Thursday, 3 November 2016

मध्ययुगीन संत काव्य और सार्वभौमिक मानव मूल्य



मध्ययुगीन संत काव्य तत्कालीन सामंतवादी और रुढ़िवादी परिवेश में मानवतावादी चेतना की प्रखर अभिव्यक्ति है। यह उस सांस्कृतिक जागरण की सशक्त अभिव्यक्ति हैजो गहरे मानवीय सरोकारों से उपजी है औरसार्वभौमिक मानव मूल्यों को प्रतिष्ठापित करता है|सार्वभौमिक मूल्य से तात्पर्य उन मूल्यों से है जिनकी प्रासंगिकता प्रत्येक भौगोलिक परिवेश और अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के कालखंड में भी है| लेकिन यहाँ प्रासंगिकता से मतलब मात्र इतना नहीं है कि वह मूल्य वर्तमान या परिवेश विशेष की परिस्थितियों के अनुकूल होया हमारे विचारों को समर्थन करता हो, बल्कि प्रासंगिकता तब भी होती है जब वह मूल्य वर्तमान या परिवेश विशेष की परिस्थितियों को चुनौती भी देता है और उन्हें नवीन सन्दर्भों में परिष्कृत भी करता है|
मध्ययुगीन संत काव्य में सार्वभौमिक मानव मूल्यों कीअभिव्यक्ति निम्न रूपों में हुई है:-
  •  मानव प्रेम के रूप में,
  • लोकधर्म के रूप में,
  • मानव कल्याण के रूप में,
  • सामाजिक विषमता और धार्मिक आडम्बरों के खंडन के रूप मे,
  • अखंड प्राकृतिक सत्ता के प्रति गहरे लगाव के रूप में |

महान और कालजयी कविता वही होती है जहाँ मनुष्य, उसके अस्तित्व और अस्मिता के समक्ष संकट और मानवता के अपमान करने वाले तत्वों के समक्ष प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है | यही नहीं महान कविता मानवीय एकता और सामाजिक समरसता और समन्वयता की भावना को विस्तार देती हैलोक जागरण की पक्षधरता के स्वर को मुखर करती है| इसमें कोई संशय नहीं कि मध्युगीन भक्त कवियों की वाणीअखिल मानवता के प्रति इस दायित्व का बखूबी निर्वहन करती हैं

मध्ययुगीन संतकवि चाहे वेअसम के शंकरदेव हों या गुजराती के नरसी मेहता हों, या कर्नाटक के अलम्मा प्रभु, या हिन्दी के कबीरजायसी, नानक, तुलसी, दादू, मलूक दास और सूरदास हो, सभी के अपने- अपने निजी विश्वासों, इन संत कवियों की कमियों और उस काल की सीमाओं के बावजूदऐसे अनेक सूत्र है जो ऐसे मानव मूल्य को प्रतिष्ठापित करते है जो सार्वदेशिक और सर्वकालिक है|

कबीर दास जब कहते है-कबीरा सोई पीर है जो जाने पर पीर’- वो संत है जो दूसरे की पीड़ा जानता है, जब गुजराती के नरसी मेहता कहते हैं कि वैष्णव जन तो तैने कहिएपीर पराई जाने रे’-वही वैष्णव है जो दूसरे के दुख जानता है, तुलसीदास जब कहते हैं कि परहित सरिस धर्म नहीं भाईपर पीरा सम नहिं अधमाई’-दूसरे को दुख देने के समान कोई पाप नहीं है और दूसरे को सुख पहुँचाने के समान कोई पुण्य नहीं है तो मध्यकालीन संत कवि एक ऐसे मानव धर्म की एक नई व्याख्या कर रहे होते है, एक ऐसे मानव मूल्य की प्रस्तावना लिख रहे होते हैजिसका आधार यह परम विश्वास था कि घट-घट में तेरा सांई बसता| इसलिए संत कवि दुखी जन की पीड़ा को जानने और मानव धर्म को जोड़ने वाले एकता का सूत्र स्थापित कर रहे थे | यह मानव धर्म हिन्दू और इस्लाम से परे हैं।
धर्म-अधर्म की यह नयी परिभाषा संत कवियों ने लोकहित या मानव कल्याण के सिद्धांत पर ही निर्मित किया है | दुनिया के अधिकतर देशों में जब धर्म का प्रभाव बढ़ता है तो पूरे माहौल में एक ही धर्म रहता है। कोई अन्य धर्म नहीं होता और जब धर्म का बंधन टूटता है तो उसके तोड़नेवाले उसी धर्म से उपजते हैंविधर्मी नहीं होते। मध्ययुगीन भक्तिकाल का माहौल मानव धर्मी है | आज के धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदारों के लिए कबीर और जायसी और उनका मानव धर्म एक चुनौती की तरह है | इस मानव धर्म का आधार वह वह मानवीय प्रेम हैं जो मनुष्य को मुट्ठी भर धूल से उठाकर 'वैकुंठी'बनाता है। जिस व्यक्ति के अन्तः में प्रेम रस व्याप्त नहीं है, वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है | तुलसीदास ने प्रेम को ही सबसे बड़ा जीवन मूल्य माना है-सब नर करहिं परस्पर प्रीति, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति | यहाँ उन्होंने स्वधर्मके द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता का और श्रुति नीतिके द्वारा धर्म के मूल तत्वों का पक्ष लिया है, जो विकृत एवं संकीर्ण धार्मिक आडम्बरों से भिन्न है |

कबीरनानकशंकरदेवतुलसीसूर, नरसी मेहताआदि सभी संत कवियों की वाणी जीवन के प्रति आस्था से निकली हुई हैमानवीय सरोकारों से गहरे जुडी हुई है इसलिए वह हृदय की अतल गहराइयों से निकली हुई है। वह अनभै सांचा है अर्थात् अनुभव सत्य और अनभय सत्य से युक्त | इस अनभै सांचा के आधार पर संत-काव्य परंपरागत मानदण्डों को तिलांजलि देते हुए उन नए मानदण्डों की प्रतिष्ठापना करता है जिसमें व्यक्ति की सामाजिक प्रास्थिति के बजाय उसकी स्वयं की अस्मिता और व्यक्तित्व को सर्वोच्च मूल्य माना गया है। संत-काव्य हमारी संवेदनाओं को मानवीयता से जोड़ता हैमनुष्यता की नयी परिभाषा करता है तथा नया धर्म रचता है। यह नया धर्म ही "लोकधर्म" है और इसी लोकधर्म के प्रति समूचा संत-काव्य समर्पित है।

संत कवियों ने जन-जीवन का सीधा साक्षात्कर किया और जीवन में वैसी ही वाणी से फूट पड़ी वे आँखिन देखी पर विश्वास करते थे।इसलिए उनके जीवन अनुभवों और कथनों के बीच अद्वैतताहै जो सिर्फ भारतवर्ष ने दुनिया को दिया है। संत कवि अपनी सरलता और सादगी और प्रेमसिक्त ह्रदय के कारण ही संत थे डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं – "संत-साहित्य भारतीय जनता के प्रेमघृणाआशाओं और वेदना का दर्पण है। वह उसके हृदय की सबसे कोमलसबसे सबल भावनाओं का प्रतिबिम्ब है। उसकी मानवीय सहजता लौकिक जीवन में आस्था और उज्ज्वल भविष्य की कामना का प्रतीक है।"

संत कवियों का मूल्य-बोध सामजिक यथार्थ से उपजा है। जिस परिवेश में संत कवियों ने अपनी पीयूषवर्षिणी वाणी से जन सामान्य को चेतना प्रदान की वह समाज क्षयशील प्रवृतियों से ग्रस्त समाज था | वह अज्ञानअशिक्षा और अनैतिकता का युग था। जीवन के आदर्शों का पतन होने लगाथा,मानवता की भावना का लोप हो चला था मानवीय सद्वृतियाँ– प्रेमक्षमाकरुणाशीलसेवात्याग एवं अहिंसा जैसे चिरंतन मूल्य लुप्त प्राय होने लगे थे | मानव-धर्म जातिवर्गसंप्रदाय आदि में विभक्त हो चला था और जन समुदाय भावनात्मक रूप से विखरता जा रहा था | ऐसे परिवेश में अंधकार से प्रकाश की ओरअसत्य से सत्य की ओरअधर्म से धर्म की ओरपशुता से मानवता की ओरविनाश से सृजन की ओरऔर अंत में असीम से ससीम की ओर ले जाने का श्रेयसंत कवियों को है | इस प्रकार संत काव्य में सांसारिक जीवन के व्यापक क्षेत्र को दृष्टि में रखकर मानवीय मूल्यों का निरूपण किया है |

संत कवियों ने धर्म को उत्तुंग शिखर से उतारकर ठोस ज़मीन पर लोक जीवन से जोड़ दिया और इसके साथ ही धर्म को मनुष्यता से जोड़कर उच्चतर धरातल पर प्रतिष्ठित किया। इस प्रकारजिस नूतन मानव धर्म की प्रतिष्ठा की वह लोकधर्म ही नहीं अपितु विश्वधर्म में परिणत हो गया और निराशा. वासनाप्रतिशोध और प्रतिहिंसा के अन्धकार में भटकते हुए जन-सामान्य का पथ प्रदर्शित करने लगा और भविष्य में भी मार्ग प्रदर्शित करता रहेगा |धर्म तथा भक्ति का स्वर प्रधान होने के साथ ही मनुष्य के भौतिक तथा लौकिक जीवन को स्वीकृति प्रदान करने के कारण संत-काव्य लोक-जीवन का काव्य हो गया है | अर्थात् संत-काव्य की बुनियाद लोक जीवन है। यह मनुष्य की सहजता तथाजन-सामान्य की आशा-आकांक्षा एवं उसकी स्वाभाविक भावनाओं का काव्य है। इसी उनके काव्य में लोक संस्कृति का सौंदर्य है |

विचार और संवेदना दोनों स्तर परसंत कवि सामाजिक अन्याय का दो-टूक प्रतिरोध करते हैं| संत-काव्य ने राजदरबार-मंदिर-मस्जिद के दायरे को तोड़कर जो लोकधारा प्रवाहित की उसका मूल स्त्रोत लोक जीवन ही है। वस्तुतः यह लोक जागरण का साहित्य है क्योंकि इसने शोषित-पीड़ित तथा वंचित जन-समुदाय के बीच आत्म-सम्मान तथा आत्मविश्वास की भावना को जागृत किया। संत कवियों ने जिस सार्वभौम मानव धर्म की हिमायत की उसमें सभी प्रकार की भेद दृष्टि मिथ्या है। मानव-मानव में भेद इस परम अज्ञान का द्योतक है कि सभी एक परम तत्व से उत्पन्न है -
एक जोति से सब उत्पन्ना, को बाभन को शूदा
इसी तत्व दृष्टि से संत कवियों ने जाति-पाँतिछुआ-छूतऊँच-नीच के भेद का विरोध किया और मानवता की प्रतिष्ठा के लिए भेद बुद्धि के निराकरण सर्वोच्च प्राथमिकता देते है | संत कवि समाज में व्याप्त बाह्याडम्बरपाखण्डकर्मकांड आदि का पूर्णतः विरोध करते हैं। उन्होंने धार्मिक मठाधीशों के धार्मिक मनमानेपन, बड़बोलेपन, धूर्तता और दंभ की आलोचना की और इस बात पर बल दिया कि विभिन्न धर्म मतों में प्रचलित कर्मकांडों तथा पूजा-पाठ आदि धर्म की मूल्य दृष्टि के पोषक नहीं हैं |

संत-काव्य में जिन सार्वभौमिक मूल्यों को तरजीह दी गई है वह लोकहितवादी विचारधारा को लेकर चलता है| इसलिए यह सम्पूर्ण विश्व मानवता का आधार है धर्मसाहित्य और राजनीति सबकी एकमात्र कसौटी है लोक हित| तुलसीदास ने स्पष्ट सन्देश दिया है कि
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी सो नृप अवस नरक अधिकारी
राजनीति के मानवीय और अमानवीय चरित्र को पहचानने की कसौटी प्रजा का सुख है | यह तथाकथित आधुनिक, लोकतान्त्रिक और कल्याणकारी राज्य का दंभ भरने देशों के लिए महत्वपूर्ण सीख और चुनौती दोनों है |
सामाजिक पहचान के स्थान पर व्यक्ति की गरिमा को महत्व देने के बावजूद समष्टि हित को ध्यान में रखते हुए इन कवियों ने वर्गीय समाज की व्यक्तिवादिता का लगातार विरोध किया। ये कवि अधर्म जन्य विश्रृंखल समाज का विरोध ही नहीं करते वरन्‌ सहज, सरल एवं सत्य धर्म के स्वरूप को निर्दिष्ट करते हुए कहते हैं कि उसका आधार चरित्रसंयम एवं हृदय तथा मन की स्वच्छता है।वे मनुष्य की चेतना का सकुंचन नहीं वरन विस्तार चाहते हैं। यही संत-काव्य की प्रगतिशीलता है। इसके लिए वे नैतिक आदर्शों का भी प्रतिपादन करते हैं। इन्होंने जहाँ कामक्रोधमोहलोभअहंकार आदि की निंदा की हैवहाँ सत्यदयाप्रेमपरोपकार आदि का महत्व भी बतलाया है। परोपकार को वे संत का पहला लक्षण मानते है |

यही नहीं, कण-कण में एक ही परम तत्व के विद्यमान होने की अप्रतिम आस्था के कारण संत कवियों में सृष्टि के एक-एक तत्व के प्रति अद्भुत आकर्षण और ममता थी| गोरखनाथ ने घोषणा की थी- जोई-जोई पिंडेसोई ब्रह्मांडे अर्थात् जो शरीर में हैवही ब्रह्मांड में है।तुलसीदास ने सियाराममय सब जग जानी, कहकर संसार के सभी पदार्थों में एक ही परम तत्व को व्याप्त माना| इस प्रकार ब्रह्माण्ड में मानव समाज के अतिरिक्त जीव जन्तुओं, वनस्पति जगत और भौतिक पदार्थों का भी एक विशाल संसार है। मनुष्यों का साथ इनका घनिष्ठ संबंध भी होता है। मानव जीव-जन्तु एवं वनस्पतियाँ आध्यात्मिक एकता से परिपूर्ण हैं।जीव-जन्तुओं के प्रति अपने लगाव को कबीर इन शब्दों में व्यक्त करते है– ‘जीव वधत अरू धरम कहते होअधरम कहाँ है भाई|’आधुनिक वैज्ञानिक शब्दों में कहा जाय तो संत कवियों में पारिस्थितिकी के प्रति गहरी सचेतनता थी जो वास्तव में मानव-अनुभूति का ही विस्तार है| कबीर, सूर, जायसी, तुलसी दास, नरसी मेहता, मीरा और शंकर देव सभी संत कवियों ने प्रकृति और ब्रह्माण्ड के विस्तृत परिप्रेक्ष्य में ही सार्वभौमिक मानव मूल्यों की सार्थकता को प्रतिष्ठित किया| आज जबकि प्रकृति के असंतुलन एवं वैषम्य के कारण विश्व मानव समुदाय के अपने अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है, ऐसे समय में संतों की प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम वास्तव में विश्व मानवता के प्रति प्रेम को ही प्रतिष्ठापित करता है | यही कारण है कि संत कवि आधुनिकता की चेतना के अधिक निकट लगते हैं|

संत काव्य की सार्वभौमिकता का एक विशिष्ट कारण उसकी विवेकपरक दृष्टि है| यह मानव विवेक ही अंतरात्मा के सहायक तत्वों में सबसे प्रमुख और विश्वसनीय है | संत कवियों के अनुसार इस मानव विवेक के बरक्स ऐसी कोई भी श्रद्धा और आस्था, जो समाज की विषमता को विधि का विधान मानकर स्वीकार कर ले, केवल अमानवीय वृतियों को जन्म देती है, मानवता के अस्तित्व के समक्ष संकट खड़े करती है और मानवीय गौरव को विकलांग बनाती है | लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उनके पास वैज्ञानिक दृष्टि थी | फिर भी उन्होंने अपनी विवेकपरक दृष्टि से मनुष्य की महत्ता को पहचाना और मानव के गरिमामय जीवन का मार्ग प्रशस्त किया |

मध्यकालीन संत काव्य में निहित मानव धर्म और मानवीय मूल्यों की सार्वभौमिकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बीसवीं सदी में साम्राज्यवाद के खिलाफ सबसे बड़ा और अहिंसक संग्राम छेड़ने वाले गाँधी भी अपना मार्गदर्शन इन संत कवियों से ही प्राप्त करते है | नरसी मेहता कावैष्णव जन तो तैने कहिएपीर पराई जाने रेवह मूल्य है जो देश और काल की सीमाओं से परे मानव मात्र के कल्याण और उनके बीच एक-सूत्रता की प्रतिष्ठापना करता है | संतों ने जटिल परिस्थितियों के मध्य अपनी स्वतंत्र दृष्टि, मानवतावादी चिन्तन पद्धति और दृढ़ संकल्पना शक्ति के द्वारा समाज में व्याप्त विषमता का न केवल विरोध किया अपितु अपनी वाणियों के माध्यम से समतामूलक समाज के लिए आधारभूमि भी प्रस्तुत की।


देवकीनन्दन खत्री: हिन्दी का 'शिराज़ी'



औपनिवेशिक शासन के जिस दौर में प्रशासनिक कार्यों के लिए हिंदी भाषा और उसकी लिपि ‘देवनागरी’ को स्थापित करने के अभियान की शुरुआत हुई तो उस समय हिन्दी का महिमा-मंडन और उर्दू के विरोध के बजाय हिंदी के पक्ष को रचनाशीलता के माध्यम से सशक्त करने वालों में बाबू देवकीनन्दन खत्री का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। मुस्लिम शासन के समय से फ़ारसी ही कई रियासतों की राजभाषा बनी हुई थी। अंग्रेज़ों ने भी सशक्त अरबी-फ़ारसी में लिखी उर्दू को ही संपर्क भाषा के रूप में बनाये रखा था। तत्कालीन समय में हिन्दुस्तान में साक्षरों की संख्या महज़ छः प्रतिशत ही थी और नौकरियों आदि के लिए उर्दू और फ़ारसी के ज्ञान की अनिवार्यता के चलते देश का युवा-वर्ग हिन्दी और नागरी लिपि से दूर होता जा रहा था। ऐसे समय में खत्री जी अपने पठनीय और रोचक उपन्यासों, विशेषकर चन्द्रकान्ताऔर चन्द्रकान्ता संतति के द्वारा तिलिस्म और ऐयारी का ऐसा जादू बिखेरा कि लाखों युवा और पाठक सम्मोहित होकर हिन्दी भाषा और उसकी लिपि देवनागरीसीखने के लिए विवश हो गए | चन्द्रकान्ता मूलत: एक प्रेम कथा है। इस अभूतपूर्व लोकप्रियता से प्रेरित होकर उन्होंने इसी कथा को आगे बढ़ाते हुए चौबीस भागों वाला दूसरा उपन्यास चन्द्रकान्ता सन्तति (1894 1904) लिखा जो चन्द्रकान्ता की अपेक्षा कई गुणा अधिक रोचक और लोकप्रिय भी हुआ। यही नहीं इन कालजयी रचनाओं का रसास्वादन करने के लिए कई गैर-हिन्दी भाषियों ने हिन्दी भाषा सीखी। 'अंग्रेजी ढंग का नावेल' लिखने की आतुरता के बजाय पुरागाथाओं, मिथकों, किंवदन्तियों, लोककथाओं, स्‍मृतियों और पुराणों आदि के माध्यम से कथा की पुरानी परम्परा के आधार पर उन्होंने जिन कथाकृतियों की रचना की, उनका सारा रचना तंत्र बिलकुल मौलिक और स्वतंत्र है। उनका महत्त्व इस आधार पर समझा जा सकता है कि हिन्दी भाषा और उसकी लिपि देवनागरीसे सबसे अधिक संख्या में पाठकों को जोड़ने में बाबू देवकीनन्दन खत्री का योगदान अन्य किसी भी साहित्यकार से अधिक है | यही कारण है कि हिन्दी के सुप्रसिद्ध उपन्यास लेखक श्री वृंदावनलाल वर्मा ने उन्हें हिन्दी का 'शिराज़ी' कहा है। देवकीनन्दन खत्री द्वारा तैयार की गई इसी भूमि पर प्रेमचंद का औपन्यासिक भवन स्थापित होता है जिसे वे भाव और भाषा के संस्कार और परिमार्जन द्वारा स्थापित करते है| 

खत्री जी ने कालजयी उपन्यासों चन्द्रकान्ताऔर चन्द्रकान्ता संतति के अलावा ‘कुसुम कुमारी’, ‘नरेंद्र मोहिनी’, ‘भूतनाथ’, ‘वीरेंद्र वीर’, ‘गोदना’ और ‘काजल की कोठारी’ की भी रचना की | उनकी अधिकांश रचनाओं में तिलिस्म और ऐयारी का सम्मोहन है। 'ऐयारी' को उपन्यास का विषय बनाए जाने को लेकर चन्द्रकान्ता उपन्यास में देवकीनन्दन खत्री ने स्पष्ट किया है कि " आज तक हिन्दी उपन्यास में बहुत से साहित्य लिखे गये हैं जिनमें कई तरह की बातें व राजनीति भी लिखी गयी है, राजदरबार के तरीके एवं सामान भी जाहिर किये गये हैं, मगर राजदरबारों में ऐयार (चालाक) भी नौकर हुआ करते थे जो कि हरफनमौला, यानी सूरत बदलना, बहुत-सी दवाओं का जानना, गाना-बजाना, दौड़ना, अस्त्र चलाना, जासूसों का काम देना, वगैरह बहुत-सी बातें जाना करते थे। जब राजाओं में लड़ाई होती थी तो ये लोग अपनी चालाकी से बिना खून बहाये व पलटनों की जानें गंवाये लड़ाई खत्म करा देते थे। इन लोगों की बड़ी कदर की जाती थी। इसी ऐयारी पेशे से आजकल बहुरूपिये दिखाई देते हैं। वे सब गुण तो इन लोगों में रहे नहीं, सिर्फ शक्ल बदलना रह गया है, और वह भी किसी काम का नहीं। इन ऐयारों का बयान हिन्दी किताबों में अभी तक मेरी नजरों से नहीं गुजरा। अगर हिन्दी पढ़ने वाले इस आनन्द को देख लें तो कई बातों का फायदा हो। सबसे ज्यादा फायदा तो यह किऐसी किताबों को पढ़ने वाला जल्दी किसी के धोखे में न पड़ेगा। इन सब बातों का ख्याल करके मैंने यह चन्द्रकान्तानामक उपन्यास लिखा|"  
देवकीनन्दन खत्री जी की भाषा और शैली को लेकर आलोचकों के बीच काफी बहस हुई | उनकी भाषा-शैली को हिंदी भाषा की हत्या के रूप में भी देखा गया | उनका ध्यान कथाक्रम की तरफ अधिक रहा है, भावचित्रण की ओर कम । वे एक साथ अनेक समांतर घटनाक्रमों और पात्रों को लेकर चलते हैं। पात्रों और घटनाओं के इस अंतर्जाल में वे विभिन्न पात्रों के भावों को चित्रित करने का बहुत कम अवकाश पाते हैं। इसी कारण हिन्दी के विशाल पाठक समूह तैयार करने में खत्री जी के योगदानों की प्रशंसा करते हुए भी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इनकी रचनाओं को विशुद्ध साहित्य की श्रेणी में स्वीकार नहीं करते हैं। तिलिस्म और ऐयारी के अन्य रचनाकारों से या बहुचर्चित हैरी पौटरश्रृंखला की रचनाओं के विपरीत खत्री जी की रचनाओं में तिलिस्म और ऐयारी के चमत्कारों में भी किसी न किसी रूप में विज्ञान और तकनीकी कौशल का वर्णन अवश्य है | चन्द्रकान्ता संतति में तरह तरह के जिन यंत्रों की परिकल्पना की गई है, उन पर वैज्ञानिक अविष्कारों की छाया है और बहुत चीजें ऐसी भी है जो उनकी उर्वर कल्पना शक्ति का परिचायक है | उनकी रचनाओं में जब भी कोई पात्र किसी तिलिस्म को तोड़ता है तो उसे संचालित करने वाली मशीनों व कल-पुर्जों को भी देखता है। इस तरह तत्कालीन दौर में खत्री जी विज्ञान और फैंटेसी के अन्यतम रचनाकार थे | यह कहना अतिश्योक्ति पूर्ण नहीं होगा कि खत्री जी की रचनाशीलता तत्कालीन हिंदी भाषा और समाज की अनिवार्यता थी, जिसे खत्री जी अनन्य समर्पण के साथ निर्वाह किया |

Monday, 24 November 2014

केदारनाथ सिंह : सहजता और लोक आख्यान के जादूगर

केदारनाथ सिंह : सहजता और लोक आख्यान के जादूगर
हिंदी के वरिष्ठतम कवि केदारनाथ सिंह को सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा जाना महज उनके काव्य की उत्कृष्टता का सम्मान नहीं है अपितु उन्हें यह पुरस्कार दिये जाने से स्वयं में ज्ञानपीठ पुरस्कार ही अधिक गौरवान्वित हुआ है | उत्तरप्रदेश के बलिया जिले के चकिया गाँव के किसान परिवार से शुरू हुई जीवन यात्रा ८० वर्ष पूरी कर चुकी है और उनकी सर्जनात्मकता अपनी सम्पूर्ण प्रखरता और उर्जा के साथ अभी भी अक्षुण्ण है| अभी बिलकुल अभी, बाघ, अकाल में सारस, जमीन पक रही है, कब्रिस्तान में पंचायत, उत्तर कबीर और अन्य कवितायेँ, टॉलस्टॉय और साइकिल, सृष्टि पर पहरा केदारजी की कालजयी रचनाएं हैं जिसमें युग-बोध और भाव बोध जीवन की सहज लय में रच-बस कर अभिव्यक्त हुआ है | ज्ञानपीठ पुरस्कार समिति ने अपने बयान में कहा है कि केदारनाथ सिंह अपनी कविताओं में जनपदीय चेतना के लिए जाने जाते हैं| वे कविता में आधुनिकता के साथ-साथ गीतात्मकता, प्रकृति और मनुष्य के बहुआयामी संबंधों को बड़ी सहजता से प्रस्तुत करने के लिए चर्चित हैं।
मै अपने को उन सौभाग्यशाली लोगों में मानता हूँ जिन्हें केदार जी से पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ| वे अद्भुत शिक्षक हैं और निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ और मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ जैसी जटिल संवेदना वाली कविताओं को इतने सरल और सहज रूप से व्याख्यायित करते हुए अपने छात्रों के लिए बोधगम्य बना देना और उनके मन मष्तिष्क में कविता के प्रति रूचि पैदा कर देना उनकी अद्भुत खूबी रही है | मेरी जानकारी में किसी भी छात्र को उनसे कभी भी कोई परेशानी नहीं हुई या शिकायत नहीं रही| व्यक्तित्व में विनम्रता इतनी कि उनके अध्यापन और सर्जनात्मकता में भी झलकती रहती है |
केदारनाथ सिंह ‘तीसरे सप्तक’ के एक प्रमुख कवि थे | इस नाते वे नयी कविता आन्दोलन के अग्रणी कवियों में से एक थे | लेकिन वे कभी भी नयी कविता आन्दोलन की रूढ़ियों और साथ ही साथ यों कहा जाय कि समकालीनता की रूढ़ियों के गुलाम नहीं रहे | समय और परिवेश के साथ हिंदी कविता की बदलती धाराओं, फूटते नए स्वरों और उभरते मूल्य बोधों के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने अपनी कविताई को नया आयाम प्रदान किया लेकिन कथ्य, भाषा और बिम्ब की सहजता को लेकर कभी समझौता नहीं किया | वे अपने आसपास के दैनिक जीवन से विश्व मानव की ओर अग्रसर होते है | ६० से अधिक वर्षों में काव्य रचना उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रही बल्कि उनके व्यक्तित्व का अंग बन गयी है|
निःसंदेह केदारनाथ सिंह समकालीन हिंदी में जनपदीय चेतना और गीतात्मकता के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं| यह लोकजीवन से उनके गहरे रिश्ते का प्रमाण है | वे खेत, खलिहान, कृषि और ग्रामीण संस्कृति से जुड़े ठेठ देशी मुहावरों, जुमलों और शब्दों का इस्तेमाल करते हुए गहन, गंभीर संदेश देने वाली कविताएं रचते हैं, जिसमें इंसानियत, संस्कृति, प्रकृति, पर्यावरण, नव उदारवाद, भूमंडलीकरण सहित देश और दुनिया के एक व्यापक परिवेश को समेट लेते है| उनकी कविताओं की ताकत भी यही है कि वे सहज-सरल शब्दों में बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं- उसका हाथ/अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा/दुनिया को/हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए| भाषा और कथ्य की सहजता उनकी कविताओं का प्राणतत्व है और यही उनकी खूबी है। केदारजी अपने विचारों और संवेदनाओं को अधिकाधिक लोगों तक संप्रेषित करने के लिए बेहद सीधे-सादे ज़ुबान में अभिव्यक्त करते है और इस प्रक्रिया में वे कुछ ऐसा कह जाते हैं जिसका दायरा धर्म, जाति, भाषा, प्रदेश और देश से ऊपर उठते हुए विश्व समुदाय तक फैल जाता है। वे अक्सर साधारण सी दिखने वाली घटनाओं के माध्यम से असाधारण बात कह जाते है | लेकिन साठ के दशक में कुशीनगर में बुद्ध की निर्वाण स्थली पर स्थित स्तूप के साथ खड़े विशाल वट-वृक्ष को काट दिये जाने की घटना उनके लिए सामान्य और असाधारण घटना नही थी | मंच और मचान में उस असाधारण घटना को केदार जी समकालीन नैतिक संकट और सांस्कृतिक संकट के रूप देखते है क्योंकि वट-वृक्ष पर पड़ने वाली कुल्हाड़ियों की ठक के नीचे जाने कितनी चहचह/कितने पर/कितनी गाथाएँ/कितने जातक/दब जाते थे और प्रत्येक ‘ठक’ आधुनिकता के समक्ष विकट सवाल खड़े करता है, जो अभी भी उसी तरह से टंगा है जैसे चीना बाबा का घर|
उनकी कविताओं में गाँव की स्मृतियाँ ही सहज रूप में ही नहीं कौंधती हैं बल्कि गाँव के खेत-खलिहान, पेड़-पौधे, गली चौपाल और पशु पक्षी भी पूरी जीवन्तता के साथ उपस्थित होते हैं और पूरे ग्रामीण सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में मानव सबंधों के बनते बिगड़ते स्वरुप को उजागर कर जाते है जो पाठक के मन-मष्तिष्क पर लम्बे समय तक छा जाती हैं। उनमें ठेठ गंवई किसान का जीवन मुखर हुआ है और वे कुदाल जैसे ठेठ ग्रामीण किसानी उपकरण के माध्यम से शहर की विसंगतियों पर अंगुली उठाते है | ‘जाड़ों के शुरू में आलू’ कविता में केदार जी आलू के माध्यम से लूट खसोट वाली व्यापारिक संस्कृति को उजागर करते है-वह जमीन से निकलता है और सीधे/बाजार में चला जाता है|’ किसान की पैदावार बाजारों में बिक जाती है जहाँ दलाली, सट्टेबाजी और लूट खसोट का माहौल इस कदर है कि किसान इन सबके कुचक्र में पीस जाता है | जिस आलू को किसान अपनी मेहनत से उपजाता है वही आलू व्यापारियों के बीच जाकर दहशत पैदा कर देता है| `दानेकविता की पंक्तियाँ- नहीं हम मंडी नहीं जाएंगे/खलिहान से उठते हुए कहते हैं दाने/जाएंगे तो फिर लौटकर नहीं आएंगे/जाते-जाते कहते जाते हैं दाने के माध्यम से केदार जी बहुत सहजता से गाँवो से शहरों की ओर प्रवास और फिर लौटकर नहीं आने की विडंबना को बयां कर जाते है| वे सड़क पार करने को भी सड़क के पार बेहतर दुनिया की और टूटे हुए खड़े ट्रक पर चढ़ती घास को एक बदलाव की उम्मीद के रूप में देखते है| लेकिन शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की अंधाधुंध दौड़ में जिस तरह से कृत्रिम खूबसूरती के लिए कंक्रीट और सड़कों का विस्तार किया जा रहा है उसमें घास के लिए जगह नहीं बची है और वही घास दुनिया के तमाम शहरों से /खदेड़ी हुई जिप्सी है वह/  तुम्हारे शहर की धूल में / अपना खोया हुआ नाम और पता खोजती हुई तमाम दरवाज़े पीट रही है पर विडम्बना यह है कि प्राकृतिक सौन्दर्य से महरूम होते जा रहे शहरों में घास के लिए कोई जगह नहीं बची है | इसलिए पर्यावरण की सुरक्षा के सवाल को वे अपने सीधे सादे अंदाज से उठाते है और कहते हैं कि आदमी के जनतंत्र में / घास के सवाल पर / होनी चाहिए लंबी एक अखंड बहस / पर जब तक वह न हो / शुरुआत के तौर पर मैं घोषित करता हूं / कि अगले चुनाव में / मैं घास के पक्ष में / मतदान करूंगा और इस तरह वे पर्यावरण और प्रकृति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते है | विकास और जीडीपी की अंधी दौड़ में जिस तरह से धरती और उसके संसाधनों का दोहन और विनाश किया जा रहा है, इसके बावजूद यह पृथ्वी रहेगी में कवि को भरोसा है कि जैसे दाने में रह लेता है घुन/ यह रहेगी प्रलय के बाद भी मेरे अंदर“” भले ही ‘मेरी जबान’ में रहे या ‘मेरी नश्वरता’ में रहे | इसलिए वे फूल को, लहरों को, बादलों को, माटी को हक़ देने की मांग करते है, ताकि नए मानव की पताका ऊपर उठती जाय |
महत्वपूर्ण यह है कि बाजार पर आधारित उपभोक्ता वादी संस्कृति जैसे जैसे हावी होती गई, वैसे वैसे केदारनाथ सिंह का जीवन की सहजता की ओर उन्मुख होता गया है | ‘कुछ सूत्र जो किसान बाप ने बेटे को दिए’ इसका सशक्त प्रमाण है | यह नॉस्टैल्जिया नहीं है, बल्कि बहुप्रचारित आधुनिकता के नाम पर परोसी जा रही अपसंस्कृति से अपनी सभ्यता को अक्षुण्ण रखने की एक संवेदनशील कवि की कवायद है और जटिल होते जा रहे समय में परिवेश में मानवीय संबंधों की सहजता का सुकून हैं | जब वे पेड़ों में दबी कहानियां, पत्थरों में हड़प्पा के बसे होने की संभावना, एक दमदार आवाज वाली बुढ़िया का घर, जिसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने का प्रस्ताव करते है, तो क्या यह निरी नॉस्टैल्जिया है?

भोजपुरी से नाभिनाल बद्ध केदार जी भाषा में भोजपुरी के शब्द अनायास ही आ जाते है और भावो और विचारों को सहज और रोचक बना जाते है| भोजपुरी भाषा क्षेत्र से आने के कारण इस प्रदेश की सांस्कृतिक परंपरा और  विरासत से गहरे जुड़े हुए है और यही उनकी लेखकीय ऊर्जा का स्रोत भी है। यहां के जीवन के सुख-दुख और राग-रंग के बीच मैं पला बढ़ा हूं।  वे स्वीकार करते है कि ‘पुरबिया दुनिया’ उनकी आत्मा में बसी है लेकिन उनकी कविता में सम्पूर्ण मानवता समायी हुई है । उनकी भोजपुरी की क्रियाएं  खेतों से आई है और संज्ञाएं पगडंडियों से चलकर | इसी क्रम में भोजपुरी को लोकतंत्र से पहले का ‘ध्वनि- लोकतंत्र’ घोषित करते है जिसकी सबसे बड़ी लाइब्रेरी जबान है | लेकिन उनकी भोजपुरी हिंदी से अलग नहीं है | वे लिखते है, ‘हिंदी मेरा देश है / भोजपुरी मेरा घर / ....मैं दोनों को प्यार करता हूं / और देखिए न मेरी मुश्किल / पिछले साठ बरसों से /दोनों को दोनों में / खोज रहा हूं। परंपरा का यही धरातल है जिस पर कविता का सम्पूर्ण ताना बाना बुना जाता है | फिर वे जन जीवन के बीच हिंदी की वर्णमाला को रचित होते देखते हैं- यह मेरे लोगों का उल्लास है / जो ढल गया है मात्राओं में, / अनुस्वार में उतर आया है कोई कंठावरोध...............बिना कहे भी जानती है मेरी जिह्वा /........ कि आती नहीं नींद उसकी कई क्रियाओं को / रात-रात भर / दुखते हैं अक्सर कई विशेषण|

हाल में देश के भीतर भाषा की सियासत को लेकर जो विवाद का माहौल बना है और भाषा को राजनीति का मोहरा बनाकर शाह और मात का खेल खेलने वालों से वे विनम्रता पूर्वक ‘करबद्ध’ अनुरोध करते है कि राज नहीं–भाषा/भाषा-भाषा-सिर्फ भाषा रहने दो क्योंकि वे मानते है इसमें भरा है/पास-पड़ोस और दूर-दराज की/इतनी आवाजों का बूँद-बूँद अर्क/कि मैं जब भी इसे बोलता हूँ/तो कहीं गहरे/अरबी तुर्की बांग्ला तेलुगु/यहाँ तक कि एक पत्ती के/हिलने की आवाज भी| इसप्रकार किसी देश की भाषा का उस देश की परंपरा और संस्कृति से अभिन्न एवं हिंदी भाषा की अन्य देशी-विदेशी भाषाओँ से परस्पर अन्योन्याश्रित सबंध का भी बयान करते है|

केदारनाथ की कविताओं में संकीर्णताओं के लिए कोई जगह नहीं है | जितनी सहजता और सरलता उनकी भाषा में है उतनी ही उदारता उनके भाव-बोध में भी | उनके लिए कुम्भनदास और तुलसीदास से लेकर निराला, त्रिलोचन, शमशेर और राजेंद्र यादव सभी समान रूप से आदर प्राप्त करते है| यहाँ तक कि ज्यॉ पाल सार्त्र भी उनकी कविताओं में पूरे सम्मान के साथ अपनी जगह बना जाते है और भोजपुरी के लोकप्रिय नाट्यकर्मी भिखारी ठाकुर भी बदलते सांस्कृतिक परिवेश में अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाते हैं। उनके यहाँ झपट्टा मारते हुए स्वामीनाथन आते है तो नामवर सिंह, निर्मल वर्मा से कुछ कहते नजर आते है |
सहजता, संवेदना और आख्यान के इस महान जादूगर को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाना स्वागत योग्य है, वे निःसंदेह इसके हक़दार है |

शिवानन्द उपाध्याय