान तथा आत्मविश्वास की भावना को जागृत किया। संत कवियों ने जिस सार्वभौम मानव धर्म की हिमायत की उसमें सभी प्रकार की भेद दृष्टि मिथ्या है। मानव-मानव में भेद इस परम अज्ञान का द्योतक है कि सभी एक परम तत्व से उत्पन्न है -
एक जोति से सब उत्पन्ना, को बाभन को शूदा
इसी तत्व दृष्टि से संत कवियों ने जाति-पाँतिछुआ-छूतऊँच-नीच के भेद का विरोध किया और मानवता की प्रतिष्ठा के लिए भेद बुद्धि के निराकरण सर्वोच्च प्राथमिकता देते है | संत कवि समाज में व्याप्त बाह्याडम्बरपाखण्डकर्मकांड आदि का पूर्णतः विरोध करते हैं। उन्होंने धार्मिक मठाधीशों के धार्मिक मनमानेपन, बड़बोलेपन, धूर्तता और दंभ की आलोचना की और इस बात पर बल दिया कि विभिन्न धर्म मतों में प्रचलित कर्मकांडों तथा पूजा-पाठ आदि धर्म की मूल्य दृष्टि के पोषक नहीं हैं |

संत-काव्य में जिन सार्वभौमिक मूल्यों को तरजीह दी गई है वह लोकहितवादी विचारधारा को लेकर चलता है| इसलिए यह सम्पूर्ण विश्व मानवता का आधार है धर्मसाहित्य और राजनीति सबकी एकमात्र कसौटी है लोक हित| तुलसीदास ने स्पष्ट सन्देश दिया है कि
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी सो नृप अवस नरक अधिकारी
राजनीति के मानवीय और अमानवीय चरित्र को पहचानने की कसौटी प्रजा का सुख है | यह तथाकथित आधुनिक, लोकतान्त्रिक और कल्याणकारी राज्य का दंभ भरने देशों के लिए महत्वपूर्ण सीख और चुनौती दोनों है |
सामाजिक पहचान के स्थान पर व्यक्ति की गरिमा को महत्व देने के बावजूद समष्टि हित को ध्यान में रखते हुए इन कवियों ने वर्गीय समाज की व्यक्तिवादिता का लगातार विरोध किया। ये कवि अधर्म जन्य विश्रृंखल समाज का विरोध ही नहीं करते वरन्‌ सहज, सरल एवं सत्य धर्म के स्वरूप को निर्दिष्ट करते हुए कहते हैं कि उसका आधार चरित्रसंयम एवं हृदय तथा मन की स्वच्छता है।वे मनुष्य की चेतना का सकुंचन नहीं वरन विस्तार चाहते हैं। यही संत-काव्य की प्रगतिशीलता है। इसके लिए वे नैतिक आदर्शों का भी प्रतिपादन करते हैं। इन्होंने जहाँ कामक्रोधमोहलोभअहंकार आदि की निंदा की हैवहाँ सत्यदयाप्रेमपरोपकार आदि का महत्व भी बतलाया है। परोपकार को वे संत का पहला लक्षण मानते है |

यही नहीं, कण-कण में एक ही परम तत्व के विद्यमान होने की अप्रतिम आस्था के कारण संत कवियों में सृष्टि के एक-एक तत्व के प्रति अद्भुत आकर्षण और ममता थी| गोरखनाथ ने घोषणा की थी- जोई-जोई पिंडेसोई ब्रह्मांडे अर्थात् जो शरीर में हैवही ब्रह्मांड में है।तुलसीदास ने सियाराममय सब जग जानी, कहकर संसार के सभी पदार्थों में एक ही परम तत्व को व्याप्त माना| इस प्रकार ब्रह्माण्ड में मानव समाज के अतिरिक्त जीव जन्तुओं, वनस्पति जगत और भौतिक पदार्थों का भी एक विशाल संसार है। मनुष्यों का साथ इनका घनिष्ठ संबंध भी होता है। मानव जीव-जन्तु एवं वनस्पतियाँ आध्यात्मिक एकता से परिपूर्ण हैं।जीव-जन्तुओं के प्रति अपने लगाव को कबीर इन शब्दों में व्यक्त करते है– ‘जीव वधत अरू धरम कहते होअधरम कहाँ है भाई|’आधुनिक वैज्ञानिक शब्दों में कहा जाय तो संत कवियों में पारिस्थितिकी के प्रति गहरी सचेतनता थी जो वास्तव में मानव-अनुभूति का ही विस्तार है| कबीर, सूर, जायसी, तुलसी दास, नरसी मेहता, मीरा और शंकर देव सभी संत कवियों ने प्रकृति और ब्रह्माण्ड के विस्तृत परिप्रेक्ष्य में ही सार्वभौमिक मानव मूल्यों की सार्थकता को प्रतिष्ठित किया| आज जबकि प्रकृति के असंतुलन एवं वैषम्य के कारण विश्व मानव समुदाय के अपने अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है, ऐसे समय में संतों की प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम वास्तव में विश्व मानवता के प्रति प्रेम को ही प्रतिष्ठापित करता है | यही कारण है कि संत कवि आधुनिकता की चेतना के अधिक निकट लगते हैं|

संत काव्य की सार्वभौमिकता का एक विशिष्ट कारण उसकी विवेकपरक दृष्टि है| यह मानव विवेक ही अंतरात्मा के सहायक तत्वों में सबसे प्रमुख और विश्वसनीय है | संत कवियों के अनुसार इस मानव विवेक के बरक्स ऐसी कोई भी श्रद्धा और आस्था, जो समाज की विषमता को विधि का विधान मानकर स्वीकार कर ले, केवल अमानवीय वृतियों को जन्म देती है, मानवता के अस्तित्व के समक्ष संकट खड़े करती है और मानवीय गौरव को विकलांग बनाती है | लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उनके पास वैज्ञानिक दृष्टि थी | फिर भी उन्होंने अपनी विवेकपरक दृष्टि से मनुष्य की महत्ता को पहचाना और मानव के गरिमामय जीवन का मार्ग प्रशस्त किया |

मध्यकालीन संत काव्य में निहित मानव धर्म और मानवीय मूल्यों की सार्वभौमिकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बीसवीं सदी में साम्राज्यवाद के खिलाफ सबसे बड़ा और अहिंसक संग्राम छेड़ने वाले गाँधी भी अपना मार्गदर्शन इन संत कवियों से ही प्राप्त करते है | नरसी मेहता कावैष्णव जन तो तैने कहिएपीर पराई जाने रेवह मूल्य है जो देश और काल की सीमाओं से परे मानव मात्र के कल्याण और उनके बीच एक-सूत्रता की प्रतिष्ठापना करता है | संतों ने जटिल परिस्थितियों के मध्य अपनी स्वतंत्र दृष्टि, मानवतावादी चिन्तन पद्धति और दृढ़ संकल्पना शक्ति के द्वारा समाज में व्याप्त विषमता का न केवल विरोध किया अपितु अपनी वाणियों के माध्यम से समतामूलक समाज के लिए आधारभूमि भी प्रस्तुत की।