Tuesday, 17 May 2022

हिंदी साहित्य में आत्मकथा

 जब कोई व्यक्ति अपने जीवन की घटनाओं का विवरण स्वयं लिखता है तो उसे आत्मकथा कहते हैं। वस्तुतः जब व्यक्ति राजनीति, साहित्य, विज्ञान, सामाजिक कार्य आदि में विशेष महत्व अर्जित करता है तब वह कलात्मक, साहित्यिक ढंग से अपनी जीवनी स्वयं लिखता है, जिसे आत्मकथा कहते हैं। लेखक अपने जीवन में घटित घटनाओं का क्रमिक ढंग से वर्णन कर, उन्हें सजीवता प्रदान करता है। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा के शब्दों में–“आत्मकथा लेखक के अपने जीवन से सम्बद्ध वर्णन है, आत्मकथा के द्वारा अपने जीवन का सिंहावलोकन और एक व्यापक पृष्ठभूमि में अपने जीवन का महत्व दिखलाया जाना संभव है। साहित्य की इस विधा में लेखक वर्णनात्मक शैली में अपने जीवन का एक ऐसा क्रमिक ब्यौरा प्रस्तुत करता है जिससे कि न केवल उसके जीवन को संजीवनी प्रदान करने वाली मूल शक्ति का पता चलता है अपितु उसका अंतर्बाह्य व्यक्तित्व भी साकार हो उठता है। आत्मकथा लेखक के अतीत का लेखा-जोखा भर ही नहीं है, यह तो परिवेश विशेष में जिए गए क्षणों का पुनःसृजन है, इस कारण इसकी गणना सर्जनात्मक साहित्य के अंतर्गत की जाती है। चूँकि आत्मकथा में व्यक्ति अपने लम्बे जीवन-अनुभवों का निचोड़ प्रस्तुत करता है, अतः तत्कालीन समाज और परिवेश जीवंत हो उठता है।

प्राचीन साहित्य में आत्मकथा की परम्परा भले ही नहीं रही हो लेकिन ऐसा नहीं है कि कथाकारों ने आत्म वचन को नहीं अपनाया हो। हर्षचरित का वह आरम्भिक हिस्सा है, जिसमें रचयिता बाणभट्ट ने अपमान, वंचना और हताशा में भरे अपने बचपन, विद्यार्थी जीवन और शुरूआती युवावस्था की चर्चा की है। इसी तरह कुछ और नाम भी आते हैं जिनमें बिलहण (विक्रमांकदेव चरित), दण्डी (दशकुमारचरित) आदि प्रमुख हैं।

हिंदी साहित्य में आत्मकथा लेखन के तीन निश्चित चरण हैं

·         आरंभिक युग

·         स्वतंत्रता पूर्व युग

·         स्वातंत्र्योत्तर  युग 

आरंभिक युग

हिंदी साहित्य में आत्मकथा लेखन की शुरुआत सत्रहवीं शताब्दी में बनारसीदास जैनकी अर्द्धकथानक’  (1641ई.) से होती है, जो अपनी बेबाकी में चौंकाने वाली आत्मकथा से मानी जाती है। यह आत्मकथा पद्य में लिखी गयी है जिसमें बड़े ही तटस्थ भाव से अपने गुण और दोषों को बनारसीदास जी ने स्वीकार किया है । बनारसीदास की अर्द्धकथा के बाद एक लंबे कालखण्ड में आत्मकथा लेखन की दृष्टि से मौन मिलता है। इस लंबे मौन को स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सन् 1860 में अपने आत्मचरितसे तोड़ा है। दयानन्द सरस्वती जी का स्वकथित जीवन वृत्तान्त अत्यन्त संक्षेप में भी अपने वर्तमान तक पहुंचने की कथा का निर्वाह निजी विशिष्ट चेतना के साथ करता है।

भारतेंदु ने अपनी पत्रिकाओं के माध्यम से इस विधा का भी पल्लवन किया। उनकी स्वयं की आत्मकथा ‘एक कहानी: कुछ आपबीती कुछ जगबीतीका आरंभिक अंश प्रथम खेलशीर्षक से प्रकाशित हुआ था। उनकी संक्षिप्त-सी आत्मकथा की भाषा आम-बोलचाल के शब्दों से निर्मित हुई है, जो एक तरह से बाद की आत्मकथाओं के लिए आधार-दृष्टि का काम करती है। अपना परिचय देने के क्रम में आत्मकथाकार ने अपनी सहृदयता का यथेष्ट प्रमाण दिया है-

जमीन चमन गुल खिलाती है क्या-क्या?

बदलता है रंग आसमाँ कैसे-कैसे |

भारतेंदु के अतिरिक्त इस काल के आत्मकथाकारों में सुधाकर द्विवेदी कृत रामकहानीऔर अंबिकादत्त व्यासकृत निजवृतांतको महत्वपूर्ण माना जा सकता है। कलेवर की दृष्टि से इन आत्मकथाओं को भी संक्षिप्त कहा जा सकता है।

·     स्वतंत्रता पूर्व युग

सत्यानंद अग्निहोत्री कृत मुझमें देव जीवन का विकासका पहला खण्ड सन् 1909 में और दूसरा खण्ड सन् 1918 में प्रकाशित हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक ने आर्यसमाज के प्रचार की प्रतिस्पर्द्धा में देव-समाज के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने हेतु इस ग्रन्थ को रचा था। आस्तिकता और वैदिक विचारधारा का खण्डन इस आत्मकथा का प्रमुख हिस्सा है। सन् 1921 में भाई परमानंदकी आत्मकथा आपबीतीप्रकाशित हुई। इसे किसी क्रांतिकारी की प्रथम आत्मकथा माना जा सकता है। स्पष्टवादिता, सच्चाई के लिए प्रसिद्ध, वैदिक धर्म के सच्चे भक्त परमानन्द की आपबीती का अपनी तत्कालीन राजनीतिक स्थिति में एक विशेष राजनीतिक महत्त्व है। सन् 1924 में स्वामी श्रद्धानंद की आत्मकथा कल्याणमार्ग का पथिकप्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने अपने जीवन संघर्षों और आत्मोत्थान का वर्णन किया है। 

सन् 1932 में मुंशी प्रेमचंद ने हंसका एक विशेष आत्मकथा-अंक सम्पादित करके अपने यहाँ आत्मकथा विधा के विकास की एक बड़ी पहल की थी। 1941 में प्रकाशित आत्मकथा मेरी आत्म कहानीके आत्मकथाकार प्रसिद्ध साहित्यकार श्यामसुन्दर दास हैं। सम्पूर्ण कृति में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना, विकास, गति, तत्कालीन हिन्दी और हिन्दी की स्थिति की चर्चाएँ हैं। सन् 1942 ई. में बाबू गुलाबराय की आत्मकथा मेरी असफलताएँशीर्षक से प्रकाशित हुई। यह आत्मकथा अत्यन्त ही रोचक एवं व्यंग्य-विनोदपूर्ण है, साथ ही लेखक के व्यक्तित्व, चरित्र, कार्यक्षमता पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश डालती है।

20वीं शती के चौथे दशक में ही महात्मा गांधी ने आत्म-दर्शनकी अपनी जीवनव्यापी कोशिशों को आत्मकथा का रूप दिया, जिसे उन्होंने सत्य के प्रयोगकी संज्ञा दी। मूल रूप से यह आत्मकथा गुजराती में थी जो अनुदित होकर बाद में हिन्दी में भी प्रकाशित होती है। गांधीजी इस बात से सहमत थे कि आत्मकथा लिखने का पश्चिमी ढंग अनिवार्यतः आत्म-केन्द्रित और अहम्मन्यतापूर्ण है। परन्तु गांधी ने अपने व्यक्ति या मैंके बजाय आत्माको आत्मकथा के केन्द्र में लाकर इन पाश्चात्य विकृतियों का प्रतिकार किया। सही मायने में गाँधीजी ने आत्मकथा का भारतीयकरण किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भारतीय जनता उनके जीवन-विश्वास और जीवन व्यवहार का अन्धानुकरण न करे, क्योंकि उनकी बातें अन्तिम और सचनहीं है। सत्य को उन्होंने पाया नहीं है, बल्कि उसे पाने की निरन्तर अथक कोशिश की है|

हरिभाऊ उपाध्याय की आत्मकथा साधना के पथ पर1946 ई. में प्रकाशित हुई, जिसमें लेखक ने 1842 से 1945 तक के जीवनानुभवों को लिपिबद्ध किया है। राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा पांच खण्डों में मेरी जीवन यात्राशीर्षक से प्रकाशित हुई। आत्मकथा में राहुल सांकृत्यायन के जीवन के 62 सालों का चित्रण है तथा दक्षिण भारत की यात्रा, मठ का आश्रय, आर्य समाज से सम्पर्क, महात्मा गाँधी के प्रभाव, लंका, तिब्बत, जापान, रूस व यूरोप आदि की यात्रा, किसान सत्याग्रह, जेलयात्रा, बौद्ध धर्म व साम्यवाद से प्रभावित होने की कथा है। इस विशाल और व्यापक आत्मकथा में लेखक की साहित्यिक अभिरुचियों, वैयक्तिक गुण-दोषों, अनुभूतियों, भावनाओं, यात्राओं तथा विशिष्ट उपलब्धियों का विस्तृत वर्णन हुआ है। स्थान-स्थान पर उनकी रचनाधर्मिता, रचना-प्रक्रिया तथा लेखन स्रोतों का भी उल्लेख है।

स्वातंत्र्योत्तर  युग

स्वातंत्र्योत्तर  युग में आत्मकथा लेखन में काफी तेजी आई | 1947 में प्रकाशित बाबू राजेन्द्र प्रसाद की आत्मकथामें लेखक के बचपन के तत्कालीन सामाजिक रीति-रिवाजों का, संकुचित प्रथाओं से होने वाली हानियों का, तत्कालीन गँवई जीवन का, धार्मिक व्रतों, उत्सवों और त्यौहारों का, शिक्षा की स्थितियों का हू-ब-हू चित्र अंकित है। 1951 में प्रकाशित स्वामी सत्यदेव परिव्राजक की स्वतंत्रता की खोज में, अर्थात् मेरी आत्मकथाहिन्दी की अत्यन्त महत्वपूर्ण आत्मकथा है। स्वतंत्रता की खोज में भटकते पथिक की यह कथा मानवता से जुड़ी आत्मा की छटपटाहट एवं तत्कालीन भारतीय राजनीतिक स्थितियों से सम्बद्ध है। यशपाल की आत्मकथा सिंहावलोकनउनके उपन्यासों की भाँति रोचक और मर्मस्पर्शी है। सेठ गोविंददास की आत्मकथा के तीन भाग प्रयत्न, प्रत्याशा और नियतारितहै और चतुरसेन शास्त्री की दो आत्मकथाएं: यादों की परछाइयां’ (1956), तथा मेरी आत्म कहानी’ (1963) है | छठे दशक के प्रारम्भ में ही पाण्डेय बेचन शर्मा उग्रकी आत्मकथा अपनी खबरप्रकाशित हुई। पाण्डेय बेचन शर्मा उग्रने मुक्तिबोध के से आत्मीय और आकुल आवेग के साथ अपनी अजीब जिंदगी में आए कुछ प्रमुख व्यक्तियों के चरित्र की गहरी छानबीन की है।

लोकप्रियता में महात्मा गांधी और पण्डित नेहरू के बाद हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा आती है जिनकी क्या भूलूँ क्या याद करूँ(1969 ई.),नीड़ का निर्माण फिर(1970 ई.), बसेरे से दूर(1977ई.) और दशद्वार से सोपान तक(1985 ई.)  ने गद्य की इस विधा के लेखन में नवीन कीर्तिमान स्थापित किए हैं। अत्यंत विस्तृत होने के बावजूद बच्चन जी की आत्मकथा की विशेषता उसका सुव्यवस्थित होना है। उनके बाद प्रकाशित आत्मकथाओं में वृन्दावनलाल वर्मा की अपनी कहानी’ ( (सन् 1970), देवराज उपाध्याय की यौवन के द्वार पर’ (सन् 1970), शिवपूजन सहाय की मेरा जीवन’ (सन् 1985), प्रतिभा अग्रवाल की दस्तक ज़िंदगी की’ (सन् 1990) और भीष्म साहनी की आज के अतीत’ (सन् 2003) प्रकाशित हुई। देश विभाजन की त्रासदी को भीष्म साहनी ने जीवंत भाषा में चित्रित किया है। उनकी शैली मर्मस्पर्शी है।

समकालीन आत्मकथा साहित्य में दलित आत्मकथाओं का उल्लेखनीय योगदान है। ओमप्रकाश बाल्मीकि की जूठन’, मोहनदास नैमिशराय की अपने-अपने पिंजरेऔर कौशल्या बैसंत्री की दोहरा अभिशाप, तुलसीराम की मुर्दहियाऔर मणिकर्णिका’, श्यौराज सिंह बैचेनकी मेरा बचपन मेरे कंधों परआत्मकथाएँ इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण पहल है जो कहीं-न-कहीं इसके उज्जवल भविष्य की ओर इशारा करती है। दलित आत्मकथाओं के बारे में ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं, “किसी भी दलित द्वारा लिखी आत्मकथा सिर्फ उसकी जीवनगाथा नहीं होती, बल्कि उसके समाज की जीवनगाथा भी होती है। लेखक की आत्म अभिव्यक्ति होती है। उसके जीवन के दुःख, दर्द, अपमान, उपेक्षा, आत्मकथा उसकी जाति एवं समाज के दुःख-दर्द और अपमान-उपेक्षा इत्यादि को भी स्वर देता है।

वर्तमान समय में महिला रचनाकारों ने इस विधा को गहरे सामाजिक सरोकारों से जोड़ा है। इस संदर्भ में मैत्रेयी पुष्पा की कस्तूरी कुण्डल बसैका नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं| शिकंजे का दर्दसुशीला टाकभौरे की आत्मकथा नारी के शोषण के विरुद्ध संघर्ष की गाथा है।

 

Monday, 21 March 2022

भारतीय राजनीति में परिवारवाद लोकतंत्र के लिए विषबेल

हाल ही हुए विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा संसदीय दल की बैठक को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय राजनीति में परिवारवाद की प्रवृति पर प्रहार करते हुए कहा कि विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी के नेताओं के बेटे-बेटियों के टिकट उनके कहने पर ही काटे गए क्योंकि परिवारवाद भारतीय राजनीति को खोखला कर रहा है और इससे निपटने के लिए कहीं से तो शुरुआत करना ही होगा | यह बेशक सराहनीय कदम है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसकी शुरुआत अपनी ही पार्टी से करके अन्य दलों के लिए ऐसा करने के लिए मिसाल पेश की |

वैसे तो लोकतंत्र में परिवारवाद का कोई आधार नहीं होना चाहिए, लेकिन आज शायद ही कोई पार्टी हो, जहां परिवारवाद नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी इस तथ्य से पूरी तरह से अवगत है कि भारतीय जनता पार्टी भी इस परिवारवाद की बीमारी से अछूती नहीं रही हैं | कांग्रेस को ग्रैंड ओल्ड पार्टी के नाम से जाना जाता है और आजादी के बाद इस पार्टी में गांधी-नेहरू परिवार का खासा दबदबा है और 3 लोग प्रधानमंत्री बन चुके हैं| आजादी के तुरंत बाद शुरू हुई वंशवाद की यह अलोकतानात्रिक परंपरा अब काफी मजबूत रुप ले चुकी है। नेहरू द्वारा परिवारवाद के जिस रक्तबीज को भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में बो दिया गया था, वह बीज बढ़कर भारतीय राजनीति और लोकतंत्र को पूरी तरह से अपने शिकंजे में कसकर लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों में फैल चुका हैं। राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ राज्य और स्थानीय स्तर पर इसकी जड़े इतनी जम चुकी है कि देश का लोकतंत्र परिवारतंत्र नजर आता है। भारतीय जनता पार्टी समेत विपक्ष के कई दल कांग्रेस की आलोचना इसलिए करते रहे हैं कि इस पार्टी में गांधी-नेहरू परिवार के सदस्यों के आगे किसी अन्य नेता को महत्व नहीं दिया गया| विडंबना यह है कि एक समय जो नेता चाहे वे कांग्रेस के भीतर या बाहर कांग्रेस की परिवारवाद की राजनीति की आलोचना किया करते थे और इस मुद्दे पर कांग्रेस से विद्रोह अलग राह चुनी, वे भी आज उसी की राह पर चल रहे हैं। जब इनके पास सत्ता आयी तब ये खुद ही परिवारवाद को बढ़ावा देने और परिवारवाद पर आधारित राजनीतिक पार्टियां खड़ी करने में लग गये। वे यह देखने को तैयार नहीं कि परिवारवाद की राजनीति ने कांग्रेस को किस तरह पतन की राह पर धकेल दिया है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में जवाब देते हुए ऐसे नहीं कहा कि अगर कांग्रेस न होती तो लोकतंत्र परिवारवाद से मुक्त होता, बल्कि उनकी जेहन में कांग्रेस द्वारा बोया और पोषित किया गया परिवारवाद का रक्तबीज था| कांग्रेस पार्टी अभी भी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से आगे की नहीं सोच पा रही है| उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति और आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी, पंजाब में अकाली दल और हरियाणा में आईएनएलडी समेत ऐसे ढेरों राजनीतिक दल हैं जो प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह काम कर रहे हैं और पिता या मां के बाद बेटे-बेटी को ही पार्टी की जिम्मेदारी मिलती है|

भारतीय राजनीति में परिवारवाद का विरोध करने वाले सबसे कद्दावर राजनीतिज्ञ राम मनोहर लोहिया थे | उनका मानना था की राजनीति में वंशवाद नहीं होना चाहिए| जिसमे नेतृत्व की क्षमता हो वह आगे बढ कर राजनीति को थाम ले, साथ ही जनता के हित में काम करे ना कि अपने और अपने परिवार की वैशाखी को थामकर राजनीति में प्रवेश करने सुविधा का लाभ उठाये| लेकीन समाजवाद के पुरोधा डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचार को आज उनके चेले मानने को तैयार नहीं | लोहिया के सबसे करीबी चेलो में शुमार रहे और खाटी समाजवाद की कोख से कथित रूप से पैदा हुए मुलायम सिंह यादव ने लोहिया के समाजवाद की धज्जियाँ उडा दी| आज मुलायम सिंह यादव ने जनता को अपने समाजवाद का ऐसा चेहरा दिखाया है कि परिवारवाद को बढावा देने वालो में मुलायम के आगे कोई नहीं टिकता है |

इस परिवारवादी दलों के लिए सिर्फ राजनीति या सत्ता अहम हो गई है, विचारधारा के लिए शायद कोई जगह नहीं बची है| देश का विकास और सुरक्षा का इनके एजेंडे में नहीं होता है, बल्कि सत्ता की मलाई किसी भी तरह से परिवार के किसी न किसी सदस्य को मिले, इसका पुख्ता इंतजाम ही इनका प्रमुख उद्देश्य होता है | राजनीति इनके लिए वह पेशा है जिसे वह अपने पारिवारिक लोगो को हस्तानांतरित करते रहते हैं | सत्ता में रहे या न रहे, पार्षद से लेकर विधायक और सांसद की कुर्सी पर चिपके रहने का मोह अब हर उस छोटे-बड़े नेता को है चाहे वह किसी भी पार्टी में है | इस कारण अब एक ही परिवार के लोग दो अलग-अलग विचारधारा या विरोधी पार्टियों में शामिल होने लगे हैं, ताकि उन्हें टिकट मिल सके या कुर्सी बची रह सके |

इसका मतलब यह नहीं है कि एक परिवार में से एक से अधिक लोग राजनीति में नहीं आ सकते है | बेशक आ सकते है लेकिन योग्यता के आधार पर, जनता का विश्वास पाकर, उनके संघर्ष का साथी बनकर किसी परिवार से एक से अधिक लोग राजनीति में आ सकते है | इससे पार्टी परिवारवादी नहीं बन जाती है| इसके विपरीत जब कोई  पार्टी, पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही परिवार की जागीर बनी रहती है यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा संकट हैं|

राजनीति में परिवाद से लोकतंत्र को गंभीर खतरा पैदा हुआ है | सबसे पहले इन परिवारवादी दलों और नेताओं ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सामाजिक न्याय के नाम पर जातिवाद और कथित अल्पसंख्यक सुरक्षा के नाम पर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया| कुलमिलाकर इन परिवारवादी दलों और नेताओं ने अपराधीकरण, जातिवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचार का एक घातक मिश्रण तैयार किया, जिसके तले दशकों तक राज्यों का शोषण किया, दमन किया और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया| परिवारवादी राजनीति के कारण सबसे अधिक नुकसान जमीनी स्तर पर आम जनता से जुड़कर ईमानदारी से काम करने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं को होता है | उनका पार्टियों से मोहभंग होता है और समाज के अपराधिक तत्वों और चाटुकारों को अधिक महत्व मिलने लगता है | परिणाम यह होता है कि पार्टियाँ जनता के समस्याओं, उनके दुखों, उनकी भावनाओं से दूर हो जाती है | हाल के विधानसभा चुनाओं में जनता ने जनादेश दिया है, उससे साबित होता है कि परिवारवादी पार्टियों जनता से दूर पड़ती जा रही है | 

Thursday, 10 February 2022

राजनीति में महिलाएं और महिलाओं की राजनीति

 विश्व की आधी आबादी महिलाओं की है। कोई भी देश अपनी आधी जनसंख्या की कार्यकुशलता, प्रतिभा एवं दक्षता की उपेक्षा नहीं कर सकता। किसी भी देश की सर्वांगीण प्रगति के लिए उस देश की महिलाओं की भागीदारी आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है| राजनीति का संबंध प्रत्यक्ष रूप से शासन तथा समाज के प्रबंधन से होता है। नीतियों, कानूनों एवं राज्य के आदेशों के क्रियान्वयन के लिए राजनीतिक शक्ति अनिवार्य है। फिर भी विश्व भर में नीति-निर्माण प्रक्रिया एवं लोकतांत्रिक संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्त्व अत्यंत कम है | भारत ही नहीं बल्कि विश्व की आधी शक्ति एवं क्षमता होने के बावजूद राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका, उनकी कम भागीदारी तथा कमजोर स्थिति और सहभागिता पर प्रश्नचिन्ह यथावत लगा हुआ है। लोकतांत्रिक देशों में भारत एक ऐसा देश है जिसने आज़ादी प्राप्त करने के साथ ही महिलाओं को पुरुषों के समान मताधिकार और राजनीति में समान सहभागिता का अधिकार प्रदान किया। भारतीय संविधान सरकार के संचालन की प्रक्रिया में पुरुषों एवं स्त्रियों की समान राजनीतिक सहभागिता का प्रावधान करता है। आज़ादी के लगभग सात दशक के दौरान  जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सरकार एवं नागरिक समाज द्वारा असंख्य प्रयास किए गए। जिसका प्रभाव यह हुआ कि लगभग सभी राज्यों में न सिर्फ महिलाओं के मतदान का प्रतिशत बढ़ा है बल्कि महत्वपूर्ण बात यह कि कई राज्यों में मतदान के हिसाब से महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है| चुनावी राजनीति में महिलाएं अधिक सक्रिय दिखाई दे रही है| वर्तमान समय में भी महिलाएं केन्द्रीय मंत्री, राज्य मंत्री, मुख्यमंत्री, महापौर और सांसद के पद पर आसीन हैं| ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतों में भी महिलाएं विभिन्न पदों पर आसीन हैं|फिर भी पिछले 70 वर्षों के इतिहास में समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीति एवं शिक्षा के क्षेत्र में बढती भागीदारी के बावजूद उन्हें जनसंख्या के हिसाब से पर्याप्त प्रतिनिधित्त्व हासिल नहीं हो पाया है | वैधानिक क्षेत्र और राष्ट्रीय नीति के निर्माण में एकाध अपवादों को छोड़कर उनका प्रतिनिधित्त्व और योगदान तो और भी नगण्य रहा है | लोकसभा और मंत्रिमंडल जैसे फ़ैसले लेने वाली जगहों में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व सीधे-सीधे राजनीतिक ढांचे से उनको सुनियोजित ढंग से बाहर रखने और मूलभूत लैंगिक भेदभाव को रेखांकित करता है| लोकसभा में 10 में से नौ सांसद पुरुष हैं| 1952 में लोकसभा में महिलाओं की संख्या 4.4% थी जो 2014 में क़रीब 11% है| लेकिन यह अब भी वैश्विक औसत 20% से कम है| सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि लोकतान्त्रिक विकास की दृष्टि से भारत की तुलना में पिछड़े पड़ोसी देशों के संसद में महिलाओं की भागीदारी अधिक है| पाकिस्तान में महिलाओं की भागीदारी तकरीबन 21 फीसदी है तो अफगानिस्तान में 28 फीसदी, नेपाल में 30 फीसदी और बांग्लादेश में 20 फीसदी है|

 वर्तमान समय में भारत में महिलाओं के राजनीतिक विकास में अनेक बाधायें हैं| आज का प्रदूषित राजनीतिक वातावरण महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश को हतोत्साहित करता है | महिलाओं में संकोच, भारतीय समाज का पितृसत्तात्मक ढांचा, महिलाओं की आर्थिक पराधीनता, महिलाओं में असुरक्षा का भय, राजनीतिक दलों में सत्ता लोलुपता की प्रवृत्ति, खर्चीली चुनाव प्रणाली, यौन शोषण, लैंगिक पक्षपात, चरित्र हनन का भय, पारिवारिक प्रतिबंध के साथ महिला स्वास्थ्य और पर्याप्त साक्षरता का अभाव, ऐसे असंख्य घरेलू एंव सार्वजनिक कारक महिलाओं के राजनीतिक विकास में प्रमुख बाधायें हैं| विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी की जाने वाली वार्षिक ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के मुताबिक 144 देशों की सूची में भारत का 87 वां स्थान है| इसमें महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी का आंकलन किया जाता है| इसका सीधा एवं साफ संकेत यह है कि संसदीय राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की हिस्सेदारी का कम होना महज महिलाओं से जुड़ा हुआ मसला नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक मुद्दा है | संयुक्त राष्ट्र महिला तथा सेंटर फॉर सोशल रिसर्च (सीएसआर) द्वारा राजनीति में महिलाओं के खिलाफ हिंसापर किए गए अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया के देशों भारत, नेपाल और पाकिस्तान में पाया गया है कि 60 प्रतिशत से अधिक महिलाएँ हिंसा के डर से राजनीति में भाग नहीं लेती वहीं लगभग 90 प्रतिशत महिलाएँ हिंसा को उनके राजनीति में शामिल होने के संकल्प को तोड़ती हैं| भारत के संदर्भ में महिलाएँ शारीरिक हिंसा, मौखिक और हिंसा की धमकी से ग्रस्त हैं, जैसा की भारत में महिला उम्मीदवारों में से 45 प्रतिशत शारीरिक हिंसा एवं धमकी का सामना करते हैं| विधियों का अपर्याप्त कार्यान्वयन,  पुलिस और न्यायपालिका से समर्थन की कमी,  राजनीति के बारे में कम जागरूकता और नैतिक मूल्यों में समग्र गिरावट राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को बाधित करता है |

 भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने के कारणों में एक भारतीय समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे का होना है| यह न सिर्फ़ महिलाओं को राजनीति में आने से हतोत्साहित करता है बल्कि राजनीति में महिलाओं के प्रवेश में अवरोध का काम करता है| पितृसत्तात्मक ढांचे को कतिपय हिन्दू धर्मशास्त्र यह कहकर स्थापित करते है कि धर्मानुसार स्त्री को बाल्यावस्था में पिता के संरक्षण में, युवावस्था में पति के संरक्षण में और पति के देहांत हो जाने के बाद पुत्रों के अधीन रहना चाहिए। भारत में नारी को जन्म लेते ही सिखा दिया जाता है की वो किसी और घर की है, किसी और की अमानत है। शायद इसी सोच के कारण आजादी मिलने के 70 वर्षों तक महिलाओं की संख्या राजनीति अपेक्षाकृत काफी कम रही है। पितृसत्तात्मक ढांचे के कारण राजनीति में महिलाओ की भागीदारी को लेकर समाज का नजरिया न तो सकारात्मक है और न ही राजनीतिक दल अपने तमाम प्रगतिशील और लोकतान्त्रिक नारों और दावों के बीच भेदभावपूर्ण मानसिकता से ऊपर उठ पाए है | जिस तरह की परेशानी महिलाओं को आम जीवन में झेलनी पड़ती है ठीक वैसा ही राजनीतिक दलों में होता है| पुरुषों के दबदबे वाले इन राजनीतिक दलों की कार्य संस्कृति में साफ नजर आता है कि महिलाओं के लिए स्थिति सहज नहीं है| तात्पर्य यह है कि महिलाओं के लिए लोकतंत्र के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा हमारी संस्कृति ही रही है| फिर भी राजनीतिक दलों के भेदभावपूर्ण रवैये के बावजूद मतदाता के रूप में महिलाओ की भागीदारी नब्बे के दशक के अंत से उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है| फिर भी राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है| पार्टियों को महिला मतदाताओं की याद सिर्फ चुनाव के दौरान ही आती है और उनके घोषणापत्रों में किए गए वादे शायद ही कभी पूरे होते हैं|  महिलाओं के सशक्तीकरण तथा बराबरी की बात करनेवाले दलों की असलियत टिकट वितरण के समय सामने आ जाती है | चुनावों में महिलाओं को टिकट न देने की नीति का मुख्य कारण उनमें 'जीतने की क्षमता' कम होना माना जाता है, जो चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण है| जिन्हें टिकट मिलता है, वे भी ज्यादातर राजनीतिक पारिवारों से आती हैं, उनके पीछे पिता या पति का हाथ होता है| कुछ राजनेताओं ने मजबूरी में अपनी पत्नी या बेटी को राजनीति में उतारा। किसी महिला को किसी नेता की मृत्यु के बाद सहानुभूति वोट के लिए टिकट दिया गया। कुछ महिला सिलेब्रिटीज को उसका ग्लैमर भुनाने के लिए राजनीति के मैदान में लाया गया । कुल मिलाकर वंशवाद और वोट की राजनीति के हिसाब से महिलाओं को बढ़ावा मिला, किसी सरोकार के तहत नहीं। इससे जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर कार्य करने वाली महिला कार्यकर्ता स्वयं को तिरष्कृत मानने लगते है | आज भी ज्यादातर राजनीतिक दल सिर्फ एक रस्म अदायगी के तहत महिलाओं के मुद्दों पर बात करते हैं। इसका कारण यह है कि भारतीय समाज में औरतों की कोई स्वतंत्र आवाज नहीं बन पाई है। राष्ट्रीय पार्टियों के साथ-साथ क्षेत्रीय पार्टियां भी महिला उम्मीदवारों को खड़ा करने से कतराती हैं। राज्यसभा में तो विधान सभा सदस्य वोट डालते हैं फिर राजनीतिक दल महिलाओं को राज्यसभा चुनाव में खड़ा करते हैं| सच्चाई यह है कि राजनीतिक दल महिलाओं को राजनीति में आगे बढाने की बात तो करते हैं लेकिन उनकी इच्छाशक्ति नहीं है। साथ ही, वे पुरुष प्रधान समाज की भूमिका को कम होने देना नहीं चाहते हैं। कई राजनीतिक दलों के नेता सोचते हैं कि महिलाओं को टिकट देने से यदि वे निर्वाचित होंगी तो पुरुषों का राजनीति से सफाया हो जाएगा। राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर दूसरी चुनौती यह है कि अगर कोई महिला अपने राजनीतिक कौशल के कारण किसी पार्टी के अंदरूनी ढांचे में उपस्थित दर्ज करवाने में कामयाब भी होती हैं तो उसे नेतृत्व के दूसरे दर्जे पर धकेल दिया गया है | वह राजनीतिक दलों में नीति और रणनीति के स्तर पर बमुश्किल ही कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और अक्सर उन्हें महिला एवं बालविकास जैसे मुद्दों पर निगाह रखने का काम दे दिया जाता है, जिससे कि चुनावों में पार्टी को फ़ायदा मिल सके | श्रमिकों, कामगारों, व्यापारियों, सरकारी सेवकों एवं आम जनता के हितों एवं आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्त्व करने एवं उनकी सहमति हासिल करने के संबंध में महिलाओं को असमर्थ समझा जाता है। आज भले ही राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाये जाने पर जोर दिया जाता है लेकिन इन राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है| हालाँकि इस तर्क को स्व. जयललिता, ममता बनर्जी, वसुंधराराजे सिंधिया, महबूबा मुफ़्ती, सुषमा स्वराज, उमा भारती, सुमित्रा महाजन, गिरजा व्यास, मेनका गांधी, मारग्रेट अल्वा और मायावती जैसी राजनीतिक हस्तियों ने अपने करिश्माई व्यक्तित्व और राजनीतिक कौशल के बल पर बेमानी सिद्ध किया है और न चुनावों में न केवल स्वयं को अपराजेय सिद्ध किया है बल्कि कुछ ने अपने-अपने दलों को भारी बहुमत से जीतकर सरकारें भी बनायीं हैं | इन महिलाओं ने यह भी सिद्ध किया है कि सत्तारूढ़ महिलाएँ स्वयं को केवल स्त्री संबंधी विषयों तक ही परिसीमित नहीं करतीं। वे राज्य और समाज के व्यापक मुद्दों का सफलतापूर्वक निर्वहन कर सकती है | यही नहीं भारत के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की सफलता की दर भी पिछले तीन चुनावों में बेहतर रही है| 2014 के आम चुनावों में महिलाओं की सफलता 9% रही है जो पुरुषों की 6% के मुक़ाबले 3% ज़्यादा है| यह आंकड़ा राजनीतिक दलों के जिताऊ उम्मीदवार के आधार पर ज़्यादा टिकट देने के तर्क को ख़ारिज कर देता है और साथ ही महिला उम्मीदवार न मिलने की बात को निराधार ठहराता है| भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लगभग 16 वर्षीय प्रधानमंत्रित्व काल से ही यह सिद्ध हो चुका है कि भारत में राजनीतिक स्वतंत्रता संविधान के अक्षरों के रूप में ही नहीं अपितु वास्तविक रूप में क्रियान्वित है। श्रीमती प्रतिभा पाटिल भारत के राष्ट्रपति पद को भी सुशोभित कर चुकी हैं। भारतीय संसद में वर्तमान लोकसभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन के अतिरिक्त मीरा कुमार भी इस पद को सुशोभित कर चुकी हैं। भारतीय राज्यों में 1947 से आज तक लगभग 23 महिलाएं राज्यपाल पद को भी सुशोभित कर चुकी हैं। सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला और भारत के किसी राज्य की पहली महिला राज्यपाल थीं|  

 

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को निर्धारित करने वाला एक प्रमुख कारक उनमें साक्षरता का अभाव है | साक्षरता की समस्या कम से कम भारत जैसे विकासशील देशों में महिलाओं की भागीदारी को हतोत्साहित करने में अहम भूमिका रही है | संवैधानिक प्रावधानों के द्वारा महिलाओं को राजनीतिक अधिकार दिए जाने के बावजूद उन अधिकारों के प्रयोग और निर्णय क्षमता को लेकर महिलाएं पुरुषों पर आश्रित है | भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त विभिन्न अधिकारों तथा अधिनियमों के फलस्वरूप यद्यपि महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता उत्पन्न हुई है। 73 वे संविधानिक संशोधन के माध्यम से देशभर में पंचायत स्तर पर निर्वाचन प्रक्रिया में 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित किये जाने के बाद महिलाओं का एक बड़ा तबका राजनीति में आया है। फिर भी ग्रामीण परिवेश की अधिकांश महिलाएँ अत्यधिक पिछड़ी हुर्इ एवं निरक्षर होने के कारण सरकार के निर्वाचन में निर्णय लेने के लिए असमर्थ हैं। वे अपने चयन का निर्णय अपने परिवार के पुरुष सदस्यों जैसे कि पति अथवा पुत्रों, पिता या भाइयों की सहमति से करती हैं। पंचायतों में महिलाएं चुन कर तो आ जाती हैं लेकिन जब निर्णय लेने की बात आती है तब उनके पुरुष सहयोगी या परिवार वाले ज्यादातर हस्तक्षेप करते हैं या बहुत से जगहों पर तो महिला सिर्फ नाम की प्रधान होती है बाकी सारे काम तो उसके पति ही करते हैं | यहां तक की कागजों पर हस्ताक्षर भी वही करते हैं और उसको समाज मान्यता भी दे देता है। अभी उनका वास्तविक सशक्तिकरण नहीं हुआ है। महिलाओं में राजनीतिक सशक्तीकरण का अभाव उन्हें देश के राजनीतिक मामलों में निर्णायक भूमिका निभाने में असमर्थ बना देती हैं।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार हर देश में लगभग आधी आबादी के बावजूद कानूनन देश की कुल संपत्ति पर उनका अधिकार महज एक-तिहाई है जबकि वे दो-तिहाई काम करती हैं | भारत जैसे विकासशील देशों में महिलाओ की आर्थिक पर निर्भरता और भी खतरनाक स्तर पर है | ऐसी स्थिति में राजनीति की मौजूदा खर्चीली प्रणाली में महिलाओं का पांव जमाना तो दूर, प्रवेश करना भी दुष्कर है | भारत जैसे विकासशील देशों में महिलाओं के चुनाव प्रचार के लिए अलग से राजनीतिक कोष जैसे प्रावधान की कल्पना करना भी बेमानी है | अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों में राजनीतिक महिलाओं के लिए अलग से फंड एकत्र किया जाता है | भारत में महिलाएं धार्मिक संस्थानों को दिल खोलकर दान दे सकती हैं लेकिन राजनीति में भाग ले रही या चुनाव लड़ रही किसी महिला उम्मीदवार की आर्थिक मदद करने की जरुरत महसूस नहीं करती |

 आरक्षण किसी समस्या का अंतिम समाधान नहीं है। आरक्षण का अर्थ यह हुआ कि संसद या विधायी प्रक्रिया में चुनी हुई महिलाओं की संख्या को निर्धारित कर देना। यह राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को सीमित कर देगा| राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करना आरक्षण का मसला नहीं है | यह समाज की सोच और उसकी मानसिकता का मुद्दा है | समाज को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा और वो एक दो दिन की प्रक्रिया नहीं है उसमे समय लगेगा। यह आधी दुनिया के प्रति समानता और सम्मान की भावना का मुद्दा है | महिलाओं मे यह आत्मविश्वास जगाना होगा कि वो बिना किसी पारिवारिक मर्यादा को हताहत किये अपनी राजनीतिक और सामाजिक भूमिका का निर्वहन कर सकती हैं। वर्तमान समय में भी बहुत सी महिलाएं राजनीति में हैं फिर भी करोड़ो महिलाएं आज भी काफी कमजोर हैं। आरक्षण के माध्यम से हम कितनी महिलाओं को राजनीति में लायेंगे। कुछ महिलाओं को लायेंगे। बाकी असंख्य का क्या होगाक्या एक तिहाई महिलाओं के राजनीति में आ जाने से राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पूरी हो जाएगी, क्या महिलाओं का सशक्तिकरण संभव हो पायेगा ?  वास्तव में हम आरक्षण का नारा उछालकर महिला विकास, महिला सशक्तिकरण, महिला उन्नयन से पल्ला झाड़ लेते हैंजरूरत पूरे परिवेश को सुधारने की है जिसमें हर महिला सशक्त हो, शिक्षित हो। भारतीय समाज में महिलाओं में राजनीतिक विकास जागृत कर उन्हें पुरूषों के समान स्तर पर लाने के लिए भारतीय समाज एवं प्रशासन दोनेां को ही समान रूप से सहयोग करना होगा। ऐसा परिवेश बनाने की कोशिश करनी चाहिए की महिला में यह आत्मविश्वास आयें कि वो जो चाहे वो करे। राजनीति में पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं की समान भागीदारी की जो बात हम करते हैं वो सिर्फ आरक्षण से नहीं आएगी।

 संयुक्त राष्ट्र महिला तथा सेंटर फॉर सोशल रिसर्च (सीएसआर) ने अपने अध्ययन में निम्न प्रत्येक स्तर पर तत्काल कार्यवाही करने की संस्तुति करता हैं जिनमें

a)    विधि निर्माण

b)    राजनीतिक दल

c)    कानून को लागू करने वाली एजेंसी

d)    कानून को प्रभावित एजेंसी शामिल है |

अध्ययन में राजनीतिक दलों की सभी समितियों में अधिक महिला सदस्यों को शामिल करने का सुझाव भी दिया गया है| चुनाव आयोग को महिलाओं को पहचान, सुरक्षा, बढ़ावा देने एवं महिलाओं की भागीदारी को संस्थागत रूप देने के लिए कदम उठाने की जरूरत हैं| कानून का सख्ती से कार्यान्वयन, पुलिस और न्यायपालिका द्वारा तेजी से कार्यवाही करने और न्याय दिलाने पर जोर दिया गया है |

 महिलाओं के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर कर उन्हें राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी निभाने के लिए प्रेरित एवं प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। विधायी निकायों में महिलाओं के लिए सकारात्मक दिशा में काम किया जाना वक्त की ज़रूरत है| इसके लिए महिलाओं की चुनावी प्रक्रिया में बाधक बनने वाली चीज़ों को दूर किए जाने की ज़रूरत है और चुनावी राजनीति में मौजूदा दूरियों को पाटने की आवश्यकता है| यही नहीं, समाज में महिलाओं पर हो रहे अत्याचार को खत्म करने के लिए महिलाओं को राजनीति में आना चाहिए। राजनीति में आने के बाद वे महिलाओं पर हो रहे कुरीतियों को दूर करने का काम कर सकती हैं। यह आवश्यक नहीं कि सम्पूर्ण महिला समाज ही राजनीति के मैदान में उतर पड़े और सत्ता सुख का उपयोग करें। वे सजग प्रहरी की भाँति राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश कर महिला समाज के अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ देश और समाज के विकास में पुरूषों के बराबर अपना यथाशक्ति योगदान कर सकें। वस्तुतः आवश्यकता इस बात की है कि महिलाओं को पुरूषों के समान स्थान और सम्मान दिया जाये। भारतीय राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की बढती भागीदारी का ही परिणाम है कि महिलाओं के लिए वर्जित धर्म और समाज के कुछ प्रतिष्ठानों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर व्यापक आन्दोलन होने लगे हैं|  महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों के साथ ही मुंबई के हाजी अली दरगाह पर हाल ही में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के संबंध में न्याय प्रक्रिया ने कड़ा रुख अपनाते हुए महिलाओं को बराबरी का मूल अधिकार प्रदान किया है।

 

Thursday, 30 January 2020

वसंत पंचमी......... अवरुद्ध मानसिकता को खोलने का उत्सव


वसंत पंचमी नाम सुनते ही पर सबसे पहले वर दे वीणा वादिनी पंक्ति स्मृति में कौंधती है। हमारे स्कूली दिनों में स्कूलों में धूमधाम से बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा होती थी, जिसकी तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थी | पूजा के बाद बेर, गाजर और लड्डू के प्रसाद का वितरण किया जाता था| आज भी पूजा होती होगी| लेकिन जबसे प्राइवेट स्कूलों का जोर पकड़ा, दिल्ली जैसे बड़े नगरों को तो छोड़ ही दीजिए, छोटे शहरों में भी सरस्वती पूजा कम होती गई | लेकिन ये सभी स्कूल महिना दिन पहले से क्रिसमस ट्री लगाना और सजावट शुरू कर देते है | वजह मात्र इनके संचालकों की कुत्सित और मैकाले मानसिकता है जो यह मानकर चलती है कि क्रिसमस मानाना आधुनिकता है, प्रगतिशीलता है, धर्मनिरपेक्षता है और सरस्वती पूजा करना पोंगापंथिता, कट्टरता और साम्प्रदायिकता है | ऐसे स्कूलों से हम किस तरह से यह अपेक्षा कर सकते है कि देश की सभ्यता, संस्कृति, धर्म दर्शन और इतिहास से बच्चों को अवगत कराते होंगे |
माँ सरस्वती के अनन्य उपासक सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने जब 'वर दे वीणा-वादिनी वर दे' की रचना की थी तब देश गुलाम था । निराला महज अज्ञान अंधकार से मुक्ति को लेकर चिंतित नहीं थे बल्कि वे तत्कालीन मनुष्य की चेतना को, उसकी चिंतन शक्ति को या आत्मा को ग्रसित करने वाली गुलामी से मुक्ति भी चाहते थे | इसलिए उन्होंने अपनी वंदना में ज्ञान रूपी आलोक पूरे देश में फ़ैलाने के साथ ही पूरे विश्व को जगमग करने की आकांक्षा रखते है | वे माँ सरस्वती से स्वयं के लिए ज्ञान के वरदान की कामना नहीं करते है बल्कि वे पूरे देश में स्वतंत्रता के अमृत मंत्र को गुंजित होने का वरदान मांगते है | वे जानते थे कि स्वतंत्रता रूपी अमृत मंत्र तभी गुंजायमान हो सकता है जब अज्ञान रूपी अंधकार, क्लेश और भेदभाव के बंधन समाप्त हो जाय | यह "तमसो मा ज्योतिर्गमय" अर्थात् 'अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की कामना' है| मनुष्य की महायात्रा महज भौतिक अंधकार को दूर करने की यात्रा नहीं है, यह मनुष्य की विषमताओं से जूझने की दृढ़ इच्छा शक्ति और अदम्य जिजीविषा का भी परिचायक है | इस तरह देश को पराधीनता से मुक्त कराने के लिए शक्ति की मौलिक कल्पना करने वाले निराला माँ सरस्वती से नयी गति, नयी वाणी, नया स्वर और नया आकाश देने की कामना करते है ताकि देश एक नयी ऊर्जा के साथ सृजन और विश्व कल्याण के पथ पर अग्रसर हो सके| आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि जिसे अपने देश से प्रेम है, उसे देश की प्रकृति और संस्कृति से भी प्रेम होगा | अन्यथा देश प्रेम महज दिखावटी होगा या आज के परिप्रेक्ष्य में कहें तो संविधान और तिरंगे की आड़ में किसी अन्य मंशा से प्रेरित होगा | निराला को अपने देश से प्रेम था इसलिए वे सरस्वती को धार्मिक और पौराणिक प्रतीकों से निकालकर पूरे देश में प्रतिष्ठित करते हैं| आज जब छायावादी आन्दोलन के प्रारंभ होने के 100 वर्ष बाद देश पर बाहरी और भीतरी विध्वंशक शक्तियों द्वारा आघात किया जा रहा है, देश को टुकड़े-टुकड़े करने के षड्यंत्र रचे जा रहे है, वसंतपंचमी के अवसर पर हम 'वर दे वीणा-वादिनी वर दे' के आह्वान द्वारा कुपढों, कुपाठियों और कुमार्गियों को सांस्कृतिक चेतना के साथ साथ भारतीयता की अनन्य चेतना से जोड़ने की उम्मीद कर सकते है |
ऋग्वैदिक काल में सरस्वती एक नदी के रूप में प्रवाहमान थी | तत्कालीन आर्य-सभ्यता के सारे गढ़ और नगर, शिक्षण संस्थाएं, ऋषियों की तपोभूमि और आश्रम सरस्वती नदी के तट पर बसे थे। वेदों और उपनिषदों की रचना इन्हीं आश्रमों में हुई थी। कालान्तर में ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों ने सरस्वती नदी को देवी का दर्जा दिया और तभी से सरस्वती सृजनात्मकता की प्रतीक हैं। ऋग्वेद में सरस्वती के प्रति श्रद्धा में कहा गया है कि ये परम चेतना हैं, ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। वसंतपंचमी के दिन सरस्वती की अर्चना वस्तुतः आर्य सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र में सरस्वती नदी की भूमिका के प्रति हमारी कृतज्ञता की भी अभिव्यक्ति है और हमारी अवरुद्ध मानसिकता के द्वारों को खोलने का उत्सव है।
भारत की सनातन परंपरा में किसी भी पर्व, त्यौहार या उत्सव का प्रकृति से अनन्य रूप से जुड़ा है | आज की जरूरतों के हिसाब से कहें तो सनातन परम्परा में पर्यावरण संरक्षण का एक दीर्घकालिक और प्रभावी प्रबंध किए गए हैं | समस्त भारतीय समाज आदिकाल से भी प्रकृति के साथ रस-भाव या सम-भाव से सराबोर रहा है | वसन्त पंचमी का उत्सव भी प्रकृति से जुड़ा हुआ है | वसंत को ऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है क्योंकि इस समय ठण्ड का मौसम उतार पर होता है और गर्मी का मौसम अभी शुरू नहीं हुआ होता है | इस कारण ऐसा माना जाता है कि पंचतत्त्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं। पंचतत्त्व-जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपने मोहक रूप में होते हैं। यह अनायास नहीं है कि कवियों और कलाकारों को वसन्त ऋतु सहज ही आकर्षित करती है | केदार नाथ अग्रवाल की कविता बसंती हवाएक साथ महुआ और आम से लेकर अरहर, अलसी और सरसों की फसलों के मिले-जुले नैसर्गिक सौन्दर्य को अभिव्यक्त करती है| इसलिए पंचमी में वसंत पंचमी को सर्वश्रेष्ठ पंचमी माना जाता है और इसे श्री पंचमी भी कहा जाता है | यह उस विदेशी संस्कृति से बिल्कुल अलग है जिसमें वलेन्टाइन डे से लेकर बर्थ डे, वाथ डे तक  न जाने क्या क्या डे मनाया जाता है जहाँ प्रकृति के सरंक्षण के बजाय उसका उपभोग और दोहन होता है जबकि भारतीय सनातन परंपरा में मनुष्य और पर्यावरण में उपभोक्ता और उपभोग का संबंध नहीं है |

Friday, 24 January 2020

जेपी नड्डा की चुनौतियाँ........पार्टी के जोश को हाई रखना


भाजपा ने अपने संगठनात्मक चुनाव में जेपी नड्डा को निर्विरोध अध्यक्ष चुनकर पार्टी के भीतर न केवल लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्दता का स्पष्ट सन्देश दे दिया है बल्कि कम से कम अपनी उस धारणा को भी प्रदर्शित भी किया है कि वह उन राजनीतिक दलों जैसे नहीं है जिसकी नाभिनाल या तो परिवारवाद है या जहाँ परिवार की गुलामी की संस्कृति पार्टी का संविधान है | यह भारतीय राजनीति की विडंबना ही है कि जहां एक ओर देश की सबसे पुरानी पार्टी परिवारवाद से इस कदर चिपकी हुई है कि परिवार से इतर बुजुर्ग नेता सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से हटाने के लिए पार्टी कार्यालय से फेंकवाने में संकोच नहीं करती है तो नरसिम्हा राव जैसे कद्दावर नेता, पूर्व अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के शव को कार्यकर्ताओं के अंतिम दर्शन के पार्टी कार्यालय में रखे जाने से भी रोक दिया जाता है वही दूसरी ओर भाजपा पार्टी के एक आम कार्यकर्ता भी अध्यक्ष पद पर विधिवत ताजपोशी कर रही है | एक ओर पिछले दो दशक में जहां भाजपा में लगभग दस ऐसे लोगों ने अध्यक्ष पद की कमान संभाली कभी पार्टी के आम कार्यकर्ता थे, वहीं कांग्रेस पार्टी एक परिवार के अलावा अन्य किसी को इस लायक नहीं समझ सकी कि उसे पार्टी की कमान सौंपी जा सके। इस तरह पार्टी के भीतर वंशवाद और लोकतंत्र के विमर्श या संघर्ष में भाजपा देश की सबसे पुरानी पार्टी के ऊपर अपनी लोकतान्त्रिकता को स्थापित किया है | क्षेत्रीय दलों की तो भाजपा से तुलना ही नहीं की जा सकती है क्योंकि उनका तो जन्म ही परिवारवाद की कोख से हुआ है जिनसे लोकतांत्रिक तौर-तरीकों के पालन की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है |

पार्टी की यही लोकतांत्रिकता नए अध्यक्ष जेपी नड्डा की सबसे बड़ी चुनौती है | भले ही पार्टी ने शीर्ष पदों पर वंशवाद को हावी नहीं होने दिया है, लेकिन पार्टी नेताओं के पारिवारिक सदस्यों की पहुँच से परे बिल्कुल नहीं है | पार्टी में पारिवारिक सदस्यों का स्थान लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के तहत तय करना होगा | 

भाजपा अध्यक्ष के सामने दो व्यापक चुनौतियां हैं-उतराधिकार में प्राप्त संगठनात्मक मजबूती को बरकरार रखना और आगामी चुनावों के संगठन एवं कार्यकर्ताओं के बीच जोश को बनाए रखना |  अमित शाह ने अपने साढ़े पांच कार्यकाल में दोनों जिम्मेदारियों को केवल बखूबी निभाया | जेपी नड्डा को भी इस सिलसिले को कायम रखना होगा| इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उम्मीदों पर खरा उतरने की अतिरिक्त चुनौती है और यह तभी कायम हो सकता है कि जब आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा उल्लेखनीय सफलता हासिल करेगी | उनके कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद से हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी को अभी तक निराशा ही हाथ लगी लेकिन उन्होंने संगठनात्मक मजबूती और कार्यकर्ताओं के जोश को कमजोर होने नहीं दिया है और इसी का इनाम उन्हें मिला है |
नड्डा के लिए तात्कालिक चुनौती भाजपा को दिल्ली में सत्ता में वापस लाना है, जहाँ वह पिछली बार 1998 में सरकार में थी। भाजपा को दिल्ली के मुख्यमंत्री आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल की सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। केजरीवाल सरकार को अपनी लोकलुभावन नीतियों पर भरोसा है, जिससे भाजपा को पार पाना असंभव तो नहीं, लेकिन मुश्किल अवश्य हो रहा है। दिल्ली में भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद के लिए अभी तक कोई सशक्त चेहरा नहीं है|
लेकिन जेपी नड्डा की असली अग्निपरीक्षा इस साल के अंत में बिहार विधानसभा चुनाव में होगी, जहाँ से उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत पटना विश्वविद्यालय में एक छात्र नेता के रूप में की थी| बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू अध्यक्ष, चतुर राजनेता नीतीश कुमार बिहार में एक वरिष्ठ की भूमिका का दावा छोड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे | नड्डा के सामने नीतीश कुमार के साथ ही लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के साथ अपने मोलभाव के कौशल का इस्तेमाल करते हुए बिहार में भाजपा के आधार को आक्रामक तरीके से बढ़ाना एक अहम चुनौती है |
2021 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के किले को तोड़ना नड्डा के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक पश्चिम बंगाल चुनाव को भाजपा के लिए अंतिम मोर्चा कहते हैं | इसके साथ उसी वर्ष असम में सत्ता विरोधी लहर को मात देने का कठिन कार्य भी होगा। पिछले साल दिसंबर में संसद द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पारित किए जाने के बाद से असम विरोध प्रदर्शन की चपेट में है। नड्डा के पास उन सभी राज्यों में पार्टी के कैडरों को पुनर्जीवित करने का एक कठिन कार्य है, और यह सुनिश्चित भी करना है कि पार्टी उन राज्यों में सत्ता नहीं खोये जहां वह सरकार चला रही है।
इस प्रक्रिया में दूरगामी दृष्टिकोण रखते हुए सहयोगी दलों के बीच भरोसा बनाए रखना भी होगा | भाजपा नेतृत्व द्वारा सहयोगी दलों को साथ लेकर चलने की बात बार-बार दोहराए जाने के बावजूद भाजपा के "बड़े भाई दृष्टिकोण" से सहयोगी अधिक असहज हो गए हैं। हाल ही महाराष्ट्र में शिवसेना के अलग होने बीजेपी को तगड़ा झटका लगा है जिसकी भरपायी भाजपा ने पहले की है लेकिन अब उसे नए सिरे से करना है | भाजपा ने पुराने सहयोगी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) के बिना अकेले ही झारखंड विधानसभा चुनाव लड़ा। जिससे भयानक हार का सामना करना पड़ा।
नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद लंबे समय से गठबंधन के सहयोगी, जेडीयू और शिरोमणि अकाली दल भाजपा के साथ असहज महसूस कर रहे हैं। कई सहयोगियों ने खुले तौर पर भाजपा के प्रमुख प्रोजेक्ट, पैन-इंडिया नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) के प्रति असहमति व्यक्त कि है| भाजपा अध्यक्ष होने के नाते एनआरसी को लेकर सहयोगी दलों की आशंकाओं को दूर करना और उन्हें साथ बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है | खासकर तब जब विपक्षी खेमा राज्य-विशेष स्तर पर भाजपा-विरोधी (मोदी विरोधी पढ़ें) गठबंधन को एकजुट करने की कोशिश कर रहा है।
अमित शाह ने अपने साढ़े पांच वर्षों के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी के लोकप्रिय व्यक्तित्व को बरकरार रखा | सरकार और उसकी योजनाओं के साथ पार्टी का तालमेल स्थापित करते हुए 2019 के लोकसभा चुनाव में 303 से अधिक सीटो पर जीत दर्ज करने में अहम भूमिका निभायी थी | 2019 से पहले कई राज्यों में जहां भाजपा ने विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था वहाँ भी लोकसभा चुनाव में पार्टी को 50 प्रतिशत से अधिक वोट मिले। इसमें कोई संशय नहीं कि नड्डा ने 2014 और 2019 के संसदीय चुनावों में रणनीतिकार के रूप में अपनी भूमिका निभाई थी लेकिन अब नड्डा स्वयं सूत्रधार की भूमिका में हैं | इसलिए, नड्डा की सबसे बड़ी चुनौती मोदी लहर को बरकरार रखना है।